नेताओं का खुलेआम रोना जनता से जोड़ता है या कमज़ोर दिखाता है?

    • Author, निकोला ब्रायन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

कइयों को लिए अब ये बात पुरानी हो गई है कि पुरुष नहीं रोते. लेकिन राजनीतिक नेताओं को लेकर क्या कहेंगे. वो रोते हैं तो लोग क्या महसूस करते हैं?

बुधवार को वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर वॉगन गेथिंग वेल्स पार्लियामेंट में अविश्वास प्रस्ताव के पहले रोते दिखाई दिए. गेथिंग अविश्वास प्रस्ताव हार गए थे.

इस तरह गेथिंग चर्चिल से लेकर ओबामा तक, दुनिया के ऐसे नेताओं में शामिल हो गए, जिनके आंसू सार्वजनिक जगहों पर बहते दिखे.

क्या इस तरह सार्वजनिक जगहों पर रोने वाले नेता ज्यादा मानवीय या प्रामाणिक माने जाते हैं या फिर इसे उनकी कमजोरी के एक संकेत के तौर पर देखा जाता है.

ग्यूटो हेरी नंबर 10 के पूर्व कम्यूनिकेशन डायरेक्टर रहे हैं. वो पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के जमाने में काम कर चुके हैं.

वो कहते हैं कि लोग चाहते हैं कि आप उनकी भावनाओं से जुड़े रहें. भावनात्मक तौर पर सजग रहें.

लोग नेताओं को कमजोर नहीं देखना चाहते

लेकिन क्रूर सच्चाई तो ये है लोग नेताओं को कमजोर नहीं देखना चाहते. आपमें कितनी भी करुणा क्यों न हो और आप अपने चैंबर में रोते हुए पाए जाते हैं तो माना जाता है कि आप ताकतवर नहीं हैं.

हेरी कहते हैं कि किसी भी राजनीतिक नेता के लिए असली और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि उसके अंदर कितनी असलियत है.

वो कहते हैं, ''जो लोग स्वाभाविक रूप से आकर्षक नहीं हैं उन्हें अगर मुस्कुराने के लिए कहें तो वो अजीब लग सकते हैं. जैसे- गॉर्डन ब्राउन और टेरेसा मे जैसे लोग एक हद तक ऐसा लग सकते हैं.

उन्होंने कहा,'' इसका एक बेहतरीन उदाहरण है जब एड मिलिबैंड जो एक बेकन सैंडविच खाने की कोशिश कर रहे थे या विलियम हेग बच्चों के साथ बेसबॉल की कैप उठाने की कोशिश कर रहे थे. ये उन राजनीतिक नेताओं में शुमार हैं जो इस बात का खमियाजा भुगतते रहे हैं कि वो जो हैं उससे अलग दिखने की कोशिश कर रहे थे.''

नेताओं की भावनाओं का मजाक न उड़ाएं

राजनीति के बाहर और राजनीति के अंदर कई ऐसे नेता हैं जिन्हें लोगों ने कैमरे पर रोते देखा है. विंस्टन चर्चिल सार्वजनिक जगह पर रोने के लिए जाने गए.

ब्रिटेन की महारानी उस समय अपने आंसू पोछती दिखाई दीं जब 1997 में उनका उनका याच सर्विस से हटा लिया गया. या फिर 2019 में भी वो सेनोटेफ में रिमेंबरेंस सनडे सर्विस के दौरान रोती दिखाई दी थीं.

चासंलर जॉर्ज ओसबोर्न के आंखों में भी 2013 में उस समय आंसू दिखाई दिए थे जब 2013 में मार्गरेट थैचर के शव को दफनाया जा रहा था.

अपने कार्यकाल के दौरान पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा कई बारे सार्वजनिक तौर पर रोते दिखाई दिए.

2012 में सैंडी हूक नरसंहार पर और 2015 में एरेथा फ्रैंकलिन के परफॉरमेंस के दौरान वो रोते दिखाई दिए.

2019 में प्रधानमंत्री पद छोड़ने का एलान करते हुए टेरेसा मे रो पड़ी थीं.

गेथिंग जिस तरह से रो रहे थे और और वेल्श सरकार के चीफ व्हीप जेन हट जिस तरह उन्हें शांत करा रही थीं वो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. गेथिंग टिश्यू पेपर से आंसू पोछते दिखाई दिए.

लोगों ने इसे घड़ियाली आंसू कहा क्योंकि वो कैमरे पर आंसू बहाते नजर आए. खुद को शर्मसार करते हुए. उन पर लैंगिंक टिप्पणी भी गई. कहा गया कि 'वो छोटी बच्ची जैसे रो रहे हैं.'

लेकिन मिस्टर हेरी का मानना है कि वे आंसू असली थे. उनका कहना है कि ऐसे मौकों पर जो भावनात्मक चोट पहुंचती है उसे कम करके नहीं आंकना चाहिए.

वो कहते हैं, '' मैंने बोरिस के हटने को काफी करीब से देखा है. यह मेरा निजी अनुभव है. ये काफी क्रूर था. मैंने उनके हताश-निराश लम्हे देखे थे. लेकिन ये सब आमतौर पर बंद दरवाजे के अंदर ही हुआ.''

कभी पुरुषों का रोना कमजोरी माना जाता था लेकिन अब नहीं

वो कहते हैं कि सार्वजनिक तौर पर रोना हमेशा जोखिम भरा होता है क्योंकि लोग सोचते हैं कि आपके आंसू नकली हैं और आप लोगों की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.

''कई बार राजनीति और जिंदगी के किसी भी क्षेत्र में आप हताशा और बेचैनी भरा कदम उठाते हैं. जैसे आपके पार्टनर ने आपको छोड़ दिया है और चाहते कि आप पर लोगों को दया आए. लेकिन ये अपील इतनी ताकतवर नहीं होती कि लोगों पर आपको विश्वास हो.

वॉरविक यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग के एमिरेटस प्रोफेसर और ब्रिटिश एकेडमी के फेलो बर्नार्ड कैप कहते हैं कि अब तक के इतिहास में सार्वजनिक जगहों पर रोने के प्रति लोगों की धारणाएं कई बार बदली हैं.

उन्होंने कहा, ''ये पेंडुलम की तरह है. जैसै कई कालखंडों में जैसे प्राचीन ग्रीस या रोम या फिर इंग्लैंड में मध्यकाल लोग पुरुष खुल कर अपनी भावनाएं व्यक्त करते थे. इनमें रोना भी शामिल था. गुस्से और रोष का भी इजहार सार्वजनिक तौर पर होता था.''

''लेकिन दूसरे कालखंड जैसे पुनर्जागरण काल यानी 18वीं और शुरुआती 20वीं सदी में भावनाओं को नियंत्रित रखना सही माना जाता था.''

उन्होंने कहा कि आज के दौर में लोग राजनीति और खेल जैसे क्षेत्र में लोग खुल कर अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं.

उन्होंने कहा, ''किसी दिग्गज बिजनेस लीडर के बारे में ये सोचना अकल्पनीय है कि कंपनी के बोर्ड से हटाए जाने पर वो रोएगा. लेकिन राजनीति में थैचर और थेरेसा मे दोनो पद छोड़ते हुए रोई थीं. इसी तरह विंस्टन चर्चल भी हाउस ऑफ कॉमन्स में रोए थे. ब्लिट्ज में बमबारी वाली जगहों पर दौरा करते हुए भी रो पड़े थे.''

आंसुओं को छिपाने की जरूरत नहीं

थैचर और मे दोनों पद छोड़ने के बाद रोते हुए आहत दिख रही थीं.

जबकि डेविड कैमरन अपने इस्तीफे के दौरान गुनगुनाते दिखे. ऐसा करके वो दिखाना चाहते थे कि उनका ख़ुद पर काबू है.

सवाल ये है कि सार्वजनिक जगहों पर रोने को कैसा देखा जाता है.

वो कहते हैं, '' वॉगन गेथिंग केस बहुत ज्यादा आत्मदया का मामला है. ये स्वीकार्य नहीं है. डी-डे वेटरन्स में शामिल काफी लोगों के आंखों के आंसू देखे गए. लेकिन वो खुद नहीं रो रहे थे. वे अपने शहीद साथियों की याद में रो रहे थे.

मार्क बोरकोवस्की एक क्राइसिस पीएआर कंस्लटेंट्स हैं जो बड़ी अंतरराष्ट्रीय हस्तियों और बड़ी कंपनियों के लिए काम करते हैं.

उन्होंने कहा कि अगर उन्हें गेथिंग को सार्वजनिक जगह पर रोने के बाद सलाह देनी होती तो वो उन्हें कहते है कि इसे छिपाने (आंसुओं को) की जरूरत नहीं है. इसका फायदा लीजिए. लेकिन इस पर इतना ज्यादा निर्भर भी मत होइए. अपनी प्रामाणिकता को बताने के लिए दूसरे तरीकों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

आदमी कमजोर है इसे मान लेना चाहिए

मार्क बोरकोवस्की कहते हैं कि ब्रिटेन की जनता जनता अब नेताओं की ओर से तरह अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के प्रति ज्यादा खुले हैं.

उन्होंने कहा, ''राजनीतिक नेताओं से कभी ये उम्मीद की जाएगी कि वो अपनी ताकत को लोगों के सामने दिखाएंगे. कमजोरियों को छिपाएंगे. लेकिन हम मनुष्य हैं और कमजोर भी. हम गलतियां करते हैं और दुनिया इसे स्वीकार भी करती है. कोई भी मुकम्मल नहीं है. लेकिन ईमानदारी तो अभी भी लोगों में बरकरार है.''

वो कहते हैं मुद्दा ये है कि अब इन चीजों को पीछे छोड़ कर कैसे आगे बढ़ाया जाए. संकट में हमेशा कोई मौका मौजूद होता है.

भारत में नेताओं का रोना

ये तो हुई दुनिया भर के नेताओं की बातें, भारतीय संदर्भ में कुछ उदाहरण मौजूद हैं.

भारत की पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी को कम से कम सार्वजनिक तौर पर रोने से काफी परहेज़ था.

उनके छोटे पुत्र संजय गाँधी की मौत पर जब उनके साथी संवेदना व्यक्त करने गए तो वह यह देख कर हतप्रभ रह गए कि इतने बड़े सदमे के बाद भी उनकी आँखों में आँसू नहीं थे.

भारत के लोगों को वह दृश्य भूला नहीं है जब अपने बेटे की शव यात्रा के दौरान उन्होंने एक धूप का चश्मा लगा रखा था कि अगर उनकी आँखे नम भी हो रही हों तो देश के लोग यह न देख पाएं कि मानवीय भावनाएं उन्हें भी प्रभावित कर सकती हैं.

लाल कृष्ण आडवाणी को भी कई मौक़ों पर भावुक होते देखा गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई टीवी इंटरव्यू के दौरान भावुक दिखे हैं. पीएम मोदी चुनावी सभाओं में भी कई बार भारी गले के साथ बोलते सुने गए.

- बीबीसी हिंदी के इनपुट के साथ

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