आत्मविश्वास कैसे बना सकता है आपको शारीरिक और मानसिक रूप से मज़बूत

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“मुझे जैसे ही पता चला कि मैं कैंसर की शिकार हो चुकी हूँ तो मेरा दिमाग़ कुछ सेकंड के लिए सुन्न हो गया. लेकिन फिर मैंने अगले ही पल तय कर लिया कि मुझे जितना जल्दी हो इस जानलेवा बीमारी से छुटकारा पाना है.’’

यह कहना है दिल्ली से सटे ग़ाज़ियाबाद इलाक़े में रहने वाली अनीता शर्मा का.

वो बताती हैं कि जब उन्हें पता चला कि उन्हें स्तन या ब्रेस्ट कैंसर हो चुका है तो थोड़ा सदमा लगा. उनके मुताबिक़, “मेरे परिवार का हाल तो और भी ख़राब था.”

उनके अनुसार, “फिर मैंने ठान लिया कि इससे हार नहीं मानने वाली हूँ. एक हफ़्ते बाद ही मैंने अपना ऑपरेशन कराया और कभी भी इस ख़्याल को ख़ुद को हावी नहीं होने दिया कि मैं किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हूँ.’’

अनीता का ऑपरेशन साल 2013 में हुआ था. वे अब एक सामान्य जीवन जी रही हैं. वो लोगों को सकारात्मक सोच बनाए रखने के लिए प्रेरित भी कर रही हैं.

वे न केवल ख़ुद नियमित तौर पर कसरत करती हैं बल्कि लोगों को योग और मेडिटेशन सिखाती भी हैं.

योग और मेडिटेशन का महत्व

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ये अनीता शर्मा की इच्छाशक्ति ही थी जिसने उन्हें कभी कमज़ोर नहीं पड़ने दिया. वे जानती थीं कि उनकी बीमारी चुनौतीपूर्ण है लेकिन अपने विश्वास के ज़रिए ही वह उससे सहजता से निपटने में सफल रहीं.

जानकार मानते हैं कि अगर आप ख़ुद पर विश्वास रखें तो शारीरिक और मानसिक रूप से मज़बूत बन सकते हैं.

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मिसिसिपी स्टेट यूनिवर्सिटी के एक्सरसाइज फिजियोलॉजी विभाग से जुड़े डॉ. जचारी एम गिलेन कहते हैं कि आत्मविश्वास ख़ुद को प्रेरित करने में मदद करता है और इसका सकारात्मक असर होता है.

डॉ. जचारी एम गिलेन, बीबीसी रील्स से बातचीत में कहते हैं, “इससे एपिनेफ्राइन, एड्रिनालिन और नोराएड्रिनालिन हार्मोन के स्तर में भारी इजाफा होता है, जो ताक़त का अहसास बढ़ाने के लिए जाने जाते हैं.’’

डॉ. गिलेन के मुताबिक़, “अगर पूरे आत्मविश्वास के साथ करसत करें तो मांसपेशियों की ताक़त काफ़ी ज़्यादा बढ़ाई जा सकती है. एथलीटों की ताक़त का असली राज़ यही है.”

वह कहते हैं, “मांसपेशियां जितनी बड़ी होती हैं, शरीर उतना ही मज़बूत और ताक़तवर होता है. जो एथलीट ज़्यादा ताकतवर होते हैं, उनकी मांसपेशियों का आकार उतना ही बड़ा होता है.”

सकारात्मक सोच और ख़ुद पर विश्वास क्यों ज़रूरी

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डॉ. जचारी एम गिलेन के मुताबिक़, “मांसपेशियां शरीर की ज़रूरतों के हिसाब से अपनी भूमिका निर्धारित करने में सक्षम होती है. आम आदमी भले ही किसी एथलीट जितना शानदार प्रदर्शन नहीं कर सकता, लेकिन वह ताक़तवर हो सकता है और अपने प्रदर्शन में लगातार सुधार ला सकता है. वहीं, सकारात्मक सोच आपको अपने लक्ष्य की तरफ एकाग्र करने में भी मददगार साबित होती है.”

जैसा, अनीता शर्मा के मामले में साफ़ नज़र आता है. इलाज के दौरान उनका दाहिना हाथ ही ख़राब हो गया था.

अनीता ने बीबीसी के सहयोगी आर द्विवेदी को बताया कि कीमो के दौरान ग़लत ढंग से दवा चढ़ने के कारण उनका हाथ अचानक सूज गया और फिर तीन उंगलियों ने काम करना बंद कर दिया.

अनीता बताती हैं कि पहले तो उन्हें लगा था कि इस हाथ से कोई काम ही नहीं कर पाएंगी. लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और धीरे-धीरे इन उंगलियां को चलाती रहीं. अब चाहे आटा गूंथना हो या फिर कोई वजन वाली चीज उठाना, इन उंगलियों के टेढ़े होने के बावजूद उन्हें रोज़मर्रा के कामों में कोई दिक्क़त नहीं होती.

ख़ुद को कभी असहाय महसूस न करें

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अनीता का मानना है कि इंसान को किसी भी हालत में ख़ुद को असहाय नहीं मानना चाहिए और ख़ुद पर भरोसा होना ही सबसे बड़ी ताक़त है. यही वजह है कि ऑपरेशन के बाद भी उन्हें एकदम निढाल होकर बिस्तर पर पड़े रहना पसंद नहीं था.

अनीता को जुलाई 2013 में पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है और एक हफ़्ते बाद ही उन्होंने ऑपरेशन करा लिया. ऑपरेशन के अगले दिन से ही वह वॉशरूम तक जाने में भी किसी की मदद नहीं लेती थीं.

वे सकारात्मक सोच पर ज़ोर देती हैं.

उनका कहना है कि कसरत शरीर को मज़बूत बनाती है और सकारात्मक सोच से मानसिक दृढ़ता बढ़ती है और उसके आगे हर कठिनाई या चुनौती छोटी नज़र आने लगती है.

मनोरोग में भी कारगर है कसरत

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विशेषज्ञों की मानें तो मनोरोग की समस्या अगर ज्यादा गंभीर न हो तो योग और व्यायाम की मदद से भी इस पर काफ़ी हद तक काबू पाया जा सकता है.

देहरादून स्थित राजकीय दून मेडिकल कॉलेज में वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. जेएस बिष्ट ने बीबीसी के सहयोगी आर द्विवेदी से कहा, “फिजिकल फिटनेस आपकी मांसपेशियां मज़बूत करके शारीरिक क्षमता को तो बढ़ाती ही है, यह मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से भी बहुत अहम साबित होती है.”

डॉ. बिष्ट कहते हैं, “घबराहट, डिप्रेशन, एंजाइटी जैसी मानसिक समस्याओं से उबरने में नियमित एक्सरसाइज से बेहतर कुछ नहीं हो सकता है.”

कौन-सी एक्सरसाइज करना ज़्यादा बेहतर है?

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डॉ. जेएस बिष्ट का कहना है कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को अलग करके नहीं देखा जा सकता और इसमें आत्मविश्वास भी अहम भूमिका निभाती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की परिभाषा में भी दोनों को एक-दूसरे का पूरक माना गया है.

वे बताते हैं कि तमाम मनोचिकित्सक अपने मरीज़ों को दवाओं के साथ नियमित व्यायाम की सलाह देते हैं क्योंकि शारीरिक तौर पर सक्रिय रहने वाले लोगों के लिए मानसिक चुनौतियों से उबरना ज्यादा आसान साबित होता है.

वे कहते हैं चाहे व्यक्ति किसी भी उम्र का हो, उन्हें कसरत ज़रूर करनी चाहिए क्योंकि इसके तमाम फ़ायदे हैं.

  • करसत करने से मांसपेशियां मज़बूत होती है और उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है.
  • नियमित तौर पर जॉगिंग, एरोबिक, रस्सीकूद जैसी गतिविधियां फ़ायदेमंद होती हैं.
  • बैडमिंटन, टेबिल टेनिस जैसे खेलों में हाथ आजमाने से भी शारीरिक क्षमता बढ़ती है
  • अगर ज्यादा कुछ संभव न हो तो ब्रिस्क वॉकिंग को आजमाया जा सकता है.
  • बढ़ती उम्र में याददाश्त दुरुस्त रखने में बेहद कारगर है हल्की-फुल्की कसरत

जचारी एम गिलेन कहते हैं, आत्मविश्वास हो तो कसरत के सहारे आप अपनी मांसपेशियों को मजबूत कर एथलीट जैसी ताकत हासिल कर सकते हैं. लेकिन अति-आत्मविश्वास से बचना भी बहुत जरूरी है.

वे कहते हैं कि अभ्यास के दौरान अपनी मांसपेशियों की आवाज की कतई अनसुनी न करें, जितना आराम से संभव हो, उतनी ही कसरत करें और भार उठाने में कतई जल्दबाजी न दिखाएं. किसी दिन कम तो किसी दिन अधिक भार उठाने की कोशिश करें. इससे मांसपेशियां आसानी से शरीर की जरूरतों के हिसाब से ढल जाएंगी. साथ ही वे कसरत के बाद तुरंत प्रोटीन लेने की सलाह देते हैं.

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