चीन-भूटान बातचीत के बीच भूटान नरेश का भारत दौरा क्यों है अहम?

नरेंद्र मोदी के साथ भुूटान के किंग

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    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भूटान नरेश जिग्मे ख़ेसर नामग्याल वांगचुक जब रविवार को नई दिल्ली पहुँचे, तो उनका स्वागत करने के लिए भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर एयरपोर्ट पर खड़े थे.

भूटान दो ताक़तवर पड़ोसियों चीन और भारत के बीच बसा एक छोटा सा देश है. इसकी भौगोलिक स्थिति इसे भारत और चीन दोनों के लिए ख़ास बना देती हैं.

भूटान नरेश का भारत दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब चीन ने भूटान के साथ सीमा विवाद सुलझाने को लेकर फिर से बातचीत की है.

ऐसे में ये दौरा और भी अहम हो जाता है. पिछले महीने चीन और भूटान के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए 25वें दौर की बातचीत हुई.

चीन गए भूटान के विदेश मंत्री तांडी दोरजी ने संकेत दिए कि भूटान चीन के साथ अपने सीमा विवाद को जल्द से जल्द सुलझा लेना चाहता है.

दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध स्थापित होने के संकेत भी भूटान के विदेश मंत्री की यात्रा के बाद आए. चीन के मीडिया में इससे जुड़ी ख़बरें भी प्रकाशित हुई हैं.

चीन का सिर्फ़ दो ही देशों के साथ सीमा विवाद है. एक भारत और दूसरा भूटान.

चीन ने हाल के दशकों में वैश्विक स्तर पर तरक्की की है और भूटान पर उसके साथ सीमा विवाद को सुलझाने का दबाव बढ़ रहा है.

जबकि भारत भूटान का सबसे क़रीबी देश है और एक अहम पक्ष भी है.

भारत ने भूटान में अरबों डॉलर का निवेश किया है. भूटान की विकास परियोजनाओं का भारत ने ना सिर्फ़ खाका खींचा है, बल्कि उनमें भारी निवेश भी किया है.

भूटान के साथ भारत के एतिहासिक रिश्ते

नरेंद्र मोदी के साथ भूटान के किंग

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ऐसे में भूटान के चीन के क़रीब खिसकने की ख़बरों ने भारत में चिंताएँ पैदा की हैं.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ और इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू) के पूर्व प्रो-वाइस चांसलर महेंद्र पी लांबा कहते हैं, “भारत का भूटान के साथ ऐतिहासिक, पारंपरिक, भौगोलिक, संस्कृतिक और आर्थिक संबंध है. ये बहुत विस्तृत संबंध हैं, जबकि चीन के साथ भूटान का इन सभी क्षेत्रों में संबंध नहीं है. भारत का भूटान पर जैसा प्रभाव है या भूटान के विकास में भारत का जो योगदान रहा है, उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती है.”

भूटान और चीन के बीच उत्तरी और पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में सीमा विवाद है. लेकिन इसमें सबसे अहम है डोकलाम.

रणनीतिक रूप से ये एक अहम पठार है और जो ऐसी जगह पर है, जहाँ भारत, चीन और भूटान की सीमाएँ मिलती हैं.

भूटान और चीन दोनों ही इस क्षेत्र पर दावा करते हैं और भारत भूटान के दावे का समर्थन करता है.

डोकलाम भारत के लिए रणनीतिक और सुरक्षा दृष्टि से ख़ास अहमियत रखता है. ये भारत को पूर्वोत्तर भारत से जोड़ने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर के क़रीब है और अगर इस पर चीन का प्रभाव बढ़ता है तो ये इस अहम कॉरिडोर के लिए सुरक्षा ख़तरा हो सकता है.

प्रोफ़ेसर लांबा कहते हैं, “चीन ने जिस तरह से डोकलाम में अड्डा जमाने का प्रयास किया है, वो भारत के लिए बहुत चिंता की बात है और चुनौतीपूर्ण भी है. डोकलाम ऐसी जगह है जहाँ भारत, भूटान और चीन की सीमाएँ मिलती हैं. चीन ने डोकलाम पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश की है और उसका मक़सद स्पष्ट है.”

भूटान की चीन से बातचीत के मायने

भूटान नरेश के साथ विदेश मंत्री एस जयशंकर

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वहीं दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हेमंत अदलखा मानते हैं कि चीन और भूटान के बीच सीमा विवाद पर बातचीत होना भारत के लिए गंभीर विषय है.

प्रोफ़ेसर हेमंत अदलखा कहते हैं, “ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि दोनों देश जल्द से जल्द सीमा विवाद को सुलझाना चाहते हैं और जल्द से जल्द कूटनीतिक संबंध बहाल करना चाहते हैं. अगर ऐसा हुआ तो भारत के लिए इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. जो बयान आए हैं, उनके हिसाब से ये कहा जा रहा है कि चीन ने भूटान को एक पैकेज देने का प्रस्ताव दिया है. पहले भी चीन ऐसा प्रस्ताव दे चुका है, लेकिन इस बार के प्रस्ताव में डोकलाम भी शामिल है. ये ख़ासतौर से भारत के लिए गंभीर विषय है.”

डोकलाम को लेकर भूटान अकेले कोई फ़ैसला नहीं लेगा इसके संकेत भूटान के प्रधानमंत्री लोते त्शेरिंग ने बेल्जियम के अख़बार ला लिब्रे को दिए साक्षात्कार में दिए थे.

उन्होंने कहा था, “अकेले भूटान इस समस्या का समाधान नहीं कर सकता है. यहाँ हम तीन हैं. कोई छोटा या बड़ा देश नहीं है, तीन बराबर देश हैं, हर कोई तीसरे को गिन रहा है. हम तैयार है. जैसे ही बाक़ी दोनों पक्ष तैयार हो जाते हैं, हम चर्चा करने के लिए तैयार हैं.”

प्रोफ़ेसर अदलखा कहते हैं, “भूटान की तरफ़ से ये कहा गया है कि भूटान और चीन के बीच में अगर सीमा को लेकर कोई भी समझौता होता है और उसमें अगर डोकलाम का ज़िक्र होता है तो भूटान भारत के उस बातचीत में शामिल हुए बिना क़दम आगे नहीं बढ़ाएगा. ये सभी चीज़ें होंगी या नहीं होंगी, ये अभी कहना मुश्किल है.”

भूटान और चीन 1984 से सीमा विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत कर रहे हैं. मौजूदा बातचीत सात साल के लंबे अंतराल के बाद हुई है.

2017 में भारत और चीन की सेनाओं में डोकलाम में झड़प हुई थी. उसके बाद भूटान और चीन के बीच बातचीत में ठहराव आ गया. फिर कोविड महामारी की वजह से बातचीत को टाल दिया गया.

चीन की कामयाबी?

डोकलाम

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इमेज कैप्शन, डोकलाम में भारत और चीन के सैनिकों की फ़ाइल तस्वीर

ऐसे में सात साल के लंबे अंतराल के बाद चीन और भूटान के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए हो रही वार्ता अहम है.

प्रोफ़ेसर अदलखा कहते हैं, “चीन की समाचार सेवाओं में आए बयानों में कहा गया है कि चीन और भूटान सीमा विवाद सुलझाना चाहते हैं और कूटनीतिक संबंध बनाना चाहते हैं. लेकिन ऐसा कोई अधिकारिक बयान अभी भूटान की तरफ़ से नहीं आया है. हालाँकि भूटान ने अभी तक चीन की तरफ़ से आए बयानों को ख़ारिज नहीं किया है. ऐसे में ये समझा जा सकता है कि ये बातचीत आगे बढ़ रही है.”

भूटान के चीन के साथ कूटनीतिक संबंध नहीं हैं. विश्लेषक मानते हैं कि अगर भूटान और चीन के बीच कूटनीतिक संबंध बहाल होते हैं तो ना सिर्फ़ ये चीन के लिए बड़ी कामयाबी होगी बल्कि भारत के लिए चुनौतियाँ भी पैदा हो सकती हैं.

प्रोफ़ेसर अदलखा कहते हैं, “चीन को लगता है कि अगर वो भूटान के साथ राजयनिक संबंध स्थापित करने में कामयाब होता है तो वो एक तरह से भारत को कॉर्नर कर पाएगा. चीन के विशेषज्ञों का मानना है कि ये चीन की कूटनीति के लिए बड़ी कामयाबी होगी.”

वहीं प्रोफ़ेसर लांबा कहते हैं, “चीन कई सालों से भूटान के साथ कूटनीतिक संबंध शुरू करने के प्रयास कर रहा है. चीन चाहता है कि भूटान में उसका दूतावास हो, सामान्य स्थिति में ये दूतावास होता तो कोई बात नहीं थी, लेकिन हिमालय क्षेत्र में चीन का अब तक जो इतिहास रहा है, उसे देखते हुए भूटान में चीन का दूतावास होने से भारत का चिंतित होना लाज़िमी है.”

भारत के लिए चिंताएं

भूटान के लोग

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विश्लेषक मानते हैं कि डोकलाम पर चीन का प्रभाव और थिंपू में दूतावास भारत के लिए पूर्वोत्तर में चिंताएँ पैदा कर सकता है.

प्रोफ़ेसर लांबा कहते हैं, “अगर चीन भूटान में दूतावास शुरू करने में कामयाब रहा तो इससे भारत के चार राज्य अरुणाचल प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल और सिक्किम प्रभावित हो सकते हैं."

"चीन पहले भी पूर्वोत्तर में अलगाववादी तत्वों को बढ़ावा देने की कोशिशें कर चुका हैं. भारत के लिए एक और चुनौती यह होगी कि चीन के लिए नेपाल, भूटान और बांग्लादेश, तीनों देशों के लिए एक नया रास्ता खुल जाएगा.”

विश्लेषक ये भी मानते हैं कि चीन का भूटान के साथ बातचीत करना सिर्फ़ सीमा विवाद सुलझाने के लिए नहीं है बल्कि क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाते रहने की उसकी रणनीति का हिस्सा है.

प्रोफ़ेसर लांबा कहते हैं, “अभी जो चीन और भूटान के बीच बातचीत चल रही है, उसका मक़सद सिर्फ़ सीमा विवाद का समाधान करना नहीं है, कम से कम चीन की तरफ़ से. चीन ये चाहता है कि वो भूटान में दूतावास खोले, संबंध मज़बूत करे. ये भारत के लिए भले ही ख़तरनाक ना हो लेकिन चुनौतीपूर्ण ज़रूर होगा. क्योंकि संवेदनशील क्षेत्र में एक और शक्ति आ जाएगी.”

भारत का दौरा अहम

भूटान

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तो क्या चीन भूटान को ख़ुश करने के लिए आगे बढ़कर भी कुछ कर सकता है?

प्रोफ़ेसर लांबा कहते हैं, “ऐसा भी संभव है कि भूटान को ख़ुश करने के लिए चीन सीमा विवाद में कुछ नरम पड़े और भूटान को कुछ दे दे. कुछ ऐसा भी हो सकता है, जो अभी नहीं सोचा जा रहा है. दरअसल चीन हिंद महासागर तक पहुँचना चाहता है और उसके लिए हर संभव रास्ता तलाश रहा है."

"चीन ने म्यांमार से एक रास्ता बनाया. श्रीलंका से भी चीन रास्ता बना रहा है. बांग्लादेश होते हुए भी चीन वहाँ दाख़िल होना चाहता है. चीन म्यांमार में गैस और तेल पाइपलाइन ला रहा है, एक्सपोर्ट ज़ोन बना रहा है. चीन का मक़सद बिल्कुल स्पष्ट है, वह हिंद महासागर में अपनी पहुँच और प्रभाव बढ़ाना चाहता है. इससे भारत के लिए ज़रूर चुनौतियाँ पैदा होंगी.”

अपनी यात्रा के दौरान भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाक़ात की है. इससे पहले भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वांगचुक के साथ बातचीत की है.

प्रोफ़ेसर हेमंत अदलखा मानते हैं कि ताज़ा घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि में भूटान के किंग का भारत दौरा और अहम हो जाता है.

प्रोफ़ेसर अदलखा कहते हैं, “हाल ही में भूटान और चीन के बीच बातचीत की पृष्ठभूमि में अगर भूटान के किंग के भारत दौरे को देखा जाए तो ये बहुत अहम है. ये आठ दिनों का दौरा है और इस दौरान कई महत्वपूर्ण समझौते भी होने वाले हैं. "

"भारत ने अभी तक चीन और भूटान की बातचीत के बारे में कोई बयान नहीं दिया है. भूटान और असम के बीच रेल लिंक स्थापित करने पर भी चर्चा हो रही है. शायद ऐसा लगता है कि भारत चीन और भूटान के बीच हाल ही में हुई बातचीत पर अधिक ध्यान नहीं देना चाहता है और भूटान के साथ अपने संबंधों को और मज़बूत करने पर काम कर रहा है.”

विश्लेषक ये भी मानते हैं कि अब नेपाल, बांग्लादेश और भूटान जैसे छोटे देशों के लोगों की आंकाक्षाएँ बढ़ रही हैं और वो बाहरी देशों के प्रभाव से निकलना चाहते हैं.

प्रोफ़ेसर लांबा कहते हैं कि अब कोई देश किसी बड़े देश के प्रभाव में नहीं रहना चाहता है, वो पूरी तरह स्वतंत्रता चाहते हैं. अगर चीन भी ये सोचता है कि वो पूरी तरह इन देशों पर अपना प्रभाव बना लेगा तो ये सोच ग़लत है."

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