नेपाल: केपी शर्मा ओली के पीएम बनने पर भारत से रिश्तों पर क्या होगा असर

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भारत के अहम पड़ोसी नेपाल में सियासी उठापटक तेज़ हो गई है. यहां राजनीतिक समीकरण बदलने से मौजूदा प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड की कुर्सी ख़तरे में पड़ गई है.
प्रचंड ने कहा है कि वो पद से इस्तीफ़ा नहीं देंगे बल्कि संसद में विश्वासमत का सामना करेंगे.
ऐसे में अब प्रचंड के पास 30 दिनों का वक्त है.
प्रचंड की सरकार पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी (सीपीएन-यूएमएल) के समर्थन से चल रही थी.
अब कम्युनिस्ट पार्टी ने प्रचंड की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है.
ओली की कम्युनिस्ट पार्टी का गठबंधन अब नेपाली कांग्रेस के साथ हो गया है.
कम्युनिस्ट पार्टी के उप महासचिव प्रदीप ज्ञवाली ने कहा है कि नेपाली कांग्रेस से समझौते के कारण यह सब हो रहा है.
उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री नेपाली कांग्रेस से एक महीने से राष्ट्रीय एकजुटता की सरकार बनाने के लिए बात कर रहे थे. इसी वजह से अविश्वास का माहौल बना. ऐसे में हमने नेपाली कांग्रेस से गठबंधन किया."


प्रतिद्वंद्वी साथ आए
इसी हफ़्ते, सोमवार को ओली की कम्युनिस्ट पार्टी और नेपाली कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ था.
लेकिन इस गठबंधन पर सबकी नज़र है, क्योंकि ये दोनों राजनीतिक दल एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं.
एक तरफ ओली की पार्टी के समर्थन वापस लेने के बाद प्रचंड के पास अब बहुमत नहीं है, तो दूसरी तरफ प्रचंड सरकार में ओली की कम्युनिस्ट पार्टी के सभी आठ मंत्रियों को इस्तीफ़ा देने के लिए कहा गया है.
ऐसे में प्रचंड के लिए इस्तीफ़ा देना बाध्य हो गया है.
लेकिन प्रचंड की पार्टी का कहना है कि वो प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा नहीं देंगे और संसद में विश्वासमत का सामना करेंगे.
नेपाल में प्रधानमंत्री के पास विश्वासमत हासिल करने के लिए 30 दिन का समय है. लेकिन देश के नए राजनीतिक माहौल को देखते हुए प्रचंड के लिए समर्थन जुटा पाना लगभग असंभव लग रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र फुयाल ने बीबीसी संवाददाता सुमिरन प्रीत कौर से कहा, "प्रचंड सरकार बड़ी मुसीबत में पड़ गई है, बहुमत कम होने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी उनसे जल्द से जल्द इस्तीफ़े की मांग कर रही है. लेकिन प्रचंड कुछ और दिन, कुछ और सप्ताह अपनी सरकार की ज़िंदगी बचाने की कोशिश में जुटे हैं."
"उन पर दबाव बढ़ रहा है और नेपाली संविधान के अनुसार उन्हें या तो इस्तीफ़ा देना होगा या फिर विश्वासमत हासिल करें."

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आगे क्या होगा?
नेपाली संसद के नियम के अनुसार- संसद के महासचिव को विश्वासमत के लिए नोटिस देना होता है, जिसके बाद संसद की अगली बैठक में इसके लिए एक तारीख तय की जाती है.
इस दिन पीएम को विश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत करना होता है. ये प्रक्रिया 30 दिनों के भीतर पूरी करनी होती है.
संविधान मामलों के जानकार और नेपाली कांग्रेस के पूर्व सदस्य राधेश्याम अधिकारी ने बीबीसी नेपाली सेवा को बताया कि "यूएमएल के सरकार से समर्थन वापस लेने का नोटिस दिए जाने के बाद, प्रधानमंत्री की 30 दिनों की उलटी गिनती शुरू हो जाएगी. प्रधानमंत्री इससे पहले भी इस्तीफ़ा दे सकते हैं."
28 मई 2008 में नेपाल में 240 सालों से चली आ रही राजशाही ख़त्म हुई थी.
सुरेंद्र फुयाल कहते हैं कि यहां राजशाही के ख़त्म होने के बाद से राजनीतिक अस्थिरता रही है.
वो कहते हैं, "जब से देश लोकतंत्र बना, तभी से देश में सरकारें बनती रहीं और टूटती रहीं. नेपाल में स्थिर सरकार लंबे समय तक नहीं चली हैं."
"यहां के लिए लोकतंत्र नया अभ्यास है और ये अभी शुरुआती चरण में हैं. उम्मीद है कि अगली बार, अगले चुनाव में ये अभ्यास कामयाब हो और स्थिर सरकार आए."

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क्या भारत के साथ रिश्तों पर पड़ेगा असर?
भारत और नेपाल लंबे वक्त से दोस्त रहे हैं. कहा जाता है कि नेपाल और भारत के बीच रिश्ता 'रोटी-बेटी' का है.
सुरेंद्र फुयाल कहते हैं, "दोनों दोस्त रहे हैं तो दोनों के रिश्तों में ज्यादा बदलाव आने की उम्मीद नहीं है. ये नहीं कह सकते कि दोनों के रिश्ते ख़राब होंगे. लेकिन केपी शर्मा ओली आए तो थोड़ा-सा बदलाव हो सकता है क्योंकि वो पहले भारत से थोड़ा नाराज़ थे."
सुरेंद्र फुयाल साल 2020 का वो वाकया याद दिलाते हैं- जब नेपाल ने अपना एक नक्शा जारी किया था. इस नक्शे से भारत सहमत नहीं था और उसने इसे अस्वीकर किया था.
नेपाल ने मई 2020 में अपना आधिकारिक नक्शा जारी किया, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा इलाक़ों को नेपाल की पश्चिमी सीमा के भीतर दिखाया है.
सुरेंद्र फुयाल कहते हैं कि इसके बाद हाल ही में नेपाल ने उसी नक्शे को एक नोट में भी डाल दिया, तो इसे लेकर भी भारत में हलचल हुई थी.
वो कहते हैं, "अगर केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री बनते हैं तो ये भारत के लिए चुनौती साबित हो सकती है. लेकिन ये गठबंधन (सीपीएन-यूएमएल और नेपाली कांग्रेस) की सरकार होगी. नेपाली कांग्रेस का ज़ोर कूटनीतिक रास्तों के ज़रिए समस्या का समाधान ढूंढने पर होता है."
"नेपाली कांग्रेस संतुलित और तटस्थ नज़रिया रखते हुए काम करने को कह सकती है, ऐसे में दोनों के रिश्तों में अधिक बदलाव नहीं आना चाहिए."
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