अरुण गोयल ने इस्तीफ़ा क्या मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार से बढ़ते मतभेद के कारण दिया- प्रेस रिव्यू

अरुण गोयल और मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार

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भारत के चुनाव आयोग में एक इस्तीफ़े ने हलचल मचा दी है.

चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने शनिवार को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था और इसी के साथ चुनाव आयोग में इस समय सिर्फ़ मुख्य चुनाव आयुक्त ही बचे हैं.

चुनाव आयोग में दो चुनाव आयुक्त और एक मुख्य चुनाव आयुक्त होते हैं. एक चुनाव आयुक्त का पद पहले से ख़ाली था तो अब अरुण गोयल के जाने से सिर्फ़ मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ही बचे हैं.

देश में लोकसभा चुनाव की तारीख़ों के एलान से पहले चुनाव आयुक्त के इस तरह इस्तीफ़ा देने को अख़बारों ने प्रमुखता से छापा है.

अंग्रेज़ी अख़बार इकॉनमिक टाइम्स के अनुसार, अरुण गोयल के इस्तीफ़े के पहले से मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार और उनके बीच मतभेद चल रहा था.

बीते 15 फ़रवरी से दोनों के बीच मतभेद और ज़्यादा बढ़ गया था.

अख़बार लिखता है कि दोनों के बीच अहम नीतियों को लेकर मतभेद नहीं था. हालाँकि, मतभेद चुनाव तैयारी की समीक्षा के लिए राज्यों में जाने वाली आयोग की टीमों की संरचना और आकार को लेकर था. प्रेस ब्रीफिंग का प्रारूप कैसा हो इसे लेकर भी मतभेद था.

अरुण गोयल और मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार

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किस तरह के मतभेद थे?

आयोग के लोग अख़बार से कहते हैं कि इस तरह के मतभेद के बावजूद ऐसा कोई मुद्दा रिकॉर्ड में नहीं है जहाँ मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त के बीच मतभेद ज़ाहिर रूप में दर्ज किया गया हो. ये मतभेद मौखिक ज़्यादा था.

यह भी पता चला है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में जब अनूप चंद्र पांडे आयुक्त के पद पर थे तो इनमें से कुछ मतभेदों को सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटाया जाता था. कुछ मामलों में अरुण गोयल की बात भी मानी गई.

मुख्य चुनाव आयुक्त और अरुण गोयल को हाल ही में पश्चिम बंगाल में एक समीक्षा बैठक के दौरान चर्चा करते देखा गया था लेकिन जब कोलकाता में प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई तो अरुण गोयल उसमें शामिल नहीं हुए थे.

मामले से वाकिफ़ लोगों का मानना है कि जिस तरह के मतभेद थे, उन्हें देखकर नहीं लगता कि अरुण गोयल ने उन बातों को लेकर कर इस्तीफ़ा दिया होगा.

अशोक लवासा और सुनील अरोड़ा

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अशोक लवासा प्रकरण की याद

चुनाव आयोग में जो हो रहा है, वह साल 2020 के उस वाक़ये की याद दिलाता है, जब तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

2019 में आम चुनाव से पहले ऐसा ही मतभेद तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के बीच हुआ था.

चुनाव आयुक्त रहते हुए अशोक लवासा ने एक चिट्ठी लिखी थी और कहा था कि वह आयोग की बैठक से दूर रहना चाहते हैं क्योंकि आयोग की बैठक में अल्पमतों की कोई गिनती नहीं है.

कथित रूप से लवासा ने साल 2019 के चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बयानों के ज़रिए आचार संहिता का उल्लंघन करने के मामले में चुनाव आयोग के क्लीन चिट देने के फ़ैसले के विपरीत राय रखी थी.

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समाप्त

अरुण गोयल ने नवंबर 2022 में चुनाव आयुक्त का पदभार संभाला था.

इस इस्तीफ़े को लेकर ही अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू ने भी अपने पहले पन्ने पर ख़बर छापी है.

द हिंदू लिखता है कि देश के चुनाव आयुक्त ने लोकसभा चुनाव की तारीख़ों की घोषणा से एक हफ़्ते पहले अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.

आयोग के लोगों का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार और चुनाव आयुक्त अरुण गोयल के बीच पश्चिम बंगाल के दौरे के दौरान तनातनी बढ़ी. दोनों यहाँ लोकसभा चुनाव की तैयारियों का जायज़ा लेने पहुँचे थे.

द हिंदू भी लिखता है कि गोयल ने कोलकाता में प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने मना कर दिया था.

पश्चिम बंगाल सीटों के लिहाज से तीसरा सबसे बड़ा राज्य है. यहाँ 42 सीटें हैं. पाँच मार्च को कोलकता की प्रेस कॉन्फ्रेंस अकेले राजीव कुमार को करनी पड़ी थी.

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा थआ कि अरुण गोयल को ‘स्वास्थ्य कारणों’ से दिल्ली वापस जाना पड़ा. हालांकि अरुण गोयल के एक क़रीबी ने बताया कि “उनका स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक था.”

एक सूत्र ने अख़बार को बताया, “कुछ गंभीर मतभेदों के कारण वह पश्चिम बंगाल की अपनी यात्रा को बीच में छोड़कर वापस दिल्ली आ गए थे.”

हालांकि ये नहीं पता है कि आख़िर दोनों के बीच किन विषयों पर मतभेद इतना बढ़ा. अरुण गोयल का कार्यकाल नवंबर 2027 तक का था.

अगर वो कार्यालय में होते तो अगले साल देश के मुख्य चुनाव आयुक्त बन सकते थे.

अरुण गोयल

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'नियमों से चलने वाले अधिकारी'

द हिंदू की रिपोर्ट कहती है कि सरकारी अधिकारियों ने बताया, "सरकार की ओर से उन्हें मनाने और मतभेदों को सुलझाने की कोशिशें की गईं लेकिन वह इस्तीफ़ा देने पर अड़े रहे."

उनका इस्तीफ़ा राष्ट्रपति ने नौ मार्च को स्वीकार कर लिया था और क़ानून और न्याय मंत्रालय ने एक गजट अधिसूचना जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि अरुण गोयल का इस्तीफ़ा तुरंत स्वीकार कर लिया गया है.

सरकार और चुनाव आयोग के कई सूत्रों ने अख़बार से कहा है, "चुनाव आयोग और सरकार के सबसे वरिष्ठ अधिकारियों को छोड़कर सरकारी अधिसूचना जारी होने तक किसी को गोयल के इस्तीफ़े के बारे में जानकारी नहीं थी.”

दिल्ली में ब्यूरोक्रेट्स के बीच गोयल की छवि एक "तेज़-तर्रार और नियमों के अनुसार, चलने वाले अधिकारी" की है.

एक्स पर सरकार में एक रिटायर्ड सचिव और गोयल के बैचमेट संजीव गुप्ता ने लिखा, “साल 2022 में जितनी तेज़ी से अरुण गोयल को चुनाव आयोग में लाया गया और जिस तेज़ी के साथ उन्हें निकाला गया उससे गंभीकर सवाल उठते हैं. हम सभी बैचमेट भी हैरान हैं और उनकी (अरुण गोयल) की ओर से हमें कोई जवाब नहीं मिल रहा.”

चुनाव आयोग

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नए चुनाव आयुक्त की तलाश

चुनाव आयोग में नियुक्ति से पहले अरुण गोयल दिल्ली विकास प्राधिकरण के वाइस चेयरमैन, संस्कृति मंत्रालय और भारी उद्योग मंत्रालय के सचिव के रूप में कार्यरत थे. दोनों ही पद ग़ैर-मुख्यधारा के पद और ब्यूरोक्रेसी में औसत पद" माने जाते हैं.

चूंकि दो चुनाव आयुक्तों के ना होने से अब आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ही बचे हैं, ऐसे में नए चुनाव आयुक्तों का चयन होना है.

नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में क़ानून मंत्री के नेतृत्व में सर्च कमिटी पाँच नामों को शॉर्टलिस्ट करती है.

बदले हुए नियमों के अनुसार, इन पांच नामों में से आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री अध्यक्षता वाली कमिटी करती है. इसमें प्रधानमंत्री की ओर से मनोनीत एक केंद्रीय मंत्री और नेता प्रतिपक्ष होते हैं.

इससे पहले चुनाव आयुक्तों को चुनने की जो प्रक्रिया थी उसमें प्रधानमंत्री, चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया और नमेता प्रतिपक्ष हुआ करते थे. जिसे एनडीए सरकार ने सीजेआई को हटा कर केंद्रीय मंत्री को सदस्य बनाया.

ममता बनर्जी

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अरुण गोयल को मेरा सलाम- ममता बनर्जी

रविवार को कोलकता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में जनता को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि वह अरुण गोयल को बीजेपी सरकार के आगे ना झुकने के लिए सलाम करती हैं.

उन्होंने कहा, “शनिवार को एक चुनाव आयुक्त ने इस्तीफ़ा दे दिया. हम उन्हें सलाम करते हैं. ख़बरों में बताया जा रहा है कि उन्होंने बीजेपी के आगे झुकने से मना कर दिया, बीजेपी चुनावों में पश्चिम बंगाल को कंट्रोल करना चाह रही थी और उन्होंने ये नहीं माना. जो लोग बीजेपी के कहने पर काम कर रहे हैं, वह आयोग पर धब्बे की तरह हैं.”

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