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चीन और रूस का दबदबा अफ्रीका में कैसे बढ़ रहा है?
- Author, एंड्रूय हार्डिंग
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, जोहान्सबर्ग
दक्षिण अफ्रीका के सबसे संपन्न और चमक दमक वाले इलाके में ब्रिक्स समिट का आयोजन हो रहा है, इस आयोजन को लेकर दक्षिण अफ्रीका में गर्व, राहत और कुछ हद तक बैचेनी के भाव भी देखे जा रहे हैं.
जोहान्सबर्ग के बाहरी हिस्से में स्थित है सैंडटन, जो अफ्रीका के सबसे अमीर और संपन्न लोगों का इलाका है, इसे बैंकिंग डिस्ट्रिक्ट भी कहा जाता है. यहीं हो रहा ब्रिक्स देशों का शिखर सम्मेलन.
ब्रिक्स देशों में ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं. ये दुनिया भर में पश्चिमी दबदबे को चुनौती देने की इच्छा लिए देशों का समूह है.
इस समूह में शामिल होने के लिए दुनिया भर के दर्जनों देश क़तार में लगे हुए हैं.
हालांकि इस शिखर सम्मेलन की मेजबानी को लेकर दक्षिण अफ्रीका में राहत इसलिए भी देखी जा रही है क्योंकि रूस के राष्ट्रपति ने इस सम्मेलन से दूर रहने का फ़ैसला लिया है.
दक्षिण अफ्रीका का 'धर्म संकट'
अगर वे इस सम्मेलन में भाग लेने की ज़िद करते तो दक्षिण अफ्रीका को दुनिया भर के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होती कि क्या वह यूक्रेन के ख़िलाफ़ कथित युद्ध अपराध के लिए रूस के राष्ट्रपति को गिरफ़्तार करके अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को पूरा कर रहा है या नहीं?
पुतिन ने खुद को इस शिखर सम्मेलन से दूर रख कर, मेजबान देश को अप्रिय स्थिति से बचा लिया है.
यही वजह है कि दक्षिण अफ्रीका के अधिकारी अब ब्रिक्स सम्मेलन को कवर कर रहे पत्रकारों को ब्रेकफास्ट मीटिंग, व्यापार मेले और टाउनशिप डॉयलॉग जैसे आयोजनों से जुड़ी पल पल की जानकारी दे कर उनका इनबॉक्स स भर दे रहे हैं.
इस उत्साह को देखते हुए कुछ विश्लेषकों की राय है कि दक्षिण अफ्रीका किस कदर पश्चिमी देशों से दूरी बरतते हुए चीन और रूस के साथ होना चाहता है.
'चीन भविष्य है और...'
ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन से ठीक पहले केपटाउन में सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी, जिसमें एक रूसी पत्रकार ने कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा, "आप अपने मानवाधिकार के स्वर्ग यानी पश्चिमी दुनिया को अपने पास रखो. हम नए सिरे से दुनिया बना रहे हैं."
ब्रिक्स अभी भी शुरुआती अवस्था में ही है लेकिन धीरे धीरे यह अपनी जगह बना रहा है, इसको लेकर देशों में उत्साह भी दिख रहा है.
दक्षिण अफ्रीका सरकार की ओर से आयोजित विदेश नीति मामलों की एक वर्कशॉप में शामिल एक सहकर्मी ने बताया कि चीन भविष्य है और पश्चिम गिरावट की ओर है, इस बात को लेकर आम सहमति जैसी स्थिति है.
यही वो पहलू है जहां से दक्षिण अफ्रीका की बेचैनी को समझा जा सकता है. देश के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा एक अमीर कारोबारी हैं.
वे इस बात को भली भांति समझते हैं कि कोविड संकट की वजह से घरेलू अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है, बेरोजगारी और असमानता अपने उच्चतम स्तर पर है और तेजी से गहराते संकट से बचाव के लिए ज़्यादा से ज़्यादा विदेशी निवेश की ज़रूरत है.
पश्चिमी देशों के साथ संबंध
इस समस्या के हल में रूस से मदद की उम्मीद नहीं ही है क्योंकि दोनों देशों के बीच आपसी कारोबार नहीं के बराबर है.
चीन निश्चित तौर पर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है और महत्वपूर्ण बनता जा रहा है, लेकिन दक्षिण अफ्रीका के साथ कारोबार या निवेश के मामले में अभी भी बढ़त यूरोपीय संघ और अमेरिका को ही हासिल है.
ऐसे में सवाल यही है कि आर्थिक अनिश्चितता के दौर में दक्षिण अफ्रीका पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को ख़तरे में क्यों डालना चाहेगा?
इसका जवाब, कम से कम कुछ हद तक ही सही, देश पर शासन करने वाली पार्टी की ढुलमुल नीति हो सकती है.
तीन दशकों तक सत्ता में रहने के बाद, अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस (एएनसी) अंदरूनी कलह, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अराजकता से छुटकारा पाने के लिए संघर्ष कर रही है.
रूस को हथियारों की आपूर्ति?
उदाहरण के लिए, यूक्रेन-रूस युद्ध के दौरान दक्षिण अफ़्रीका की सरकार की प्रतिक्रियाएं स्पष्ट नहीं थीं.
पहले आक्रमण की निंदा की गई, फिर स्पष्ट रूप से इसकी निंदा करने से इनकार कर दिया, फिर नेटो को दोषी ठहराया गया, इसके बाद पुतिन की प्रशंसा, खुद को शांति मध्यस्थ के रूप में पेश करना, रूसी नौसैनिक अभ्यास की मेजबानी करना, अमेरिका को अपनी स्थिति समझाने की कोशिश करना और क्रेमलिन की बातों को ही दोहराते रहना.
फिर यह अभी भी रहस्य बना हुआ है कि क्या अमेरिकी आरोपों के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका ने पिछले साल रूस को हथियारों की आपूर्ति की थी?
इसमें कोई संदेह नहीं है कि राष्ट्रपति रामफोसा यूक्रेन पर रूस के आक्रमण को लेकर बेहद असहज हैं और खुद को बहुध्रुवीय दुनिया के पैरोकार के तौर पर पेश करते रहे हैं.
लेकिन उनकी सरकार और पार्टी में कई लोग नियमित रूप से उनके इस नज़रिए को कमजोर करते हैं और इसके लिए वे अक्सर रंगभेद विरोधी संघर्ष के दौरान मॉस्को से मिले समर्थन की बात करते हैं और अमेरिकी विदेश नीति को लेकर संशय दिखाते हैं.
मंडेला का 'इंद्रधनुष राष्ट्र'
इस संशय भरी स्थिति के कारण दक्षिण अफ्रीका भी कमजोर और अनिर्णयात्मक स्थिति में दिखाई देता है. नेल्सन मंडेला का 'इंद्रधनुष राष्ट्र' निश्चित रूप से अभी संघर्ष के दौर से गुजर रहा है और कुछ विश्लेषकों ने चेताया है कि यह बहुत जल्दी ही नाकाम देश बन जाएगा.
बहरहाल, इस सप्ताह का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन रूसी प्रशासन को कहीं अधिक रणनीतिक और प्रभावी कूटनीति प्रदर्शित करने के लिए एक उपयोगी मंच प्रदान करेगा.
हाल ही में नीजेर में तख्तापलट हुआ जिससे पैदा हुई अनिश्चितता का फ़ायदा वहां रूस के लिए लड़ने वाले वैगनर समूह के लड़ाकों ने अपना प्रभाव मज़बूत करने के लिए किया.
वैगनर समूह इससे पहले माली और मध्य अफ्रीकी गणराज्य (सीएआर) में ऐसा कर चुका है.
रूसी विदेशी मंत्री सर्गेई लावरोव की सक्रियता और चतुराई भरे मीडिया संदेशों की मदद से बिना किसी मौजूदगी के रूस पश्चिमी प्रभाव वाले अफ्रीका में विश्वसनीय विकल्प के तौर पर उभरा है. यह कामयाबी उल्लेखनीय है.
पश्चिमी देश क्या कर रहे हैं?
ग़रीबी, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, बढ़ती युवा आबादी और बढ़ती बेरोज़गारी से जूझ रहे इन देशों में, यथास्थिति से निराशा ने कई लोगों नए विकल्प के लिए तैयार दिख रहे हैं.
सवाल उठता है - पश्चिमी देश रूस को चुनौती देने के लिए क्या कर रहे हैं?
ज़ाहिर है, इस महाद्वीप के बारे में मोटे तौर पर किसी तरह का सतही आकलन करना सही नहीं होगा और यह सुझाव देना कि अफ्रीकी सरकारें आधुनिक शीत युद्ध में केवल मोहरे हैं, ग़लत और अपमानजनक, दोनों है.
ऐसे में सवाल यही है कि ब्रिक्स का पश्चिमी संस्करण कहां है? ब्रिटेन में 'अफ्रीका के लिए एक मंत्री' है - लेकिन लगभग एक वर्ष से अधिक समय तक पद पर कोई मंत्री नहीं है.
मनमी विकास परियोजनाओं, कड़ी शर्तों और पसंदीदा अफ्रीकी नेताओं के लिए विदेशी निमंत्रणों ने इस आशंका को बढ़ावा दिया है कि फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य पूर्व औपनिवेशिक शक्तियां अभी भी अफ्रीका को एक साझेदार देश के तौर पर देखने के बजाए समस्या के तौर पर देख रहे हैं.
यह अनुचित भी कहा जा सकता है.
आख़िरकार, पश्चिमी देशों ने दशकों से पूरे महाद्वीप में स्वास्थ्य सेवाओं, व्यवसायों और सरकारों को समर्थन देने के लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा और नकद सहायता मुहैया कराया है.
लेकिन नाइजर और सोमालिया जैसी जगहों पर पश्चिमी सेनाओं - विशेष रूप से फ्रांसीसी सैनिकों और अमेरिकी ड्रोन - की भूमिका ने संघर्ष की स्थिति भी पैदा किया है.
जो यह समझाने में मदद कर सकता है कि ब्रिक्स को विकल्प के तौर पर इस महाद्वीप में क्यों उम्मीद से देखा जा रहा है.
ब्रिक्स समूह इसी उम्मीद को मज़बूती देने के लिए सैंडटन के सम्मेलन हॉल में जोर-शोर से और आत्मविश्वास से अपनी बात रखेगा.
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