मेरठ में बीजेपी के अरुण गोविल क्या अपनी 'राम' की छवि को भुना पाएंगे?- ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता मेरठ से
महिलाएं हाथों में फूल मालाएं लिए खड़ी हैं, 'जय श्री राम' के नारों की आवाज़ तेज़ होती जा रही है.
जैसे ही गाड़ियों का काफ़िला क़रीब से गुज़रता है, महिलाएं फूल बरसाने लगती हैं. वो कुछ आगे बढ़कर ऑडी कार की सनरूफ़ से बाहर निकलकर हाथ जोड़ रहे अरुण गोविल को माला पहनाती हैं.
अरुण गोविल कुछ फूल उठाते हैं और महिलाओं की तरफ़ फेंक देते हैं, महिलाएं इन फूलों को आंखों से लगा लेती हैं.
मेरठ से बीजेपी के उम्मीदवार और टीवी धारावाहिक रामायण में श्रीराम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल के चुनाव प्रचार में माहौल भक्तिमय है.
कई महिलाएं कह रही हैं, ‘भगवान राम को टीवी पर देखा था, आज साक्षात देख लिया.’
मेरठ से क़रीब 20 किलोमीटर दूर बिजौली गांव में हो रहे इस रोड शो में सबसे आगे भगवा झंडा लहराते युवा चल रहे हैं, उनके पीछे 'जय श्रीराम' का नारा लिखी टी-शर्ट पहने युवाओं की भीड़ है.
अरुण गोविल गांव में कहीं नहीं ठहरते, बस हाथ हिलाते हुए, कुछ लोगों पर फूल बरसाते हुए दूसरे गांव की तरफ़ बढ़ जाते हैं.
हमने कई गांवों में अरुण गोविल के रोड शो को देखा. गोविल कहीं भी अपनी ऑडी कार से नहीं उतरे.
20-22 साल की उम्र के युवाओं से मैं सवाल करता हूं, इस बार चुनाव में मुद्दा क्या है. एक साथ कई उत्साही युवा बोलते हैं- ‘मुद्दा-वुद्दा कुछ नहीं हैं, बस एक ही मुद्दा है जय श्री राम.’
एक बार फिर देर तक जय श्री राम का नारा गूंजने लगता है और साथ ही योगी-मोदी ज़िंदाबाद का नारा भी.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मेरठ सीट पर बीजेपी ने अरुण गोविल को मैदान में उतारा है.

कौन से वादे कर रहे हैं गोविल?

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अरुण गोविल रामराज्य लाने का वादा कर रहे हैं.
यदि वो चुने गए तो रामराज्य के वादे को कैसे पूरा करेंगे, इस सवाल पर गोविल कहते हैं, “हमारी संस्कृति के साथ हम जिएं, हमारी विरासत के साथ हम जिएं और विरासत के साथ हम विकास करें, यही रामराज्य है. सभी को बराबर न्याय मिले, सबको समान अधिकार मिलें, महिलाओं, पुरुषों, सभी को बराबर देखा जाए, यही रामराज्य है.”
अरुण गोविल यूं तो मेरठ के हैं लेकिन मुंबई में रहने की वजह से उन्हें बाहरी उम्मीदवार माना जा रहा है.
ज़मीनी उम्मीदवार ना होने के सवाल पर अरुण गोविल कहते हैं, ‘मैं पिछले एक सप्ताह से मेरठ में हूं, जनता मुझे यहां से संसद भेजेगी, मैं यहां लोगों के बीच रहकर ही काम करूंगा.’

मेरठ में मुद्दे क्या हैं?

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मेरठ के मुख्य बाज़ार में बेरोज़गारी, महंगाई, ग़रीबी और पेपर लीक जैसे मुद्दों को खारिज करते हुए एक दुकानदार कहते हैं, “इस बार चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है, जब कोई बड़ा मिशन होता है तब बड़े मिशन को देखते हुए छोटे-छोटे स्थानीय मुद्दे नज़रअंदाज़ कर देने चाहिए. इस समय बड़ा मिशन है भारत को दुनिया में शीर्ष पर पहुंचाना. देश में कोई महंगाई, ग़रीबी या बेरोज़गारी नहीं है. देश इस समय उन्नति कर रहा है, जब आर्थिक प्रगति होती है तो थोड़ी बहुत महंगाई होती ही है.”
इसी दुकान में एक कर्मचारी तीन सौ रुपये रोज़ाना की दिहाड़ी पर काम कर रहा है. ये उत्तर प्रदेश में अकुशल श्रमिकों के लिए तय किए गए न्यूनतम वेतन 10275 रुपए महीना से कम है.
अगर देश में महंगाई और ग़रीबी नहीं है, तब इस श्रमिक को न्यूनतम वेतन से भी कम दिहाड़ी क्यों मिल रही है, इस सवाल पर एक आम मज़दूर की रोज़ाना कमाई कम से कम 700 रुपये बताने वाले ये दुकानदार कहते हैं, ‘इतना वेतन देने के कारण आर्थिक हैं.’
यहीं मौजूद भारतीय जनता पार्टी के एक अन्य समर्थक कहते हैं, “मेरठ में अरुण गोविल को नहीं बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के काम पर बीजेपी को वोट मिलेंगे. देश में रामराज्य आना चाहिए. रामराज्य का मतलब ये नहीं है कि किसी एक धर्म या जाति को बढ़ावा दिया जाए, बल्कि रामराज्य का मतलब है समानता, यानी जो हैं सब हमारे हैं, अपने हैं. जो राष्ट्रहित में काम कर रहा है वो बढ़िया है. अगर कोई राष्ट्र विरोधी कार्य कर रहा है तो वो हमारा दुश्मन है.”
बिजौली गांव के चुनावी रोड शो में आगे-आगे चल रहे बीजेपी समर्थक कहते हैं, “सबसे बड़ा मुद्दा जय श्री राम का ही है, बस उन्हीं की भक्ति में लगे रहो. जो काम इस सरकार में हो रहा है, कभी नहीं हुआ है, देश बहुत आगे पहुंच गया है.”

क्या कह रहे हैं मुस्लिम मतदाता

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मेरठ में एक बड़ी आबादी मुसलमान मतदाताओं की भी है.
क्या अरुण गोविल मुसलमान मतदाताओं के बीच जाएंगे, उनका दिल जीतने का प्रयास करेंगे?
इस सवाल पर वो बेहिचक कहते हैं, “दिल तो मैं यहां किसी का नहीं जीत पाता. ये तो लोगों को तय करना है कि मैं ठीक हूं या नहीं. यदि मुसलमानों को लगेगा कि ये आदमी ईमानदार है, ठीक काम करेगा, तो वो मुझे ज़रूर वोट देंगे. मैंने मतदाताओं से अपील की है कि हमें वोट धर्म और जाति से ऊपर उठकर देश की प्रगति के लिए देना चाहिए, देश की प्रगति होगी तो हम सबकी प्रगति होगी.”
मेरठ के कई इलाकों में घूमने पर यहां धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण स्पष्ट नज़र आता है.
मेरठ के शाहपीर इलाक़े में जिन मुसलमानों से हमने बात की, अधिकतर का ये कहना था कि सांप्रदायिकता उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा है. वहीं कोई लोग सरकार के क़ानून व्यवस्था में सुधार करने और अपराधियों पर सख़्त होने से ख़ुश भी नज़र आते हैं.
यहां एक मुसलमान वोटर कहते हैं, “मुसलमान अभी असमंजस में हैं. मुसलमान माहौल को देख रहे हैं, आगे माहौल बदल भी सकता है. अभी इरादा गठबंधन के लिए है, लेकिन आगे किधर जाएंगे पता नहीं है.”
हालांकि, मुसलमान मतदाता अपने आप को अलग-थलग भी महसूस करते हैं.
क्या अरुण गोविल मुसलमानों के लिए भी काम करेंगे?
इस सवाल पर वो कहते हैं, “ये नहीं कहा जा सकता है कि मुसलमान पीछे छूट गए हैं. देश की मुख्यधारा से मुसलमानों को भी जोड़ा जाना चाहिए, मुसलमानों को भी आगे आना चाहिए, अपने आप एक जगह खड़े होकर अगर वो सोचें कि सबकुछ हो जाएगा, ऐसा नहीं होगा. मुसलमानों को भी ख़ुद आगे आना होगा.”
कितनी बड़ी है चुनौती?

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हिंदुत्व की लहर पर सवार बीजेपी के अरुण गोविल से मुक़ाबला करने के लिए विपक्ष सामाजिक और जातिगत समीकरणों को साधने की रणनीति पर काम कर रहा है.
मेरठ सीट पर समाजवादी पार्टी ने दो उम्मीदवारों को बदलने के बाद अब सुनीता वर्मा को मैदान में उतारा है.
पार्टी को उम्मीद है कि पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतों की गोलबंदी करके बीजेपी को चुनौती दी जा सकती है.
टिकट काटे जाने से नाराज़ समाजवादी पार्टी विधायक अतुल प्रधान अब पार्टी की उम्मीदवार सुनीता वर्मा का समर्थन करने की बात कर रहे हैं.
अतुल प्रधान कहते हैं, “अपने आप को क्या समझाना हम तो विधायक हैं, एक पद पर हैं, हमने हमेशा संघर्ष किया है. हम समाजवादी आंदोलन और संघर्ष को आगे बढ़ाना चाहते हैं. पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव जिस भी मंच पर जाने के लिए कहेंगे, मैं जाऊंगा.”
हालांकि अतुल प्रधान खुलकर ये नहीं कहते कि वो पूरे दमखम के साथ सुनीता वर्मा के चुनाव प्रचार में उतरेंगे.
समाजवादी पार्टी का कहना है कि रणनीति के तहत पार्टी ने मेरठ से एक दलित उम्मीदवार को मैदान में उतारा है.
मेरठ में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष विपिन चौधरी कहते हैं, “पार्टी ने मज़बूत प्रत्याशी देखा और पहले से घोषित उम्मीदवार को बदलकर सुनीता वर्मा को उम्मीदवार बनाया है. यहां मुसलमान बड़ी तादाद में हैं और सुनीता वर्मा दलित समुदाय से आती हैं, पार्टी को उम्मीद है कि वो अपने वर्ग के वोटों को जोड़ पाएंगी.”
समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता इसरार सैफ़ी कहते हैं, “मुसलमानों की बड़ी तादाद होने के बावजूद इस सीट पर दलित उम्मीदवार को हमारी पार्टी ने इसलिए ही उम्मीदवार बनाया है ताकि बीजेपी को चुनौती दी जा सके.”
वहीं, सुनीता वर्मा दावा करती हैं कि उन्हें सर्व समाज के साथ-साथ अपने दलित वोटर वर्ग का भी वोट मिल रहा है.
मेरठ नगर पालिका की चेयरमैन रहीं सुनीता वर्मा के पति योगेश वर्मा पूर्व विधायक हैं.
योगेश वर्मा कहते हैं, ‘दलितों का सम्मान हमारा सबसे बड़ा मुद्दा है, अखिलेश यादव पिछड़ा, दलितों और अल्पसंख्यकों को जोड़ने के लिए काम कर रहे हैं, यही हमारा सबसे बड़ा मुद्दा है.’

बसपा की ख़ामोशी

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बीजेपी और गठबंधन के उम्मीदवार जहां ज़ोर-शोर से मैदान में हैं, वहीं बहुजन समाज पार्टी ख़ामोशी से चुनाव लड़ रही है. पार्टी के दफ़्तर पर सन्नाटा है.
मेरठ मंडल के प्रभारी मोहित कुमार कहते हैं, “बहुजन समाज पार्टी 2009, 2014 और 2019 के चुनाव मज़बूती से लड़ी है. बहुजन समाज पार्टी का कोर वोट उसके साथ है, पार्टी का वोटबैंक हमेशा पार्टी के साथ रहता है. सिर्फ मायावती के कहने पर ही हमारी पार्टी का वोट कहीं और ट्रांसफर हो सकता है. हमें उम्मीद है कि हमारी पार्टी का वोट हमारे साथ रहेगा.”
मोहित कुमार दावा करते हैं कि बीएसपी ने रणनीति के तहत देव व्रत त्यागी को उम्मीदवार बनाया है.
वो कहते हैं, ‘वोटर ये तय करेंगे कि कौन उम्मीदवार जीत रहा है. हम मज़बूती से मैदान में हैं.’
हालांकि, दलित मतदाता चुनाव को लेकर अलग-अलग राय ज़ाहिर करते हैं. शहर की शेरगढ़ी बस्ती में अधिकतर दलित आबादी रहती है.
यहां कांशीराम पार्क के बाहर बीड़ी पी रहे क़रीब 50 साल के एक व्यक्ति कहते हैं, “इस सरकार में बढ़िया काम हो रहा है, सड़कें बन रही हैं, पानी आ रहा है, नाली की सफाई चल रही है, राशन मिल रहा है, इसलिए ही कुछ दलित भी सरकार का समर्थन कर रहे हैं, पहले हम मायावती के साथ थे, अब नहीं हैं. जो हमारे लिए काम करेगा हम उसके साथ हैं.”
बहुजन समाज पार्टी के कई समर्थक भी यहां नज़र आते हैं. इनका मानना है कि पार्टी के उम्मीदवार जीतें या हारें, इससे पार्टी के समर्थकों पर फ़र्क नहीं पड़ता है.
ये समर्थक कहते हैं, “हमारे लिए हमारी पार्टी सबसे अहम है, हम मायावती के साथ हैं, भले ही हमारा वोट गड्ढे में ही क्यों ना चला जाए. चुनावी समीकरण कुछ भी हों, हमें अपनी पार्टी से उम्मीद है और हमेशा रहेगी.”
लेकिन यहां बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जिनका स्पष्ट झुकाव सुनीता वर्मा की तरफ़ नज़र आता है. इसके पीछे कारण जाति ही है.
एक दलित बुज़ुर्ग कहते हैं, “हम दलित हैं, सुनीता वर्मा हमारी जाति से हैं, हमें उम्मीद है कि वो आगे हमारे मुद्दे उठाएंगी. हम समाजवादी पार्टी के साथ नहीं हैं, अपनी उम्मीदवार के साथ हैं.”
कई और लोग भी इसी तरह की राय ज़ाहिर करते हैं. जाति यहां स्थानीय मुद्दों और धार्मिक ध्रुवीकरण पर हावी नज़र आती है.


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मेरठ के स्थानीय पत्रकार राशिद ज़हीर कहते हैं, “मुसलमानों और दलितों का जातिगत गठजोड़ कभी-कभी हिंदुत्व के मुद्दों पर हावी पड़ जाता है. समाजवादी पार्टी ने यहां सुनीता वर्मा को उम्मीदवार बनाया है, अगर वो दलित वोटों को अपने साथ जोड़ पाती हैं तो पार्टी यहां बीजेपी को चुनौती दे सकती है.”
खेल से जुड़े सामान बनाने के लिए विख्यात मेरठ को स्पोर्ट्स सिटी के नाम से भी जाना जाता है.
सूरजकुंड पार्क के पास स्थित इलाक़े में खेल का सामान बनाने वाली कई फ़ैक्ट्रियां हैं. यहां कैरम बोर्ड से लेकर क्रिकेट के बल्ले तक बन रहे हैं. जिम का सामान बनाने की भी कई बड़ी फ़ैक्ट्रियां हैं.
यहां काम कर रहा एक मज़दूर कहता है, ‘हमारे पास काम तो है, आमदनी भी है, लेकिन महंगाई की वजह से काम चल नहीं पा रहा है.’
स्पोर्ट्स कारोबारी विपुल गुप्ता कहते हैं, ‘स्पोर्ट्स इंडस्ट्री की वजह से यहां रोज़गार पैदा हो रहा है, लेकिन जिस स्तर पर होना चाहिए वो नहीं हो पा रहा है क्योंकि स्पोर्ट्स इंडस्ट्री के मुद्दे चुनाव के मुद्दे नहीं बन पाते हैं. सरकार ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस का दावा करती है, लेकिन ज़मीन पर ये दिखाई नहीं देता है.’
ज़मीन पर भले ही मुद्दे दिखाई दे रहे हों, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इनका असर मतदान पर शायद ही हो.
राशिद ज़हीर कहते हैं, “मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सभी मुद्दे तब ख़त्म हो जाते हैं जब बड़े नेता यहां आकर हिंदुत्व की बात करते हैं. ज़मीन पर भले ही मुद्दे दिखाई दे रहे हों, लेकिन चुनाव में इनका असर नहीं दिखाई देता है.”
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)
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