बसवराजू के ठिकाने का कैसे चला था पता, अब माओवादी आंदोलन का क्या होगा

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- Author, आलोक पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
"हम यह भी जानते हैं कि भारत सरकार को उखाड़ फेंकना कोई आसान काम नहीं है. जनयुद्ध में निर्णायक शक्ति तकनीक नहीं बल्कि लोग होते हैं. दुश्मन की आधुनिक तकनीक या तो लोगों की बाढ़ में नष्ट हो जाएगी या फिर निष्क्रिय हो जाएगी."
13 अगस्त 2012 को सीपीआई (माओवादी) की पोलित ब्यूरो के सदस्य और केंद्रीय सैन्य आयोग के प्रभारी नंबाल्ला केशव राव उर्फ़ बसवराजू ने आधुनिक तकनीक को लेकर पूछे गए सवाल पर यह जवाब दिया था.
आधुनिक तकनीक का मतलब माओवादियों के ख़िलाफ़ सेटेलाइट, जीपीएस और यूएवी का इस्तेमाल था. बसवराजू जब सवाल का जवाब दे रहे थे तब उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी नहीं रहा होगा कि यही आधुनिक तकनीक उनकी जान ले लेगी.
इस सवाल-जवाब का पूरा ब्योरा ओडिशा से प्रकाशित होने वाली माओवादियों की पत्रिका जन संग्राम में अगस्त, 2012 में प्रकाशित हुआ था.
करीब 13 साल बाद तकनीक की वजह से ही सुरक्षाबलों के जवानों ने बसवराजू का सही सही पता लगा लिया.
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बीते बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने माओवाद प्रभावित नारायणपुर में एक मुठभेड़ में सीपीआई (माओवादी) के मुखिया नंबाल्ला केशव राव ऊर्फ़ बसवराजू को मारने का दावा किया.
सीपीआई (माओवादी) के टॉप लीडर बसवराजू को दो घेरों में लगभग चार दर्जन लोग सुरक्षा देते थे. उन तक पहुंचना आसान नहीं होता था.
ऐसा भी दावा किया जाता है कि कई बार बसवराजू की हिफ़ाज़त के लिए, उनके आस-पास तीन किलोमीटर के घेरे में बारूदी सुरंगें बिछा दी जाती थीं.
लेकिन अब बसवराजू की मौत के बाद अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं. पिछले तीन चार दिनों से बसवराजू के मारे जाने के कई क़िस्से सुनाए जा रहे हैं. जितने मुँह उतनी बातें.

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छत्तीसगढ़ पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करते हुए बीबीसी से कहा, "पुलिस ने उसके एक साथी नक्सली के सेलफ़ोन की मॉनिटरिंग की. जीपीएस के सहारे हमारे जवानों ने भारत के सबसे दुर्दांत माओवादी बसवराजू और उसके साथियों की लोकेशन पता कर ली. उसके बाद जो कुछ हुआ, वह सबके सामने है."
हालांकि पुलिस के एक अन्य अधिकारी का दावा है, "इस लोकेशन के आधार पर तीन दिनों से, डीआरजी की चार टुकड़ियां बसवराजू की तलाश कर रही थीं. एक टुकड़ी ने तो मंगलवार की रात पहाड़ी के जिस छोर पर गुजारी, वहां से महज 1 किलोमीटर दूर माओवादियों का दल रुका हुआ था. सुबह जब डीआरजी के एक सहयोगी पर माओवादियों ने फायरिंग की, तब जा कर मुठभेड़ शुरु हुई."
बसवराजू की मौत के बाद छत्तीसगढ़ में जिस सवाल पर सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है, वह यह है कि क्या ये भारत में माओवाद के अंत की शुरुआत है?
राज्य के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने गुरुवार को पत्रकारों से बातचीत में इसे एक बड़ी उपलब्धि बताया था.
बसवराजू को नक्सल आंदोलन की रीढ़ बताते हुए राज्य के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा, "बसवराजू तीन करोड़ का इनामी था. तीन दशकों में पहली बार हुआ कि जनरल सेक्रेटरी रैंक का कोई माओवादी न्यूट्रलाइज़ किया गया है. यह बहुत बड़ी सफलता है और इससे निश्चित रूप से नक्सलवाद को एक बड़ा झटका लगा है. नक्सलवाद की कमर टूटी है."

1975 में मारा गया था नक्सल संगठन का एक और महासचिव

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हालांकि यह पहली बार नहीं है, जब माओवादी संगठन से जुड़ा शीर्ष नेतृत्व स्तर का व्यक्ति मारा गया हो.
कोलकाता में जन्मे और दिल्ली में पले-बढ़े सुब्रत दत्त उर्फ़ जौहर उन युवाओं में शुमार थे, जिन्होंने चारु मजूमदार के आह्वान पर अपनी नौकरी छोड़कर हथियारबंद आंदोलन का रास्ता चुना था.
जौहर को नक्सली संगठन सीपीआई-एमएल में बंगाल-बिहार सीमांत क्षेत्रीय समिति का जिम्मा सौंपा गया था. इस दौरान 28 जुलाई 1972 को नक्सल आंदोलन के संस्थापकों में से एक चारू मजूमदार की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी. इसके बाद नक्सल संगठन के सामने अपने को बनाए और बचाए रखने की एक बड़ी चुनौती थी.
यही वह दौर था, जब बंगाल समेत दूसरे राज्यों में बड़ी संख्या में पुलिस मुठभेड़ों में नक्सली मारे जा रहे थे.
नक्सलियों के दस्तावेज़ बताते हैं कि जौहर ने बंगाल और छोटानागपुर के इलाके़ में संगठन का लगातार विस्तार किया. यही कारण है कि 28 जुलाई 1974 को केंद्रीय समिति के पुनर्गठन के बाद जौहर को नक्सली संगठन सीपीआई-एमएल का महासचिव चुना गया.
इसके 16 महीने बाद, बिहार के भोजपुर के बाबू बांध इलाके़ में 29 नवंबर 1975 को पुलिस ने इस नक्सली महासचिव को एक मुठभेड़ में मारने का दावा किया.
इस बात को 50 साल होने को आए और तब से लेकर अब तक नक्सल संगठन का न केवल नाम बदला, बल्कि उसकी पूरी सूरत बदल गई.
लेकिन हिंसा नक्सली संगठनों की स्थायी पहचान बनी रही.
दस्तावेज़ बताते हैं कि 50 साल पहले जब जौहर की मौत हुई थी, तब भी यह सवाल उठा था कि आगे क्या होगा?
लेकिन तब के सवाल और उनके जवाब, ज़ाहिर तौर पर अलग थे. आज 'सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती' के तौर पर घोषित नक्सल आंदोलन के सामने सवाल भले वही हो, लेकिन जवाब बहुत बदल गए हैं.
'31 मार्च 2026 से पहले माओवाद ख़त्म होगा'

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छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक अरुण देव गौतम का मानना है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक देश से माओवाद को ख़त्म करने की जो समय सीमा तय की है, उससे पहले ही माओवाद ख़त्म हो जाएगा.
जेएनयू से अंतरराष्ट्रीय क़ानून में एमफिल की पढ़ाई करने वाले 1992 बैच के आईपीएस अरुण देव गौतम ने कहा, "मेरे हिसाब से शीर्ष नेतृत्व के न्यूट्रलाइज़ होने के बाद आंदोलन को बिखरने में ज़्यादा वक्त नहीं लगना चाहिए. कई सालों से सुरक्षाबलों ने बहुत अधिक नुक़सान उठाया है. इस क्षेत्र के निर्दोष नागरिकों ने अपने बच्चों की शहादत दी है. आज पूरे देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन है."
अरुण देव गौतम का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षाबलों ने बस्तर के उन सभी इलाक़ों पर नियंत्रण कर लिया है, जो लगभग सुरक्षा विहीन थे.
अरुण देव गौतम के अनुसार, "बहुत थोड़ा क्षेत्र बचा है, जिसपर पूरी तरह से क़ब्ज़ा करके हम माओवाद को इस धरती से पूरी तरह से ख़त्म करने के लिए प्रयासरत हैं. हमें केंद्रीय गृहमंत्री ने जो समयसीमा दी है उससे पहले ही माओवाद का अंत हो जाएगा. ऐसा हम सबका संकल्प है और ऐसी हम सबकी आशा भी है."
विचारधारा के बचे रहने का भरोसा

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रमेश उर्फ़ बदरन्ना यह मानते हैं कि शीर्ष नेतृत्व के ख़त्म होने से संगठन में बिखराव होगा लेकिन माओवाद कभी ख़त्म नहीं होगा.
बदरन्ना ने साल 2000 में माओवादी आंदोलन छोड़कर आत्मसमर्पण किया था.
साल 1987 में 15 साल की उम्र में नक्सल आंदोलन में शामिल होने वाले बदरन्ना ने पहली बार एके-47, बसवराजू के हाथ में ही देखी थी.
तब बसवराजू को इस इलाके़ में गंगन्ना के नाम से जाना जाता था.
बदरन्ना बताते हैं, "बड़ा नेता बचा रहे तो संगठन के फिर से विकसित होने की गुंजाइश रहती है. लेकिन नेता ही मारा जाए तो यह बहुत बड़ा नुक़सान है. पुराने दिनों की तरह, पार्टी के शीर्ष नेता एक साथ मिलकर बैठक करने की स्थिति में भी नहीं हैं. ऐसे में पार्टी पर फ़र्क तो पड़ेगा."
बदरन्ना का मानना है कि माओवाद एक विचारधारा है और विचारधारा कभी ख़त्म नहीं होती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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