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न्यूज़ीलैंड में भारत के साथ ट्रेड डील पर विवाद, विदेश मंत्री ने जताई आपत्ति, सरकार ने विपक्ष से मांगी मदद
न्यूज़ीलैंड और भारत ने इसी हफ़्ते सोमवार को एक नए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफ़टीए) की घोषणा की थी.
लेकिन न्यूज़ीलैंड की गठबंधन सरकार के एक पार्टनर ने भारत के साथ एफ़टीए को एक ख़राब समझौता कहा है.
न्यूज़ीलैंड की सरकार ने कहा था कि भारत के साथ हुए एफ़टीए के बाद उसके 95 प्रतिशत निर्यात से टैरिफ़ या तो ख़त्म होगा या फिर कम होगा, ख़ासकर कीवीफ्रूट, सेब, मीट, ऊन, कोयला और फॉरिस्ट्री पर.
हालाँकि डेयरी प्रोडक्ट पर टैरिफ़ में कटौती जिस तरह से न्यूज़ीलैंड चाहता था, वो नहीं हो पाई.
डेयरी में न्यूज़ीलैंड को थोक शिशु फ़ॉर्मूला मिल्क और एक कोटा के तहत उच्च-मूल्य वाले मिल्क एल्ब्यूमिन्स पर 50 प्रतिशत टैरिफ़ कटौती मिली है.
सोमवार को जैसे ही इस समझौते की घोषणा की गई, उसी समय एक बयान में न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट के नेता और वहाँ के विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने इसे देश के लिए एक ख़राब सौदा बताया.
न्यूज़ीलैंड में क्रिस्टोफ़र लक्सन के नेतृत्व में नेशनल पार्टी की सरकार है. लेकिन नेशनल पार्टी के पास कुल 48 सीटें ही हैं. सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की ज़रूरत होती है.
ऐसे में लक्सन की सरकार एसीटी न्यूज़ीलैंड और न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट पार्टी के समर्थन से चल रही है.
एसीटी न्यूज़ीलैंड के पास 11 और न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट पार्टी की आठ सीटें हैं. न्यूज़ीलैंड में मुख्य विपक्षी लेबर पार्टी है, जिसके पास 34 सीटें हैं.
न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट के नेता विंस्टन पीटर्स की आपत्ति से गठबंधन सरकार की चुनौतियाँ बढ़ गई हैं. हालाँकि प्रधानमंत्री का कहना है कि उन्हें एफ़टीए पर संसद की मंज़ूरी लेने में दिक़्क़त नहीं होगी.
विंस्टन पीटर्स ने कहा, "इमिग्रेशन के मामले में यह बहुत ज़्यादा रियायतें देता है. इसकी तुलना में न्यूज़ीलैंड के लोगों को पर्याप्त लाभ नहीं मिलता. ख़ास कर डेयरी क्षेत्र में हमें कोई ख़ास फ़ायदा नहीं मिल रहा है.''
आपत्ति क्यों?
पिछले सप्ताह जब इस सौदे को न्यूज़ीलैंड में कैबिनेट की मंज़ूरी के लिए रखा गया, तो न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट ने अपने गठबंधन समझौते में मौजूद 'असहमति पर सहमति' के प्रावधान का इस्तेमाल किया.
न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट ने स्पष्ट कर दिया कि अगर इसे संसद में क़ानून बनाने के लिए पेश किया जाएगा, तो पार्टी उसके ख़िलाफ़ मतदान करेगी.
पीटर्स ने कहा, "इस समझौते के तहत न्यूज़ीलैंड भारतीय उत्पादों के लिए अपना बाज़ार पूरी तरह खोल रहा है, जबकि भारत हमारे प्रमुख डेयरी उत्पादों पर मौजूदा भारी टैरिफ़ को कम नहीं कर रहा है."
न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट ने प्रस्तावित माइग्रेशन नीति में बदलावों पर भी चिंता जताई.
इस व्यापार समझौते के तहत भारतीय नागरिकों के लिए एक नया रोज़गार वीज़ा बनाया गया है.
न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट के अनुसार, प्रतिस्पर्धी श्रम बाज़ार की स्थिति में इससे न्यूज़ीलैंड में भारतीय प्रवासन के प्रति रुचि बढ़ने की आशंका है.
पीटर्स ने कहा कि व्यापार समझौतों को लेकर उनकी पार्टी का रुख़ हमेशा से एक समान, लंबी अवधि के लिए और सिद्धांतों पर आधारित रहा है.
उन्होंने कहा, "न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट का लंबे समय से यह रुख़ रहा है कि वह उन मुक्त व्यापार समझौतों (एफ़टीए) का समर्थन करे, जो न्यूज़ीलैंड के लोगों के लिए अच्छा सौदा हो और जो नहीं हों उनका विरोध करो."
दूसरी तरफ़, प्रधानमंत्री क्रिस्टोफ़र लक्सन ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि सरकार यह क़ानून पारित करा लेगी भले ही इसके लिए लेबर पार्टी के समर्थन की ज़रूरत पड़े.
उन्होंने कहा, "संसद में व्यापार के मुद्दे पर हमें व्यापक समर्थन देखने को मिला है और हम इसके समर्थन में अपना पक्ष मज़बूत करते रहेंगे."
लक्सन ने कहा कि उन्होंने न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट की आपत्तियों से निपटने की कोशिश की और उन्हें उन हिस्सों को लेकर 'आश्वस्त किया' जो न्यूज़ीलैंड के हित में हैं.
उन्होंने कहा, "आख़िरकार भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है. यह ऐसी अर्थव्यवस्था है, जिसमें न्यूज़ीलैंड को शामिल होना चाहिए."
विपक्ष से उम्मीद
न्यूज़ीलैंड के व्यापार मंत्री टॉड मैक्ले ने कहा है कि न्यूज़ीलैंड फ़र्स्ट के विरोध के बावजूद उन्हें भरोसा है कि भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता (एफ़टीए) लागू हो जाएगा.
उन्होंने संसद से पास कराने में लेबर पार्टी के समर्थन हासिल करने पर भरोसा जताया है.
टॉड मैक्ले ने कहा कि अगर लेबर पार्टी इसका समर्थन नहीं करती तो उन्हें हैरानी होगी.
मैक्ले ने आरएनज़ेड से कहा कि इस समझौते पर अगले साल हस्ताक्षर किए जाएँगे और सेलेक्ट कमेटी की जाँच प्रक्रिया के बाद भारत के लिए टैरिफ दरें घटाने से जुड़ा क़ानून संसद में पारित कराना होगा.
इसका मतलब है कि यह पारित होगा या नहीं, अब विपक्ष के हाथ में है.
उन्होंने कहा कि समझौते की घोषणा से पहले उन्होंने लेबर नेता क्रिस हिपकिंस और पार्टी के व्यापार प्रवक्ता डेमियन ओ'कॉनर को इसके बारे में जानकारी दी थी.
उन्होंने कहा, "यह एक अच्छा समझौता है और यह उन्हीं समझौतों जैसा है, जिन्हें वह ख़ुद आगे बढ़ा चुके हैं. मुझे हैरानी होगी अगर वे इसका समर्थन नहीं करते लेकिन वे अपना वोट कहाँ देना चाहते हैं, यह उनका फ़ैसला होगा."
ओ'कॉनर पहले आरएनज़ेड से कह चुके हैं कि यह समझौता "आगे की दिशा में एक अच्छा क़दम" है.
लेकिन फ़िलहाल उन्होंने यह नहीं कहा है कि पार्टी इसका समर्थन करेगी या नहीं. उन्होंने कहा कि लेबर पार्टी नए साल में इस पर फ़ैसला करेगी.
मैक्ले ने कहा कि उनका लक्ष्य अगले साल के चुनाव से पहले इस समझौते को लागू करना है.
द न्यूज़ीलैंड हेरल्ड का कहना है कि किसी भी व्यापार समझौते को संसद की पूरी प्रक्रिया से गुज़रने में आमतौर पर एक साल से 18 महीने लग जाते हैं.
मैक्ले कहा, "जो बात बिल्कुल स्पष्ट है, वह यह कि व्यापार अब द्विदलीय मुद्दा बन चुका है. सभी न्यूज़ीलैंडवासी मानते हैं कि व्यापार हमारे लिए अहम है. दुनिया भर में क़रीब 40 करोड़ लोग अपनी लगभग 10 प्रतिशत खाद्य ज़रूरतें न्यूज़ीलैंड से पूरी करते हैं. अगर हम व्यापार नहीं करेंगे तो हमारी अर्थव्यवस्था पीछे चली जाएगी और अलग-अलग सरकारों ने इसे पहचाना है."
डेयरी उत्पाद को लेकर निराशा
न्यूज़ीलैंड की डेयरी कंपनियों के एसोसिएशन ने कहा है कि यह समझौता देश के लिए तो अच्छा है, लेकिन डेयरी क्षेत्र के लिए नहीं क्योंकि मक्खन और चीज़ जैसे मुख्य उत्पादों को इससे बाहर रखा गया है.
न्यूज़ीलैंड की डेयरी कंपनियों के एसोसिएशन के अध्यक्ष गुय रोपर आरएनज़ेड से कहा, "हमें निराशा है कि भारत छोटे-मोटे बदलावों से आगे कुछ देने को तैयार नहीं रहा. भारत अपने घरेलू बाज़ार की रक्षा करना चाहता है. इसलिए अब तक कोई भी देश मुख्य डेयरी उत्पादों को शामिल करने वाला समझौता हासिल नहीं कर पाया है.''
उन्होंने इस बात पर भी संतोष जताया कि समझौते में यह प्रावधान शामिल है कि अगर भारत दूसरे देशों के साथ बेहतर शर्तों पर समझौता करता है, तो डेयरी पर फिर से बातचीत शुरू होगी.
ऑकलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी में अर्थशास्त्र के सीनियर प्रोफ़ेसर डॉ. राहुल सेन इसे एक अच्छा समझौता बताया है.
उन्होंने आरएनज़ेड से कहा, "यह तो सिर्फ़ शुरुआत है. यह मूल रूप से न्यूज़ीलैंड के लिए भारत के साथ लंबी अवधि के लिए आर्थिक संबंध बनाने का रास्ता खोल रहा है."
उन्होंने बताया कि इस समझौते की हर साल समीक्षा की जाएगी.
उन्होंने कहा, "इसलिए यह ज़रूरी नहीं है कि हर चीज़ पर तुरंत सहमति बन जाए. लेकिन आप समझिए कि इसकी नींव रख दी गई है."
सेन के अनुसार, इस समझौते से न्यूज़ीलैंड के व्यवसायों को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक के साथ जुड़ने का अवसर मिलेगा.
उन्होंने कहा, "जब आपको ऐसा अवसर मिलता है, तो सबसे पहले आपको उसे पकड़ना होता है और फिर यह देखना होता है कि भविष्य में इसे कैसे और आगे बढ़ाया जा सकता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.