बिहार के वे गांव जहां मुसलमान नहीं रहते लेकिन हिंदुओं से मस्जिदें आबाद हैं

    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बिहार की राजधानी पटना से सटे इलाक़े मगध के नाम से मशहूर रहे हैं.

इस इलाक़े की एक ख़ास बात ये भी है कि यहां कई जगहों पर मुसलमानों की आबादी नहीं है लेकिन अब भी मस्जिदें मौजूद हैं और वहां हर दिन अजान भी दी जाती है.

ये मस्जिदें ऐसी हैं, जो दशकों पुरानी हैं. उनकी विरासत को बचाने के लिए आम लोग खुद ब खुद सामने आए हैं.

इन लोगों की अपनी मुश्किलें भी कम नहीं हैं, क्योंकि ये आम दिहाड़ी मजदूरी करने वाले लोग हैं, लेकिन इन लोगों ने इबादत की जगह को संरक्षित करने का काम अपने आप ले लिया है. ख़ास बात ये भी है कि इनमें से कुछ तो हिंदू हैं.

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माड़ी की कहानी, अजय की ज़ुबानी

अजय पासवान ऐसे ही एक हिंदू हैं. जिन्होनें अपने दो दोस्तों बखौरी बिंद और गौतम प्रसाद के साथ मिलकर अपने गांव माड़ी की मस्जिद को आबाद रखा है.

बिहार की राजधानी पटना से तक़रीबन 80 किलोमीटर दूर नालंदा ज़िले का मुख्यालय बिहारशरीफ़ है. बिहारशरीफ़ के चौड़े रास्तों से जब हम अंदरूनी इलाकों में जाते हैं तो उबड़-खाबड़ सड़कों से गुज़रते हुए माड़ी गांव तक पहुंचते हैं.

गांव में लगातार बन रहे ऊंचे और पक्के मकानों के बीच सैकड़ों साल पुरानी मस्जिद का गुंबद दूर से ही नज़र आता है. पास पहुंचने पर यहां नौजवान अजय पासवान मिलते हैं जो मस्जिद के बरामदे में झाड़ू लगा रहे हैं.

हमें देखकर वो मुस्कुराते हुए कहते हैं, " मेरा दिल है कि मस्जिद का काम करूं. खाना नहीं खाएंगे लेकिन यहां सेवा करनी है."

दरअसल ये कहानी 15 साल पहले शुरू होती है जब अजय और उनके दो दोस्त मस्जिद के पास से गुज़र रहे थे.

माड़ी गांव के रहने वाले ये लोग अपने जीवनयापन के लिए मज़दूरी करते हैं.

पेशे से मजदूर अजय बीबीसी को बताते हैं, "एक दिन मैं और मेरे दोस्त यहां से गुज़र रहे थे तो लगा कि मस्जिद के लिए कुछ करना चाहिए. यहां बहुत जंगल था. हम लोग मज़दूर आदमी हैं तो सारा काम ख़ुद कर लिया."

"पहले फ़र्श बनाया, जंगल साफ़ किया, फिर प्लास्टर किया, पुताई की. उसके बाद लगा कि अल्लाह का घर है रौशन रहना चाहिए तो सांझ बाती शुरू कर दी. अगरबत्ती जलाने लगे. फिर लगा अज़ान भी मस्जिद से होनी चाहिए तो लाउडस्पीकर लाए और पेन ड्राइव की मदद से अज़ान दिलवाने लगे. "

"शायद अल्लाह को लगा होगा कि हमसे काम ले ले, तो उन्होंने करवा लिया. हम लोगों ने सारा काम अपने ख़र्च पर किया."

200 साल पुरानी मस्जिद

माड़ी गांव में अब कोई मुस्लिम परिवार नहीं रहता. भारत-पाकिस्तान विभाजन के दंगों के समय मुस्लिम इस गांव से धीरे-धीरे चले गए.

ये मस्जिद कितनी पुरानी है इसका कोई ठोस जवाब नहीं मिलता लेकिन माड़ी गांव के लोगों के मुताबिक़ ये मस्जिद 200 साल पुरानी है.

इस मस्जिद के पास एक मज़ार भी है जहां गांव के लोग शुभ काम शुरू करने से पहले आते हैं.

मस्जिद के ठीक बगल में कुसुम देवी रहती हैं.

वह कहती हैं, " इस गांव में कोई मुसलमान नहीं रहता. लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि मस्जिद ऐसे ही रहेगी. हम सब लोग यहां काम करते हैं."

"कोई भी शुभ काम हो तो देवी स्थान पर जाने से पहले यहीं गोड़ (प्रणाम) लगा जाता है. उसके बाद देवी स्थान जाकर लोग पूजा करते हैं और शादी-विवाह होता है."

अजय पासवान रोज़ाना 500 रुपये कमाते हैं.

मस्जिद के रख-रखाव को लेकर हो रहे ख़र्च के बारे में पूछने पर कहते हैं, "हम गांव वालों से कुछ भी नहीं लेते. कोई अगर मस्जिद देखने आ गया और 50-100 रुपये दे दिया तो बात अलग है."

"मेरी मां, पत्नी, बच्चे भी कुछ नहीं कहते क्योंकि हम किसी नशे पर पैसे तो ख़र्च नहीं कर रहे हैं. हम तो धर्मस्थल पर लगा रहे हैं."

"इतने साल बीत गए लेकिन सरकार, नेता, विधायक किसी ने इस मस्जिद की सुध नहीं ली. हमने भी ठान लिया है कि जब तक ज़िंदा रहेंगे तब तक मस्जिद का काम करेंगे."

मगध इलाके की मस्जिदें

बिहार के मगध इलाके में ऐसे कई गांव मिलते हैं जहां मुस्लिम समुदाय के लोग नहीं रहते. लेकिन इन इलाकों में पुरानी मस्जिदें हैं.

इनमें से कुछ मस्जिद अतिक्रमण की शिकार हुईं, कुछ जमींदोज़, तो कुछ खंडहर में तब्दील हो गईं या स्थानीय लोगों के जानवरों का आशियाना बन गईं.

ये मस्जिदें इस बात का साफ़ संकेत हैं कि किसी ज़माने में इन गांवों में मुसलमान आबादी अच्छी तादाद में रही होगी.

मगध का इलाका, वो इलाका है जहां मगही भाषा बोली जाती है. पटना, गया, नालंदा, नवादा, शेखपुरा, अरवल आदि ज़िले मगध में आते हैं.

1946 में जब नोआखली ( अभी बांग्लादेश में) में दंगे हुए तो उसके नतीजे में बिहार में भी दंगे हुए जिसका प्रमुख केंद्र मगध का इलाका था.

दरअसल, मुस्लिम लीग की पॉलिटिक्स बिहार में बहुत मजबूत नहीं थी.

बिहार विधानसभा की वेबसाइट के मुताबिक, 1937 में जब 'गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट' के तहत प्रांतीय चुनाव हुए तो बिहार में मुस्लिम लीग महज़ दो सीट जीत पाई थी.

प्रांतीय सरकार में गवर्नर के हस्तक्षेप के सवाल पर कांग्रेस ने सरकार बनाने से इनकार कर दिया. जिसके बाद बिहार मुस्लिम इंडिपेंडेंट पार्टी के मोहम्मद यूनुस ने सरकार बनाई. जिसने 20 सीटें जीती थीं.

प्रसिद्ध इतिहासकार और ख़ुदा बख़्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी के पूर्व निदेशक इम्तियाज़ अहमद बताते हैं, "1937 के बाद जब कांग्रेस का मोहम्मद यूनुस के साथ बुरा सलूक रहा, तो उससे मुसलमानों में नाराज़गी हुई. फिर जिन्ना यहां कई बार आए, मेंबरशिप ड्राइव चलाई और बिहार में भी मुस्लिम लीग मज़बूत हुई."

"उसके बाद ध्रुवीकरण मज़बूत हुआ. नोआखाली में जो कुछ हुआ, वो बंगाल की पॉलिटिक्स का असर था, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया बिहार में हुई."

वह बताते हैं, "एक वजह थी कि बंगाल हमारा पड़ोसी राज्य था. दूसरी वजह ये थी कि बिहार में पहले से ही बहुत तनाव था और तीसरी बात ये कि बिहार में जो कृषि भूमि थी, उसमें बहुत सारे ज़मींदार मुसलमान थे."

"इन इलाकों (मगध) में जो अन्य मज़बूत जातियां थीं, वे इन ज़मीनों पर अपना अधिकार चाहती थीं. और उसका एक तरीका था कि ये ज़मींदार किसी तरह से इलाके से भगा दिए जाएं. दंगे हुए और इसके बाद मुस्लिम लीग के महत्वपूर्ण लीडर ख्वाज़ा नाज़िमुद्दीन पटना आए. उन्होंने कहा था कि अब हमने पाकिस्तान हासिल कर लिया. यानी मगध इलाके के दंगे टर्निंग प्वाइंट थे."

'खंडहर होती मस्जिद और हमारी अंदरूनी टूटन'

मगध के हुए इन दंगों का प्रभाव इस कदर है कि आज भी कई बुज़ुर्ग लोग 1946 के साल को 'मियांमारी के साल' के तौर पर याद करते हैं.

पटना के दनियावां का खरभैया गांव आज़ादी से पहले मुस्लिम बहुल गांव था. पेशे से शिक्षिका रही गीता कुमारी के घर के सामने तक़रीबन 100 साल पुरानी मस्जिद है. खरभैया गांव से भी दंगों के बाद मुस्लिम पलायन कर गए.

गीता कुमारी बीबीसी को बताती हैं, "हम सब भाई-बहनों की बचपन की यादों में एक सुंदर, चहल पहल से भरी मस्जिद है. ये इलाका ही इस मस्जिद की वजह से पहचाना जाता था और आज भी इस तरफ़ का संकेत देने के लिए लोग मस्जिद की तरफ़ कहते हैं."

"मुसलमान परिवार जब यहां से गए तो उनके जाने के बाद मस्जिद पहले वीरान हुई और फिर खंडहर हो गई. हम लोगों को लगा हमारे भीतर कुछ टूट रहा है. मैंने अपने भाई कौशल किशोर से बात की और भाई-बहन ने मिलकर मस्जिद फिर से बनवा दी."

हालांकि इस मस्जिद में नमाज़ नहीं अदा की जाती. बल्कि मस्जिद में समय-समय पर उग आए झाड़- झंखाड़ हटवाने पड़ते हैं.

गीता बताती हैं, "मस्ज़िद में कोई नहीं आता. हम लोगों के पास चाबी रहती है. समय-समय पर सफाई करवानी पड़ती है. कोई हिंदू या फ़िर कोई भी त्यौहार हो तो दीया जलाकर रख देते है जैसे हमारे पूर्वज करते थे."

क्या घर और गांव वालों ने विरोध नहीं किया?

इस सवाल पर गीता कहती हैं, "90 फ़ीसदी गांव वाले तो खुश थे कि एक धर्मस्थल सुरक्षित और संरक्षित हो गया. जिनका व्यक्तिगत स्वार्थ था, उन्होंने इसका विरोध किया. जहां तक घरवालों की बात है तो हम सभी भाई-बहन धर्मनिरपेक्ष माहौल में पले-बढ़े."

वह कहती हैं, "हमारा घर भी देखिए तो इसके आर्किटेक्चर में आपको इस्लामिक शैली का प्रयोग दिखेगा. बाद में हम लोगों ने गांव के कब्रिस्तान की घेराबंदी भी करवाई. ताकी कभी कोई अपने पूर्वजों की कब्र ढूंढता यहां आए तो उन्हें वो यहां सुकून से आराम फ़रमाते मिलें."

जैसे मंदिर में शंख, वैसे मस्जिद में अज़ान

नालंदा के कैला गांव से तक़रीबन 200 मीटर दूर एक सुस्ताती दोपहर में जुमे के दिन मोहम्मद इस्माइल जल्दी-जल्दी पंक्चर बनाने में व्यस्त थे.

दुबले-पतले इस्माइल नीम के पेड़ की छांव में अपना काम वक़्त पर ख़त्म करना चाहते थे ताकि ज़ुहर (दोपहर) की नमाज़ के लिए वक़्त पर पहुंचे.

इस्माइल को कैला गांव की मस्जिद में पहुंचना था. इस गांव में कोई मुसलमान नहीं रहता. इस्माइल यहां अकेले आते हैं और अज़ान देकर पांचों वक़्त की नमाज़ अदा करते हैं.

इस्माइल बताते हैं, "हम लोग कैला गांव के पास से गुज़रते थे तो लगता था कि मस्जिद बंद पड़ी है. 50-60 बरस से बंद थी ये मस्जिद. इसको खुलवाया झाड़ू, अज़ान दिया, दूसरे मुसलमानों की मदद से मस्जिद को ठीक किया. उसकी बाउंड्री करवाई."

"अब भी लोगों से चंदा इकट्ठा करके मस्जिद में काम लगवाते है. हमने अपना गांव छोड़ दिया. बीवी-बच्चों के साथ भी नहीं रहते लेकिन ये अल्लाह का घर था तो इसको आबाद रखना ज़रूरी था. मंदिर में जैसे शंख बजता है, वैसे मस्जिद में अज़ान ज़रूरी है. मैं बहुत खुश हूं."

लेकिन हिंदुओं के इस गांव में किसी ने परेशान नहीं किया?

इस सवाल पर रेडियो और पुराने गानों के शौकीन इस्माइल कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि किसी ने खाने को दे दिया. लेकिन किसी ने तंग भी नहीं किया. तंग नहीं करना ही सबसे बड़ा सहयोग है, जो हिंदू कर रहे हैं. बिजली, पानी सब आता है और क्या चाहिए?"

बड़े शहरों से दूर बिहार के इन छोटे-छोटे गांवों में अजय, गीता और इस्माइल जैसे लोग भारत की साझी संस्कृति के प्रतीक हैं.

इतिहासकार इम्तियाज़ अहमद कहते हैं, "हम लोगों में एक-दूसरे के धर्म के सम्मान करने की परंपरा रही है. राजनीतिक वजहों से हाल के सालों में उसको धक्का लगा है लेकिर अब भी हमारे भीतर एक-दूसरे के धर्म और धार्मिक स्थलों का आदर करने और सहेजने का गुण है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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