हिज़्बुल्लाह के सिविलियन नेटवर्क को निशाना बनाने के पीछे इसराइल की रणनीति क्या है?

    • Author, रमी रुहायेम
    • पदनाम, बीबीसी के मध्य पूर्व संवाददाता, बेरूत

पिछले महीने इसराइल ने यह घोषणा की थी कि वह हिज़्बुल्लाह से जुड़ी लेबनानी माइक्रोलोन चैरिटी की शाखाओं को निशाना बनाएगा.

इसके बाद देशभर में इस संगठन की शाखाओं की सूची को लेकर अफ़रा-तफ़री का माहौल बन गया था. क्योंकि, इस संगठन की कुछ शाखाएं उनके घर के पास भी मौजूद थीं.

लेबनान में सभी नागरिक यह सोचकर परेशान थे कि इसराइल के बमबारी शुरू करने से पहले क्या उनको अपना घर छोड़कर जाना चाहिए,

दरअसल, अल-क़र्द अल-हसन एसोसिएशन (एक्यूएएच), एक चैरिटी संस्था है, जो ब्याज मुक्त छोटे ऋण मुहैया कराती है.

पिछले एक दशक में लेबनान पर अमेरिकी प्रतिबंधों और लेबनान के बैंकिंग सेक्टर के धराशायी होने के बीच एक्यूएएच का तेज़ी से उभार हुआ.

पीड़ित ने सुनाई आपबीती

हसन अपने परिवार के साथ बेरूत में एक्यूएएच की एक शाखा से केवल 200 मीटर की दूरी पर रहते हैं.

हसन ने बताया, “हमने इन हमलों के बारे में अविचाई अद्राई से सुना.”

अविचाई अरबी भाषा के प्रवक्ता हैं, जो इसराइली सेना के उन आदेशों की घोषणा सोशल मीडिया पर करते हैं, जिनमें लेबनानी इलाकों को खाली करने के निर्देश होते हैं.

हसन ने बताया, “सूचना मिलने के बाद दहिह (दक्षिणी बेरूत में एक उपनगर) में बमबारी शुरू हो गई थी. हम उसकी आवाज़ सुन सकते थे. बूम..बूम..बूम...हर धमाके के साथ बच्चे डर के मारे उछल पड़ते थे.”

इसके बाद हसन के पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी. वह अपने परिवार को लेकर समुद्र की ओर चले गए. वहां उन सभी ने कई रातें एक कार में बैठकर जागकर बिताई.

इसराइली सेना ने उस रात क़रीब 30 शाखाओं पर हमला किया था. लेकिन, हसन के घर के पास वाली शाखा इस हमले में बच गई थी. इसलिए अगले दिन हसन वापस वहां चले गए.

इसराइल हिज़्बुल्लाह से जुड़े नागरिक संगठनों पर हमला कर रहा है. यह कार्रवाई लेबनान में जारी इसराइल के अभियान का हिस्सा है.

किसे बनाया गया निशाना?

एक्यूएएच के अलावा, इसराइल ने इस्लामिक हेल्थ सोसायटी को भी निशाना बनाया, जिसे हिज़्बुल्लाह धन मुहैया करवाता है.

हेल्थ सोसायटी लेबनान में आपातकालीन सेवाएं, अस्पताल और चिकित्सा केंद्र संचालित करता है.

इस हमले में हिज़्बुल्लाह की खोज और बचाव टीम को भी निशाना बनाया गया. इसमें दर्जनभर बचाव कर्मचारी मारे गए.

हालांकि, इसराइल ने दावा किया कि हिज़्बुल्लाह “आतंकी गतिविधियों को छिपाने के लिए आईएचएस का इस्तेमाल” कर रहा है.

और जो कर्मचारी इसराइली हमले में मारे गए हैं, वो सैन्य भूमिका में शामिल थे, मगर आईएचएस ने इस दावे को नकार दिया है.

इसराइल ने बमबारी और निकासी आदेशों के कारण विस्थापित हुए लोगों की इमारतों पर भी हमला किया.

इस तरह के हमलों ने लेबनान में व्यापक स्तर पर संदेह की स्थिति पैदा कर दी कि इसराइल अब उस नागरिक आबादी को निशाना बना रहा है, जो हिज़्बुल्लाह की समर्थक मानी जाती है.

ये वो लोग हैं, जिन्हें इसराइल में ‘बिया’ के रूप में जाना जाता है, इसका शाब्दिक अर्थ ‘पर्यावरण’ है. इन लोगों को हिज़्बुल्लाह का सामाजिक आधार माना जाता है.

यह एक समुदाय है, जो लाखों लेबनानी लोगों से मिलकर बना है. ये वो लोग हैं जो पार्टी का समर्थन करते हैं, उसको वोट देते हैं.

इनमें से कई तो नागरिक संगठनों में कर्मचारी हैं या हिज़्बुल्लाह लड़ाकों के रिश्तेदार या उसके सदस्य हैं.

इस सामाजिक आधार के साथ हिज़्बुल्लाह का रिश्ता दक्षिण में शिया बहुल इलाक़ों, पूर्वी बेका घाटी और दक्षिणी बेरूत के उपनगरों पर केंद्रित है.

लंबे समय से इसे समूह की ताकत के स्रोत के तौर पर देखा जाता है. मगर, इसके चलते यह हिज़्बुल्लाह के दुश्मनों के निशाने पर भी आ गए हैं.

एक्यूएएच पर क्या हैं आरोप?

इसराइल का कहना है कि एक्यूएएच हिज़्बुल्लाह की सैन्य गतिविधियों के लिए धन उपलब्ध करवाता है. हालांकि, समूह ने इस दावे का खंडन किया है.

एक्यूएएच ने कहा है कि सामान्य लेबनानी लोगों को छोटे और ब्याज मुक्त ऋण मुहैया करवाने के अलावा बाकी किसी काम में उसकी कोई भूमिका नहीं है.

समूह इस दावे के लिए यह तर्क भी देता है कि इस्लामिक क़ानून में ब्याज वसूलने पर प्रतिबंध है.

पिछले महीने एक्यूएएच की शाखाओं पर किए गए हमले के बाद इसराइल के तत्कालीन रक्षा मंत्री ने एक्स पर लिखा था कि इसराइल “आतंकवादी समूह की मिसाइल ख़रीदने और लॉन्च करने की क्षमता को नष्ट कर रहा है.”

अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के हिसाब से विशेषज्ञ कहते हैं कि एक्यूएएच क़ानूनी तौर पर सेना का निशाना नहीं हो सकता है.

फ़िर भले ही इसराइल दावा करे कि यह संगठन हिज़्बुल्लाह को आर्थिक तौर पर मदद मुहैया करवाता है.

मानवाधिकार और आतंकवाद विरोध पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष अधिकारी बेन सोल के अनुसार, “अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून किसी समूह के आर्थिक और वित्तीय ढांचे पर हमला करने की अनुमति नहीं देता है. फ़िर भले ही वो अप्रत्यक्ष तौर पर सैन्य गतिविधियों को बढ़ावा देते हों.”

सोल कहते हैं कि बमबारी “नागरिकों और सैन्य लक्ष्यों के बीच के अंतर को ख़त्म कर देती है.” और नागरिक आबादी के ख़िलाफ़ ‘संपूर्ण युद्ध’ का दरवाज़ा खोल देती है.”

इसराइल क्या उम्मीद कर सकता है?

तो फ़िर हिज़्बुल्लाह से जुड़े नागरिक संगठनों पर बमबारी करके इसराइल क्या हासिल करने की उम्मीद कर सकता है?

इसके जवाब में अमाल साद कहती हैं कि इसराइल के हमलों का मक़सद उस समूह को ख़त्म कर देना है, जिसे हिज़्बुल्लाह के ‘समर्थक समुदाय’ के तौर पर देखा जाता है.

अमाल साद कार्डिफ़ यूनिवर्सिटी में राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों की व्याख्याता हैं और हिज़्बुल्लाह के मामलों की विशेषज्ञ मानी जाती हैं.

उन्होंने कहा, “सरकार के बाद शायद हिज़्बुल्लाह दूसरा बड़ा संगठन है, जिसने नौकरियां दी है. उसके नागरिक संगठन लाखों लेबनानी लोगों को प्रभावित करते हैं. खासतौर पर शियाओं को. यह समुदाय को ख़त्म करने का एक तरीका है.”

यह पहली बार नहीं है, जब हिज़्बुल्लाह का सामाजिक आधार माने जाने वाली आबादी इस हमले के दायरे में आ गई है. जब इसराइल और हिज़्बुल्लाह के बीच साल 2006 में जंग हुई थी.

तब इसराइल ने दहिह (बेरूत का एक उपनगर) के आसपास के इलाक़ों को निशाना बनाया था.

दो साल बाद यह सामने आया था कि यह एक सैन्य रणनीति के तहत किया गया था, जिसे दहिह सिद्धांत कहा जाता है.

इसे सबसे पहले मेजर जनरल गादी इज़ेनकोट ने 2008 में जाहिर किया था. जब वो इसराइली सेना की उत्तरी कमांड के प्रमुख थे.

यह सिद्धांत कुछ ऐसा था कि इसमें नागरिक आबादी पर ‘अत्यधिक दबाव’ का इस्तेमाल करके लेबनानी लोगों को मजबूर करना था ताकि वो तंग आकर हिज़्बुल्लाह का समर्थन करना छोड़ दे.

उन्होंने उस समय कहा था कि, ‘हमारी सोच यही थी कि वो सैन्य अड्डे हैं.’

उन्होंने हिज़्बुल्लाह के तत्कालीन नेता हसन नसरल्लाह को याद करते हुए कहा था, ‘तब नागरिक आबादी को नुक़सान पहुंचाना ही नसरल्लाह को रोकने का एकमात्र साधन था.’

सितंबर 2024 में दहिह में किए गए इसराइल के हवाई हमले में हिज़्बुल्लाह के नेता हसन नसरल्लाह की मौत हो गई थी.

अब, इसराइल के निशाने पर हिज़्बुल्लाह के नागरिक संगठनों के साथ वो इलाक़े भी हैं, जो युद्ध क्षेत्र से कहीं दूर हैं. जैसे वार्देनियेह, सिडोन का उत्तर-पूर्व इलाक़ा.

बीबीसी को आईडीएफ ने एक प्रतिक्रिया में कहा, “हम केवल हिज़्बुल्लाह के आतंकी संगठनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रहे हैं. हम लेबानानी लोगों या चिकित्सा सेवाओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं कर रहे हैं. और हमारी कोशिश होती है कि हमारी कार्रवाई के दौरान लेबनानी नागरिकों को कम नुक़सान हो.”

उन्होंने कहा, “आईडीएफ़ ऑपरेशन की योजना अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के मुताबिक और ख़ुफ़िया विभाग की सूचनाओं के आधार पर ही तैयार की जाती है.”

एक्यूएएच की स्थापना कब हुई?

एक्यूएएच भी उन कई संगठनों में शुमार है, जो हिज़्बुल्लाह से जुड़े हैं. और लाखों लेबनानी नागरिकों के लिए एक जीवन रेखा के समान है.

खासतौर पर वो लोग, जो इस आंदोलन का आधार बनाते हैं. इसकी कहानी लेबनान के आर्थिक और वित्तीय पतन से जुड़ी है.

एक्यूएएच की स्थापना 1980 की शुरुआत में हुई थी. तब इसने परिवारों और नए शादी-शुदा जोड़ों को कर्ज़ दिया था, जिससे उनको अपनी ज़रूरतों को पूरा करने में मदद मिली थी.

हाल ही में, यह संगठन कृषि और सोलर पैनल से जुड़े प्रोजेक्ट्स को लेकर भी कर्ज़ दिए जाने की शुरुआत करने वाला था.

मगर, अमेरिका ने साल 2007 में एक्यूएएच पर प्रतिबंध लगा दिए थे. यूएस ने कहा था कि हिज़्बुल्लाह इसका इस्तेमाल कर रहा था.

अगस्त 2019 में एक्यूएएच तब सुर्खियों में आया था, जब यूएस ट्रेज़री ने जमाल ट्रस्ट बैंक को मंजूरी दे दी थी. हालांकि, तीन सप्ताह से भी कम समय के बाद इस बैंक को बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा था.

इस बीच, अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद एक्यूएएच तेज़ी से फैला.

दरअसल, अमेरिका द्वारा चुनिंदा व्यक्तियों और संस्थाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों का परिणाम यह हुआ था कि लेबनानी बैंकों ने उन लोगों और संस्थाओं के खाते बंद कर दिए थे क्योंकि उनको लेकर शंका थी कि वे लोग अमेरिकी राजकोष के साथ दिक्कत पैदा कर सकते हैं.

इसके बाद उनमें से कई लोग अपना पैसा लेकर एक्यूएएच के पास चले गए.

आमजन की क्या परेशानी?

साल 2019 में वित्तीय और आर्थिक गिरावट के चलते लेबनानी बैंकों ने लोगों की बचत को रोक लिया था. इससे आम लोगों में लेबनान के बैंकिंग सिस्टम को लेकर भरोसा और कम हो गया.

इस दौरान एक्यूएएच ने कई लेबनानी लोगों की मदद की, जिनकी मदद अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते लेबनान के फाइनेंशियल सिस्टम ने नहीं की थी.

और ये वो लोग थे, जो अपना धन कहीं और जमा करवा पाने में असमर्थ थे. इनमें से कई आज लेबनान में फैले लाखों या इतने ही विस्थापित लोगों में से होंगे.

इनमें ज़्यादातर लेबनान के दक्षिण में बेका, बेरूत के दक्षिणी इलाक़ों से ताल्लुक रखते हैं.

इनमें कई लोग सरकार द्वारा चलाए जा रहे आश्रय स्थलों और खाली इमारतों में रहने को मजूबर हैं. वे सभी बेबस नज़र आते हैं. उनके गांव और शहरों को इसराइली सेना ने नष्ट कर दिया है.

और जिनके घर अभी भी बच गए हैं, उन पर अगली बमबारी में क्षतिग्रस्त हो जाने का ख़तरा है.

और ऐसे में जब एक्यूएएच की शाखाओं पर हमला हुआ, तो उनकी सारी जमा पूंजी भी ख़त्म हो गई, वो भी ऐसे समय में जब उन्हें उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.

इन विस्थापितों में वो लोग भी शामिल हैं, जो बमबारी का शिकार हुए हैं, लेकिन उनका घर युद्ध क्षेत्र से कहीं दूर था. जैसे- एटोव में एक उत्तरी गांव, जहां ईसाई समुदाय की बहुलता है.

वहां इसराइल के हमले में 23 लोग मारे गए थे. अब उनके समुदाय में दहशत का माहौल है कि पता नहीं कब उन पर इसराइली हमला हो जाएगा.

इस बीच, दक्षिण में, हिज़्बुल्लाह और इसराइली सेना आमने-सामने है. इस बात को एक महीना बीत चुका है. यह स्थिति अक्तूबर की शुरुआत इसराइल के दक्षिणी लेबनान में हमला शुरू करने के बाद पैदा हुई थी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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