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इनकम टैक्स से जुड़े क़ानूनों में बड़े बदलाव- जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट और क्या हैं उम्मीदें
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत सरकार इनकम टैक्स से जुड़े क़ानून में नए स्तर पर बदलाव करने जा रही है. यह इनकम टैक्स एक्ट-1961 में होने वाला एक बड़ा बदलाव होगा.
उम्मीद की जा रही है कि संसद के बजट सत्र में गुरुवार को यह बिल लोकसभा में पेश किया जाएगा. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस साल का आम बजट पेश करते हुए बताया था कि सरकार नया इनकम टैक्स बिल लेकर आने वाली है.
इनकम टैक्स बिल-2025 में इनकम टैक्स एक्ट-1961 की 823 पेज में की गई व्याख्या को घटाकर 622 पेज में समेट दिया गया है.
यह बिल संसद से पारित होने के बाद भारत में 64 साल पुराने इनकम टैक्स क़ानून की जगह ले लेगा. इससे आम टैक्स पेयर के उपर क्या फर्क पड़ेगा और यह कितना बड़ा बदलाव साबित हो सकता है, हमने कुछ विशेषज्ञों से बात कर समझने की कोशिश की.
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इनकम टैक्स बिल 2025 में सीबीडीटी को कई नई शक्तियां दी गई हैं और इसके लिए अब संसद की मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं होगी.
माना जा रहा है कि इस विधेयक को संसद में पेश करने के बाद इसे संसद की स्थाई समिति के पास भेजा जा सकता है, ताकि इसपर और बेहतर सुझाव लिए जा सकें.
कितना आसान हो पाएगा क़ानून?
हर साल बजट के बाद इनकम टैक्स से जुड़े बदलावों को इनकम टैक्स एक्ट में शामिल किया जाता है, लेकिन दशकों के बाद ऐसा मौक़ा है, जब इनकम टैक्स से जुड़े क़ानूनों में बदलाव की पहल की गई है.
विशेषज्ञों के मुताबिक़, नए इनकम टैक्स बिल की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि इसमें इनकम टैक्स से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या को आसान बना दिया गया है.
इसका मक़सद व्याख्या की वजह से पैदा होने वाली जटिलताओं और क़ानूनी मामलों को कम करना है.
रिटायर्ड प्रिंसीपल चीफ़ कमीश्नर (इनकम टैक्स) अतुल प्रणय बताते हैं, "मौजूदा इनकम टैक्स के क़ानून में ऐसे प्रावधान हैं, जिनको आम लोग तो क्या कई बार सीए और वकील भी नहीं समझ पाते थे और इसकी अलग-अलग व्याख्या करते थे, जिसकी वजह से कई क़ानूनी मामले खड़े हो जाते थे."
"अब जैसे इनकम टैक्स एक्ट में प्रीवियस ईयर और असेसमेंट ईयर की बात कही गई है, इसे समझना आम लोगों के लिए आसान नहीं है. इसे हटाकर नए बिल में फ़ाइनेंशियल ईयर (वित्त वर्ष) और टैक्स ईयर का इस्तेमाल किया गया है."
"इस बिल के प्रावधानों में इनकम टैक्स से जुड़े क़ानूनों को सरल बनाने की कोशिश की गई है ताकि यह आम लोगों की समझ में भी आ जाए."
हालांकि इनकम टैक्स एक्ट में जिस तरह के बदलाव की उम्मीद कई जानकार कर रहे थे, वो ऐसा कुछ भी इस बिल में नहीं देख रहे हैं.
द इंस्टीट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटेंट ऑफ़ इंडिया के पूर्व प्रमुख वेद जैन कहते हैं, "स्पष्ट तौर पर कहूं तो इस विधेयक में जो प्रावधान है वह कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं है. इसमें केवल पुराने क़ानून को रिफ़ाइन और रिस्ट्रक्चर किया गया है. इससे ग़ैर ज़रूरी प्रावधानों को हटा दिया गया है पुराने क़ानूनों को नया नंबर दे दिया गया है. ."
मौजूदा इनकम टैक्स एक्ट में कई ऐसे प्रवाधान हैं, जिनको समझने के लिए कई खंडों में उनकी व्याख्या की गई है. इस तरह से किसी ख़ास टैक्स को जानने के लिए कई स्तर पर उसकी व्याख्या को पढ़ना ज़रूरी है.
अतुल प्रणय कहते हैं, "नए विधेयक की शब्दावलियों को समझने के लिहाज से आसान बनाया गया है, ताकि विवाद कम हो सके. कुल मिलाकर यह एक अच्छा प्रयास है."
इनकम टैक्स से जुड़े क़ानून में हर साल बदलाव आते हैं और प्रक्रिया लगातार जारी रहती है. हर साल फ़ाइनेंस बिल में ही कई प्रावधान होते हैं.
सेवानिवृत चीफ़ कमीश्नर (इनकम टैक्स) रजनीकांत गुप्ता कहते हैं, "इनकम टैक्स से जुड़े मौजूदा कानून काफ़ी जटिल हैं. इन्हें सरल करने की ज़रूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी."
"साल 2009 में पी चिदंबरम ने वित्त मंत्री रहते इस मामले को लेकर एक गंभीर प्रयास किया था और 'डायरेक्ट टैक्स कोड-2009' लेकर आए थे, हालांकि उस वक़्त यह काम नहीं हो पाया और मामला संसद की स्थायी समिति के पास भेज दिया गया."
'न्यू टैक्स ईयर' का प्रावधान
रजनीकांत गुप्ता कहते हैं, "इनकम टैक्स से जुड़े क़ानून में बदलाव के सुझाव हर साल आते हैं. इसलिए ज़रूरत एक ऐसे क़ानून की थी, जिससे हर साल बहुत सारे संशोधन न करने पड़ें. इसके लिए आम लोगों से भी सुझाव मंगाए गए थे."
"सरकार भी चाहती है कि यह प्रक्रिया आसान हो जाए, इसलिए इस बार के बजट में ओल्ड टैक्स रिजीम में कोई बदलाव नहीं किया गया और इनकम टैक्स में छूट की सीमा 12 लाख रुपये तक बढ़ा दी गई, ताकि लोगों को नए टैक्स रिजीम को चुनने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके."
नए इनकम टैक्स बिल में टैक्स ईयर को नए तरीके से परिभाषित किया गया है, माना जा रहा है कि दुनियाभर के टैक्स सिस्टम से बेहतर तरीके से जुड़ने के लिए यह प्रावधान रखा गया है.
रजनी कांत गुप्ता बताते हैं, "दुनिया भर के देशों में कैलेंडर ईयर होता है, लेकिन हमारे यहां प्रीवियस ईयर और असेसमेंट ईयर का कंसेप्ट है, जो कई लोगों के लिए काफ़ी कन्फ़्यूज़न है और इसे आप हर साल इनकम टैक्स फ़ाइल करने वालों में देख सकते हैं."
"अगर आपको साल 2023-24 के लिए इनकम टैक्ट फ़ाइल करना हो तो आपका असेसमेंट ईयर साल 20024-25 होगा. आम लोगों को ये शब्दावलियां समझ में नहीं आती हैं."
हालांकि वेद जैन मानते हैं कि इससे बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं आने वाला है.
वेद जैन मानते हैं कि इस विधेयक में एक जैसे प्रावधान को एक जगह कर दिया गया है. यह एक तरह से पुराने क़ानू को फिर से लिख देना है. इससे न तो क़ानूनी मामले कम होंगे और न ही टैक्स पेयर को बहुत बड़ा फ़ायदा होने वाला है.
उम्मीदों पर कितना खरा
वेद जैन कहते हैं, "इस एक्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे असेसमेंट या रिअसेसमेंट अपील की पुरानी प्रक्रिया में कोई बदलाव आएगा. इसमें भी ठीक वही पुरानी प्रक्रिया रखी गई है. केवल लोगों के समझने के लिए कुछ जगहों पर भाषा को आसान कर दिया गया है.
लोगों को इनकम टैक्स एक्ट में किस तरह के बदलाव की अपेक्षा है?
इस सवाल के जवाब में वेद जैन कहते हैं, "पहली उम्मीद यह थी कि इस क़ानून से टैक्स भरने वालों के पर कंप्लायंस का भार कम हो. बीते लंबे समय से यह बोझ बढ़ता ही गया है. इस बिल में उस दिखा में कोई काम नहीं किया गया है."
"हमारी दूसरी उम्मीद एडमिनिस्ट्रेटिव फ्रंट को लेकर थी. हम तकनीक की मदद से प्रक्रिया को आसान बनते देखना चाहते थे. असेसमेंट और रिअसेसमेंट के मामले में हम इनकम टैक्स विभाग की कार्यप्रणाली में बदलाव की उम्मीद कर रहे थे, जो नहीं किया गया है."
आर्थिक मामलों के वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, "इसकी सबसे ख़ास बात वही होगी जिसका प्रस्ताव वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कुछ ही दिन पहले पेश किए आम बजट में रखा था. सरकार का फ़ोकस न्यू टैक्स रिजीम पर है. सरकार चाहती है कि न्यू रिजीम को पसंद करने वालों की संख्या 70% से बढ़कर 99% जाए और यह सरलता से हो जाए."
सिद्धार्थ कलहंस मानते हैं कि इनकम टैक्स से जुड़े कानून को आसान बनाने की दिशा में एक शुरुआत की गई है, जो एक महत्वपूर्ण बात है. हालांकि उनको इससे थोड़ी और उम्मीदें थीं.
उनका कहना है, "नए इनकम टैक्स से कुछ और भी उम्मीदे थीं, मसलन अब पेंशन ख़त्म ख़त्म हो गई है तो 60 साल से उपर के व्यक्ति को अपने निवेश पर मिलने वाले ब्याज पर टैक्स न देना पड़े, जिसका कोई प्रावधान इसमें नहीं है."
"इसके अलावा जिन कर्मचारियों को टीडीएस काटकर सैलरी दी जाती है, उनको टाडीएस का एक हिस्सा जमा हो ताकि भविष्य में उन्हें भी कुछ पेंशन मिल सके."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित