ज्वालामुखी की राख कितनी ख़तरनाक है, भारत में कई हवाई उड़ानें प्रभावित

इथियोपिया में हायली गुब्बी ज्वालामुखी फटने की वजह से आसमान में कई किलोमीटर ऊपर तक राख के बादल दिखाई दे रहे हैं.

इसका असर भारत तक देखा जा रहा है. राख का ये ग़ुबार लाल सागर को पार कर मध्य पूर्व और मध्य एशिया की तरफ़ बढ़ रहा है.

ज़मीन पर इसका अधिक असर महसूस नहीं होगा क्योंकि ये बादल बहुत ऊंचाई पर हैं. लेकिन यह ऊंचाई ही वह जगह है जहां ज़्यादातर यात्री विमान उड़ते हैं.

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा ने बीबीसी को बताया है कि इसकी वजह से "प्रभावित ऊंचाई समुद्र तल से 8.5 किलोमीटर (5.2 मील) और 15 किलोमीटर के बीच है."

महापात्रा ने कहा, "इससे सैटेलाइट के काम करने और उड़ानों का संचालन अस्थायी रूप से प्रभावित हो सकता है. लेकिन इससे मौसम की स्थिति या वायु की गुणवत्ता या मौसम पर असर पड़ने की संभावना नहीं है. ज्वालामुखी की राख सोमवार रात उत्तर भारत पहुंची थी और ऐसा लगता है कि यह अब चीन की ओर बढ़ रही है."

इसकी वजह से भारत में कई अंतरराष्ट्रीय और घरेलू उड़ानें या तो देरी से चल रही हैं या रद्द कर दी गई हैं. कई उड़ानों का रास्ता भी बदला गया है.

देश के विमानन नियामक डीजीसीए ने एयरलाइन्स से कहा है कि वो प्रभावित क्षेत्रों से "बचने" की हर संभव कोशिश करें.

सवाल है कि आख़िर ये राख इतनी ख़तरनाक क्यों है? क्या यह जहाज़ के इंजन को फ़ेल कर सकती है? इससे निपटने के लिए क्या किया जा सकता है?

डीजीसीए ने क्या कहा?

एयर इंडिया ने 11 उड़ानें रद्द की हैं. वहीं इंडिगो, आकासा और केएलएम की उड़ानें भी इस कारण प्रभावित हुई हैं.

डीजीसीए ने स्थिति के मद्देनज़र विमानन कंपनियों के लिए एक एडवाइज़री जारी की है.

डीजीसीए ने एयरलाइन कंपनियों से कहा है कि वो अपने पायलटों से कहें कि राख के बादल दिखने की जानकारी तुरंत नियामक से साझा की जाए. साथ ही वो इंजन की परफ़ॉर्मेंस और विमान के कैबिन में किसी तरह की गंध या राख देखे जाने के संबंध में भी रिपोर्ट करें.

डीजीसीए ने कहा है कि प्रभावित इलाक़ों के आसपास संचालित होने वाले उड़ानों की निगरानी करने को कहा है कि "स्थिति बिगड़ने पर प्रभावित हवाई अड्डों पर उड़ानें रोकी जाएं या उनमें देरी की जाए."

इंजन फ़ेल होने का ख़तरा

हवाई जहाज़ के लिए राख के बादल सबसे ज़्यादा ख़तरनाक इसलिए होते हैं क्योंकि इससे उनका इंजन ख़राब हो सकता है.

ज्वालामुखी फटने पर बहुत बारीक राख और कण आसमान में फैल जाते हैं. ये कण सिलिकेट नाम के बेहद सख़्त पदार्थ से बने होते हैं.

जब ये जेट के इंजन में जाते हैं तो अंदर के तेज़ तापमान की वजह से पिघल जाते हैं. लेकिन जैसे ही वे इंजन के ठंडे हिस्सों तक पहुँचते हैं, ये दोबारा जमकर काँच जैसी परत बना लेते हैं.

ये कांच जैसी परत हवा के बहाव को रोकती है. इसकी वजह से इंजन रुक भी सकता है या पूरी तरह फ़ेल भी हो सकता है.

हालांकि, अगर इंजन बंद हो जाए तो वह जल्दी ठंडा हो जाता है. ठंडा होकर कई बार पिघली हुई राख टूटकर अलग हो जाती है और इंजन को दोबारा स्टार्ट किया जा सकता है.

लेकिन अगर यह स्थिति टेक-ऑफ़ या लैंडिंग के समय हो जाए, तो इंजन को दोबारा स्टार्ट करने का समय ही नहीं मिलेगा और दुर्घटना की संभावना बहुत बढ़ जाती है.

सेंसरों के घिसने का ख़तरा

ज्वालामुखी से निकलने वाली राख सिर्फ़ विमान के इंजन को ही नहीं प्रभावित करती, बल्कि विमान की बाहरी सतहों और नेविगेशन सिस्टम को भी नुक़सान पहुंचा सकती है.

राख के सख़्त और नुकीले कण विमान की खिड़कियों और बाहरी सतह से टकराते रहते हैं, जिससे वह धीरे-धीरे घिसने लगती है.

राख के कण सैंडपेपर की तरह विंडस्क्रीन को घिस देते हैं, जिससे पायलट की विज़िबिलिटी कम हो जाती है.

हालांकि यह घिसावट तुरंत किसी बड़े ख़तरे में नहीं बदलती, लेकिन विमान के लिए यह नुक़सानदेह होती है और आगे चलकर मरम्मत की ज़रूरत पड़ सकती है.

यह जहाज़ के सेंसरों को भी ख़राब कर सकती है. इससे स्पीड मापने वाले सेंसर ग़लत रीडिंग दे सकते हैं और नेविगेशन में मुश्किल आ सकती है.

इसके अलावा केबिन की हवा की क्वालिटी भी इसकी वजह से ख़राब हो सकती है. राख के बहुत महीन कण कभी-कभी वेंटिलेशन सिस्टम में घुस जाते हैं, जिससे यात्रियों और क्रू को सांस लेने में दिक्कत हो सकती है. ऐसी स्थिति में ऑक्सीजन मास्क पहनने की ज़रूरत पड़ सकती है.

पायलट क्या कर सकते हैं?

राख के बादल को पहचानना बहुत मुश्किल होता है. ऊंचाई पर यह सामान्य बादल की तरह नहीं दिखता.

इसे पहचानने का सबसे भरोसेमंद संकेत है सेंट एल्मो की रोशनी, यानी राख के कणों के कारण विमान के आसपास हल्की चमक दिखाई देना. यह पायलट को चेतावनी देता है कि विमान ऐश क्लाउड (राख के बादल) में जा रहा है.

ऐसी स्थिति में पायलट की पहली कोशिश वहां से विमान को मोड़कर उस इलाके़ से बाहर निकाल लेने की होती है.

पायलट इंजन का थ्रस्ट कम भी कर सकता है, जिससे इंजन का तापमान घटता है और इंजन फ़ेल होने की संभावना कम हो जाती है.

असल में, बेहतर यह है कि पायलट ऐसी स्थिति में फंसे ही नहीं. इसके लिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में 9 वोल्केनिक ऐश एडवाइज़री सेंटर बने हैं.

इनका काम ज्वालामुखी फटने पर हवा में फैल रही राख की दिशा और ख़तरे को ट्रैक करना है. यह जानकारी एयरलाइंस के साथ साझा की जाती है.

क्या पहले कभी विमान इस स्थिति में फँसे हैं?

2010 में आइसलैंड के ज्वालामुखी एयाफ़्यात्लायोकूट के विस्फोट के कारण क़रीब दो हफ्तों तक यूरोप में हवाई यात्रा पूरी तरह रुक गई थी.

राख को आंखों से पहचानना मुश्किल होता है और कभी-कभी रडार भी इन छोटे कणों को नहीं पकड़ पाता. इसके चलते पिछले कुछ सालों में इंडोनेशिया में कई बार छोटे-छोटे एयरस्पेस बंद करने पड़े हैं.

पिछले सालों में इंडोनेशिया में भी कई बार छोटे-छोटे एयरस्पेस बंद किए गए हैं. 1982 में कुआलालंपुर से पर्थ जा रही ब्रिटिश एयरवेज़ की एक उड़ान इंडोनेशिया के ऊपर राख के बादल में चली गई थी.

पायलट ने पहले सेंट एल्मो की रोशनी देखी और कुछ ही मिनटों में विमान के सभी चार इंजन बंद हो गए.

विमान 11,300 मीटर से गिरकर 3,650 मीटर तक नीचे आया था. उसके बाद इंजन दोबारा स्टार्ट हुए और विमान को सुरक्षित जकार्ता में उतारा गया.

साल 1989 में भी इस तरह का एक बड़ा हादसा होते-होते बच गया था. अलास्का में माउंट रेडाउट ज्वालामुखी फटने के एक दिन बाद केएलएम का एक बोइंग 747 विमान एम्स्टर्डम से टोक्यो जा रहा था.

उड़ान के दौरान अचानक विमान के चारों इंजन एक साथ बंद हो गए थे. इंजन बंद होने पर जहाज़ क़रीब 4,000 मीटर नीचे गिर गया.

लेकिन जैसे ही इंजन ठंडे हुए, पायलट ने उन्हें दोबारा शुरू कर दिया. विमान को सुरक्षित तरीके़ से एंकरेज में उतारा गया.

इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के अनुसार, "ऐसे कुछ गंभीर मामले ज़रूर हुए हैं, लेकिन अब तक ज्वालामुखी की राख की वजह से कोई विमान दुर्घटना, किसी यात्री की मौत या गंभीर चोट दर्ज नहीं हुई है."

कब तक रहेगा असर?

स्काईमेट वेदर के अध्यक्ष जीपी शर्मा ने कहा, "ज्वालामुखी फटने से पैदा होने वाला प्रदूषण (हवा में राख और ज्वालामुखी से निकले अन्य छोटे कण) को मापने के लिए काफी तैयारी करनी पड़ती है, सेंसर पहले से ही लगाने पड़ते हैं. लेकिन इस ज्वालामुखी विस्फोट को लेकर लिए तैयारी की कोई गुंजाइश नहीं थी. इसलिए प्रदूषण का स्तर क्या है ये कहा नहीं जा सकता."

कई हज़ारों सालों से सुप्त इस ज्वालामुखी से रविवार सवेरे धुंए और राख का बाहर निकलने लगा.

मौसम की जानकारी रखने वाली निजी एजेंसी स्काईमेट वेदर ने कहा है कि आसमान से राख पूरी तरह साफ होने में कितना वक्त लगेगा ये कहना मुश्किल है.

आईएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा का कहना है कि "ज्वालामुखी की राख दिल्ली से दूर जा रही है और हमारा अनुमान है कि मंगलवार शाम तक दिल्ली का आसमान साफ़ हो जाएगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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