ओडिशा रेल हादसे के बाद, पश्चिम बंगाल के एक गांव में पसरा मातम

प्रभाकर मणि तिवारी

बीबीसी हिंदी के लिए, कोलकाता से

"शफ़ीक़ ने शाम क़रीब साढ़े छह बजे ही ट्रेन से वीडियो कॉल पर सबसे बात की थी. वह अबकी जाना नहीं चाहता था. फ़ोन पर उसने कहा था कि वह काम निपटा कर जल्दी ही हमेशा के लिए घर लौट आएगा. तब हमने कल्पना तक नहीं की थी यह उसके साथ ये हमारी आख़िरी बातचीत है."

यह कहते हुए शफ़ीक़ के पिता हमीरूल का गला रुंध जाता है.

वो कहते हैं, "रेल हादसे के बाद उसके एक साथी ने फ़ोन पर इसकी सूचना दी. यह ख़बर सुनने के बाद से हम जैसे सुन्न हो गए. परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य की ख़बर से हमारी आंखों के आगे अंधेरा छा गया है."

पश्चिम बंगाल के पूर्वी बर्दवान ज़िले के रहने वाले शफ़ीक़ काज़ी रोजी-रोटी के सिलसिले में एक राज मिस्त्री के साथ चेन्नई जा रहे थे.

उनकी मौत के बाद ही घर ही नहीं पूरे गांव में मातम पसरा है. घरवालों को अब इंतजार है उसके शव के गांव पहुंचने का.

उनके पिता हमीरूल कहते हैं, "शफ़ीक़ ने जल्दी लौटने का वादा ज़रूर किया था. लेकिन वह इतनी जल्दी और इस हाल में लौटेगा, इसकी हमने कल्पना तक नहीं की थी."

वो बेरोज़गारी के मुद्दे की तरफ इशारा करते हैं और सवाल करते हैं, "अगर यहां रोज़गार होता तो मेरा बेटा घर-बार छोड़ इतनी दूर क्यों जाता?"

मज़दूरी करने वालों की पसंदीदा ट्रेन

कोलकाता के शालीमार स्टेशन से चेन्नई के बीच चलने वाली कोरोमंडल एक्सप्रेस रोजी-रोटी की तलाश में हर महीने भारी तादाद में दक्षिण भारतीय राज्यों का रुख़ करने वाले बंगाल के मज़दूरों और इलाज के लिए वेल्लोर समेत दूसरे अस्पतालों में जाने वाले मरीजों और उनके परिजनों की सबसे पसंदीदा ट्रेन है.

इसकी वजह यह है कि यह ट्रेन कोलकाता से चेन्नई तक की दूरी इस रूट पर चलने वाले चेन्नई मेल के मुक़ाबले बहुत कम समय लेती है.

पहले यह ट्रेन हावड़ा से ही चलती थी. लेकिन बीते साल जनवरी से यह कोलकाता के ही शालीमार स्टेशन से चलने लगी है.

शफ़ीक़ के पिता बहुत मुश्किल से हमसे बात कर पा रहे हैं. पत्नी और मां तो बात करने की हालत में ही नहीं है.

दक्षिण 24-परगना जिले के बासंती इलाक़े के पांच और लोगों की भी इस हादसे में मौत हुई है. उनमें एक ही परिवार के तीन सदस्य, निशिकांत गाएन, दिवाकर गाएन और हारान गाएन भी शामिल हैं.

यह लोग धान के खेतों में मज़दूरी करने के लिए मध्यप्रदेश जा रहे थे. पहले भी यह तीनों वहां जाते रहे हैं. लेकिन इस बार का सफर उनके लिए उनका अंतिम सफर साबित हुआ.

इन तीनों भाइयों के अलावा इलाक़े के विकास हालदार और संजय हालदार की भी हादसे में मौत हो गई है. इसके अलावा कई लोग घायल हो गए हैं.

दक्षिण और उत्तर 24 परगना जिले के ग्रामीण इलाकों से हज़ारों लोग हर साल दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों में मज़दूरी के लिए जाते रहे हैं.

राज्य से मृतकों की सूची में पूर्वी बर्दवान जिले के मंगलकोट और मालदा के मालतीपाड़ा इलाक़े के तीन युवक भी शामिल हैं.

मंगलकोट ताने के करूई गांव के दस लोगों का एक समूह राजमिस्त्री के तौर पर काम करने के लिए केरल जा रहा था. उनमें 18 साल के छोटू सरदार और उसके पिता सुखलाल भी शामिल थे.

पिता-पुत्र अलग-अलग डिब्बों में बैठे थे. हादसे में पिता बच गए लेकिन पुत्र की मौत हो गई. इस समूह के कुछ लोग ओडिशा के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हैं.

इस हादसे में मरे छोटू सरदार के एक परिजन मनोज सरदार बताते हैं, “छोटू दूसरी बार केरल जा रहा था. वहां उसके पिता तो कई साल से नई बनने वाली इमारतों में काम करने जाते थे. लेकिन छोटू बीते साल पहली बार गया था.”

गांव में शोक की लहर

इसी गांव के 41 साल के संचित सरदार का अब तक पता नहीं चल सका है.

उनके भाई रूपम बताते हैं, "कल हादसे की ख़बर टीवी पर देखने के बाद से ही मैं लगातार उनको फ़ोन कर रहा हूं. लेकिन फ़ोन बंद बता रहा है. गांव के कुछ लोग घटनास्थल पर गए हैं. मैं बीमारी के कारण नहीं जा सका. कल रात से ही घर के किसी सदस्य ने खाना नहीं खाया है. सबका रो-रो कर बुरा हाल है."

बर्दवान के मंगलकोट के मज़दूर मोहम्मद अली शेख़ का भी कल रात से कुछ पता नहीं चला है.

उनके साथ जाने वाले उसी गांव के अहमद शेख़ घायल हैं और बालासोर अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है.

मालदा के मालतीपाड़ा के अशरफुल आलम के परिवार में मां, पिता और पत्नी के अलावा क्रमशः छह साल का पुत्र और एक साल की पुत्री शामिल हैं.

आलम की मौत इस परिवार के लिए वज्रपात से कम नहीं है.

अशरफुल आलम के चाचा मोहम्मद अशरफ़ बताते हैं, "कल रात से ही घर में मातम पसरा है. किसी के गले से खाने का एक दाना तक नहीं उतरा है. अशरफ़ कुछ साल तक वहां कमाने के बाद गांव में कुछ खेत खरीद कर खेती-बाड़ी करना चाहता था. लेकिन ऊपरवाला को शायद कुछ और ही मंजूर था."

शुक्रवार देर रात हादसे की ख़बर मिलने के बाद से ही गांव में शोक की गहरी छाया उतर आई है.

अब लोगों को शव के गांव पहुंचने का इंतजार है. आलम ही परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे. वे

कोयंबटूर में मार्बल मिस्त्री के तौर पर काम करते थे.

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