कर्नाटक सीएम सिद्धारमैया पर चलेगा मुक़दमा, राज्यपाल ने दी मंज़ूरी, कांग्रेस और बीजेपी ने क्या कहा

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ ज़मीन से जुड़े भ्रष्टाचार के एक मामले में मुक़दमा चलेगा. राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने इसकी आधिकारिक मंज़ूरी दे दी है.

सिद्धारमैया ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे चुनी गई सरकार को अस्थिर करने की साजिश बताया है. वहीं इस मामले में कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा "ये मोदी सरकार का राजनीतिक प्रतिशोध है."

बीजेपी इस मामले पर उनके इस्तीफ़े की मांग कर रही है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा है कि कांग्रेस को राज्यपाल के फ़ैसले पर सवाल उठाने की बजाय अपने काम पर ध्यान देना चाहिए.

ये मामला मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (एमयूडीए यानी मूडा) की तरफ से सिद्धारमैया की पत्नी पार्वती को आवंटित की गई ज़मीन से जुड़ा है.

सिद्धारमैया बोले, इस्तीफ़े का सवाल नहीं उठता

राज्यपाल की तरफ से नोटिस जारी होने के बाद सिद्धारमैया ने अपने कैबिनेट सहयोगियों, वरिष्ठ पुलिस और ख़ुफ़िया अधिकारियों के साथ बंद कमरे में बैठक की.

फिलहाल ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सिद्धारमैया मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं छोड़ेंगे. इसके पीछे की बड़ी वजह कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाक़ात के बाद उन्हें मिल रहा कांग्रेस आलाकमान का समर्थन है.

इस मामले पर अपनी पहली प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्रीसिद्धारमैया ने संवाददाताओं से कहा, "मेरे इस्तीफ़ा देने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता. पार्टी मेरे साथ है, कैबिनेट मेरे साथ है और पूरी सरकार मेरे साथ है. ये चुनी गई सरकार को अस्थिर करने की राजनीतिक साजिश है."

उन्होंने कहा कि राज्यपाल ने खनन के एक मामले में लोकायुक्त की जांच के बाद केंद्रीय मंत्री और जनता दल सेकुलर नेता एचडी कुमारस्वामी, बीजेपी नेता शशिकला जोले और जनार्दन रेड्डी के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की इजाज़त नहीं दी थी.

वहीं प्रदेश के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि "कांग्रेस पार्टी इसे क़ानूनी और राजनीतिक दोनों तरीकों से लड़ेगी. पूरा कैबिनेट और पार्टी मज़बूती से मुख्यमंत्री के पीछे खड़े हैं. वो मेरे मुख्यमंत्री हैं. उके इस्तीफ़ा देने का सवाल ही पैदा नहीं होता. वो मेरे मुख्यमंत्री रहेंगे और हम कर्नाटक के लोगों की इच्छानुसार उनकी सेवा करते रहेंगे."

उन्होंने कहा, "बीजेपी इस सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है. केंद्रीय मंत्रियों का कहना है कि वो सरकार को गिरा देंगे. ये पूरी तरह एक राजनीतिक मुद्दा है. मुझे ये कहते हुए दुख हो रहा है कि बीजेपी ने राज्यपाल कार्यालय का दुरुपयोग किया है."

वहीं कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद ने बीबीसी हिंदी से कहा, "ये राजनीतिक रूप से प्रेरित है. वो गरीबों की सेवा कर रहे एक पिछड़े वर्ग के व्यक्ति को परेशान कर रहे हैं." हरिप्रसाद को सिद्धारमैया का आलोचक कहा जाता है.

शिकायत में क्या कहा गया है?

इस मामले के शिकायतकर्ता एक्टिविस्ट टी.जे. अब्राहम, प्रदीप एस.पी और स्नेहमयी कृष्णा हैं.

इन्हें भेजे गए एक साझा पत्र में राज्यपाल के स्पेशल सेक्रेटरी ने लिखा, "राज्यपाल के निर्देशानुसार, मैं याचिकाओं में दिए गए कथित अपराधों के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 17 के तहत मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ अभियोजन की मंज़ूरी के अनुरोध पर संबंधित ऑथोरिटी के फ़ैसले की प्रति संलग्न कर रहा हूं."

इन सभी शिकायतों में कही गई एक आम बात ये है कि सीएम की पत्नी पार्वती को मैसूर के विजयनगर में 14 जगहें दी गई थीं. ये उन्हें केसारे गांव में 3.16 एकड़ ज़मीन के बदले में दी गईं, जिस पर एमयूडीए ने अनधिकृत रूप से कब्ज़ा किया हुआ था.

आसान भाषा में कहें तो सीएम की पत्नी पार्वती के पास जो 3.16 एकड़ ज़मीन थी, उसे एमयूडीए ने विकास के लिए ले लिया था और मुआवज़े के तौर पर उन्हें मैसूर के महंगे इलाके़ में ज़मीन दी गई. शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उन्हें दी गई ज़मीन की क़ीमत उस ज़मीन से ज़्यादा है जो एमयूडीए ने उनसे ली थी और सीएम ने धोखाधड़ी से महंगी जगह ली गई है.

मुख्यमंत्री का तर्क है कि इस मामले में कुछ ग़लत नहीं हुआ है. 50:50 योजना के लाभार्थियों में कई अन्य लोग भी शामिल थे, जिनकी ज़मीन पर एमयूडीए ने अनधिकृत रूप से कब्ज़ा किया था. एमयूडीए ने हाई कोर्ट के एक फ़ैसले के बाद 50:50 योजना को लागू किया था.

मामले के मुख्य शिकायतकर्ता टी.जे. अब्राहम का आरोप है कि ये 44.64 करोड़ रुपये का घोटाला है.

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कराने का रास्ता साफ़ हो गया है (मुक़दमा चलाने की राज्यपाल की मंज़ूरी के बाद). अब सीबीआई जांच होगी या नहीं ये मुझे तय करना है."

2010 में टी.जे. अब्राहम बीजेपी के कर्नाटक के पहले मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी हासिल करने में भी सफल रहे थे.

राज्यपाल ने मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी क्यों दी?

राज्यपाल के इस फ़ैसले से पहले मुख्यमंत्री और कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित किया था. इसमें सिद्धारमैया को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस को वापस लेने की सलाह दी गई थी.

राज्यपाल ने मुक़दमे की मंज़ूरी देने वाले आदेश में कहा है, "कैबिनेट प्रस्ताव को सिद्धारमैया के ही कैबिनेट सहयोगियों ने पारित किया है, जिनकी नियुक्ति उन्हीं की सलाह पर की गई थी. चूंकी मंज़ूरी सीधा मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ मांगी गई थी, ऐसे में कैबिनेट के सामने कारण बताओ नोटिस जारी करने (26 जुलाई को जारी हुआ था) और उनका मुझे इसे वापस लेने की सलाह देने के इर्द-गिर्द की परिस्थिति... इसका मेरे कार्य पर असर नहीं पड़ेगा."

उनका कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में मंत्रियों के कैबिनेट की सलाह से बंधने का सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि "मध्य प्रदेश पुलिस एस्टेब्लिशमेंट बनाम स्टेट ऑफ़ मध्य प्रदेश (2004) मामले में विशेष परिस्थितियों के दौरान राज्यपाल की शक्तियों पर चर्चा और उनका निर्धारण किया गया है."

राज्यपाल ने कहा है कि उन्हें सिद्धारमैया की तरफ से आए जवाब, क़ानूनी राय के साथ मिली कैबिनेट की सलाह में "एक ही तरह के तथ्यों पर दो वर्ज़न भी मिले."

इसके साथ ही उन्हें बताया गया कि राज्य सरकार ने इस मुद्दे की जांच के लिए पहले एक आईएएस अधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति नियुक्त की थी और बाद में सेवानिवृत्त हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया गया. उनका मानना है कि "इतना काफी नहीं" है.

राज्यपाल ने अपने आदेश में कहा, "मामले में निष्पक्ष और बिना पक्षपात के जांच होना बहुत ज़रूरी है. मैं प्रथमदृष्टया इस बात से संतुष्ट हूं कि आरोप और उससे जुड़ी चीज़ें अपराध होने का खुलासा करती हैं."

उन्होंने कहा, "मैं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 218 के तहत मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ आई याचिका (टी.जे. अब्राहम, प्रदीप और स्नेहमयी कृष्णा ने शिकायत की) में बताए गए कथित अपराध में मुक़दमे के लिए मंज़ूरी देता हूं."

कांग्रेस ने कहा- लड़ेंगे

बीते महीने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने पार्टी के आला नेताओं- राहुल गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुल खड़गे, पार्टी सेक्रेटरी केसी वेणुगोपाल और कर्नाटक के प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला से मुलाक़ात की थी. ये पहला इशारा था कि पार्टी इस मामले में लड़ने के लिए तैयारी कर रही है.

इस बैठक के बाद पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने सिद्धारमैया से कहा कि "वो बीजेपी की साजिश के ख़िलाफ़ आक्रामक रुख़ अपनाएं."

इस मामले को लेकर डीके शिवकुमार ने शनिवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया जिसमें दर्जनभर से अधिक नेता मौजूद थे.

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में क़ानून मंत्री एचके पाटिल ने मुक़दमा चलाने की राज्यपाल की मंज़ूरी को ग़ैरक़ानूनी, अनैतिक और राजनीति से प्रेरित बताया.

उन्होंने कहा, "ग़ैरक़ानूनी फ़ैसलों के लिए राज्यपाल राजभवन का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये इसलिए किया जा रहा है क्योंकि सिद्धारमैया ने राज्य को पैसा न दिए जाने को लेकर अपनी आवाज़ उठाई है. उन्होंने कहा है- 'हमारा टैक्स, हमारा हक़'."

इसे लेकर रणदीप सिंह सुरजेवाला ने सोशल मीडिया पर कांग्रेस का बयान जारी किया है.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में राजस्व मंत्री कृष्ण बायरे गौड़ा ने बताया कि राज्यपाल का दिया फ़ैसला गै़रक़ानूनी क्यों है.

उन्होंने केंद्र सरकार की तरफ से सभी राज्य सरकारों को दिए गए एक आदेश का ज़िक्र किया जिसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत शिकायत आने पर किस प्रक्रिया का पालन किया जाना है, इसे लेकर हर कदम की जानकारी दी है.

केंद्र सरकार की तरफ से ये दिशानिर्देश 3 सितंबर 2021 को जारी किए गए थे.

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री के ख़िलाफ़ अभियोजन चलाने के लिए मंज़ूरी डीजीपी (डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस) रैंक के अधिकारी की तरफ से मांगी जाती है.

उन्होंने कहा, "इस मामले में मुक़दमा चलाने के लिए किस पुलिस अधिकारी या डीजीपी इजाज़त मांगी थी."

उन्होंने कहा कि इन्हीं दिशानिर्देशों के आधार पर जनता दल सेकुलर नेता एचडी कुमारस्वामी, बीजेपी नेता शशिकला जोले और जनार्दन रेड्डी के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की इजाज़त नहीं दी थी.

बीजेपी की प्रतिक्रिया

इसे लेकर बीजेपी नेता भी हमलावर हैं. बीजेपी प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने जल्द से जल्द मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़े की मांग की और कहा कि इस मामले में निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.

बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सोशल मीडिया एक्स पर इसे लेकर पोस्ट किया है.

उन्होंने लिखा, "कांग्रेस पार्टी के भ्रष्टाचार की विरासत जारी है. नेशनल हेराल्ड से लेकर एमयूडीए (मैसूर ज़मीन घोटाले) स्कैम तक, कांग्रेस पार्टी के भ्रष्टाचार का इतिहास पहले से लिखा हुआ है. उन्होंने व्यक्तिगत लाभ के लिए बार-बार लोगों का भरोसा तोड़ा है."

जेपी नड्डा ने लिखा, "फ़ैसले को गै़र-क़ानूनी बताने की बजाय अपने किए काम पर विचार करना चाहिए. एक तरफ कांग्रेस खुद को दलितों और अल्पसंख्यकों का संरक्षक बताती है और दूसरी तरफ उनके ही मुख्यमंत्री दलित परिवार से ज़मीन हड़प रहे हैं. ये कांग्रेस के पाखंड और उसकी परिवार केंद्रित राजनीति का एक और उदाहरण है."

बेंगलुरू साउथ से बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या ने शनिवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "सिद्धारमैया के परिवार ने जो ज़मीन घोटाला किया है, उससे पर्दा उठ गया है. सिद्धारमैया के बेटे ने अपनी पत्नी के नाम पर पॉश इलाके में 14 साइट्स लीं."

उन्होंने कहा कि ये मामला नेशनल हेराल्ड केस या रॉबर्ट वाड्रा पर लगे आरोपों से ज़्यादा अलग नहीं है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)