श्रीलंका की सत्ता से बेदखली का एक साल, राजपक्षे का राजनीतिक खेल खत्म हो गया?
रंजन अरुण प्रसाद
बीबीसी तमिल के लिए

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श्रीलंका की राजनीति में अजेय समझे जाने वाले राजपक्षे परिवार को सत्ता से बेदखल हुए एक साल हो चुका है.
पिछले चुनाव में गोटाबाया राजपक्षे राष्ट्रपति चुने गए थे और उनके शासन में देश को अभूतपूर्व आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा.
लोगों को ज़रूरी चीजें खरीदने के लिए लंबी लंबी लाइनों में घंटों खड़े रहना पड़ा और बिजली का हाल ये था कि रोजाना 15-15 घंटे की कटौती होती थी.
खाना बनाने वाली गैस, पेट्रोल और डीज़ल की आपूर्ति कम होने के चलते इनके दाम आसमान छू रहे थे जिससे आम आदमी को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा था.
इससे परेशान होकर जनता पिछले साल 31 मार्च को सड़क पर उतर आई और अपनी इन मुसीबतों के लिए राजपक्षे परिवार पर आरोप लगाए.
यह प्रदर्शन जन आंदोलन में तब्दील हो गया और जुलाई के अंत तक चलता रहा. इसकी वजह से देश के राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में काफ़ी बड़ा बदलाव हुआ.
नौ जुलाई 2022 को जनता ने गोटाबाया राजपक्षे के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी. उस दिन हर ओर से हज़ारों लोगों ने राष्ट्रपति भवन, सचिवालय, प्रधानमंत्री कार्यालय और उनके आधिकारिक आवास पर धावा बोल दिया.
गोटाबाया राजपक्षे को राष्ट्रपति भवन छोड़कर जाना पड़ा.

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'राजपक्षे के लिए जीत दूर की कौड़ी'
देश में कई दशक से चले आ रहे गृह युद्ध का अंत करने में राजपक्षे परिवार की भूमिका अहम मानी जाती है और इस वजह से भी उन्हें अपराजेय माना जाता था.
सिंघली लोग इस परिवार को श्रीलंका के अनिवार्य सत्ता केंद्र के रूप में देखते थे.
जिस परिवार ने युद्ध और बौद्ध राष्ट्रवाद को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया, न केवल सिंघली बल्कि सभी लोगों ने मिलकर उसी परिवार को देश से बाहर खदेड़ दिया.
गोटाबाया राजपक्षे जब देश छोड़ कर भाग गए तो पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने कार्यकारी राष्ट्रपति का पद संभाला.
वर्तमान हालात में राजपक्षे परिवार और उनका राजनीतिक भविष्य अनिश्चित है.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक ए. निक्सन का कहना है कि इस परिवार की सत्ता में वापसी अब नामुमकिन लगती है.
बीबीसी तमिल से उन्होंने कहा, “राजपक्षे के लिए जीत दूर की कौड़ी लगती है. विक्रमसिंघे भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग से मुक्त प्रशासन चलाना चाहते हैं. जहां तक मुझे पता चला है, वो जो भी संभव है कर रहे हैं.”
“हालांकि वो इंसाफ़ करने में अक्षम हैं क्योंकि गोटाबाया राजपक्षे के बचे हुए कार्यकाल में राष्ट्रपति के तौर पर उनका चुनाव भ्रष्ट लोगों के समर्थन से ही संभव हुआ है. फिर भी राजपक्षे परिवार के सत्ता में लौटने की संभावना बिल्कुल भी नहीं है. हां, वो एक ताक़तवर विपक्ष बने रह सकते हैं.”

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एकजुट है राजपक्षे का वोट बैंक
निक्सन का कहना है कि राजपक्षे परिवार 'एक ताक़तवर विपक्ष' बना रहेगा, जबकि उनके बाद आने वाली सरकार कमजोर बनी रहेगी.
उनके मुताबिक़, विपक्ष पर राजपक्षे परिवार की पकड़ का नतीजा ये होगा कि सरकार स्थिर नहीं रहेगी.
उन्होंने कहा, “राजपक्षे परिवार का मानना है कि अगर वे अपनी पार्टी से रानिल या किसी और को खड़ा कर दें तो वो जीत सकते हैं लेकिन वो दोबारा शासन नहीं कर सकते. हालांकि यह परिवार ताक़तवर बना रहेगा क्योंकि बौद्ध राष्ट्रवादियों का उन्हें मजबूत समर्थन प्राप्त है.”
“कट्टर ताक़तें चाहेंगी कि एक मजबूत विपक्ष के रूप में इस परिवार की अहमियत बनी रहे क्योंकि उनके समर्थन में कट्टर बौद्ध वोट बैंक अभी भी एकजुट है.”

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गोटाबाया का राजनीतिक भविष्य
लेकिन इन हालात में गोटाबाया राजपक्षे का राजनीतिक भविष्य क्या होगा?
निक्सन का कहना है कि अब वो राष्ट्रपति चुनाव तो नहीं जीत सकते लेकिन संसद के सदस्य के रूप में चुने जाने की संभावना बनी हुई है क्योंकि उन्हें दक्षिणपंथी ताक़तों और बौद्ध राष्ट्रवादी वोटरों का समर्थन हासिल है.
वो कहते हैं, “लेकिन वो राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बनने का सपना कभी नहीं देख सकते.”
निक्सन का अनुमान है, ‘हालांकि वो संसदीय चुनावों से खुद को दूर रख सकते हैं और राजनीति से भी अलग रह सकते हैं. अगर ऐसा नहीं हुआ तो संभावना ये भी है कि उन्हें सरकार में असर रखने लायक कोई बड़ा पद मिल जाए.’
वो कहते हैं, “बासिल राजपक्षे सांसद बन सकते थे. हालांकि वो प्रशासन के लिए एक फिट राजनेता नहीं हैं. उन्हें पहले इसका मौका भी नहीं मिला. एक नई सरकार गठित होगी लेकिन वो कमज़ोर होगी.”
राजपक्षे परिवार के वारिस नमल राजपक्षे विपक्ष में अग्रणी भूमिका निभाएंगे. लेकिन अभी के हालात को देखते हुए उनके अगला राष्ट्रपति बनने की कोई संभावना नहीं दिखती.

आर्थिक संकट बना चुनौती
निक्सन के अनुसार, ये दस साल बाद हो सकता है क्योंकि तब मैदान में कोई और नहीं होगा और बौद्ध राष्ट्रवाद ही उनके राजनीतिक उदय ही वजह बनेगा.
हालांकि गृह युद्ध में जीत सबकी याद में है लेकिन मौजूदा आर्थिक संकट ने लोगों का मूड बिगाड़ दिया है और उनके प्रति नफ़रत पैदा कर दी है.
वो कहते हैं, “हमेशा की तरह, भविष्य में जनता की याददाश्त से ये मिटाया जा सकता है.”
राजपक्षे परिवार को देश छोड़े एक साल हो चुका है लेकिन तबसे हालात में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है.
निक्सन कहते हैं, “हालात खराब ही हो रहे हैं. दूसरी पार्टी से रानिल विक्रमसिंघे राष्ट्रपति बन गए. राजपक्षे के समर्थन से उन्होंने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में थोड़ी बहुत कामयाबी हासिल की है. लोगों ने राहत की सांस ली है. लेकिन इसे राजपक्षे की उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जा सकता, इसका जवाब सिर्फ चुनाव में मिल सकता है.”
“चाहे संसदीय या राष्ट्रपति चुनाव हो, परिवार के प्रदर्शन में लगातार गिरावट ही हुई है. रानिल को समर्थन देकर उन्होंने अपने भ्रष्टाचार पर पर्दा ही डाला है.”
निक्सन के अनुसार, संसद में 128 सांसद राजपक्षे परिवार के साथ हैं और रानिल उनके समर्थन से ही राष्ट्रपति पद पर बने हुए हैं. हालांकि इसे राजपक्षे परिवार के संभलने के रूप में नहीं देखा जा सकता.
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