लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद देने पीएम मोदी क्यों नहीं आए?

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राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव लोकसभा में बिना बहस और प्रधानमंत्री के पारंपरिक जवाब के पारित किया गया.
सत्तापक्ष ने बिना बहस और प्रधानमंत्री के जवाब के धन्यवाद प्रस्ताव पारित होने पर विपक्ष को ज़िम्मेदार ठहराया है. इसे गुरुवार को लोकसभा में कई बाधाओं के बीच ध्वनिमत से पारित किया गया.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, "मैं प्रधानमंत्री और बीजेपी को याद दिलाना चाहता हूं कि 19 जून 2004 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब नहीं दे पाए थे क्योंकि उन्हें जवाब देने से रोका गया था. 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने राष्ट्रपति को दो बार धन्यवाद दिया था, क्योंकि 2004 में वे ऐसा नहीं कर सके थे. यही बीजेपी का ट्रैक रिकॉर्ड है."
सबसे ज़्यादा हैरान करने वाला बयान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का था. लोकसभा अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि उनके पास विश्वसनीय जानकारी है कि कई कांग्रेस सांसद "प्रधानमंत्री की सीट तक पहुंच सकते थे और कुछ अप्रत्याशित कर सकते थे." प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुधवार को लोकसभा में संबोधित करना था, लेकिन आख़िरकार नहीं बोले.
बीजेपी के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष ने अपनी पीड़ा व्यक्त की है.
उन्होंने कहा, "भारतीय संसद के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि प्रधानमंत्री को घेरकर जबरन बोलने से रोका गया हो और अध्यक्ष को उन्हें न आने के लिए कहना पड़ा हो. विपक्ष और कांग्रेस के सदस्यों ने जो किया, उससे क्या हासिल करना चाहते हैं? संसद बहस की जगह है, क़ानून की सीमाओं के भीतर अपने विचार व्यक्त कीजिए."

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लोकसभा अध्यक्ष ने क्या कारण बताया?
राष्ट्रपति के अभिभाषण को ध्वनिमत से पारित करने के बाद ओम बिरला ने कहा, "बुधवार को सदन के कुछ सदस्यों ने ऐसा आचरण किया जो लोकसभा की स्थापना के बाद कभी नहीं हुआ. अध्यक्ष का गरिमामय पद संविधान में निहित है.''
''ऐतिहासिक रूप से, राजनीतिक मतभेद कभी भी अध्यक्ष के कार्यालय तक नहीं लाए गए. अध्यक्ष के कार्यालय में विपक्षी सांसदों का व्यवहार उचित नहीं था. यह एक काला धब्बा था. सदन को सुचारू रूप से चलाने के लिए हम सभी को सहयोग करना चाहिए."
ओम बिरला ने कहा, "जब सदन के नेता प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अभिभाषण का जवाब देने वाले थे, तब मुझे विश्वसनीय जानकारी मिली कि कांग्रेस पार्टी के कई सदस्य प्रधानमंत्री की सीट तक पहुंच सकते हैं और कुछ अप्रत्याशित घटनाएं कर सकते हैं. मैंने प्रधानमंत्री को अगले दिन न आने की सलाह दी थी.''
राजनीतिक विश्लेषक विनोद शर्मा कहते हैं कि लोकसभा अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री के साथ जो संभावित अप्रत्याशित घटना की, उसके पक्ष में कोई ठोस सबूत नहीं है.
विनोद शर्मा कहते हैं, ''यह पहली बार हुआ है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव लोकसभा में बिना बहस और प्रधानमंत्री के पारंपरिक जवाब के पारित किया गया. यहाँ तक कि पीएम की स्पीच को टेबल भी नहीं किया गया.''
''मुझे लगता है कि विपक्ष के सवालों से बचने के लिए लोकसभा अध्यक्ष ने यह राह निकाली. पीएम मोदी ने भी राज्यसभा में जवाब देकर परंपरा निभा दी. जिस तरीक़े से विपक्ष को यह सरकार हैंडल कर रही है, वह पूरी तरह से तिरस्कार है. ज़ाहिर है कि विपक्ष जनरल नरवणे की किताब पर सवाल पूछता और सरकार ऐसा चाहती नहीं है.''
विनोद शर्मा कहते हैं, ''सरकार ने सहानुभूति लेने के लिए ऐसा किया है, ताकि पब्लिक में संदेश जाए कि प्रधानमंत्री के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है.''
ओम बिरला की टिप्पणी को कांग्रेस की कुछ महिला सांसदों से जोड़कर देखा गया. इन्हें बुधवार को विरोध के दौरान प्रधानमंत्री की सीट के सामने और उसके बग़ल की गलियारे में खड़े देखा गया था. भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने भी इसी तरह के आरोप लगाए.

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विपक्ष और सत्ता पक्ष के संबंधों में कटुता
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं कि उन्होंने अपने 40 साल के करियर में ऐसा नहीं देखा, जो अब हो रहा है.
उन्होंने कहा, "मैंने वाजपेयी जी के समय भी रिपोर्टिंग की है और तब पूरा का पूरा सत्र धुल जाता था सिर्फ़ विपक्ष के विरोध से. लेकिन उस समय संसदीय कार्यमंत्री विपक्ष को बुलाते थे, उनसे पूछते थे कि वे चाहते क्या हैं और फिर सदन चलता था. लेकिन अब सरकार की तरफ़ से ऐसी कोई चेष्टा नहीं हो रही."
नीरजा चौधरी कहती हैं, "मुझे याद नहीं कि ऐसा हुआ होगा कभी जब प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही राष्ट्रपति का धन्यवाद प्रस्ताव लोकसभा में पारित हो गया हो.राष्ट्रपति का अभिभाषण सरकार की नीतियों को उजागर करता है. तो इस पर खुलकर चर्चा होती है कि क्या हमने किया है और क्या करने जा रहे हैं. पीएम का इस पर न बोलना बहुत असमान्य है.''

''इस पर भी पीएम का इसलिए न बोलना क्योंकि उनके लिए सुरक्षा नहीं है. वो भी हिन्दुस्तान की लोकसभा में. जहां देश के क़ानून पारित होते हैं. वहां प्रधानमंत्री सुरक्षित नहीं है. ये तो बहुत बड़ी चीज़ कह गए लोकसभा स्पीकर. सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लोकसभा समेत पूरे देश में गृह मंत्रालय की होती है. ये बहुत बड़ी चीज़ है."
उन्होंने कहा, "सरकार और विपक्ष राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, दोनों की विचारधारा अलग है ये तो सच है. लेकिन सरकार का ये रुख़ दिखाता है कि सरकार और विपक्ष के बीच कटुता किस स्तर तक बढ़ गई है. हमारी संसद में हो क्या रहा है? सब मैनेज क्यों नहीं हो रहा है. हेडलाइन मैनेज हो रही है लेकिन सिचुएशन नहीं. भाषा में संयम नहीं है, ये मैंने पहले नहीं देखा. मुझे तो यही लगता है कि सरकार इस कटुता से बाहर नहीं निकल पा रही है."
उन्होंने कहा कि सदन चले ये ज़िम्मेदारी सरकार की होती है और विपक्ष सदन चलाने में कैसे सहयोग करे ये भी ज़िम्मेदारी सरकार की ही है.

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विपक्ष का क्या कहना है?
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने इन आरोपों का खंडन किया. उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री अध्यक्ष के पीछे छिप रहे हैं. कल वह सदन में आने की हिम्मत नहीं जुटा पाए क्योंकि तीन महिलाएं बेंच के सामने खड़ी थीं. यह कैसी बकवास है. चर्चा इसलिए नहीं हो रही, क्योंकि सरकार चर्चा नहीं होने देना चाहती."
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उन्होंने झूठ का सहारा लिया. राहुल गांधी ने कहा, "मोदी जी सच से इतने डर गए कि उन्होंने झूठ का सहारा लिया. हालांकि, उन्होंने वही किया जो उन्हें सही लगा."
कांग्रेस के संचार प्रमुख पवन खेड़ा ने बिरला के कार्यालय पर सवाल उठाए.
उन्होंने कहा, "लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय से मीडिया में रिपोर्ट प्लांट की जा रही हैं, जिनमें दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी कल महिला सांसदों का इस्तेमाल प्रधानमंत्री पर 'हमला' करने के लिए करने की योजना बना रही थी. क्या मोदी सरकार और उनके अधीन पत्रकार यह कहना चाह रहे हैं कि महिलाएं स्वभाव से हिंसक होती हैं? क्या किसी महिला द्वारा किया गया विरोध आतंकवाद माना जाता है?"
तेलुगु देशम पार्टी के सांसद एल श्री कृष्ण देवरायलु ने कहा, "कल सदन में जो कुछ भी हुआ, न केवल अंदर का विरोध, बल्कि पोस्टर, प्ले कार्ड और बड़े-बड़े पोस्टर लाना, यह अध्यक्ष के दृष्टिकोण को ढंकने की कोशिश है. कल जो हुआ वह बहुत निराशाजनक था. मुझे नहीं लगता कि यह सदन के भीतर आवश्यक है."
2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपना भाषण मुश्किल से शुरू ही किया था कि बीजेपी सांसदों ने उनके मंत्रिमंडल में कथित रूप से दाग़ी मंत्रियों को शामिल किए जाने के ख़िलाफ़ विरोध शुरू कर दिया था. इससे वह आगे नहीं बोल पाए थे. मनमोहन सिंह जवाब नहीं दे पाए थे लेकिन 2004 में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस हुई थी.

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इस वर्ष केवल केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल, बीजेपी के सांसद तेजस्वी सूर्या और तेलुगु देशम पार्टी के हरीश बालयोगी ही लोकसभा में अपने भाषण पूरे कर सके हैं. बीजेपी के निशिकांत दुबे, जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अन्य कांग्रेस नेताओं पर लिखी किताबों का उल्लेख किया, बुधवार को सदन स्थगित होने के कारण अपना पूरा भाषण नहीं दे सके.
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने गुरुवार को निचले सदन में विरोध जारी रखा और मांग की कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख जनरल (सेवानिवृत्त) एमएम नरवणे की अप्रकाशित संस्मरण पर बोलने की अनुमति दी जाए.
बिरला ने सोमवार को नियमों का हवाला देते हुए गांधी को भारत-चीन संबंधों पर किताब से संबंधित एक लेख का उल्लेख करने की अनुमति नहीं दी थी. वरिष्ठ मंत्रियों ने भी इसका विरोध किया था. मंगलवार को आठ विपक्षी सांसदों को सत्र के शेष भाग के लिए निलंबित कर दिया गया था, जिससे गतिरोध और बढ़ गया.
बुधवार शाम को कांग्रेस के जयराम रमेश ने चेतावनी दी थी कि अगर विपक्ष के नेता को बोलने की अनुमति नहीं दी गई तो प्रधानमंत्री का भाषण नहीं होगा.
विपक्षी सांसद बार-बार बैनर लेकर और नारे लगाते हुए वेल में पहुंचे, जबकि बिरला उन्हें शोर न करने का आग्रह करते रहे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












