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पेरिस ओलंपिक: भारतीय हॉकी टीम का 'सोने' का सपना ऐसे टूटा
- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय पुरुष हॉकी टीम का ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने का सपना पेरिस में भी पूरा नहीं हो पाया.
भारतीय हॉकी टीम को सेमीफाइनल मुक़ाबले में जर्मनी के हाथों 3-2 से हार का सामना करना पड़ा. भारत अब कांस्य पदक के लिए स्पेन से खेलेगा.
भारत की हार की कई वजहें रहीं लेकिन सबसे बड़ा कारण ये था कि टीम मैच के दौरान मिले कई मौके भुना नहीं सकी.
भारत ने पेनल्टी कॉर्नर को गोल में नहीं बदल पाने में तो कमज़ोर प्रदर्शन किया ही, साथ में कई गोल जमाने के अच्छे मौके़ भी बर्बाद किए.
भारत को अब टोक्यो की तरह कांस्य पदक जीतने के लिए पहले टीम को एकजुट करना होगा.
कमजोर खेल ने मैच हाथ से निकाला
भारत ने पहले क्वार्टर में आक्रामक अंदाज में खेल की शुरुआत करके सातवें मिनट में गोल जमाकर बढ़त बनाई.
यह गोल जमाने वाले हरमनप्रीत सिंह रहे. उन्होंने छठे पेनल्टी कॉर्नर पर यह गोल किया.
इस दौरान भारत के खेल को देखकर लग रहा था कि वह टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के दौरान जो प्रदर्शन किया था, उसे दोहराने जा रहा है.
भारत ने तीसरे क्वार्टर में वापसी का भरपूर प्रयास किया और दो-दो गोल की बराबरी करने में सफलता भी प्राप्त की.
भारत को इस दौरान बढ़त बनाने के भी मौके मिले पर इनका फायदा नहीं उठा सके.
भारतीय हमलों में पैनेपन में दिखी कमी
भारतीय खिलाड़ी दम लगाकर खेल रहे थे. गोल जमाने के मौके भी बनाए, मगर गोल दागने में हुई चूक हार का कारण बनी.
कम से कम तीन ऐसे मौके थे, जब भारतीय खिलाड़ी गोल जमाने की स्थिति में थे पर जल्दबाजी में गेंद बाहर मार बैठे.
भारत ने गोल जमाने के करीब आधा दर्जन मौके गँवाए.
पहले क्वार्टर में एक लंबे स्कूप पर सर्किल के टॉप पर खड़े हार्दिक को गेंद मिली और वह सर्किल में पहुंचने में भी सफल रहे पर वह गेंद बाहर मार गए.
हार्दिक को इसी तरह तीसरे क्वार्टर में पेनल्टी कॉर्नर रिबाउंड पर मिली गेंद को खाली गोल में डालना था. पर वह शॉट को गोल के सामने से बाहर मार गए. इसी तरह से अभिषेक और शमशेर ने भी गोल जमाने के मौके बर्बाद किए.
पेनल्टी कॉर्नर पर नहीं निकले गोल
भारत की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उसके पास हरमनप्रीत सिंह के अलावा कोई दूसरा अच्छा ड्रेग फ्लिकर नहीं है.
इस कारण रशर अच्छे से जानते हैं कि गेंद हरमनप्रीत सिंह पर जानी है, इसलिए वह एंगल को खत्म करने में सफल रहते हैं.
जर्मनी ने हेनरिच टियो सहित दो खिलाड़ियों को इस काम में लगाया और वह अपनी जिम्मेदारी को निभाने में सफल रहे.
भारत को पूरे मैच में 11 पेनल्टी कॉर्नर मिले, जिसमें से सिर्फ दो को ही गोल में बदला जा सका. इसमें भी दूसरा गोल हरमनप्रीत के ड्रेग फ्लिक पर सुखजीत सिंह के डिफलेक्शन करने पर आया.
भारत को स्पेन के खिलाफ कांस्य पदक मुकाबले के दौरान इस कमजोरी से पार पाना बेहद जरूरी होगा.
पेनल्टी कॉर्नर को गोल को बदलने के मामले में जर्मनी की स्थिति कहीं बेहतर रही.
उन्होंने पांच पेनल्टी कॉर्नरों में से एक को गोल में बदला और एक पर उन्हें पेनल्टी स्ट्रोक मिला, जिसे भी गोल में बदल दिया गया.
जर्मनप्रीत की गलतियों ने बदला खेल
जर्मनप्रीत को आमतौर पर अच्छे खिलाड़ियों में शुमार किया जाता है. लेकिन भारत को उनकी कुछ गलतियों ने पहले हाफ में मुश्किल में ला दिया.
भारत पर पहले हाफ में जर्मनी ने जो दो गोल जमाए , वह दोनों ही जर्मनप्रीत की गलतियों के नतीजे रहे.
पहले मौके पर जर्मनी के दाएं फ्लैंक से बने हमले में जब खिलाड़ी ने गेंद को सर्किल में डाला तो जर्मनप्रीत गेंद रोकने के प्रयास में गेंद को पैर में लगा बैठे और उन्हें 18वें मिनट में पहला पेनल्टी कॉर्नर मिल गया, जिसे रूहर क्रिस्टोफर ने गोल में बदल दिया.
जर्मनी को 27वें मिनट में दूसरा पेनल्टी कॉर्नर मिला और इस मौके पर गोलकीपर श्रीजेश के गच्चा खा जाने पर उनके बाएं खड़े जर्मनप्रीत गोल की तरफ आई. गेंद उनके पैर में लग गई. इस पर जर्मनी ने रेफरल लिया और जर्मनी को पेनल्टी स्ट्रोक मिला, जिसे क्रिस्टोफर ने गोल में बदल दिया.
भारत को खली अमित रोहिदास की कमी
अमित रोहिदास ब्रिटेन के खिलाफ क्वार्टर फाइनल मुकाबले में रेड कार्ड दिखाए जाने से इस मैच में उपलब्ध नहीं थे.
इसकी वजह से टीम के खिलाफ पेनल्टी कॉर्नरों को लेते समय रशर की कमी खली. अमित इस जिम्मेदारी को निर्भीक अंदाज में निभाते हैं.
इसके अलावा जर्मनी के हमलों के समय बचाव में भी उनकी कमी खली. श्रीजेश पर दवाब बना और इसका जर्मनी को फायदा भी मिला.
इस मुकाबले से पहले तक यह माना जा रहा था कि भारतीय टीम मानसिक रूप से बहुत मजबूत हुई है. पर आखिरी क्वार्टर में जब जर्मनी ने तीसरा गोल जमाकर बढ़त बना ली तो टीम में बिखराव दिखने लगा.
भारतीय खिलाड़ियों की समझ में ही नहीं आ रहा था कि गेंद को आगे कैसे बढ़ाया जाए. कई बार ज़रूरत से ज्यादा समय गेंद रखने के चक्कर में वह उनसे छिन गई.
कई बार हड़बड़ी में पास में जर्मन खिलाड़ी को देकर अपने ऊपर ही खतरा बना लिया गया.
हम सभी जानते हैं कि 2011 में टीम इंडिया के विश्व कप जीतने के समय पैडी अपटन कंडीशनिंग कोच थे. इसी को ध्यान में रखकर भारतीय हॉकी टीम से उन्हें जोड़ा गया है.
भारतीय टीम पेरिस आने से पहले तीन दिन तक स्विटजरलैंड की आल्प्स पहाड़ियों पर लगाए गए शिविर में रही थी. इसमें सिखाया गया कि मुश्किल के समय कैसे एकजुटता बनाए रखें. इसके अलावा विपरीत परिस्थितियों में कैसे खेलें. पर इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी, तब इसे भारतीय खिलाड़ी भूलते नजर आए.
जर्मनी के खिलाफ हार मिलने के बाद भारतीय खिलाड़ियों में एकदम से मायूसी छा गई है.
पर भारतीय टीम को आठ अगस्त को स्पेन के खिलाफ होने वाले कांस्य पदक के मुकाबले से पहले इस निराशा से उभरकर फिर से अपना खेल एकजुट करने की जरूरत पड़ेगी.
टीम को एकजुट करने में चौथा ओलंपिक खेलने वाले मनप्रीत सिंह और पीआर श्रीजेश के साथ कप्तान हरमनप्रीत सिंह अहम भूमिका निभा सकते हैं.
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