जब अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ इंदिरा गांधी ने डांस करने से किया इनकार

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इंदिरा गांधी को महिला प्रधानमंत्री कहे जाने से चिढ़ थी. वो कहा करती थीं कि मैं काम करते समय अपने-आप को महिला नहीं समझती.
अपने एक लेख 'इंदिरा गांधी जेंडर एंड फॉरेन पॉलिसी' में मेरी सी करास ने लिखा था, "अपने राजनीतिक आचरण में इंदिरा गाँधी ने शायद ही किसी महिला के नारी-सुलभ गुणों को दर्शाया है."
"अपने सार्वजनिक रूप में वो महिला के परवरिश करने और अमन-चैन लाने वाले मॉडल में फ़िट नहीं बैठती थीं लेकिन देखने-सुनने और कपड़े पहनने में वो एक नाज़ुक महिला दिखाई देती हैं."
प्रधानमंत्री बनने के बाद जब इंदिरा गाँधी पहली बार मार्च, 1966 में अमेरिका गईं तो तत्कालीन भारतीय राजदूत बीके नेहरू के पास अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन के दाहिने हाथ समझे जाने वाले जैक वेलेन्टी का फ़ोन आया.
उन्होंने नेहरू से पूछा क्या आपने लाइफ़ पत्रिका का ताज़ा अंक पढ़ा है जिसमें कहा गया है कि इंदिरा गाँधी को पसंद नहीं है कि उन्हें 'मैडम प्राइम मिनिस्टर' कहकर पुकारा जाए.

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बीके नेहरू अपनी आत्मकथा 'नाइस गाइज़ फ़िनिश सेकेंड' में लिखते हैं, "राष्ट्रपति ने जैक वेलेन्टी के ज़रिए पुछवाया कि जब मैं इंदिरा गांधी से मिलूँ तो उन्हें क्या कह कर संबोधित करूँ? मैंने उनसे कहा कि मैं ख़ुद इंदिरा गाँधी से पूछकर उन्हें बताता हूँ."
"जब मैंने इंदिरा गांधी को बताया कि ये फ़ोन किसलिए था तो उन्होंने हँसते हुए कहा राष्ट्रपति जॉनसन अगर चाहें तो उन्हें सीधे प्रधानमंत्री कहकर बुला सकते हैं. अगर वो मुझे 'मिस्टर प्राइम मिनिस्टर' कहें तब भी चलेगा."
बीके नेहरू लिखते हैं, "वो यहीं पर नहीं रुकीं. जब मैं कमरे से बाहर निकल रहा था तो उन्होंने खिलखिलाते हुए कहा, उनसे कह दीजिएगा, मेरे मंत्रिमंडल के साथी मुझे 'सर' कहकर भी बुलाते हैं."
इंदिरा गांधी के बारे में पश्चिम जर्मनी के चाँसलर हेलमुट श्मिट ने एक दिलचस्प टिप्पणी की थी, इंदिरा 'ज़ून पॉलिटिकौन' थी जिसका अर्थ था कि वो एक ऐसी राजनीतिक प्राणी थीं जिसकी कोई स्त्री या पुरुष पहचान नहीं थी.

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निक्सन की तौहीन
उसी यात्रा के दौरान व्हाइट हाउस में उनके सम्मान में दिए गए रात्रि-भोज में राष्ट्रपति जॉनसन ने इंदिरा गाँधी को डांस फ़्लोर पर नृत्य करने के लिए आमंत्रित किया.
इंदर मल्होत्रा इंदिरा गांधी की जीवनी 'इंदिरा गाँधी अ पर्सनल एंड पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी' में लिखते हैं-
"इंदिरा गाँधी हालाँकि अपने छात्र जीवन में पश्चिमी तरीके का बॉल डांस किया करती थीं लेकिन उन्होंने जॉनसन के इस अनुरोध को ये कहते स्वीकार नहीं किया कि उनके देशवासियों को ये पसंद नहीं आएगा कि उनकी प्रधानमंत्री बॉल रूम में डांस करें."

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चार वर्ष बाद इंदिरा गाँधी संयुक्त राष्ट्र के 25वें सम्मेलन में भाग लेने न्यूयॉर्क गईं. वहाँ कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष पहुंचे हुए थे. भारतीय दल को अख़बारों से पता चला कि अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने सभी राष्ट्राध्यक्षों को व्हाइट हाउस में रात्रि-भोज पर बुलाया है.
नटवर सिंह अपनी किताब 'हार्ट टु हार्ट' में लिखते हैं, "अगले दिन अमेरिका में हमारे राजदूत लक्ष्मीकांत झा वाशिंगटन से न्यूयॉर्क पहुंचे. उन्होंने इंदिरा गाँधी से पूछा कि वो निक्सन के रात्रि-भोज में शामिल होने कब वॉशिंगटन पहुंच रही हैं?"
"इंदिरा का जवाब था, उन्हें तो आमंत्रित नहीं किया गया है. झा उन्हें समझाने लगे कि उनके वहाँ न जाने से ग़लत संदेश जाएगा. इंदिरा गाँधी ने कहा कि अगर निक्सन चाहते तो मुझे दिल्ली में अमेरिकी राजदूत के ज़रिए भोज का औपचारिक निमंत्रण भिजवा सकते थे."
इंदिरा गांधी नहीं मानीं और उस भोज से अलग रहने के अपने फ़ैसले पर कायम रहीं.

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फ़्रांस के राष्ट्रपति पर भी था इंदिरा गांधी का असर
अमेरिका जाते हुए इंदिरा गाँधी फ़्रांस के राष्ट्रपति चार्ल्स डि गॉल से बातचीत करने के लिए पेरिस में रुकी थीं. उन्होंने उनके सम्मान में दिन का भोज दिया.
पुपुल जयकर इंदिरा गांधी की जीवनी में लिखती हैं, "उनके साथ गए इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव रहे लक्ष्मीकांत झा ने मुझे बताया था, डि गॉल से भेंट के दौरान वो इंदिरा गांधी को परखने की कोशिश कर रहे थे. इस मुलाकात में इंदिरा ने डि गॉल के साथ फ़र्राटेदार फ़्रेंच में बात की."
"लंच के बाद वो थोड़ी देर के लिए मेरे साथ अकेले खड़े हो गए. उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या आप कैबिनेट के प्रमुख हैं? मैंने हाँ में जवाब दिया."
दरअसल, डि गॉल राजनीति में महिलाओं के भाग लेने के पक्षधर नहीं थे. उनका मानना था कि महिलाएँ राजनीति के लिए नहीं बनी हैं लेकिन झा से कहा, "आपकी प्रधानमंत्री में गज़ब की ताकत है. उनमें कुछ तो है. मुझे पूरा विश्वास है कि वो सफल होंगी."

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बाद में डि गॉल की मृत्यु से पहले फ़्रांस के पूर्व संस्कृति मंत्री आँद्रे मालरो ने उनसे पूछा था कि इंदिरा गांधी के बारे में आपने क्या राय बनाई थी?
आँद्रे मालरो अपनी किताब 'फ़ॉलेन ओक्स, कनवर्सेशन विद प्रेसिडेंट डि गॉल' में लिखते हैं,
"डिगॉल का जवाब था उनके नाज़ुक कंधों पर भारत का भार है लेकिन उनके कंधे भार से झुके नहीं हैं."

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क्या खाना पसंद करती थीं इंदिरा गांधी?
इंदिरा गांधी बहुत कम खाना खाती थीं. उनकी सोशल सेक्रेट्री रहीं उषा भगत अपनी किताब 'इंदिराजी में थ्रू माई आइज़' में लिखती हैं, "सुबह के नाश्ते में वो मिल्की कॉफ़ी, शहद लगा हुआ थोड़ा जला टोस्ट और एक फल लिया करती थीं. उनका दोपहर का खाना साधारण होता था लेकिन वो उसे जहाँ तक संभव हो अपने परिवार वालों के साथ थाली में खाती थीं."
"रात के खाने में मछली, अंडे या भाप में पकाई गई सब्ज़ियाँ होती थीं. ये खाना वो डायनिंग रूम में न लेकर अपने कमरे में लिया करती थीं."
उषा भगत लिखती हैं, "भोजन के बाद मीठा खाना उन्हें पसंद नहीं था और वो अपने वज़न का बहुत ध्यान रखती थीं. कभी-कभी चाँदनी चौक के एक कांग्रेस नेता उनके लिए कचौरियाँ लाते थे."
"वो उन्हें खा तो लेती थीं लेकिन फिर हम लोगों से शिकायत करती थीं कि हमने उन्हें ज़्यादा खाने से क्यों नहीं रोका. उनको कुल्हड़ की चाय बहुत पसंद थी. जब कभी वो ट्रेन से सफ़र करतीं, उनकी हमेशा फ़रमाइश रहती कि वो कुल्हड़ में चाय पिएँगी."

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इंदिरा गांधी का ग़ुस्सा
नेहरू का गुस्सा तो पूरी दुनिया में मशहूर था लेकिन थोड़ी देर में वो शांत होकर सब कुछ भूल जाते थे लेकिन इंदिरा गांधी के साथ ऐसा नहीं होता था.
वो लंबे समय तक और कई बार तो ताउम्र उन लोगों के प्रति गुस्सा रखती थीं जिन्हें वो पसंद नहीं करती थीं.
मशहूर लेखक डॉम मोरेस ने उनकी एक जीवनी लिखी थी 'मिसेज़ जी' जो उन्हें पसंद नहीं आई थी.
मशहूर प्रकाशक अशोक चोपड़ा ने मुझे एक किस्सा बताया था कि जब डॉम मोरेस उन्हें अपनी किताब भेंट करने उनके घर पहुंचे तो उन्हें एक कोने में इंतज़ार करने के लिए कह दिया गया.
प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात का वक्त कब का निकल गया. अचानक आरके धवन ने उन्हें सलाह दी कि प्रधानमंत्री अपने दफ़्तर की तरफ़ निकलने वाली हैं.
बेहतर होगा कि जब वो अपनी कार में बैठ रही हों तब आप उनसे मिल लें. जैसे ही कार में बैठ रही इंदिरा गांधी का डॉम ने अभिवादन किया, उन्होंने अत्यंत रूखेपन से कहा, 'कहिए.'
डॉम बोले, "मैडम, मैं ये किताब आपको भेंट करने आया हूँ." इंदिरा ने तमक कर कहा, ''किताब? कैसी किताब ? मैं कूड़ा-करकट नहीं पढ़ती. इसे आप वापस ले जाइए."

ये कहकर इंदिरा गांधी कार में बैठ गईं. डॉम मोरेस के लिए वो बहुत बड़ा धक्का था. वो वहाँ से सीधे बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर 'इंडियन एक्सप्रेस' के संपादक अरुण शौरी के दफ़्तर पहुँचे.
अशोक चोपड़ा लिखते हैं, "वहाँ मैं भी बैठा हुआ था. डॉम ने मेरे सामने पूरा किस्सा सुनाया, इस पर शौरी बोले कि जब इंदिरा गाँधी ने किताब लेने से इनकार कर दिया है तो आप इसे मुझे क्यों नहीं भेंट कर देते. डॉम ने वही किया."
"जब शौरी ने किताब खोली तो उसके पहले पन्ने पर लिखा हुआ था, ‘फॉर द सबजेक्ट ऑफ़ दीज़ वर्ड्स."

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ज़िया उल हक़ से मुलाकात
सन 1980 में प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गाँधी ज़िम्बॉब्वे के स्वतंत्रता दिवस समारोह में भाग लेने हरारे गईं. वहाँ पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़िया उल हक़ भी पहुँचे हुए थे.
उन्होंने इंदिरा गांधी को संदेश भेजा कि क्या वो उनसे मिलने आ सकते हैं?
प्रोटोकॉल का तकाज़ा था कि वो सरकार प्रमुख के नाते शासनाध्यक्ष ज़िया से मिलने जाएँ, उनको ये बात बता दी गई.
नटवर सिंह अपनी किताब 'वॉकिंग विद लायंस, टेल्स फ्रॉम अ डिप्लोमैटिक पास्ट' में लिखते हैं-
"लेकिन ज़िया ने कहा कि वो इंदिरा गाँधी से मिलने आएँगे. बैठक साधारण रही. ज़िया इंदिरा गाँधी से थोड़ा दब कर बात कर रहे थे. उन्होंने कहा- 'मैडम, प्राइम मिनिस्टर, प्रेस में मेरे बारे में जो कुछ भी लिखा जा रहा है उस पर यकीन मत कीजिए.'
इस पर इंदिरा गांधी ने चुटकी ली. राष्ट्रपति महोदय बिल्कुल नहीं. प्रेस वालों को कुछ पता नहीं. तभी तो वो आपको 'डेमोक्रैट' और मुझे 'डिक्टेटर' कह रहे हैं.

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ज़िया को इंदिरा की ये टिप्पणी पसंद नहीं आई. ज़िया बार-बार कहते रहे कि मोरारजी देसाई जब प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने उनके साथ अच्छे रिश्ते कायम कर लिए थे.
इस पर इंदिरा ने कहा आप शायद भूल रहे हैं कि देसाई अब भारत के प्रधानमंत्री नहीं हैं.
चलते समय उन्होंने इंदिरा गांधी को पाकिस्तान पर एक कॉफ़ी टेबल किताब भेंट की, जब वो चले गए तो उन्होंने उस किताब पर नज़र डाली.
ये देखकर उनका पारा चढ़ गया कि उसमें पूरे कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया था. उन्होंने उसी समय मुझे आदेश दिया कि इस किताब को तुरंत पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय को लौटा दिया जाए.

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जीवन के अंतिम चरण में धर्म की तरफ़ झुकाव
अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने प्रधानमंत्री पद संभालते समय सत्यनिष्ठा की शपथ ली थी लेकिन दूसरी बार जब वो सत्ता में आईं तो वो धार्मिक हो चली थीं. इस बार उन्होंने ईश्वर के नाम पर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.
सन 1977 में अपनी हार के बाद उन्होंने बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर और संकटमोचन मंदिर में पूजा की.
सागारिका घोष इंदिरा गांधी की जीवनी 'इंदिरा इंडियाज़ मोस्ट पॉवरफ़ुल प्राइम मिनिस्टर' में लिखती हैं, "इस दौरान उन्होंने वैष्णो देवी के दर्शन किए और हैलिपैड से वहाँ तक का 2 किलोमीटर का रास्ता पैदल चलकर तय किया. अंबाजी मंदिर में उन्होंने पूरे एक मिनट तक दंडवत होकर प्रार्थना की."
"सन् 80 में संजय की मौत के बाद उन्होंने धार्मिक कार्यकलापों में बढ़-चढ़ कर भाग लेना शुरू कर दिया. उन्होंने ताउम्र अपने गले में रुद्राक्ष की माला पहनी. उनके घर के पूजाघर में सभी देवताओं की मूर्ति के अलावा क्राइस्ट, गौतम बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस की मूर्तियाँ और एक शंख रखा रहता था. दिल्ली में वो अक्सर महरोली स्थित छतरपुर मंदिर जाया करती थीं."

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धार्मिक मामलों में उनके सबसे बड़े सलाहकार कमलापति त्रिपाठी बन गए थे.
इंदिरा की एक और जीवनीकार कुमकुम चड्ढ़ा अपनी किताब 'द मैरीगोल्ड स्टोरी' में लिखती हैं, "एक बार नवरात्र के मौके पर कमलापति त्रिपाठी ने उनसे बालिकाओं के पैर धोकर उनका पानी पी जाने के लिए कहा.
उन्होंने सवाल पूछा कि इससे वो कहीं बीमार तो नहीं पड़ जाएंगी? लेकिन शुरू में झिझकने के बाद विदेश में पढ़ी और फ़्रेच बोलने वाली इंदिरा गाँधी ने ये रस्म भी पूरी की."

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पूर्व और पश्चिम का बेहतरीन समन्वय
इंदिरा को गहनों का कोई शौक नहीं था. हाँ वो हाथ में पुरुषों की घड़ी ज़रूर पहनती थीं और वो भी सरकारी कंपनी एचएमटी यानी हिंदुस्तान मशीन टूल्स में बनी घड़ी.
उनको चमकदार रंगों पीले, नारंगी, लाल और हरे रंगों से लगाव था. उनकी हैंडलूम साड़ियों का संग्रह ज़बरदस्त था.
सागारिका घोष लिखती हैं, "उनके व्यक्तित्व में पूर्व और पश्चिम का बेहतरीन समन्वय था. वो परेशान होने पर गायत्री मंत्र का जाप कर सकती थीं और बीथोवन की फ़िफ़्थ सिंफनी और राग दरबारी में बराबर की रुचि थी.
"उनकी भारतीयता उनके कपड़ों में झलकती थी. मार्च 1982 में जब लंदन में फ़ेस्टिवल ऑफ़ इंडिया का आयोजन किया गया और शुरू में राष्ट्र गान बजा तो उनकी दोस्त रहीं पुपुल जयकर ने नोट किया कि उनकी आँखें नम हो गई थी."

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इंदिरा का पर्सनल टच
अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मोरारजी देताई को वो हमेशा ‘मोरारजी भाई’ कहकर संबोधित करती थीं. जगजीवन राम को उन्होंने हमेशा ‘बाबूजी’ कहा.
उनके कार्यालय में संयुक्त सचिव रहे बीएन टंडन ने अपनी किताब ‘पीएमओ डायरी’ में उनके काम करने के ढ़ंग की बहुत आलोचना की हो लेकिन वो ये भी लिखते हैं कि जब वो बीमार पड़े तो इंदिरा ने अपने निजी चिकित्सक को उनके इलाज के लिए भेजा.

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जब भी वो विदेश यात्रा पर जाती थीं तो अपने साथ काम करने वाले आरके धवन के लिए सिगरेट लाना नहीं भूलती थीं.
उन्हें पता था कि धवन चेन स्मोकर हैं.
वो रोज़ सुबह 6 बजे उठती थीं और योगा करने और जाड़े में भी ठंडे पानी से नहाने के बाद 8 बजे तक तैयार हो जाती थीं.

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आज़मगढ़ का उपचुनाव जीत कर वापसी
सन 1977 में चुनाव हारने के बाद इंदिरा की वापसी का रास्ता तय हुआ था आज़मगढ़ के उप-चुनाव से. इस चुनाव में उन्होंने मोहसिना किदवई को कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया था.
इंदिरा गाँधी ने पूरे पाँच दिन उनका चुनाव प्रचार किया था.
मोहसिना किदवई हाल में प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘माई लाइफ़ इन इंडियन पॉलिटिक्स’ में लिखती हैं, "मैंने इंदिराजी के आज़मगढ़ आने से एक हफ़्ते पहले एक रेस्ट हाउस में अपने नाम से उनके लिए एक कमरा बुक किया था."
"मई के महीने में कड़ी दोपहर में जब हम उस रेस्ट हाउस में पहुंचे तो वहाँ मौजूद एक सिक्योरिटी गार्ड ने कहा कि कोई कमरा खाली नहीं है."
"इंदिरा जी के लिए बुक किए कमरे में मंत्री मसूद साहब रह रहे हैं. उनका हुकुम है कि कोई कमरा नहीं खोला जाए."
जब मैंने गार्ड से पूछा कि क्या तुम्हें पता है कि मैंने किसके लिए ये कमरा बुक किया है?
उसने पूछा किसके लिए? जब मैंने बताया कि ये कमरा इंदिराजी के लिए हैं तो उन्हें जैसे करंट छू गया. वो दौड़े दौड़े गए और रेस्ट हाउस के सारे कमरे खोल दिए और बोला ‘नौकरी जाए तो जाए..’

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उसी दौरान जब जॉर्ज फ़र्नांडिस एक चुनाव सभा को संबोधित कर रहे थे, इंदिरा गाँधी की कार वहाँ से गुज़री. सारे लोगों ने फ़र्नानडिस की सभा छोड़ इंदिरा गाँधी को घेर लिया.
उसी दौरान मैंने देखा कि इंदिरा गांधी किस तरह मुश्किल परिस्थितियों में अपने को ढाल सकतीं थीं.
एक जगह उन्होंने कार रुकवा कर खुद हैंडपंप से पानी खींचा और हाथ धोकर उन्हें अपनी साड़ी के किनारे से पोछा.
1977 में चुनाव हारने के बाद वो हर उस जगह पहुंची जहाँ उन्हें लगा कि लोगों के साथ अन्याय हो रहा है.
चाहे वो बिहार का बेलछी हो या मौरबी के बाढ़ पीड़ितों के साथ सहानुभूति दिखाना हो या पंतनगर में हुई फ़ायरिंग का विरोध करना हो, वो हर जगह मौजूद रहती थीं.

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ब्रिटिश पत्रकार ब्रूस चैटविन ने अपने एक लेख ‘ऑन द रोड विद मिसेज़ जी’ में लिखा था, "शारीरिक रूप से वो भारत के किसी भी राजनेता से अधिक मज़बूत हैं."
"उनको अपने स्वास्थ्य पर गर्व था. साठ की उम्र में भी वो भारत के किसी भी राजनेता से अधिक फुर्तीली थीं."
"दक्षिण के चुनाव दौरे के दौरान जब प्रचार करते करते रात हो जाती थी तो वो कार में बैठे-बैठे अपने दोनों घुटनों के बीच टॉर्च रख कर जला लेती थीं ताकि उसकी रोशनी उनके चेहरे पर पड़े और लोग अँधेरे में भी उनको देख सकें."
"चिकमंगलूर के उप चुनाव में उन्होंने दिन में 18 घंटे चुनाव प्रचार किया और सिर्फ़ मूँगफली और फलों पर रहीं."
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