फ़्रांस का फ़लस्तीन को लेकर क्या हो सकता है रुख़ और भारत से कैसे होंगे रिश्ते

फ़्रांस के संसदीय चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले आए हैं.

इन नतीजों को अब एक नई राजनीतिक हक़ीक़त कहा जा रहा है जिसमें वामपंथी धड़े का न्यू पॉपुलर फ़्रंट गठबंधन पहले पायदान पर आया है.

वहीं जिस दक्षिणपंथी पार्टी नेशनल रैली को लेकर उम्मीद जताई जा रही थी कि वो चुनाव जीत जाएगी वो तीसरे नंबर पर रही है.

पूर्ण बहुमत किसी को नहीं मिला है लेकिन न्यू पॉपुलर फ़्रंट को 182 सीटें मिली हैं जबकि राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का मध्यमार्गी गठबंधन दूसरे पायदान पर रहा है.

राष्ट्रपति मैक्रों के गठबंधन को 168 सीटें मिली हैं जबकि नेशनल रैली और सहयोगी दलों को 143 सीटें मिली हैं. फ़्रांस में त्रिशंकु संसद रहने वाली है. 577 सीटों वाली संसद में सरकार बनाने के लिए 289 सीटों का आंकड़ा ज़रूरी है.

किस रणनीति से धुर-वामपंथी बने नंबर वन

इस तरह के चुनाव परिणामों के लिए एक रणनीति को ज़िम्मेदार बताया जा रहा है. दरअसल, नेशनल रैली के ख़िलाफ़ वोट बँट ना जाएं, इसलिए कई वामपंथी और मध्यमार्गी उम्मीदवार चुनावी दौड़ से अलग हो गए थे.

लेफ़्ट दलों के गठबंधन न्यू पॉपुलर फ़्रंट के सबसे बड़े गठबंधन बनने पर धुर वामपंथी नेता ज्यां-ल्यूक मेलेंशों ने कहा है कि ये जनता ने कर दिखाया है.

वो कहते हैं, "जनता की लामबंदी में ग़ज़ब का उछाल आया है और अब सब जानते हैं कि ये असाधारण है क्योंकि हम समर और हॉलीडे सीज़न में हैं."

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"हमारे लोगों ने साफ़ तौर से सबसे ख़राब स्थिति की संभावना को खारिज कर दिया है. आज शाम, नेशनल रैली पूर्ण बहुमत मिलने से बहुत दूर है, जैसा कि टिप्पणीकार एक सप्ताह पहले भविष्यवाणी कर रहे थे. वास्तव में यह बिल्कुल उलट है."

न्यू पॉपुलर फ़्रंट गठबंधन की पार्टी सोशलिस्ट्स का कहना है कि गठबंधन एक सप्ताह के अंदर प्रधानमंत्री का उम्मीदवार चुनेगा.

वहीं, मैक्रों के दल के प्रधानमंत्री गैब्रिएल अतल ने अपना पद छोड़ने की बात कही थी लेकिन राष्ट्रपति मैक्रों ने उन्हें स्थिरता सुनिश्चित होने तक अपने पद पर बने रहने को कहा है.

फ़्रांस का इसराइल-फ़लस्तीन को लेकर क्या रहेगा रुख़?

फ़्रांस में जो भी नई सरकार बनेगी उनमें धुर-वामपंथियों की बड़ी भूमिका होगी. धुर-वामपंथी विदेश नीति में इसराइल-ग़ज़ा और रूस-यूक्रेन युद्ध पर ऐसा रुख़ रखते हैं जिस पर पश्चिम के कई देश और मध्यमार्गी या दक्षिणपंथी नेता सहमति नहीं जताते हैं.

वहीं ज्यां-ल्यूक मेलेंशों का कहना है कि उनका गठबंधन फ़लस्तीन को मान्यता देने की दिशा में काम करेगा.

धुर वामपंथियों की विदेश नीति कैसी होगी? इस सवाल पर बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद से पेरिस में वरिष्ठ पत्रकार वैजू नरवणे कहती हैं कि धुर-वामपंथी अगर सत्ता में आते हैं तो विदेश नीति के मामले में दो चीज़ों में बदलाव आ सकता है.

वो कहती हैं, "जिन दो विदेश नीतियों में बदलाव आ सकता है, उनमें एक ग़ज़ा-इसराइल पर और दूसरा रूस-यूक्रेन युद्ध पर. धुर-वामपंथियों की राय एकदम साफ़ है कि वो यूक्रेन को मिल रहे समर्थन के ख़िलाफ़ हैं. उनका कहना है कि रूस-यूक्रेन जंग का हल बातचीत के ज़रिए निकलना चाहिए और यूक्रेन को जो पूरा समर्थन दिया जा रहा है उसे बंद होना चाहिए."

भारत के साथ कैसे होंगे रिश्ते?

वैजू नरवणे कहती हैं, "धुर-वामपंथियों का इसराइल को लेकर सोचना है कि उनकी नीतियां जनसंहार वाली और फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ हैं. धुर-वामपंथी फ़लस्तीनियों के समर्थक हैं. लोगों ने धुर-वामपंथियों को ये भी कहना शुरू कर दिया है कि वो हमास और आतंक के समर्थक हैं."

"धुर-वामपंथियों का कहना है कि वो हमास समर्थक नहीं बल्कि फ़लस्तीन समर्थक हैं. उनका कहना है कि 75 साल के बाद फ़लस्तीनियों को अपना स्वतंत्र राष्ट्र मिलना चाहिए."

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धुर-वामपंथियों के सत्ता में आने से फ़्रांस के भारत के साथ रिश्ते कैसे होंगे?

इस सवाल पर वैजू नरवणे कहती हैं कि इससे भारत के रिश्तों पर कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.

वो कहती हैं, "जो भी सरकार आएगी वो फ़्रांस के राष्ट्रीय हित को देखकर ही आगे बढ़ेगी. इस वक़्त फ़्रांस का राष्ट्रीय हित ये है कि जो सबसे ज़्यादा निर्यात वो भारत को कर सकते हैं वो करेंगे. वो मार्केट फ़्रेंडली होगा. फ़्रांस की न्यूक्लियर और आर्म्स की लॉबी बहुत मज़बूत है. इस वजह से भारत के साथ रिश्तों में कोई अंतर नहीं आएगा."

कैसे रहे हैं भारत-फ़्रांस संबंध?

भारत की आज़ादी के बाद चार दशकों तक यूरोप में ब्रिटेन भारत का सबसे क़रीबी साझेदार रहा था.

लेकिन पिछले तीन दशकों में विचारों और पारस्परिक हितों के स्तर पर क़रीब आने से फ़्रांस यूरोप में भारत का सबसे मज़बूत साझेदार बनकर उभरा है.

यही नहीं, रूस के बाद फ़्रांस भारत का सबसे बड़ा दोस्त बनकर भी सामने आया है.

दोनों देशों के आपसी रिश्तों को सबसे ज़्यादा मज़बूती 1998 में हुए रणनीतिक साझेदारी समझौते ने दी.

बीते 25 सालों में दोनों देश इस समझौते पर खरे उतरते नज़र आए हैं.

भारत ने इस समझौते के तुरंत बाद साल 1998 में ही राजस्थान के पोखरण में परमाणु हथियारों का परीक्षण किया था.

तमाम पश्चिमी देशों ने इसकी प्रतिक्रिया के रूप में भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए थे. लेकिन फ़्रांस प्रतिबंध लगाने वाले इन मुल्कों में शामिल नहीं हुआ.

यही नहीं, फ़्रांस ने इन प्रतिबंधों को जल्द से जल्द हटाने के लिए भारत की ओर से किए जाने वाले प्रयासों का समर्थन भी किया.

इसके साथ ही कुछ मुल्कों ने भारत को हथियारों का निर्यात करने पर प्रतिबंध लगाए थे. लेकिन फ़्रांस इस मौक़े पर भी प्रतिबंध लगाने वाले देशों के साथ खड़ा नहीं हुआ.

इसी वजह से पिछले 25 सालों में फ़्रांस भारत को एयरक्राफ़्ट से लेकर सबमरीन तक अलग-अलग तरह के रक्षा उत्पाद बेचने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश बना है.

इस मामले में सिर्फ़ रूस ही फ़्रांस से आगे है.

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