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बांग्लादेश में तारिक़ रहमान का पीएम बनना भारत के लिए सबसे अच्छा विकल्प क्यों माना जा रहा है?
- Author, शुभज्योति घोष
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
बांग्लादेश में हुए बीते चार आम चुनावों में परिणाम घोषित होने के बाद जीतने वाले दल को बधाई देने के मामले में भारतीय प्रधानमंत्री बाक़ी विदेशी नेताओं से आगे रहे हैं.
फिर चाहे नई दिल्ली में मनमोहन सिंह सत्ता में रहे हों या नरेंद्र मोदी यह सिलसिला बिना किसी अपवाद के कायम रहा है.
13 फ़रवरी की सुबह इस परंपरा का एक बार फिर पालन किया गया. लेकिन इस बार बांग्लादेश में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल चुके हैं.
बांग्लादेश के भावी प्रधानमंत्री का नाम बदल चुका था. लगातार चार चुनावी जीत के बाद शेख़ हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग ने इस बार चुनाव में हिस्सा ही नहीं लिया.
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13 फ़रवरी की सुबह 9 बजे के क़रीब पीएम नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को चुनाव में बढ़त मिलने के बाद बधाई देते हुए एक पोस्ट किया.
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "यह जीत बांग्लादेश की जनता के आपके नेतृत्व पर जताए गए भरोसे को दिखाती है."
क़रीब आधे घंटे के बाद इस मैसेज को बंगाली में भी पोस्ट किया गया, जिससे पूरे बांग्लादेश में इसकी गूंज सुनाई दी.
कामयाब नहीं हुई थीं ये कोशिशें
ये संदेश एक ऐसे राजनेता के लिए था, जिन्हें भारत की ओर से लंबे समय से कोई ख़ास तवज्जों नहीं मिलती थी. उनकी बधाई को स्वीकार करने के बावजूद इसे एक कूटनीतिक यू-टर्न के तौर पर देखा जा सकता है.
भारत में ऑब्जर्वर इस आकलन पर सहमत दिखाई देते हैं. बांग्लादेश के मौजूदा राजनीतिक हालात के मद्देनजर बीएनपी की मज़बूत सरकार फ़िलहाल भारत के लिए सबसे व्यवहारिक रणनीतिक विकल्प है. उनका मानना है कि यही सोच दिल्ली के रुख़ में बदलाव का आधार है.
कई लोग ये अनुमान भी लगा रहे हैं कि ताज़ा गर्मजोशी की वजह तारिक़ रहमान के नेतृत्व वाली सरकार के द्विपक्षीय संबंधों के बारे में दिए गए विशेष आश्वासन भी हैं.
बीएनपी के पिछले कार्यकालों में चाहे जो भी उतार-चढ़ाव रहे हों, अब भारत पुराने मतभेदों पर ध्यान दिए बिना आगे बढ़ने को तैयार दिख रहा है. पीएम मोदी के मैसेज से भी ये संकेत मिलता है.
हालांकि भारत की ओर से ये संकेत भी दिया जा रहा है कि बांग्लादेश की नई सरकार के साथ बातचीत ख़ास मुद्दों पर आधारित होगी. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक दिन पहले अपने बयान में इस बात को साफ़ कर दिया था.
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने दोहराया है कि बांग्लादेश में किसी भी सरकार के साथ संबंध बांग्लादेश में हिंदुओं पर कथित हमलों की चिंताओं से अछूते नहीं रह सकते.
फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के अंत और निर्वाचित राजनीतिक सरकार की वापसी का स्वागत करता है.
जब 2014 में मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल किया, तब बीएनपी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक़ रहमान लंदन में निर्वासन में रह रहे थे.
चूंकि बीजेपी और बीएनपी दोनों ही व्यापक रूप से मध्य-दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े हैं, इसलिए माना जाता है कि उन्हें स्वाभाविक राजनीतिक जुड़ाव की उम्मीद की थी.
इंडियन नेशनल कांग्रेस ऐतिहासिक रूप से अवामी लीग के क़रीबी रही है. उसके सत्ता से जाने के बाद यह उम्मीद स्वाभाविक भी महसूस हुई.
नई सरकार के साथ संबंध सुधारने के प्रयासों के तहत रहमान की ओर से पीएम मोदी को गिफ्ट भेजा गया. जिसे बीजेपी के नेता विजय जॉली ने दिल्ली में पहुंचाया. इसके बाद अनौपचारिक रूप से भी कई बार संपर्क साधे गए.
लेकिन ये कोशिशें कामयाब नहीं हुईं. कम से कम सार्वजनिक रूप से तो नहीं. दिल्ली के कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों ने इस मामले में सावधानी बरतने की सलाह दी थी.
ढाका में पूर्व भारतीय उच्चायुक्त पिनाक रंजन चक्रवर्ती एक अलग दृष्टिकोण पेश करते हैं, "प्रधानमंत्री हसीना हमारे और बीएनपी के बीच किसी भी संपर्क को लेकर बेहद संवेदनशील थीं. यह संवेदनशीलता एक महत्वपूर्ण वजह थी."
उस दौरान बीएनपी अध्यक्ष ख़ालिदा ज़िया का स्वास्थ्य बिगड़ रहा था और पार्टी की कमान धीरे-धीरे रहमान के हाथों में जा रही थी. चूंकि औपचारिक संपर्क सीमित था, भारत ने थिंक टैंक, रिटायर्ड राजनयिकों और सुरक्षा अधिकारियों के ज़रिए तथाकथित "ट्रैक टू" चैनल बनाए रखे.
रंजन चक्रवर्ती दिल्ली और यहां तक कि बैंकॉक में ऐसी बैठकों में भाग लेने के बारे में बताते हैं.
पाँच अगस्त 2024 के बाद बदले हालात
पाँच अगस्त 2024 को बांग्लादेश में हुए नाटकीय राजनीतिक परिवर्तन ने दिल्ली के राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह से बदल दिया. अवामी लीग के बिना बने हालात में बीएनपी ज़ाहिर तौर भारत की पहली पसंद बन गई.
रंजन चक्रवर्ती साल 2008 में ढाका में भारत के उच्चायुक्त थे. तब सेना समर्थित कार्यवाहक सरकार ने रहमान को लंदन जाने के लिए मजबूर किया था. उन्हें 2001-2006 के बीएनपी कार्यकाल के दौरान रहमान पर लगे आरोप याद हैं.
चक्रवर्ती कहते हैं, "ब्रिटेन में 17 साल से ज़्यादा समय बिताने के बाद, उनमें कितना बदलाव आया है, इसका आकलन करना मुश्किल है. लेकिन अगर भारत अब खुलकर संपर्क साध रहा है, प्रधानमंत्री के पत्र, सार्वजनिक बधाई, तो यह माना जा सकता है कि कुछ उचित आश्वासन मिले हैं."
उन आश्वासनों का क्या मतलब है, इस पर अभी सिर्फ़ अटकलें लगाई जा सकती हैं. लेकिन दिल्ली में कई लोगों का मानना है कि बीएनपी की ओर से खुले तौर पर भारत-विरोधी बयानबाज़ी पर लौटने की आशंका नहीं है.
पार्टी अपनी विदेश नीति को 'बांग्लादेश फर्स्ट के रूप में पेश करती है. लेकिन रहमान ने हाल के भाषणों में भारत पर सीधे और तीखे हमले करने से परहेज किया है. इसे भारत सकारात्मक रुख़ के रूप में देखता है.
दिल्ली स्थित मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस फेलो स्मृति पटनायक एक और कारण बताती हैं.
वह कहती हैं, भावी बीएनपी सरकार शेख़ हसीना के भारत से प्रत्यर्पण की मांग को शायद आक्रामक रूप से आगे न बढ़ाए.
वह कहती हैं, "मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की थी. बीएनपी शायद बयानबाज़ी के तौर पर यह मांग उठाती रहे लेकिन वह इसे दिल्ली के साथ व्यापक बातचीत में बाधा बनने नहीं देगी."
अल्पसंख्यकों का सवाल
बीते 18 महीनों में भारत ने बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ कथित हिंसा पर बार-बार चिंता जताई है.
यह मुद्दा अंतरिम सरकार के साथ संबंधों में तनाव का कारण बना रहा. बांग्लादेश ने इन दावों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया या राजनीतिक रूप से प्रेरित बताकर ख़ारिज किया. लेकिन भारत अपने रुख़ पर कायम रहा.
बीएनपी की सरकार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के मुद्दे को कैसे संभालती है, यह महत्वपूर्ण होगा.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी प्रवक्ता देबजीत सरकार कहते हैं कि बांग्लादेश में सत्ताधारी पार्टी से ज़्यादा ज़मीनी हक़ीक़त में सुधार ज़्यादा मायने रखता है.
हाल की घटनाओं का हवाला देते हुए वह कहते हैं, "हमारे अनुभव से पता चलता है कि हिंदुओं पर हमले बंद नहीं होते, चाहे सत्ता अवामी लीग की हो या बीएनपी की."
नई सरकार से अधिक मानवीय दृष्टिकोण की उम्मीद जताते हुए भी वह ठोस बदलाव को लेकर संशय में ही हैं.
पश्चिम बंगाल के कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मतदाताओं के बीच इस मुद्दे की प्रासंगिकता को देखते हुए, यह कम से कम राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों के समापन तक राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना रहेगा.
हालांकि क्षेत्रीय बयानबाज़ी भले ही कैसी हो, लेकिन नई दिल्ली में माहौल कहीं अधिक सकारात्मक है. बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री का गर्मजोशी से स्वागत किया है.
इसका तर्क सीधा है. बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति में तारिक़ रहमान भारत के लिए सबसे अच्छा विकल्प हैं- और संभवतः एकमात्र विकल्प भी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.