चंद्रयान 3 के बाद इसरो ने किया सूर्य का रुख़, बताई मिशन आदित्य के लॉन्च की तारीख़

    • Author, चंदन सिंह राजपूत
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने सोमवार को बताया है कि सूर्य के अध्ययन के लिए भेजा जा रहा ‘आदित्य एल-1’ उपग्रह दो सितंबर 2023, सुबह 11:50 बजे श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया जाएगा.

इसरो ने बताया कि सूर्य के अध्ययन के लिए ये भारत का पहला अंतरिक्ष अभियान है.

इसरो ने कहा है – “’आदित्य एल-1’ सूर्य का अध्ययन करने वाला पहला अंतरिक्ष आधारित भारतीय मिशन होगा. अंतरिक्ष यान को सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लैग्रेंज बिंदु 1 (एल1) के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा में भेजा जाएगा, जो पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर है.”

“L1 बिंदु के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा में एक उपग्रह को रखने का प्रमुख लाभ ये होता है कि वो बिना किसी ग्रहण के सूर्य को लगातार देख सकता है. इससे वास्तविक समय में सौर गतिविधियों और अंतरिक्ष मौसम पर इसके प्रभाव को देखने का अधिक लाभ मिलेगा.”

अंतरिक्ष यान सात पेलोड्स लेकर जाएगा जो फ़ोटोस्फ़ेयर, क्रोमोस्फ़ेयर और सूर्य की सबसे बाहरी परत का अध्ययन करेंगे.

पीएम मोदी ने बीती 23 अगस्त को चंद्रयान-3 की सफलता के बाद सूर्य अभियान की घोषणा की थी.

क्या बोले थे पीएम मोदी

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बुधवार को चांद के दक्षिण ध्रुव पर अपना चंद्रयान- 3 सफलतापूर्वक उतार दिया.

इस सफलता पर वैज्ञानिकों और समूचे देश को बधाई देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आदित्य एल- 1 का ज़िक्र किया.

उन्होंने कहा, "जल्द ही सूर्य के विस्तृत अध्ययन के लिए इसरो आदित्य एल-1 मिशन लॉन्च करने जा रहा है."

इसरो प्रमुख एस सोमनाथ ने भी बताया कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का अगला मिशन आदित्य एल- 1 है जिसे श्रीहरिकोटा में तैयार किया जा रहा है.

इसी साल जून में उन्होंने आदित्य- 1 के प्रक्षेपण का ज़िक्र किया था. सूर्य के अध्ययन के लिए उपग्रह भेजने वाला भारत दुनिया का चौथा देश बन सकता है. इससे पहले अमेरिका, रूस और यूरोपीय स्पेस एजेंसी इस तरह का शोध कर चुकी हैं.

सूर्य का शोध क्यों?

हमारा ब्रह्मांड असंख्य तारों से बना है. वैज्ञानिक ब्रह्मांड का भविष्य जानने में जुटे हैं. इसी क्रम में जिस सौर मंडल में हम रहते हैं उसे समझने के लिए सूर्य को जानना बेहद ज़रूरी है.

सूर्य से जितनी मात्रा में ऊर्जा और तापमान निकलता है उसका अध्ययन धरती पर नहीं किया जा सकता.

लिहाजा दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां जितना संभव है उतना सूर्य के पास जा कर अध्ययन करना चाहती हैं.

नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने सूर्य का अध्ययन करने के लिए कई शोध किए हैं. इसरो भी आदित्य एल- 1 के ज़रिए सूर्य का विस्तृत अध्ययन करना चाहता है.

आदित्य एल- 1 को पृथ्वी से सूर्य की ओर क़रीब 15 लाख किलोमीटर पर स्थित लैग्रेंज-1 पॉइंट तक पहुंचना है.

यह वहां कक्षा में स्थापित हो जाएगा और वहीं से सूर्य पर नज़र बनाते हुए उसका चक्कर लगाएगा.

क्या है लैग्रेंज पॉइंट?

धरती और सूर्य के बीच कुल पांच लैग्रेंज पॉइंट है और यहाँ पर गुरुत्वाकर्षण सेंट्रिपेटल फोर्स के बराबर हो जाता है. इसलिए कोई भी अंतरिक्ष यान इस पॉइंट पर कम ईंधन के साथ रुक कर अध्ययन कर सकता है.

लैग्रेंज पॉइंट धरती और सूर्य के बीच की वो जगह है जहां से सूर्य को बग़ैर ग्रहण या रुकावट के देखा जा सकता है.

स्पेस एनालिस्ट डॉ. अजय लेले मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फ़ॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस में सीनियर फेलो रह चुके हैं.

वे कहते हैं, "सूर्य को स्पष्ट एक ख़ास बिंदु से देखा जा सकता है और लैग्रेंज-1 पॉइंट से ये बिना किसी अवरोध देखा जा सकता है. कुल पांच लैग्रेंज पॉइंट हैं. धरती से लैग्रेंज1 पॉइंट की दूरी क़रीब 15 लाख किलोमीटर है. हालांकि आदित्य एल- 1 मिशन को सभी पांच लैग्रेंज पॉइंट को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है."

साथ ही वे यह भी बताते हैं कि "जहां मिशन के सफल होने और कम जटिल होने की संभावनाएं होती हैं, उसी जगह का चयन किया जाता है."

एल 1 पॉइंट इसलिए भी खास है, क्योंकि सूर्य से निकलने वाले कोरोनल मास इजेक्शन और सौर तूफान इसी रास्ते से होकर धरती की ओर जाते हैं.

मिशन आदित्य एल1 का लक्ष्य क्या है?

नासा-कैलटेक के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी वैज्ञानिक और आईआईटी इंदौर के गेस्ट प्रोफ़ेसर डॉ योगेश्वरनाथ मिश्रा कहते हैं, "लैग्रेंज-1 पॉइंट पर पृथ्वी और सूर्य दोनों के गुरुत्वाकर्षण का न्यूनतम प्रभाव होता है तो यहां किसी उपग्रह का आर्बिट करना आसान हो जाता है और ऊर्जा की खपत भी कम होती है."

आदित्य एल1 सूर्य के फ़ोटोस्फ़ेयर (सूर्य का वो हिस्सा जो हमें दिखता है), बाहरी वायुमंडल क्रोमोस्फ़ेयर (सूर्य की दिखाई देने वाली सतह फ़ोटोस्फेयर के ठीक ऊपर) और कोरोना (सूर्य से कुछ हज़ार किलोमीटर ऊपर की बाहरी परत), इसके चुंबकीय क्षेत्र यानी मैग्नेटिक फ़ील्ड, टोपोलॉजी और सौर वायु का अध्ययन करेगा.

इसरो के मुताबिक इस मिशन का लक्ष्य क्रोमोस्फ़ीयर और कोरोना की गतिशीलता, सूर्य के तापमान, कोरोना के तापमान, कोरोनल मास इजेक्शन, सूरज से निकलने वाली आग या गर्मी के निकलने के पहले और बाद की गतिविधियों, अंतरिक्ष मौसम समेत कई अन्य वैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन करना है.

आदित्य एल-1 यान के साथ सात पेलोड को पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) की मदद से भेजा जाएगा. इनमें से चार पेलोड लगातार सूर्य पर नज़र बनाए रखेंगे और अन्य तीन पेलोड लैग्रेंज- 1 पर कणों और अन्य क्षेत्रों पर शोध करेंगे. (पेलोड: अंतरिक्ष में अध्ययन के लिए ले जाए जाने वाले उपकरण)

जानकारों का क्या है कहना?

आदित्य एल-1 का पेलोड कोरोनल हीटिंग, कोरोनल मास इजेक्शन, प्रीफ्लेयर और फ्लेयर गतिविधियों और उनकी विशेषताओं की जानकारी देगा.

साथ ही अंतरिक्ष के मौसम में बदलाव, सोलर फ्लेयर यानी सूर्य से निकलने वाले पार्टिकल्स (कण) के प्रसार को समझने के लिए पेलोड्स कई महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाएंगे.

बीबीसी से बातचीत में नासा-कैलटेक के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी वैज्ञानिक और आईआईटी इंदौर के गेस्ट प्रोफ़ेसर डॉ. योगेश्वरनाथ मिश्रा बताते हैं, "सूर्य की मैग्‍नेटिक फील्‍ड मुड़ती या बदलती रहती है, इस वजह से भारी मात्रा में चुंबकीय ऊर्जा रिलीज होती है, इसमें पार्टिकल्स होते हैं और इससे रोशनी निकलती है उसे सोलर फ्लेयर्स कहा जाता है."

वे कहते हैं, "सूर्य प्लाज़्मा का एक बॉल है, मैग्‍नेटिक फील्‍ड के खिसकने से होने वाले विस्फोट के कारण यह प्लाज़्मा अंतरिक्ष में फैलता है. इसे कोरोनल मास इजेक्शन कहा जाता है."

डॉ मिश्रा बताते हैं, "सूर्य के भीतर से जो ताप निकलती है उससे गर्म हवाएं चलती हैं उसे सोलर विंड कहते हैं. इसमें पार्टिकल्स होते हैं. इलेक्ट्रॉन्स-प्रोटॉन्स होते हैं. ये काफी दूर तक फैलते हैं. ये सोलर विंड सौरमंडल से आगे तक फैलती हैं."

आदित्य मिशन का मक़सद

वे कहते हैं, "सूर्य अपने असीम ताप की वजह से हमारे लिए एक प्राकृतिक प्रयोगशाला है उन क्रियाओं का अध्ययन करने के लिए जिसे धरती पर उत्पन्न करना संभव नहीं है."

डॉ मिश्रा बताते हैं, "सूर्य हमारा सबसे नज़दीकी तारा है. ये आग का गोला है जो लाखों डिग्री सेल्सियस गर्म है और पृथ्वी के आकार से लाखों गुणा बड़ा है. सूर्य के सतह पर हर वक़्त हज़ारों-लाखों विस्फोट होते रहते हैं. विस्फोट की वजह वहां मौजूद चार्ज प्लाज़्मा, प्रचंड तापमान और मैग्नेटिक फील्ड है. इस विस्फोट की वजह से भयानक तूफ़ान उठता है और अंतरिक्ष में काफी सारा चार्ज प्लाज़्मा फैल जाता है."

कई बार सौर तूफ़ान के रास्ते में पृथ्वी आ जाती है, हालांकि पृथ्वी के मैग्नेटिक फील्ड और बाहरी परत की वजह से अमूमन सौर तूफ़ान पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुंच पाते हैं.

लेकिन इससे पृथ्वी के वायुमंडल के बाहरी परत पर ख़तरा पैदा हो जाता है, जहां दुनिया भर की हज़ारों सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा में चक्कर काट रही है.

डॉ मिश्रा कहते हैं, "धरती पर जीवन सूर्य की वजह से पनपता हैं. अगर सूर्य की रोशनी धरती पर न पड़े तो जीवन की उत्पत्ति संभव ही नहीं है. लेकिन हो सकता है एक समय ऐसा भी आए जब सूर्य से निकलने वाली उष्मा, प्लाज़्मा या सौर हवाओं की तीव्रता इतनी तेज़ हो जाए कि पृथ्वी और इसकी कक्षा में काम कर रहे सैटेलाइट्स पर इसका बहुत बुरा असर पड़े."

सूर्य की गर्मी बढ़ने से सैटेलाइट्स को ख़तरा

डॉक्टर मिश्रा ने बताया, "इसका असर ये होगा कि सूर्य से निकली भयंकर गर्मी से सैटेलाइट के जलने या शॉर्ट सर्किट जैसी समस्याएं आ सकती हैं. इसके बाद न हम कम्युनिकेशन कर पाएंगे और न ही मौसम की भविष्यवाणी कर पाएंगे. इसलिए सूर्य की गतिविधियों पर नज़र बनाए रखने की ज़रूरत है."

3 फ़रवरी 2022 को स्पेसएक्स के स्टारलिंक प्रोजेक्ट के तहत एक साथ 49 सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजा गया.

लेकिन इसके कुछ समय के बाद ही अंतरिक्ष के सोलर स्टॉर्म की वजह से 40 सैटेलाइट में ख़राबी आ गई जिससे करोड़ों का नुकसान हुआ.

डॉ योगेश्वरनाथ मिश्रा कहते हैं, "अगर भविष्य में कभी सूर्य का तापमान बढ़ जाए और इसका असर धरती पर पड़ने लगे तो फिर इसपर काबू पाना हमारे हाथ में नहीं होगा. लेकिन इन अध्ययनों के ज़रिए पहले से सचेत हुआ जा सकता है. जब कोई उपकरण पहले से ही सूर्य के नज़दीक काम करता रहेगा तो वह हमें ख़तरनाक रेडिएशन और तरंगों को लेकर चेतावनी भेज सकता है. ये अध्ययन मानवता के लिए ज़रूरी हैं."

"सोलर फ्लेयर्स के माध्यम से आने वाले रेडियेशन और एक्सरे धरती की सबसे ऊपरी वायुमंडल आयनोस्फ़ेयर पर ही रुक जाते हैं, लेकिन कई बार सोलर फ्लेयर का रेडियेशन इतना तेज़ होता हैं कि आयनोस्फ़ेयर को भी चार्ज कर देते हैं, जिसके बाद शॉर्ट वेव कम्युनिकेशन का पूरा सिस्टम ठप पड़ जाता है."

क्या हैं चुनौतियां?

इसरो के मुताबिक सूर्य की रोशनी के साथ कई तरह की तरंगें और मैग्नेटिक फील्ड होते हैं, लेकिन पृथ्वी की बाहरी परत होने की वजह से कई तरंगें धरती तक नहीं आ पाती हैं.

इस वजह से ही आदित्य एल-1 मिशन को लैग्रेंज-1 पॉइंट पर स्थापित किया जाएगा, जहां पृथ्वी के मैग्नेटिक फील्ड का प्रभाव नहीं होगा. इसलिए इसरो ने इस मिशन के लिए लैग्रेंज पॉइंट को चुना है.

इसरो के सामने सबसे बड़ी चुनौती आदित्य एल-1 को लैग्रेंज-1 पॉइंट तक भेजने की है जिसकी दूरी 15 लाख किलोमीटर बताई जाती है. धरती से चांद क़रीब तीन लाख किलोमीटर की दूरी पर है और वहां तक अपने चंद्रयान को उतारने में भारत को अब जा कर कामयाबी मिली है.

भारत ने जब 2019 में चंद्रयान- 2 को चांद पर उतारने की कोशिश की थी तब लैंडर से उसका संपर्क टूट गया था. ऐसे में लैग्रेंज-1 की पांच गुना दूरी पर आदित्य एल-1 के साथ संपर्क बनाए रखना भारतीय अंतरिक्ष संगठन के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी.

इस मिशन में लगने वाला समय भी एक बड़ी चुनौती के रूप में होगा.

विदेशी एजेंसियां करेंगी मदद

यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने जानकारी दी है कि आदित्य एल-1 मिशन के दौरान वो डीप स्पेस लोकेशन और ट्रैकिंग में मदद करेगी. हालांकि इसरो ने अभी इसकी कोई जानकारी नहीं दी है.

यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ईएसए) के मुताबिक, "आदित्य एल-1 को ईएसए के 35 मीटर डीप स्पेस एंटिना से ग्राउंड सपोर्ट दिया जाएगा जो यूरोप में कई जगहों पर स्थित है."

"ईएसए 'कक्षा निर्धारण' सॉफ़्टवेयर में भी सहायता देगा जिसका इस्तेमाल आदित्य एल-1 मिशन में होना है. यह सॉफ़्टवेयर अंतरिक्ष यान के वास्तविक स्थिति की सटीक जानकारी देने में मदद करता है."

यूरोपियन स्पेस एजेंसी को लेकर डॉ योगेश्वरनाथ मिश्रा कहते हैं, "इसे विदेशी एजेंसी की मदद नहीं कहा जा सकता. ये म्युचुअल सपोर्ट होता है. देशों के बीच डीप स्पेस नेटवर्क को लेकर कुछ तय करार होते हैं, जैसे एयरस्पेस को लेकर देशों के बीच समझौता होता है ठीक उसी तरह यह भी काम करता है."

"डीप स्पेस नेटवर्क होने की वजह से हम लगातार अंतरिक्ष यान पर नज़र रख सकते हैं क्योंकि ज़रूरी नहीं हमारे सैटेलाइट हर वक़्त पृथ्वी के दूसरे छोर पर सफ़र कर रहे अंतरिक्ष यान का सिग्नल रिसीव कर ले."

कितने देश कर चुके हैं सूर्य का अध्ययन

स्पेस एनालिस्ट डॉ अजय लेले बताते हैं, "जब गहरे अंतरिक्ष में यात्रा करते हैं तब काफी शक्तिशाली एंटिनाओं की ज़रूरत होती हैं. और सिर्फ एंटिना ही नहीं बल्कि पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति भी सिग्नल रिसीव करने के लिए मायने रखती है."

"गहरे अंतरिक्ष में जाने के बाद यान से भेजे जाने वाले सिग्नल काफी कमज़ोर हो चुके होते हैं. ऐसे में पृथ्वी के कई स्पेस सपोर्ट एंटिनाओं की मदद लेनी पड़ती है."

सूर्य के अध्ययन के लिए अब तक केवल नासा, यूरोपीय स्पेस एजेंसी और जर्मन एयरोस्पेस सेंटर ने अंतरिक्ष अभियान भेजे हैं.

नासा ने अबतक तीन मुख्य मिशन किए हैं. ये हैं सोहो (सोलर एंड हेलियोस्फेरिक ऑब्जर्वेटरी), पार्कर सोलर प्रोब और इरिस (इंटरफेस रिजन इमेजिंग स्पेक्ट्रोग्राफ).

सोहो मिशन को नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी ने मिलकर लांच किया था. यह सबसे लंबे समय तक चलने वाला उपग्रह है.

सोलर पार्कर चार साल से सूर्य की सतह के सबसे क़रीब उड़ान भर रहा है. यह सोलर कोरोना के भीतर भी जा चुका है. इरिस (इंटरफेस रिजन इमेजिंग स्पेक्ट्रोग्राफ) सूर्य के सतह की बेहतरीन तस्वीरें हाई रिजॉल्यूशन में ले रहा है.

डॉ मिश्रा कहते हैं, "कई अंतरिक्ष एजेंसी सूर्य के रहस्य को सुलाझाने के लिए उत्साहित हैं. वे कोरोनल डिस्चार्ज और सोलर फ्लेयर के अध्ययन के लिए लगातार कई मिशन पर काम कर रही हैं."

"नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी की साझा मिशन हबल स्पेस टेलिस्कोप ने भी काफी डेटा एकत्र किया है. इसके अलावा नासा ने सोलर पार्कर नाम के एक मिशन को भेजा है. सोलर पार्कर का प्रोब सूर्य के कोरोना के भीतर जाएगा और उसकी गतिविधियों का अध्ययन करेगा."

डॉ मिश्रा बताते हैं, "धरती और सूर्य के बीच की दूरी 15 करोड़ किलोमीटर है. एल-1 की दूरी 15 लाख किलोमीटर है. यानी सूर्य की धरती से कुल दूरी का 1 प्रतिशत हिस्सा. मतलब अगर कोई डाटा एल-1 तक पहुंचता है तो यहां सूर्य के कोरोना के मुक़ाबले उसकी प्रकृति और ताप कम हो जाएगी. इसलिए ये ज़रूरी है कि सूर्य के कोरोना के भीतर जाकर उसकी प्रकृति को समझा जाए."

आदित्य एल-1 एक शुरुआत

डॉ अजय लेले कहते हैं, "हर मिशन दूसरे मिशन से 100 प्रतिशत अलग नहीं हो सकता है. लेकिन समय के साथ साइंस और टेक्नॉलॉजी में काफी विकास हो जाता है. अगर किसी देश ने 10 साल पहले कोई मिशन भेजा है, तो उस समय की तकनीक और आज की तकनीक में काफी का अंतर है. मुझे लगता है कि प्रौद्योगिकी के लाभ की नज़र से हर मिशन पिछले मिशन से बेहतर मिशन है."

डॉ मिश्रा कहते हैं, "अगर भारत दूसरे देशों के मिशन पर निर्भर रहने के बजाय खुद़ मिशन करेगा तो आने वाले संभावित ख़तरे को लेकर किसी दूसरे देश पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा. मिशन से भारत को अनुभव भी मिलेगा."

डॉ योगेश्वरनाथ मिश्रा कहते हैं, "आदित्य एल-1 सूर्य को समझने के लिए काफी नहीं लेकिन ये महज़ एक शुरुआत है. अभी सूर्य को समझने के लिए कई और मिशन करने होंगे."

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