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मोहन भागवत और इंद्रेश कुमार के बयान, क्या संघ और बीजेपी के बीच सबकुछ ठीक है?
- Author, भाग्यश्री राउत
- पदनाम, बीबीसी मराठी के लिए
लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे नेता इंद्रेश कुमार का बयान आया है जिसमें उन्होंने सत्तारूढ़ बीजेपी को 'अहंकारी' और विपक्षी इंडिया गठबंधन को 'राम विरोधी' बताया है.
आरएसएस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने कहा, "2024 में राम राज्य का विधान देखिए, जिनमें राम की भक्ति थी और धीरे-धीरे अहंकार आ गया, उन्हें 240 सीटों पर रोक दिया. जिन्होंने राम का विरोध किया, उनमें से राम ने किसी को भी शक्ति नहीं दी, कहा- तुम्हारी अनास्था का यही दंड है कि तुम सफल नहीं हो सकते."
कुछ दिन पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी लोकसभा परिणाम के कारणों का विश्लेषण करते हुए एक बयान दिया था.
उन्होंने कहा, "जो मर्यादा का पालन करते हुए काम करता है. गर्व करता है लेकिन अहंकार नहीं करता, वही सही अर्थों में सेवक कहलाने का अधिकारी है."
समझा जाता है कि उन्होंने बीजेपी के कथित अहंकार को लेकर ये बात कही थी.
इतना ही नहीं उन्होंने कई मुद्दों पर सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार को नसीहत भी दी. वे यहीं नहीं रुके. उन्होंने मणिपुर में हो रही हिंसा का भी जिक्र किया और कहा कि कर्तव्य है कि इस हिंसा को अब रोका जाए.
लोकसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं. पिछले दो चुनावों की तरह बीजेपी को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला. इस झटके को लेकर कई सहयोगी, समर्थक और विरोधी बीजेपी की आलोचना कर रहे हैं.
लेकिन इन सबके बीच बीजेपी के लिए सबसे बड़ा झटका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया के बयान को माना जा रहा है.
चुनाव नतीजों के बाद मोहन भागवत का भाषण कई मायनों में अहम था. इसकी चर्चा देश भर की मीडिया में हुई और अभी भी हो रही है.
लेकिन संघ की ओर से आलोचना का सिलसिला यहीं नहीं रुका. आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र ने भी बीजेपी और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की आलोचना की.
ऑर्गनाइज़र ने लिखा कि लोकसभा चुनाव के नतीजे भाजपा के अति आत्मविश्वासी नेताओं और कार्यकर्ताओं को आईना हैं. हर कोई भ्रम में था. "किसी ने लोगों की आवाज़ नहीं सुनी."
संघ के सदस्य रतन शारदा ने यह लेख लिखा है और बीजेपी और मोदी सरकार की आलोचना की है.
तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि क्या संघ और बीजेपी के बीच सब कुछ ठीक है या नहीं? यह सवाल इसलिए भी पूछा जा रहा है क्योंकि इससे जुड़ा एक वाकया है.
लोकसभा चुनाव के शुरुआती कुछ चरणों के बाद प्रचार के दौरान बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा था कि 'बीजेपी को अब संघ की ज़रूरत नहीं है.'
सभी जानते हैं कि देश भर में फैला संघ का तंत्र, पारिवारिक संस्थाएं, उनसे जुड़े लोग किस कदर चुनाव में बीजेपी की मदद करते हैं, फिर उन्होंने चुनाव में यह बयान क्यों दिया होगा?
चुनाव परिणाम घोषित होते ही मोहन भागवत ने मोदी सरकार की आलोचना की और अगले ही दिन आरएसएस के मुखपत्र ने बीजेपी नेताओं की आलोचना कर दी.
किन मुद्दों पर बोले मोहन भागवत?
मोहन भागवत सार्वजनिक रूप से दो बार बोलते हैं, एक विजयदशमी पर और दूसरे संघ के कार्यकर्ता विकास कक्षाओं के बाद, हालांकि इन कक्षाओं में कभी राजनीतिक सलाह या बयान नहीं देते.
लेकिन, इस बार उन्होंने चुनाव नतीजों के तुरंत बाद कार्यकारी विकास वर्ग-2 के समापन भाषण में परोक्ष रूप से वरिष्ठ भाजपा नेताओं को नसीहत दी.
उनका भाषण थोड़ा आक्रामक था, इसमें उन्होंने चार प्रमुख बातें कही थीं.
पहला है मणिपुर पर उनका बयान. उन्होंने कहा, 'विकास के लिए देश में शांति जरूरी है. देश में अशांति है और काम नहीं हो रहा है. देश का अहम हिस्सा मणिपुर एक साल से जल रहा है. नफ़रत ने मणिपुर में अराजकता फैला दी है.'
उन्होंने मौजूदा एनडीए सरकार को सलाह दी कि वहां हिंसा रोकना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए.
दूसरा, पीएम मोदी हमेशा खुद को प्रधान सेवक कहते हैं. सरसंघ चालक ने अपने भाषण में इस सेवक शब्द का उल्लेख किया था.
भागवत ने कहा, "देश को निस्वार्थ एवं सच्ची सेवा की ज़रूरत है. जो मर्यादा का पालन करता है उसमें अहंकार नहीं होता और वह सेवक कहलाने का हक़दार होता है."
राजनीति के जानकार लोगों का मानना है कि यह अप्रत्यक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कहा गया था.
तीसरा, विपक्षी पार्टी को लेकर मोहन भागवत ने बयान दिया. उन्होंने कहा, "सत्ता पक्ष और विपक्ष की अलग-अलग राय है. मूलतः हमें विपक्ष शब्द का प्रयोग करना चाहिए, विरोध का नहीं. वे संसद में अपनी बात रखते हैं. इसका भी सम्मान किया जाना चाहिए. चुनाव की एक सीमा होनी चाहिए. लेकिन, इस बार ऐसा देखने को नहीं मिला."
चौथा, चुनाव प्रचार को लेकर बयान. उन्होंने कहा, "चुनाव युद्ध नहीं प्रतिस्पर्धा है. इसकी सीमाएं होनी चाहिए. झूठ का सहारा लेने से काम नहीं चलता. कैंपेन में आलोचना हुई और समाज में नफ़रत पैदा करने की कोशिश की गई. बिना वजह संघ जैसे संगठनों को भी इसमें घसीटने की कोशिश की गई."
"यह सही नहीं है कि टेक्नोलॉजी की मदद से झूठ फैलाया जाए. केंद्र में भले ही एनडीए सरकार वापस आ गई है, लेकिन देश के सामने चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं.'
मोहन भागवत ने ये भाषण 10 जून की रात को दिया था और अगले ही दिन 11 जून को आरएसएस से जुड़ी पत्रिका 'ऑर्गनाइज़र' ने बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं को आईना दिखाने का काम किया.
'आर्गनाइज़र' में क्या लिखा गया है?
आर्गनाइज़र में छपे लेख में कहा गया, "बीजेपी ने आरएसएस का काम नहीं किया. लेकिन, बीजेपी एक बड़ी पार्टी है और उनके अपने कार्यकर्ता हैं. वे पार्टी की कार्यप्रणाली, उसकी विचारधारा को लोगों तक पहुंचा सकते हैं."
"संघ चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए जनजागरण का काम कर रहा है. लेकिन, बीजेपी कार्यकर्ताओं ने संघ तक अपनी बात नहीं पहुंचाई, उन्होंने स्वयंसेवकों से चुनाव में सहयोग करने के लिए भी नहीं कहा. उन्होंने ऐसा क्यों किया."
इस लेख में महाराष्ट्र में जोड़ तोड़ की राजनीति पर भी बीजेपी की आलोचना की गई है और कहा गया कि महाराष्ट्र में जोड़-तोड़ की राजनीति से बचा जा सकता था. साथ ही ये भी कहा गया कि बीजेपी कार्यकर्ता 'मोदी की गारंटी, अबकी बार 400 पार' के अतिआत्मविश्वास में लिप्त हो गए.
लेख में सवाल उठाया गया कि जब बीजेपी और शिवसेना को बहुमत मिल रहा था तब भी अजित पवार को साथ क्यों लिया गया? भाजपा समर्थक उन लोगों को अपने साथ लेने से आहत हैं जिनके खिलाफ उन्होंने वर्षों तक लड़ाई लड़ी. एक झटके में अपनी ब्रांड वैल्यू कम करने को लेकर बीजेपी की कड़ी आलोचना हो रही है.
इन बयानों और लेखों से पहले, संघ की मशीनरी ने अपने स्वयंसेवकों, पदाधिकारियों से चुनाव परिणाम के बारे में 'फीडबैक' इकट्ठा किया था.
एक वरिष्ठ स्वयंसेवक, जिनसे यह 'फीडबैक' लिया गया था और जो पेशेवर रूप से इस चुनाव के राजनीतिक प्रबंधन में भी शामिल थे, उन्होंने नाम न ज़ाहिर करते हुए बीबीसी मराठी को बताया, ''संघ की शाखा स्तर से इस तरह का 'फीडबैक' आया है, राष्ट्रीय कार्यकारिणी स्तर पर यह कोई नई बात नहीं है."
'वोटों का प्रतिशत क्यों घटा, सामाजिक एकजुटता पर क्या प्रभाव पड़ा, चुनाव में क्या नैरेटिव चला और नतीजे ऐसे क्यों रहे, जैसे मुद्दों पर 'फीडबैक' मांगा गया था. यह बीजेपी और उससे जुड़े लोगों पर भी लागू होता है.''
हालांकि नतीजों के मद्देनजर भागवत के बयान की ज़्यादा चर्चा हो रही है, लेकिन यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने इस तरह की आलोचना की है. भागवत ने उन मुद्दों पर टिप्पणी की है जिन पर मोदी सरकार पहले भी चुप्पी साधे रही है. न सिर्फ भागवत बल्कि उनके पूर्व सरसंघ नेता भी सार्वजनिक तौर पर अपनी बात रख चुके हैं.
मोहन भागवत ने पहले क्या दिया था बयान?
वहीं मणिपुर का मुद्दा सुर्खियों में रहने के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने इस पर कुछ नहीं कहा. विपक्ष ने प्रधानमंत्री से इस मुद्दे पर बोलने की मांग को लेकर संसद में हंगामा किया. कुछ सांसदों को निलंबित भी किया गया था.
लेकिन, सरकार की ओर से कोई भी मणिपुर के बारे में बात करने को तैयार नहीं था. उस समय मोहन भागवत ने 2023 के अपने विजयादशमी भाषण में मणिपुर पर टिप्पणी की थी.
उन्होंने कहा था, "मणिपुर में हिंसा किसने भड़काई? यह हिंसा अपने आप नहीं हुई या लाई गई. अब तक, मैतई और कुकी दोनों समुदाय अच्छे से रह रहे थे."
भागवत ने कहा था कि यह सीमावर्ती राज्य है और अगर यहां हिंसा होती है तो हमें सोचना चाहिए कि इससे किसे फायदा हो रहा है.
मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की ज़रूरत बताई थी. उन्होंने यह तय करने के लिए एक समिति बनाने का प्रस्ताव रखा था कि आरक्षण का लाभ किसे और कितने समय तक मिलेगा. इसके बाद हुए बिहार विधानसभा चुनाव में भी यही मुद्दा छाया रहा.
प्रचार किया गया कि संघ आरक्षण ख़त्म करना चाहता है. देखा गया कि इसका असर बीजेपी पर भी पड़ा.
फिर आरक्षण के समर्थन में मोहन भागवत का बयान आया, जो उनके पहले के बयान और संघ के कुछ पदाधिकारियों के रुख़ से उलट था.
उन्होंने कहा, "जब तक समाज में भेदभाव है तब तक आरक्षण बरकरार रहना चाहिए. जो भी आरक्षण संविधान के मुताबिक रहना चाहिए, संघ उसका समर्थन करता है."
संघ और बीजेपी के बीच मतभेद पहले भी सामने आ चुके हैं. इनका एक महत्वपूर्ण उदाहरण संघ के तत्कालीन नेता के. एस. सुदर्शन का अटल बिहारी वाजपेयी से नाराजगी जताना है.
वाजपेयी सरकार से संघ का तनाव
2000 के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे. लेकिन, 2004 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी हार गई. तब संघ के तत्कालीन प्रमुख के. एस. सुदर्शन ने एनडीटीवी को इंटरव्यू दिया.
इस समय उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की खुलकर आलोचना की.
प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी के कार्यकाल की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था, "मुझे नहीं लगता कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान बहुत कुछ किया. उन्होंने कुछ अच्छे फैसले लिए, लेकिन, उन्हें सभी के साथ जुड़ना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया."
"हमें यह पसंद नहीं आया कि उन्होंने वीएचपी, बजरंग दल, विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ से बातचीत बंद कर दी. अब वाजपेयी और आडवाणी को संन्यास ले लेना चाहिए और नए नेतृत्व को मौका देना चाहिए."
इतना ही नहीं उन्होंने वाजपेयी के परिवार की भी आलोचना की. सुदर्शन ने सरकारी काम में दखल देने के लिए वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य की भी आलोचना की थी. उस समय बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं और संघ के बीच रिश्ते तनावपूर्ण थे.
हालाँकि, वर्षों से संघ पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों का कहना है कि नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग के समापन पर मोहन भागवत का भाषण पिछले कुछ वर्षों के इन बयानों से अधिक आक्रामक था.
नड्डा के बयान से संघ नाराज़ था?
चुनाव के दौरान किसी ने कुछ नहीं कहा. विशेष रूप से चुनाव के दौरान 17 मई को इंडियन एक्सप्रेस अखबार को दिए इंटरव्यू में बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था कि "बीजेपी को अब संघ की जरूरत नहीं है, बीजेपी राजनीतिक फैसले लेने में सक्षम है."
उस समय भी न तो बीजेपी की ओर से स्पष्टीकरण दिया गया और न ही आरएसएस की ओर से किसी ने नाराजगी जताई. लेकिन, जैसे ही चुनाव नतीजे घोषित हुए, मोहन भागवत का बयान आ गया.
सवाल उठता है कि क्या भागवत का बयान नड्डा के बयान से नाराजगी के चलते आया है? क्या इसका जवाब आरएसएस ने अब दिया है?
नागपुर लोकसत्ता के संपादक देवेन्द्र गावंडे का कहना है कि नड्डा के बयान से संघ के कई स्वयंसेवकों को ठेस पहुंची है.
बीबीसी मराठी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "एक अभियान चलाया गया कि संघ के लोग चुनाव में काम नहीं करें. बीजेपी के लोग अकेले में ऐसी बातें करते थे. इसमें चुनाव के दौरान बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का यह बयान पसंद नहीं आया कि बीजेपी को संघ की ज़रूरत नहीं है. इस बयान से तनाव साफ़ दिख रहा था."
लेकिन नागपुर में आरएसएस, बीजेपी और राजनीति पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार विकास वैद्य की राय अलग है.
वह कहते हैं, "जेपी नड्डा ने जो बयान दिया है, वह बीजेपी और आरएसएस की सहमति है. इसलिए संघ के नाराज होने का सवाल ही नहीं उठता. यदि संघ को आपत्ति थी तो वे उसी समय दर्ज कराते या नाराजगी व्यक्त करते. बीजेपी भी सफाई देती. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ."
बीजेपी और संघ के बीच कोई टकराव है?
अगर विधानसभा का सत्र होता है तो सभी बीजेपी विधायकों के लिए विशेष निर्देश जारी किए जाते हैं और उन्हें रेशीम बाग स्थित स्मारक स्थल पर माथा टेकने के लिए बुलाया जाता है.
लेकिन, मोदी सरकार पिछले 10 साल से सत्ता में हैं. मोदी खुद कई कार्यक्रमों का उद्घाटन करने नागपुर आए हैं. लेकिन, नागपुर में चर्चा है कि वह कभी आरएसएस मुख्यालय या स्मारक स्थल नहीं गए.
राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलशिकर नहीं मानते कि बीजेपी और संघ में कोई टकराव है.
वो कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि बीजेपी और संघ में कोई बुनियादी मतभेद है. जिन मुद्दों पर काम करना है उस पर दोनों में सहमति है."
पलशिकर ने कहा कि मौजूदा समझौते को यूनियनों और संबद्ध संगठनों की सांस्कृतिक क्षेत्र में आज़ादी और प्रशासन और आर्थिक नीतियों के क्षेत्र में बीजेपी की स्वायत्तता के रूप में देखा जाता है.
उनके अनुसार, बीजेपी और संघ जिस सामाजिक और सांस्कृतिक सर्वोच्चता को स्थापित करना चाहता है, उस पर वे स्पष्ट हैं. लेकिन संभव है कि सरकार के चलाने के तरीक़े पर मतभेद हो.
हर चुनाव में संघ और बीजेपी के बीच तालमेल रहता था. लेकिन जैसा कि देवेन्द्र गावंडे का कहना है कि वह इस चुनाव में शामिल नहीं हुए.
वो कहते हैं, "संघ को बीजेपी से कोई शिकायत नहीं है. लेकिन मोदी की बीजेपी नाराज़ है. क्योंकि, संघ एक सीधी रेखा में है. इसलिए संघ बीजेपी की विखंडित राजनीति और उससे बीजेपी की खराब हो रही छवि से सहमत नहीं है. भागवत के ये बयान उसी से आए होंगे. इसका मतलब ये नहीं कि संघ और बीजेपी में मतभेद है. लेकिन, थोड़ा तनाव ज़रूर है."
विकास वैद्य भी इस बात से सहमत हैं कि पार्टी जोड तोड की इस राजनीति से संतुष्ट नहीं है. लेकिन, वह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि संघ और बीजेपी के बीच कोई मतभेद नहीं है.
वे कहते हैं, "अगर संघ मोदी से नाराज़ होता तो भागवत सीधे उनका नाम लेते. संघ बीजेपी का अग्रज है. इसलिए उनका पीछे हटना संघ को स्वीकार्य नहीं है. संघ को बीजेपी से लगाव है. तो मोहन भागवत सामने आए."
लेकिन बीजेपी को नसीहत देने, विरोधियों को प्रतिस्पर्धी मानने, उनकी राय का सम्मान करने जैसे तमाम बयानों और इसकी टाइमिंग पर नागपुर लोकमत के संपादक श्रीमंत माने संदेह जताते हैं.
उनका मानना है कि यह संघ को संतुलित करने की कोशिश है.
वो कहते हैं, "बीजेपी की जीती हुई सीटों पर वोटिंग प्रतिशत कम हुआ है. विपक्ष की ताकत बढ़ती जा रही है. क्या इस पृष्ठभूमि में संघ का यह दिखाने का प्रयास नहीं है कि हमारा झुकाव पूरी तरह से भाजपा की ओर नहीं है?"
"पिछले 10 साल से वह बीजेपी के एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं और अब संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वह विपक्ष का निशाना न बनें. भागवत ने चुनाव के दौरान यह क्यों नहीं कहा कि वे विपक्ष को प्रतिद्वंद्वी मानें, मणिपुर पर ध्यान दें? वे चुनाव तक चुप क्यों रहे?"
अब सवाल यह है कि अगर संघ और बीजेपी के बीच सब कुछ ठीक नहीं है और अगर बीजेपी पूरी तरह से संघ के साथ नहीं है तो आगे के राजनीतिक परिणाम क्या होंगे?
भाजपा को संघ की जरूरत पड़ सकती है, खासकर गठबंधन सरकार चलाते समय. अगले चार महीनों में महाराष्ट्र समेत तीन राज्यों में चुनाव होने के कारण चुनौतीपूर्ण स्थिति में टीम की जरूरत होगी.
ऐसे समय में सबकी नज़र इस पर होगी कि मोहन भागवत के भाषण से मोदी और बीजेपी क्या कदम उठाते हैं.
बीजेपी नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की तैयारी में है. उस विकल्प से भी संघ और बीजेपी के मौजूदा रिश्तों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
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