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कश्मीर: हाउसबोट पर छाए संकट के बादल के बीच उम्मीद की ये किरण
माजिद जहांगीर
बीबीसी हिंदी के लिए, श्रीनगर से
कश्मीर की खूबसूरत वादियों में यहां की झीलों में तैरते हाउसबोट के बग़ैर 'धरती का स्वर्ग' कहे जाने वाली इस अनुपम जगह की कहानी अधूरी है.
हालांकि यहां का हाउसबोट उद्योग बीते चार दशक से संकट का सामना कर रहा है.
कारोबार से जुड़े लोग बताते हैं कि हाल के वर्षों में हाउसबोट की मरम्मत नहीं होने की वजह अब यहां इनकी संख्या घट कर क़रीब एक चौथाई रह गई है.
हाल ही में कोर्ट ने भी कुछ पुराने हाउसबोट की मरम्मत कराने का आदेश दिए थे. लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में हाउसबोट ऐसे ही आदेश का इंतज़ार कर रहे हैं.
इस जोखिम के बावजूद कश्मीर के हाउसबोट में न केवल यहां आने वाले पर्यटकों की दिलचस्पी बरकरार है बल्कि बॉलीवुड का भी इससे दशकों पुराना नाता रहा है जो आज भी बदस्तूर कायम है.
श्रीनगर की ज़बरवान पहाड़ियों के दामन में सैंकड़ों की संख्या में हाउसबोट पानी पर तैरते नज़र आते हैं.
आंखों से होते हुए दिल में उतर जाने वाले इन नज़ारों से प्यार करने वालों में जहां पर्यटक बड़ी तादाद में मौजूद हैं, वहीं बॉलीवुड और दूसरे क्षेत्रों कई हस्तियां भी हाउसबोट के पास खिंची चली आती हैं.
बॉलीवुड से है हाउसबोट का पुराना नाता
श्रीनगर की निगीन झील में 'न्यू गोल्डन फ़्लावर' हाउसबोट के मालिक 45 वर्षीय मोहम्मद याक़ूब दूनू के हाउसबोट में कभी बीते ज़माने के चर्चित अभिनेता राजेंद्र कुमार ठहरे थे.
उन्हें इसकी जानकारी उनके पिता से मिली. वे कहते हैं, "बॉलीवुड अभिनेता राजेंद्र कुमार हमारे हाउसबोट में रुके थे. तब उन्होंने मेरे पिता से उन्हें किसी सूफ़ी बुज़ुर्ग के पास ले चलने को कहा था. मेरे पिता उन्हें एक सूफ़ी बुज़ुर्ग के पास ले भी गए थे."
वे कहते हैं कि राजेंद्र कुमार उनके पिता के अच्छे दोस्त बन गए थे और अपने दिल की बात उनको बताते थे.
याक़ूब दूनू हाउसबोट के अपने खानदानी काम को आगे बढ़ाने वाली पांचवी पीढ़ी हैं. उनके मुताबिक़ कई जानी-मानी हस्तियां उनके हाउसबोट में ठहर चुकी हैं.
याक़ूब के मुताबिक़ बॉलीवुड अभिनेत्री नूतन भी जब एक फ़िल्म की शूटिंग के लिए कश्मीर आईं थीं तो उनके ही हाउसबोट में ठहरी थीं. तब नूतन की मां भी उनके साथ थीं.
वो कहते हैं, "तब श्रीनगर के रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज (आईआरसी) के छात्र नूतन का ऑटोग्राफ़ लेने हमारे हाउसबोट में आया करते थे."
ऐसे ही एक वाकये का ज़िक्र करते हुए याक़ूब कहते हैं, "जब ऑटोग्राफ़ लेने और उन्हें देखने वालों की भीड़ बहुत अधिक उमड़ पड़ती तो नूतन मेरी मां के कमरे में जाकर छुप जाती थीं और कभी-कभी मेरी मां के साथ ही सो जाती थीं."
भारतीय राजनीति के कई बड़े नाम भी याक़ूब की हाउसबोट में ठहर चुके हैं.
वे बताते हैं, "1975 में राजनीति जगत के बड़े नाम माधवराव सिंधिया अपनी पत्नी और बेटे के साथ हमारे हाउसबोट में ठहरे थे. तब वो सामने बने चबूतरे पर बैठ कर अपने बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे बिठाकर, 'क्या खूब लगती हो बड़ी सुंदर दिखती हो' गाना गाया करते थे."
याक़ूब कहते हैं कि उनके पिता बताया करते थे कि जब माधवराव सिंधिया श्रीनगर से पहलगाम फिशिंग के लिए जाया करते थे तब ज्योतिरादित्य को अपने कंधे पर बिठाते थे. उस वक्त ज्योतिरादित्य सिंधिया केवल तीन साल के थे.
उनके मुताबिक़, "शम्मी कपूर, लता मंगेशकर, मुकरी साहब, नेपाल के राजा बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह देव और भी कई अहम लोग भी इस हाउसबोट में ठहर चुके हैं."
वे कहते हैं, "पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के नामचीन सितारे ज़ुबिन मेहता साल 1971 में हमारे हाउसबोट में ठहरे थे. जब 2013 में कश्मीर में उनके एहसास-ए-कश्मीर कार्यक्रम का आयोजन हुआ तो मेरे पिता उसमें गए और ज़ुबिन मेहता से मिले. तब ज़ुबिन ने उन्हें पहचान लिया था."
"ज़ुबिन मेहता के गले लगाने वाली तस्वीर आज भी हमारे हाउसबोट में टंगी हुई है."
याक़ूब ने ये सभी कहानियां अपने पिता से सुनी हैं.
हाउसबोट का नाम भी बदल डाला
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से कश्मीर पहुंचने वाले सैलानी यहां के सुंदर और आकर्षक हाउसबोट में अपनी रातें गुज़ारने की ख्वाहिशें रखते हैं.
80 के दशक तक यहां विदेशी पर्यटकों की काफ़ी भीड़ होती थी. बीते दिनों जब हम डल झील और निगीन झील पर पहुंचे तो सभी हाउसबोट पर्यटकों से अटे पड़े थे.
35 वर्षीय आसिफ़ वंगु ने दावा किया कि कश्मीर में जब 'द ज्वेल इन क्राउन' नाम की एक सिरीज़ की शूटिंग हुई तब उसका क्रू उनके ही हाउसबोट में ठहरा था.
वंगु कहते हैं, "तब मेरे पिता ने अपने हाउसबोट का नाम 'वंगु हाउसबोट' से बदल कर 'द ज्वेल इन क्राउन' कर दिया था."
उन्होंने हमें उस सिरीज़ की स्क्रिप्ट भी दिखाई जो उनके पास मौजूद है. न केवल स्क्रिप्ट बल्कि सिरीज़ के कुछ अदाकारों की तस्वीरें भी उन्होंने हमें दिखाई जो शूटिंग के दरमियान ली गई थी.
आसिफ़ ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदर कुमार गुजराल का उनके पिता को भेजा गया एक ग्रीटिंग कार्ड भी दिखाया. उन्होंने बताया कि ये तब की बात है जब गुजराल विदेश मंत्री थे.
'मिशन कश्मीर' फ़िल्म की शूटिंग
मोहम्मद असलम डंगोला के हाउसबोट का नाम 'चपरो चार्ली' है लेकिन अब इसे 'मिशन कश्मीर' के नाम से जाना जाता है.
इसके पीछे कहानी ये है कि इस हाउसबोट पर साल 2002 में बनी फ़िल्म 'मिशन कश्मीर' के कुछ दृश्य फ़िल्माए गए थे.
इसके अलावा यहां पर उस फ़िल्म का मशहूर गाना 'बुम्बरो, बुम्बरो श्याम रंग बुम्बरो...' भी फ़िल्माया गया था.
डल झील में शिकारों में सैर करने वाले पर्यटक इस हाउसबोट को देखने ज़रूर आते हैं.
मोहम्मद असलम ने अपने हाउसबोट की वेबसाइट को भी 'मिशन कश्मीर' के नाम से ही बनाया है और वहां उन्होंने फ़िल्म का वीडियो भी अपलोड किया है.
मोहम्मद असलम उस समय को याद करते हुए बताते हैं, "साल 2002 में कश्मीर में चरमपंथ अपने चरम पर था. फ़िल्म के डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा ने मेरे हाउसबोट को शूटिंग के लिए चुना. मेरे हाउसबोट के बिल्कुल सामने पहाड़ी पर शंकराचार्य मंदिर दिखता है. उन्हें मेरी लोकेशन पसंद आई."
"उन्हें फ़िल्म के सीन की शूटिंग में बहुत मेहनत करनी पड़ी थी. किचन में हत्या का सीन, पूजा का सीन और हाउसबोट के बाहर 'बुम्बरो बुम्बरो' गाना फ़िल्माया गया था. उसमें मेरी बेटी ने भी काम किया है. फ़िल्म की शूटिंग 15 दिन तक कश्मीर में चली थी."
जब दिलीप कुमार और नेपाल के राजा हाउसबोट में ठहरे
कानपुर से यहां पहुंची एक पर्यटक अरीबा निगीन झील के एक हाउसबोट में पहुंचकर बहुत उत्साहित थीं.
वे कहती हैं, "बेटी गाड़ी में रो रही थी, लेकिन जब हम हाउसबोट के भीतर आ गए तो उन्हें इतना अच्छा लगा कि वह रोना ही भूल गई."
अरीबा कहती हैं, "बॉलीवुड की कई फ़िल्में कश्मीर के इन हाउसबोट्स में फ़िल्माई गई हैं. 'जब-जब फूल खिले', 'आरज़ू' और 'मिशन कश्मीर' जैसी फ़िल्मों को कोई कैसे भूल सकता है? उन फ़िल्मों में दिखाए गए नज़ारे लाजवाब हैं."
निगीन झील का 'न्यूयॉर्क' नामक हाउसबोट दिलीप कुमार का पसंदीदा रहा है.
हाउसबोट के मालिक शमीम अहमद कहते हैं कि उनके दादा जी के मुताबिक़, एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बनने से पहले उनके हाउसबोट में रुके थे. उनका ये भी कहना था कि इंदिरा गांधी सियासत में आने से पहले अपनी फूफी विजयालक्ष्मी पंडित के साथ उनके हाउसबोट में ठहरी थीं.
शमीम अहमद बताते हैं कि दिलीप कुमार साठ के दशक में उनके हाउसबोट में ठहरे थे.
वे कहते हैं, "कई राजा-महाराजा हमारे इस हाउसबोट में रह चुके हैं. पटिलाया के महाराज यहां रह चुके हैं तो कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहू भी यहां रुक चुके हैं. मेरे दादा ने मुझसे ये भी कहा था कि रतन टाटा अपनी पढ़ाई के ज़माने में हमारे हाउसबोट में ठहरे थे. 1958 में जब हमारा हाउसबोट बना था तो हमारे शुरुआती मेहमानों में जाम नगर के कई बड़े उद्योगपति थे."
शमीम ने बतााया कि 2014 की बाढ़ में उनके सभी दस्तावेज़ तबाह हो गए थे.
हाउसबोट पर संकट
न केवल पर्यटन के नज़रिए से बल्कि बड़ी संख्या में लोगों के रोज़गार का साधन होने के कारण कश्मीर में हाउसबोट उद्योग बहुत अहम है.
कश्मीर का पर्यटन उद्योग इस केंद्रशासित प्रदेश की जीडीपी में एक बड़ा योगदान भी करता है. लेकिन बीते चार दशक से यह उद्योग कई मुश्किलों का सामना कर रहा है.
कश्मीर हाउसबोट एसोसिएशन के प्रवक्ता मोहम्मद याक़ूब दूनू के मुताबिक़ जिन मुश्किलों का हाउसबोट उद्योग को सामना करना पड़ रहा है उसमें हाउसबोट्स की मरम्मत के लिए कम कीमत पर लकड़ी देने की बात, हाउसबोट्स की मरम्मत, लकड़ी की दस्तियाबी (उपलब्धता) जैसे मुद्दे शामिल हैं.
वे कहते हैं, "1982 में कश्मीर में हमारे पास क़रीब 3500 हाउसबोट थे जो अब केवल 920 तक सिमट के रह गए हैं. हमारे हाउसबोट्स कभी जल जाते हैं, कभी पानी में डूब जाते हैं, बर्फ़बारी में भी इस हाउसबोट को संकट का सामना करना होता है."
"सरकार को इन सभी बातों को लेकर कोई पहल करनी चाहिए. अगर ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले कुछ वर्षों में यहां हाउसबोट उद्योग का नाम भी बाक़ी नहीं रहेगा. हाउसबोट की मरम्मत के लिए जो लकड़ी लाना पड़ती है, उसके लिए इजाज़त हासिल करना भी कोई आसान काम नहीं है. लकड़ी भी आसानी से नहीं मिलती."
हाउसबोट का इतिहास
मोहम्मद याक़ूब दूनू के मुताबिक़ कश्मीर का पहला हाउसबोट साल 1888 में बना था. हालांकि कुछ लोगों का ये भी कहना है कि कश्मीर में साल 1800 से ही हाउसबोट मौजूद थे.
याक़ूब दूनू कहते हैं कि पहले हाउसबोट को बनाने वाले शख़्स एक कश्मीरी पंडित नारायण दास थे.
बताया ये भी जाता है कि नारायण दास की दुकान जल गई थी और उन्होंने अपनी इन्वेंट्री को एक छोटी किश्ती में शिफ़्ट किया था जिसमें हांजी समुदाय के लोग रहते थे.
कश्मीर का हांजी समुदाय हाउसबोट के काम से जुड़ा है.
हाउसबोट देवदार और अखरोट की लकड़ी से तैयार होता है. इसकी लकड़ियों पर हाथों से कारीगरी का काम किया जाता है.
नज़ीर अहमद के खानदान की चार पीढ़ियां हाउसबोट बनाने का काम करती आई है. उनके मुताबिक़ एक हाउसबोट करोड़ों की लागत से तैयार होता है और इसे हर साल मरम्मत की ज़रूरत पड़ती है.
मोहम्मद याक़ूब कहते हैं कि सरकार की कोशिश ऐसी होनी चाहिए जिससे कश्मीर के हाउसबोट में फिर से फ़िल्मों की शूटिंग का दौर शुरू हो.
2010 में जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट ने नए हाउसबोट बनाने पर प्रतिबंध लगाया था.
तब की जम्मू-कश्मीर सरकार ने हाई कोर्ट को बताया था कि श्रीनगर की वाटर बॉडीज़ में प्रदूषण का मुख्य कारण हाउसबोट हैं. उसके बाद हाई कोर्ट ने हाउसबोट की मरम्मत और नए हाउसबोट बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया था.
1988 में फ़ारुख़ अब्दुल्लाह की सरकार ने सबसे पहले नए हाउसबोट बनाने पर प्रतिबंध लगाया था. उसके बाद श्रीनगर में हाउसबोट बनाने वाले कारीगरों की कमी होने लगी थी.
हालांकि 2021 में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने हाउसबोट की एक नई पालिसी की घोषणा कर इनके मरम्मत की इजाज़त दे दी थी जिससे इस उद्योग से जुड़े लोगों में उम्मीद की नई किरण जगी थी.
हाउसबोट मरम्मत की इजाज़त तो मिली मगर..
अब जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने फिलहाल 19 हाउसबोट की मरम्मत की इजाज़त दी है.
कश्मीर हाउसबोट ओनर्स एसोसिएशन के प्रवक्ता मोहम्मद यक़ूब दूनू के मुताबिक़ जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट से उन्हें इस बाबत आदेश मिला है.
वे कहते हैं, "आदेश के मुताबिक़ हमें फिलहाल 19 हाउसबोट के मरम्मत की इजाज़त मिली है. राज्यपाल मनोज सिन्हा ने साल 2021 में नई हाउसबोट पॉलिसी को मंज़ूरी दी थी उसके बाद ये पहला मामला है जब हमें हाउसबोट के मरम्मद की इजाज़त मिली है."
वे कहते हैं, “सरकार की ओर से ये एक अच्छी शुरुआत है. इससे हाउसबोट उद्योग में एक विश्वास पैदा होगा. उम्मीद करते हैं कि आगे बाकी हाउसबोट के मरम्मत की इजाज़त मिल जाए.“
बता दें कि जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट में पर्यटन विभाग की तरफ़ से हाउसबोट मरम्मत और पुनर्निर्माण के लिए सिफारिश की गई थी जिसे अब एक साल बाद अदालत की मंज़ूरी मिली है. सरकार ने इसके लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी.
दूनू ये भी कहते हैं कि सरकार ने एक और आदेश जारी किया है जिसमें हाउसबोट मालिकों को इस मरम्मत के लिए सस्ती कीमतों पर लकड़ी उपलब्ध करवाई जाएगी.
उनका कहना था कि क़रीब 40 सालों बाद हाउसबोट के लिए सस्ती कीमतों पर लड़की मुहैया करवाई जा रही है.
श्रीनगर में हाल ही के दिनों में जी20 की बैठक का आयोजन किया गया. तब जम्मू-कश्मीर के चीफ़ सेक्रेटरी डॉ. अरुण कुमार मेहता ने कहा था कि इस बड़े आयोजन से कश्मीर के पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिलेगा.
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