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भारत ने किया ये एलान तो पाकिस्तान क्यों हुआ परेशान
दीपक मंडल
बीबीसी संवाददाता
भारत में एससीओ (शंघाई सहयोग संगठन) के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों के बाद अब राष्ट्र प्रमुखों की बैठक की बारी है.
बैठक 4 जुलाई को दिल्ली में होगी. लेकिन अब भारत ने एलान किया है कि यह बैठक आमने-सामने (इन पर्सन) नहीं वर्चुअल होगी.
भारतीय विदेश विभाग के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने अपनी साप्ताहिक प्रेसवार्ता में कहा कि इसे ऑनलाइन करने का फ़ैसला काफी सोच विचार के बाद लिया गया है.
बागची ने कहा कि सरकार का निर्णय किसी एक फ़ैक्टर पर आधारित नहीं है.
उन्होंने कहा, "हमने अब सभी एससीओ पार्टनरों को बता दिया है कि चार जुलाई की बैठक वर्चुअल होगी. हमें उम्मीद है कि सभी पार्टनर इसमें शामिल होंगे."
प्रवक्ता ने साफ़ किया है कि भारत ने ये कभी नहीं कहा था कि चार जुलाई की बैठक इन-पर्सन होने वाली है.
बागची ने कहा, "कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हाल के वर्षों में ऑनलाइन ही हुए हैं. इसलिए हम इस बैठक को भी वर्चुअल ही करेंगे. इसे सफल बनाने की तैयारियां चल रही हैं."
भारत इस बैठक का आयोजन एससीओ के अध्यक्ष के तौर पर कर रहा है.
लेकिन भारतीय समाचार पत्र ‘ द हिंदू’ ने सूत्रों के हवाले से बताया है चीन,पाकिस्तान और रूस के नेता इसके लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं. लिहाजा जिनपिंग, शहबाज शरीफ और पुतिन के दिल्ली यात्रा के कार्यक्रमों की पुष्टि नहीं की गई है.
अख़बार के मुताबिक़ रूस, यूक्रेन में चल रहे युद्ध की वजह से पुतिन का आना वैसे भी संदिग्ध था.
दूसरी ओर, खुद नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम भी काफी व्यस्त है. वो 19 से 24 जून तक अमेरिका के दौरे पर रहेंगे.
शायद यही वजह है कि भारत ने एससीओ देशों के राष्ट्र प्रमुखों की बैठक वर्चुअल कराने का फैसला किया है.
पाकिस्तान में कैसी प्रतिक्रिया?
भारत की ओर से अचानक इस एलान पर सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया पाकिस्तान में देखने को मिल रही है.
पाकिस्तानी अख़बार ‘एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ ने पाकिस्तान विदेश मंत्रालय के हवाले से ख़बर दी है चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने इस बैठक के लिए भारत आने से इनकार कर दिया था इसलिए भारत को वर्चुअल मीटिंग का एलान करना पड़ा.
पाकिस्तान में इस बात की चर्चा है कि गोवा में एससीओ के विदेश मंत्रियों की बैठक में विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी की ओर से कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म करने का मामला उठाने से भारत की ‘किरकिरी’ हुई थी.
भारत दिल्ली में शहबाज़ शरीफ को बुला कर दोबारा ये जोखिम नहीं लेना चाहता.
अगर शहबाज़ शरीफ ने कश्मीर का मुद्दा उठा दिया तो ये एससीओ की इस बैठक के एजेंडे और बातचीत पर हावी हो सकता है.
पुतिन और जिनपिंग के न आने पर कैसी चर्चा?
इससे पहले श्रीनगर में जी-20 के टूरिज्म वर्किंग ग्रुप की बैठक को लेकर पाकिस्तान को कश्मीर का मुद्दा उछालने का मौका मिल गया था.
चीन, तुर्की, सऊदी अरब और ओमान जैसे देशों के इसमें हिस्सा न लेने से पाकिस्तान इस मामले को लेकर और मुखर हो गया था.
उसका कहना था कि कश्मीर एक विवादास्पद क्षेत्र है.
लेकिन भारत दिखाना चाहता था कि अनुच्छेद 370 हटाने के बाद कश्मीर में सब कुछ सामान्य है.
पाकिस्तान का कहना था कि जिन देशों के शिष्टमंडल भारत नहीं आए उन्हें कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला रास नहीं आया था.
पाकिस्तानी मीडिया में कहा जा रहा है कि चीन के साथ भारत के सीमा विवाद और यूक्रेन के मामले में खुल कर रूस का साथ न देने की वजह से भी शी जिनपिंग और पुतिन दिल्ली नहीं आ रहे हैं.
पूर्व राजनयिक अब्दुल बासित ने क्या कहा?
भारत में पाकिस्तान के पूर्व हाई कमिश्नर अब्दुल बासित ने एक वीडियो जारी कर एससीओ की वर्चुअल मीटिंग करने के फैसले पर टिप्पणी की है.
इस वीडियो में वो कहते दिख रहे हैं,’’ भारत को जी-20 ग्रुप के टूरिज्म वर्किंग ग्रुप की बैठक में नाकामी हाथ लगी थी. उस ग्रुप में कई सदस्य देशों ने हिस्सा नहीं लिया था. अब भारत को एससीओ बैठक के मामले में नाकामी हाथ लगी है.’’
उन्होंने कहा, "जहां तक हमें मालूम है, चीन और रूस के राष्ट्रपति ने इस बैठक के लिए भारत आने से इनकार कर दिया है. चीन के इनकार की वजह तो साफ समझ आ रही है.’’
लेकिन एससीओ से जुड़ी गतिविधियों पर पैनी नज़र रखने वाले विशेषज्ञ बासित की इस राय से इत्तफ़ाक नहीं रखते.
नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चीनी अध्ययन केंद्र में एसोसिएट प्रोफेसर अरविंद येलेरी, "ये ठीक है कि वर्चुअल मीटिंग की तुलना में फिजिकल मीटिंग में ज्यादा सहूलियत होती है. मुद्दों पर सहमति बनाना ज्यादा आसान होता है. लेकिन मुझे ये भी नहीं लगता कि जिनपिंग या पुतिन नाराजगी वजह से इस बैठक में हिस्सा लेने भारत नहीं आ रहे हैं. ये तोड़-मरोड़ कर कही जा रही कहानी है.’’
लेकिन बासित कहते हैं कि चीन और भारत के संबंध सीमा विवाद और क्वाड के कारण नाराज़ है.
बासित की इस दलील में कितना दम?
अब्दुल बासित ने इस वीडियो में पुतिन के भी दिल्ली न आने की वजह बताई है.
बासित का कहना है कि भारत पर अमेरिका का काफी दबाव है.
बासित इस वीडियो में कहते दिख रहे हैं, ’’ भारत इस साल जी-20 का अध्यक्ष है. सितंबर में भारत में इसका शिखर सम्मेलन होगा. अमेरिका चाहता है कि भारत पुतिन को न बुलाए और यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की को न्योता दे या फिर उन्हें वर्चुअल मीटिंग में शामिल होने को कहे. इससे भारत के सामने बड़ी मुश्किल हालात पैदा हो गए हैं.’’
"रूस की पूरी दुनिया में अभी भी काफी अहमियत है पश्चिमी देश चाहते हैं कि किसी तरह रूस को जी-20 से निकाला जाए. भारत इस दबाव को लेकर मुश्किल में फंसा हुआ है.’’
बासित का कहना है पाकिस्तान ने पहले सोचा था कि शहबाज़ शरीफ के बदले राष्ट्रपति आरिफ अल्वी को एससीओ के राष्ट्र प्रमुखों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए भेजा जाए.
लेकिन वहां 9 मई की हिंसा की घटनाओं के बाद ऐसा लगता है कि पाकिस्तान के किसी बड़े नेता का दिल्ली आना संभव नहीं है.
बासित कहते हैं कि ऐसे में भारत के लिए मुश्किल स्थिति पैदा हो गई है.
उनका कहना है कि जब एससीओ के आठ सदस्य देशों में से तीन के राष्ट्र प्रमुख हिस्सा नहीं आ रहे हों तो शिखर सम्मेलन का क्या मतलब रह जाता है?
जेएनयू के प्रोफेसर अरविंद येलेरी, "इस तरह की बैठकें आपसी मतभेदों को दूर करने के लिए होती है. इसलिए ये कहना ठीक नहीं है कि मतभेदों की वजह से दोनों भारत नहीं आ रहे हैं. मेरा तो मानना है कि नाराजगी हो तो आना चाहिए. इससे आमने-सामने बात कर इन्हें खत्म किया जा सकता है’’
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
शिव नादर यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल और गवर्नेंस स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर जबिन टी जैकब का भी मानना है कि इस तरह की बैठकों में पहले ही मुद्दे तय हो जाते हैं.
वो कहते हैं, "ऐसी बैठकों से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों, रक्षा और विदेश मंत्रियों की बैठक हो चुकी होती. उस पर मुद्दे तय हो जाते हैं और उन पर असहमतियों को काफी हद तक दूर कर लिए जाते हैं. इसलिए ये कहना गलत है कि कुछ मुद्दों से नाराज होकर पुतिन और जिनपिंग नहीं आ रहे हैं वो गलत है और भारत को इस वजह से वर्चुअल मीटिंग का एलान करना पड़ा है.’’
जैकब का कहना है, ‘’ऑनलाइन बैठक में भी काम की बातें हो सकती हैं. चूंकि जी-20 की सितंबर में होने वाली बैठक में पुतिन और जिनपिंग को भारत आना ही है. इसलिए इस मुद्दे को ज्यादा तवज्जो देना सही नहीं है.’’
भारत के वर्चुअल मीटिंग के एलान पर पाकिस्तानी में चर्चा को लेकर येलेरी कहते हैं,’’ये कोई नई बात नहीं है. भारत में जब भी बड़े शिखर सम्मेलन होते हैं. पाकिस्तानी मीडिया भारत की आलोचना शुरू कर देता है.''
''इस साल भारत में कई बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुए हैं. पाकिस्तान और चीन दोनों अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सक्रियता से थोड़े चिंतित भी दिख रहे हैं. यही वजह है कि इस तरह की बातें हो रही हैं.’’
क्या है शंघाई सहयोग संगठन
अप्रैल 1996 में शंघाई में हुई एक बैठक में चीन, रूस, कज़ाकस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान आपस में एक-दूसरे के नस्लीय और धार्मिक तनावों से निपटने के लिए सहयोग करने पर राज़ी हुए थे. तब इसे शंघाई-फ़ाइव के नाम से जाना जाता था.
वास्तविक रूप से एससीओ का जन्म 15 जून 2001 को हुआ. तब चीन, रूस और चार मध्य एशियाई देशों कज़ाकस्तान, किर्ग़िस्तान, ताजिकिस्तान और उज़बेकिस्तान के नेताओं ने शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना की और नस्लीय और धार्मिक चरमपंथ से निपटने और व्यापार और निवेश को बढ़ाने के लिए समझौता किया.
इस संगठन का उद्देश्य नस्लीय और धार्मिक चरमपंथ से निबटने और व्यापार-निवेश बढ़ाना था. एक तरह से एससीओ (SCO) अमेरिकी प्रभुत्व वाले नेटो का रूस और चीन की ओर से जवाब था.
शंघाई सहयोग संगठन और भारत
भारत साल 2017 में एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बना. पहले (2005 से) उसे पर्यवेक्षक देश का दर्जा प्राप्त था. 2017 में एससीओ की 17वीं शिखर बैठक में इस संगठन के विस्तार की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण चरण के तहत भारत और पाकिस्तान को सदस्य देश का दर्जा दिया गया.
इसके साथ ही इसके सदस्यों की संख्या आठ हो गयी.
वर्तमान में एससीओ के आठ सदस्य चीन, कज़ाकस्तान, किर्गिस्तान, रूस, तज़ाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, भारत और पाकिस्तान हैं.
इसके अलावा तीन ऑब्जर्वर देश बेलारूस, ईरान और मंगोलिया हैं. तुर्कमेनिस्तान स्थायी आमंत्रित देश है.
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