यूपी चुनाव के लेसन्स
उत्तर प्रदेश चुनाव की सरगर्मियाँ ज़ोर पकड़ रही हैं. इसके अभी तक के प्रचार और गतिविधियों से मुझे जो लेसन्स मिले हैं या सीख मिली हैं वो मैंने सोचा सबके साथ बाँटा जाए.
पिछले दिनों छुट्टी के सिलसिले में लखनऊ गया. वहाँ के प्रसिद्ध आईटी कॉलेज के पास एक होर्डिंग लगी थी जिस पर एक कायस्थ सम्मेलन का ज़िक्र था. उसके एक ओर चेहरा भाजपा के एक प्रतिनिधि का था तो दूसरी ओर स्वामी विवेकानंद की तस्वीर लगी थी.
मुझे समझ नहीं आया कि स्वामी विवेकानंद की तस्वीर कायस्थ सम्मेलन की होर्डिंग पर क्यों? ज़ोर डाला और कुछ पूछताछ की तो पता चला कि स्वामी विवेकानंद कायस्थ परिवार से थे. जिन महापुरुषों को कभी जाति के चश्मे से न देखा हो उन्हें इस तरह जातीय होर्डिंग पर देखना काफ़ी अटपटा है.
मगर पहली सीख मिल गई थी कि प्रदेश के चुनाव में जातीय समीकरण फ़िलहाल प्रभावी रहेंगे जहाँ हर जाति के संगठनों को अपनी जाति के महापुरुषों को अपना ब्रांड एंबेसडर बना लेने की छूट है, भले ही उन्होंने काम जातीय भेद के ख़िलाफ़ ही क्यों न किया हो.
इसी जातीय वोट के लोभ में भारतीय जनता पार्टी की जो किरकिरी हुई उसने दिखाया कि चुनाव के आस-पास सभी पार्टियाँ ख़ुद को पारस पत्थर मानने लगती हैं.
जिन बाबू सिंह कुशवाहा के ख़िलाफ़ भाजपा के किरीट सोमैया ने शिकायतों का पुलिंदा सामने रखा था वही जब बसपा से निकलकर भाजपा की ओर आए तो कुशवाहा मतों के लालच में पार्टी ने उन्हें खुली बाँहों के साथ स्वीकार किया.
इतना ही नहीं राजपाल त्यागी, गुड्डू पंडित और शेर बहादुर सिंह जैसे बसपा से निष्कासित नेता अब समाजवादी पार्टी का रुख़ भी कर चुके हैं. यानी हर पार्टी चुनावी माहौल में पारस पत्थर हो जाती है, जिसे भी छू दे उसके सब पाप माफ़ और वो खरा सोना बन जाता है.
वैसे बसपा के इर्द-गिर्द कैसे ये चुनाव घूम रहा है उसका सबूत हाथियों को ढकने के मामले में भी आया था. उसी पर मैंने कहीं एक कार्टून देखा जिसमें एक ग़रीब कड़कड़ाती ठंड में ढके हुए हाथी के बगल में बैठा सोच रहा है कि काश वो भी किसी पार्टी का चुनाव निशान होता तो उसे भी ढक दिया जाता.
बेहद सटीक व्यंग्य था. वैसे जिस तरह से उन हाथियों को लपेटा गया है वो हाथियों के बॉडी सूट जैसा है. यानी हाथी ढके भी गए हैं मगर देखकर पता भी चलता है कि कवर के नीचे हाथी ही है.
अब ऐसे में हाथी तो जनता की नज़र से पूरी तरह ओझल हुए नहीं मगर उन्हें ढकने की कवायद पूरी ज़रूर हो गई.
इस दौरान मेरी रुचि ये भी जानने में है कि इन हाथियों को ढकने में कुल कितना ख़र्च आया और वो ख़र्च वहन किसने किया. इसके बाद उन हाथियों पर लगा कवर हटाने का आदेश कौन और कब देगा. साथ ही अगर किसी दूसरे दल की सरकार आ गई तो क्या ये हाथी इन पर्दों में ही रह जाएँगे.



