इस विषय के अंतर्गत रखें जनवरी 2012

यूपी चुनाव के लेसन्स

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|शुक्रवार, 27 जनवरी 2012, 18:29

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उत्तर प्रदेश चुनाव की सरगर्मियाँ ज़ोर पकड़ रही हैं. इसके अभी तक के प्रचार और गतिविधियों से मुझे जो लेसन्स मिले हैं या सीख मिली हैं वो मैंने सोचा सबके साथ बाँटा जाए.

पिछले दिनों छुट्टी के सिलसिले में लखनऊ गया. वहाँ के प्रसिद्ध आईटी कॉलेज के पास एक होर्डिंग लगी थी जिस पर एक कायस्थ सम्मेलन का ज़िक्र था. उसके एक ओर चेहरा भाजपा के एक प्रतिनिधि का था तो दूसरी ओर स्वामी विवेकानंद की तस्वीर लगी थी.

मुझे समझ नहीं आया कि स्वामी विवेकानंद की तस्वीर कायस्थ सम्मेलन की होर्डिंग पर क्यों? ज़ोर डाला और कुछ पूछताछ की तो पता चला कि स्वामी विवेकानंद कायस्थ परिवार से थे. जिन महापुरुषों को कभी जाति के चश्मे से न देखा हो उन्हें इस तरह जातीय होर्डिंग पर देखना काफ़ी अटपटा है.

मगर पहली सीख मिल गई थी कि प्रदेश के चुनाव में जातीय समीकरण फ़िलहाल प्रभावी रहेंगे जहाँ हर जाति के संगठनों को अपनी जाति के महापुरुषों को अपना ब्रांड एंबेसडर बना लेने की छूट है, भले ही उन्होंने काम जातीय भेद के ख़िलाफ़ ही क्यों न किया हो.

इसी जातीय वोट के लोभ में भारतीय जनता पार्टी की जो किरकिरी हुई उसने दिखाया कि चुनाव के आस-पास सभी पार्टियाँ ख़ुद को पारस पत्थर मानने लगती हैं.

जिन बाबू सिंह कुशवाहा के ख़िलाफ़ भाजपा के किरीट सोमैया ने शिकायतों का पुलिंदा सामने रखा था वही जब बसपा से निकलकर भाजपा की ओर आए तो कुशवाहा मतों के लालच में पार्टी ने उन्हें खुली बाँहों के साथ स्वीकार किया.

इतना ही नहीं राजपाल त्यागी, गुड्डू पंडित और शेर बहादुर सिंह जैसे बसपा से निष्कासित नेता अब समाजवादी पार्टी का रुख़ भी कर चुके हैं. यानी हर पार्टी चुनावी माहौल में पारस पत्थर हो जाती है, जिसे भी छू दे उसके सब पाप माफ़ और वो खरा सोना बन जाता है.

वैसे बसपा के इर्द-गिर्द कैसे ये चुनाव घूम रहा है उसका सबूत हाथियों को ढकने के मामले में भी आया था. उसी पर मैंने कहीं एक कार्टून देखा जिसमें एक ग़रीब कड़कड़ाती ठंड में ढके हुए हाथी के बगल में बैठा सोच रहा है कि काश वो भी किसी पार्टी का चुनाव निशान होता तो उसे भी ढक दिया जाता.

बेहद सटीक व्यंग्य था. वैसे जिस तरह से उन हाथियों को लपेटा गया है वो हाथियों के बॉडी सूट जैसा है. यानी हाथी ढके भी गए हैं मगर देखकर पता भी चलता है कि कवर के नीचे हाथी ही है.

अब ऐसे में हाथी तो जनता की नज़र से पूरी तरह ओझल हुए नहीं मगर उन्हें ढकने की कवायद पूरी ज़रूर हो गई.

इस दौरान मेरी रुचि ये भी जानने में है कि इन हाथियों को ढकने में कुल कितना ख़र्च आया और वो ख़र्च वहन किसने किया. इसके बाद उन हाथियों पर लगा कवर हटाने का आदेश कौन और कब देगा. साथ ही अगर किसी दूसरे दल की सरकार आ गई तो क्या ये हाथी इन पर्दों में ही रह जाएँगे.

मृत्यु शय्या पर 'अमर' दोस्त

पंकज प्रियदर्शीपंकज प्रियदर्शी|शुक्रवार, 13 जनवरी 2012, 02:47

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रात के 11 बजे थे. ऑफ़िस से घर लौटा ही था कि फ़ोन की घंटी बजी. देखा बचपन के एक दोस्त का फ़ोन था. पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे हमेशा ही असमय आने वाले फ़ोन किसी अनिष्ट की आशंका से झकझोरते हैं. फ़ोन उठाया, मित्र की आवाज़ भारी-भारी थी.

सदमा, दुख और विषाद उसकी आवाज़ से साफ़-साफ़ प्रतीत हो रहा था. हाल न चाल, सीधे सपाट शब्दों में पूछा- अमर के लिए कुछ कर सकते हो. मेरे पास सवालों का अंबार था. लेकिन उसके पास कहने के लिए बहुत कम शब्द थे. कैसी विडम्बना है 'अमर' दोस्त मृत्यु शय्या पर है.

अमर का नाम आते ही दिलो-दिमाग़ फ़्लैश बैक में चला गया. बचपन के वो दिन. कोई दूरी नहीं, कोई अंतर नहीं, कोई भेद नहीं, पढ़ने-लिखने के कम, खेलने-कूदने और हँसने-हँसाने के दिन. पिताजी की पोस्टिंग एक छोटे से ब्लॉक में थी. एक प्राइवेट स्कूल से पढ़ाई की शुरुआत की और फिर सरकारी स्कूल में आ गए. उन दिनों दोस्त की परिभाषा सिर्फ़ दोस्त थी. भेद नहीं था. बाल मन पर उसका कोई असर भी नहीं था.

अमर हँसने-हँसाने और ख़ूब बतियाने वाला लड़का था. कभी उसने न अपनी पीड़ा बताई और न ही पूछ पाया. बहुत दिन बाद जाना कि उसकी पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं थी और छोटे-मोटे व्यवसाय से घर चलता था. लेकिन उन दिनों इन सब चीज़ों की फ़िक्र कहाँ होती थी. पापा का तबादला होने के बाद भी वहाँ से नाता नहीं टूटा. हाँ कई दोस्त रोज़गार पाने की होड़ में वहाँ से बांबे-दिल्ली और न जाने कहाँ-कहाँ चले गए.

जितना हो सका, वहाँ के दोस्तों से संपर्क रहा. पुराने दोस्तों का हाल-चाल भी मिलता रहता था. पता चला अमर पारिवारिक परिस्थितियों से परेशान उड़ीसा चला गया है और ट्रक चलाता है. महीनों और कभी-कभी तो दो-तीन साल में एक बार घर आना होता है.

वर्ष 2007 की बात थी, लंदन से घर आया था. अमर भी उन दिनों आया था. उसे पता चला तो मोटरसाइकिल पर मिलने आया. वर्षों बाद उससे मिला था. एकदम चंगा, हँसता-हँसाता वही अमर. लगता था जैसे कई वर्षों की भड़ास कुछ घंटों में निकाल लेगा. पुरानी बातें खुली, ख़ूब हँसी-ठिठोली हुई और फिर वो चला गया.

उसी अमर के बारे में एक बुरी ख़बर ने मुझे झकझोर दिया. दोस्त फ़ोन पर बोल रहा था- अमर का आख़िरी स्टेज़ है, कुछ कर सकते हो. सवाल कई थे, लेकिन दोस्त के एक जवाब ने चुप करा दिया.

बोला- अमर को एड्स है. किसी को उसने बताया नहीं. पिछले दो साल से परेशान था. उड़ीसा से लौटा भी तो चुपचाप पटना चला गया. वहाँ महीनों भर्ती रहा. लेकिन मामला गंभीर था, इसलिए डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है और उसकी बूढ़ी माँ को उसे घर ले जाने को कहा है.

मैं चुप था, कुछ बोल नहीं पा रहा था. क्या कर सकता था सिवा कुछ आर्थिक सहायता के. फिर भी ग़ैर सरकारी संगठनों से जुड़े मित्रों और कुछ पहचान के डॉक्टरों से बात की. सबका जवाब नकारात्मक था. पता चला कि उसका बोलना-चालना भी बंद है और वो कई दिनों से बेहोश है.

घर में बूढ़ी माँ और एक बेटी है. पत्नी और पिता गुज़र चुके हैं. बाक़ी रिश्तेदार एड्स का नाम सुनकर ही उस परिवार से नाता तोड़ चुके हैं. ट्रक ड्राइवरों में एड्स आम बात है. वर्षों तक घर से दूर रहने के कारण वे यौनकर्मियों के संपर्क में आ ही जाते हैं.

लेकिन 2012 के भारत में आज भी कई इलाक़ों में सुरक्षित सेक्स की बात करना वर्जनीय है और एक बार एड्स से पीड़ित हो जाना श्राप. अमर शायद इन दोनों पाटों में पिस गया और समय पर मुँह नहीं खोल पाया.

दो-तीन महीने बाद घर जाना है. नहीं जानता कि मैं उसे देख पाऊँगा या नहीं. ये भी नहीं जानता कि किसी अनिष्ट की स्थिति में उसकी बूढ़ी माँ का कैसे सामना करूँगा.

लेकिन इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि ये सिर्फ़ मेरे दोस्त अमर की कहानी नहीं. हम बहुत आधुनिक हो गए हैं, लेकिन अब भी कई मामलों में पुरातनपंथी ही हैं. एड्स और एड्स पीड़ितों को लेकर रुढ़िवादी सोच की गहरी पैठ है.

कौआ कान ले जाए तो क्या करें?

अविनाश दत्तअविनाश दत्त|सोमवार, 09 जनवरी 2012, 14:49

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अभी जयपुर से लौटा हूँ. गया था एक कहानी के सिलसिले में. हुआ यह कि ख़बर आई कि जयपुर के हवा महल के साथ ज़्यादती हो गई. हालाँकि यह ख़बर एक दिन पहले रेडियो पर सुनाई जा चुकी थी पर एक दो शताब्दी से भी पुरानी धरोहर से छेड़छाड़ इतनी महत्वपूर्ण ख़बर थी कि इसे बिना अपनी आँख से देखे माना नहीं जा सकता था.

हालाँकि प्रथम दृष्टि में ख़बर उतनी बड़ी नहीं लगी थी लेकिन दूसरे अख़बारों और चैनलों में जिस तरह से इस घटना को पेश किया जा रहा था, मन में शक उपजा कि कहीं ऐसा न हो कि हम ग़लती कर बैठे हों और अपने श्रोताओं पाठकों को हमने घटना की सही तस्वीर नहीं पेश की हो.

बीबीसी में काम करने के कुछ फ़ायदे हैं तो कुछ नुक़सान भी हैं. फ़ायदा यह है कि आपकी बातों को लोग गंभीरता से लेते हैं, सच मानते हैं नुक़सान यह है कि आप को बड़े बुज़ुर्गों की बनाई हुई इस साख को बनाये रखने के लिए बहुत ही ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है. तो क़िस्सा मुख़्तसर यह कि मैं पहुंचा जयपुर यह देखने कि हवा महल को सही में कोई बड़ा नुकसान तो नहीं हो गया.

वहां जा कर अपनी आँख से देखा तो पता लगा कि हवामहल अपनी जगह पर खड़ा हुआ है और उसकी सेहत को कोई नुक़सान नहीं पहुंचा है.

पहले लगा कि वही क़िस्सा हो गया बचपन वाला कि कौआ कान ले गया तो दौड़े कौए के पीछे कान नहीं टटोला. ख़ैर ज़रा घूमा-भटका तो पता लगा कि इस ख़बर को जिस तरह से पेश किया गया उसके पीछे कई चीज़ें थीं.

पहली तो थी सरकार के भीतर की खींचतान. हवा महल को पानी की तेज़ बौछारों से धोने का आदेश जिस किसी ने भी दिया हो लेकिन बाद में उसे कोई अपने सर लेने तैयार नहीं था. हाँ हर किसी की कोशिश यह थी कि यह ठीकरा उस सर पर जा कर फट जाए जो सर उसको पसंद ना हो.

लेकिन इसके अलावा भी कुछ था.

मीडया के मेरे अपने भाई बन्दों ने ख़बर को बहुत ही बढ़ा चढ़ा कर सनसनीखेज़ तरीके से पेश किया था. ख़ैर कारण जो भी हो हवा महल के चारों तरफ़ रहने वालों से प्रतिक्रया मांगी तो लोगों ने कहा कि उन्होंने हंस कर बात उड़ा दी.

यानी जो जानते थे वो हँसे पर मैं नहीं हंसा एक बार फिर डर गया.

डर गया क्योंकि याद आया कि दिसंबर 1992 में मैं भोपाल में रहता था, शहर में अयोध्या में विवादित ढांचे के गिरने के बाद दंगे कुछ काबू में ही आये थे कि एक अख़बार में ख़बर छप गई कि एक समुदाय के लोगों ने एक लड़कियों के कॉलेज के हॉस्टल में घुस कर दूसरे समुदाय कि कई लड़कियों के स्तन काट लिए और दंगे फिर बुरी तरह से भड़क गए.

मैं अपने एक परिचित के साथ शहर भर के अस्पतालों में घूमा कि चलो कुछ लड़कियां आई होंगीं इलाज कराने, लेकिन एक लड़की नहीं पहुँची क्योंकि ख़बर सरासर झूठ थी जो कि मेरी नज़रों में साबित हुआ.

इस ख़बर से जिनको जिस-जिस तरह के फ़ायदे नुकसान होने थे हो गए, लेकिन जिन महोदय ने यह जानकारी सामने रखी थी वो आज भी मेरी जानकारी में पत्रकार हैं.

अगर सरकार या अदालत को मीडिया पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी सौंप दीजिये तो वो ग़लत ख़बरों का छपना नहीं बंद करेगें बल्कि वो केवल उन ग़लत ख़बरों का छपना रोकेंगे जो कि उन्हें नहीं भातीं.

कहने वाले कह देंगे कि झूठी ख़बरों की वजह से मीडिया की साख ख़त्म हो जाएगी और वही इसका सबसे बढ़िया हल होगा. मिलावट वाले जन्म जन्मान्तरों से दूध में पानी और सब्जी में रंग मिला रहे हैं. उपभोक्ता इस बात को जानता है, लेकिन फिर भी लेता है क्योंकि कोई और चारा नहीं.

इसी तरह से ख़बर वाला मिलावट करे तो भी क्या चारा है.

तो भैया एक पत्रकार के रूप में तो यही सही है कि जितनी बार कोई कहे पकड़ो कौआ तुम्हारा कान ले गया, उतनी बार कान टटोलो फिर भी कौए के पीछे दौड़ो लेकिन एक पाठक के तौर पर क्या करूँ.

आपके पास है कोई हल? हो तो ज़रूर बताना.

विरोध एक मौलिक हथियार है

सुशील झासुशील झा|मंगलवार, 03 जनवरी 2012, 11:28

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साल बदले तो बदले ईमान न बदले. बीता साल ईमानदारी और विरोध का रहा है.

भारत की युवा पीढ़ी ने विरोध को देखा, सुना और समझा. अरब देशों की पीढ़ियां विरोध को उसकी राजनीतिक चरम सीमा तक ले गईं और बिना रक्तपात के तख्तापलट भी हुआ है. विरोध की अवधारणा कोई नई नहीं है लेकिन आवाज़ उठाने की हिम्मत में एक नयापन ज़रुर महसूस हुआ है.

वैश्वीकरण के इस दौर में विद्रोही और विरोध के मायने नकारात्मक बना दिए गए हैं लेकिन अगर दुनिया अपने इतिहास पर गौर करे तो विरोध जितनी सकारात्मक सोच कोई और नहीं है.

हर नया विचार पुराने विचार के विरोध पर ही खड़ा होता है. बदलाव विरोध से ही शुरु होता है चाहे वो बदलाव वैचारिक हो, सामाजिक हो या राजनीतिक.

भारत के महाकाव्यों को ही उठा कर देख लीजिए चाहे रामायण हो या महाभारत. हर विचार के पीछे विरोध महत्वपूर्ण है. क्या सीता ने विरोध नहीं किया था जब उन पर श्रीराम ने सवाल उठाए थे. सीता का विरोध इस स्तर पर था कि उन्होंने वापस राम के महल में जाने से उचित धरती में समा जाने को समझा.

अगर अर्जुन ने अपने धर्म के विरोध में शस्त्र त्यागने की कोशिश न की होती तो श्रीकृष्ण गीता का पाठ शायद ही पढ़ाते. बौद्ध धर्म की अवधारणा हिंदू धर्म की कुरीतियों के ख़िलाफ़ ही जन्मी होगी और यही बात जैन धर्म के बारे में भी कही जा सकती है.

चारवाक का उदाहरण सबके सामने है जिन्होंने अपने समय में प्रचलित धार्मिक अवधारणाओं का विरोध किया और भोगवादी जीवनशैली को अपनाने का विचार दिया.

कबीर का 'निर्गुण' विरोध का ही प्रतीक है कुरीतियों के ख़िलाफ़ जिस पर कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं.

यही कारण है कि विरोध को हमेशा महत्व दिया जाता रहा है. हां क्षणिक लाभ के लिए लोग भले ही विरोध न करने का मंत्र देते रहे हों लेकिन हम सभी जानते हैं कि सही मुद्दे पर विरोध कभी बेकार नहीं होते.

बिना विरोध के न तो कोई सुधार हुआ है और न होगा. हम जहां और जिन परिस्थितियों में रहते हैं उसको बेहतर करना सभी की ज़िम्मेदारी है और इसके लिए विरोध एक मौलिक हथियार.

इसलिए विरोध जारी रहे बस मुद्दे ईमानदार हों.

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