इस विषय के अंतर्गत रखें अक्तूबर 2011

पोशाक और राजनीति

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|बुधवार, 26 अक्तूबर 2011, 13:14

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पिछले दिनों जब नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई भारत की यात्रा पर आए तो सबका ध्यान उनके गंभीर व्यक्तित्व के साथ साथ उनके करीने से सिले हुए काले सूट और नीली टाई पर भी गया. आमतौर से नेपाली प्रधानमंत्री सूट और टाई में कम ही दिखाई देते हैं. नेपाल की राष्ट्रीय पोशाक डौरा सरुवाल है यानि चूड़ीदार पायजामा और उस पर कोट. लेकिन अब इस पोशाक को राजतंत्र का प्रतीक माना जाता है, इसलिए कम कम से कम कम्यूनिस्ट राजनीतिज्ञ इसे सार्वजनिक रूप से नहीं पहनते. अभी पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर की भारत यात्रा को बहुत दिन नहीं हुए जब उनकी फ़ैशनेबिल पोशाक और बर्किन बैग पर भारत में ख़ासी हायतोबा मची थी और उन्होंने इसका बहुत बुरा भी माना था. भारत में पोशाक का कितना महत्व हो सकता है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के पहले गणतंत्र दिवस से तीन दिन पहले भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से बाक़ायदा पत्र लिख कर पूछा था कि वह इस अवसर पर क्या पहनें. नेहरू का जवाब था सादगी को तरजीह दीजिए. सफ़ेद चूड़ीदार पायजामा और उस पर काली अचकन. पिछले साल जापान के प्रधानमंत्री यूकियो हातोयामा की लोकप्रियता सिर्फ़ इसलिए घट गई क्योंकि उन्होंने चैक की एक ऐसी कमीज़ पहन ली थी जिसकी एक आस्तीन पीले रंग की थी तो दूसरी लाल रंग की. प्रख्यात फ़ैशन डिज़ायनर डॉन कोनिशी ने जापान की एक राष्ट्रीय पत्रिका में यहाँ तक लिख दिया था, 'क्या कोई उन्हें यह सब पहनने से रोक सकता है ?' इटली के प्रधानमंत्री जियानी एगनेली को एसक्वायर पत्रिका ने दुनिया के इतिहास में पाँच सबसे अच्छे कपड़े पहनने वालों में से एक बताया था. उनकी एक ख़ास अदा थी कि वह आस्तीन के ऊपर कफ़ पर घड़ी बाँधा करते थे. मनमोहन सिंह की आसमानी पगड़ी उनका स्टाइल स्टेटमेंट है लेकिन यह बहुत कम लोगों को पता है कि वह ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि आसमानी रंग उनके विश्वविद्यालय केंब्रिज का रंग है. अपनी छवि बनाने के लिए कपड़ों का जितना ज़बरदस्त इस्तेमाल गाँधी ने किया है उतना शायद किसी ने नहीं ! अपने राजनीतिक जीवन के शुरू में ही उन्हें कपड़ों के महत्व का अंदाज़ा हो गया था. दक्षिण अफ़्रीका की एक अदालत में वह पगड़ी पहन कर गए थे और उन्हें जज ने पगड़ी उतारने के लिए कह दिया था. अपने करियर के शुरू में सूटेड बूटेड रहने वाले गाँधी ने बाद में घुटने तक की धोती और बदन ढ़कने के लिए खादी के कपड़े के अलावा कुछ नहीं पहना. चाहे वह राजा से मिल रहे हों या बड़े से बड़े व्यक्ति से, उन्होंने अपनी इस आदत से कभी समझौता नहीं किया. नतीजा यह रहा कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने उन्हें नंगा फ़कीर तक कह डाला. जब वह इंग्लैंड गए तो इनके शुभचिंतकों ने दो चमकीले सूटकेसों में उनका सामान रख दिया. जब गाँधी को इसका पता चला तो वह बहुत नाराज़ हुए. एक ग़रीब देश का प्रतिनिधि इतने मंहगे सूटकेस के साथ वहाँ पहुँचे यह उन्हें मंज़ूर नहीं था. वह उन सूटकेसों को उसी समय समुद्र में फेंकने पर उतारू थे. उनके साथियों ने बहुत मुश्किल से उन्हें ऐसा न करने के लिए राज़ी किया.... वह भी इस वादे के साथ कि उन दो सूटकेसों को वापस बंबई भिजवा दिया जाएगा. नेपाल के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान की विदेश मंत्री को शायद यही करना चाहिए था.... बेहतर होता कि वह अपनी नीली टाई और बर्किन हैंडबैग घर छोड़ कर आते...

समस्या रामायण नहीं मानसिकता की है

सुशील झासुशील झा|मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011, 16:52

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एके रामानुजन के रामायण से जुड़े लेख को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से हटाने की कोई ठोस वजह समझ से बाहर है.

लेख का शीर्षक है तीन सौ रामायण: पाँच उदाहरण और अनुवादों पर तीन विचार. अगर लेख न भी पढ़ा गया हो तो भी इस लेख पर आश्चर्य करने या आपत्ति करना उचित नहीं प्रतीत होता.

अगर आपत्ति इस बात को लेकर है कि रामायण तीन सौ कैसे हो सकते हैं. रामायण तो केवल एक हो सकता है तो ऐसे लोगों को इतिहास और मिथकों के बारे में अपनी जानकारी और दुरस्त करने की ज़रुरत है.

अपने अपने घरों में या थोड़ा सा अपनी मातृभाषाओं के समृद्ध साहित्य के बारे में बात करें तो पता चलेगा कि रामायण का अनुवाद देश की कई भाषाओं में हुआ है और अनुवाद करने वालों ने उसमें अपनी कहानियां भी जोड़ी हैं जैसा किसी भी मिथक के साथ होता ही है.

अलग-अलग भाषाओं के रामों का चरित्र और चेहरा भी अलग अलग होता है हां मूल बात वही रहती है.

हिंदी, अवधी से लेकर दक्षिण भारतीय भाषाओं, मराठी, मैथिली और असमिया भाषाओं में रामायण उपलब्ध हैं और अपने अपने हिसाब से कहानी को बढ़ाया घटाया गया है.

अगर रामानुजम के लेख पर प्रतिबंध लगा भी दिया जाए तो ये सच्चाई बदल नहीं जाएगी कि रामायण एक नहीं अनेक हैं. इंडोनेशिया से लेकर फिजी और सूरीनाम में.

समस्या यही है कि हमारे स्कूलों कॉलेजों में हमारे मिथकों का पढ़ाया जाना या तो बंद कर दिया गया है या रामायण-महाभारत-वेद-उपनिषद पढ़ने वालों को दकियानूसी करार दिया गया है.

जो इसके लिए पश्चिमी संस्कृति को दोष देते हैं उनके लिए यह जानना ज़रुरी है कि अमरीका और यूरोप के विश्वविद्यालयों में भारतीय संस्कृति, लेखों और दर्शन पर जितना काम हो रहा है उतना भारतीय विश्वविद्यालयों में शायद ही हो रहा है.

थोड़ा अपने आसपास नज़र डालिए. भारत के विश्वविद्यालयों में धर्म, भारतीय दर्शन और भारतीय संस्कृति की पढ़ाई या तो कम होती है और अगर होती है तो इन विभागों में पढ़ने वालों को गंभीरता से नहीं लिया जाता.

इतिहास की पढ़ाई में यदा कदा इन विषयों पर ध्यान दिया जाता है लेकिन इन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों को भी पिछड़ा माना जाता है. ये और बात है कि जब अमरीकी विश्वविद्यालयों के शिक्षक रामायण-महाभारत पढ़ाने भारत आते हैं लोग खुशी खुशी उनका स्वागत करते हैं.

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम से भारतीय दर्शन का विभाग है. जर्मनी के हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय में हेनरिख़ हाइमर चेयर ऑफ इंडियन फिलॉसफी एंड इंटलेक्चुअल हिस्ट्री का चेयर गठित हुआ है.

शिकागो विश्वविद्यालय की वेंडी डॉनिजर की पुस्तक ' द हिंदू' मील का पत्थर मानी जाती है. थोड़ा और सोचें तो याद आएगा कि कुछ समय पहले शेल्डन पॉलक नाम के एक व्यक्ति को संस्कृत में योगदान के लिए पद्मश्री मिला था. शेल्डन पॉलक कोलंबिया में संस्कृत पढ़ाते हैं और भारतीय भाषाओं में लिखी कालजयी रचनाओं के अनुवाद की देख रेख के लिए नारायण मूर्ति की मदद से उन्होंने एक बड़ी परियोजना शुरु की है.

अगर भारत के लोग अपने ही इतिहास को दक्षिणपंथी और वामपंथी भावनाओं से निकल कर पढ़ें और देखें तो पता चलेगा कि विचारों की सहिष्णुता की जो परंपरा भारत में रही है वो कम ही देशों में मिल सकती है.

विडंबना यही है कि बहस करने के लिए जाने जाने वाले इस देश में अब बहस की बजाय प्रतिबंध को हथियार बनाया जा रहा है.

एक कृतघ्न समाज

विनोद वर्माविनोद वर्मा|शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011, 12:57

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बहुत से भारतीय निराश हैं कि भारतीयों को साहित्य का नोबेल पुरस्कार नहीं मिला. इस बार नोबेल पुरस्कार पाने वालों की संभावित सूची में कथित तौर पर दो भारतीय साहित्यकार विजयदान देथा और के सच्चिदानंदन शामिल थे.

'कथित तौर पर' इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि नोबेल समिति कभी नहीं बताती कि पुरस्कारों की सूची में कौन-कौन थे.

वरिष्ठ पत्रकार और कवि विष्णु खरे ने भारतीय समाज की निराशा और साहित्यकारों की आतुरता की एक अख़बार में लिखे अपने लेख में ख़ूब मज़े लिए हैं.

हालांकि विजयदान देथा और सच्चिदानंदन के साहित्यिक योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. लेकिन निराशा और मज़े से परे सवाल ये है कि भारतीय समाज को क्यों एकाएक अपने साहित्य और साहित्यकारों से उम्मीद होने लगती है?

आमतौर पर तो साहित्य और साहित्यकारों को भारतीय समाज हाशिए पर ही रखता है. तब और अधिक अगर वह अंग्रेज़ी का साहित्यकार न हो.

याद आता है कि वर्ष 2007 में जादुई यथार्थ के सबसे बड़े लेखक गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ कोलंबिया में अपने गृहनगर एराकटाका लौटे थे तो लोगों ने किस उत्सुकता से उनका स्वागत किया था.

सैकड़ों लोग उनकी ट्रेन के साथ भागते हुए स्टेशन तक पहुँचे थे.

इसके बाद सरकार उनके घर का जीर्णोद्धार कर रही है और वहाँ एक संग्रहालय की स्थापना कर रही है.

लेकिन तभी बनारस के पास लमही में उजाड़ और जर्जर सा पड़ा वो मकान याद आता है जहाँ हिंदी के कालजीवी कथाकार प्रेमचंद रहा करते थे. सरकारों की घोषणाओं के बावजूद उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.

स्ट्रैटफ़र्ड अपॉन एवन याद आता है जहाँ शेक्सपियर का जन्म हुआ था. किस संजीदगी के साथ अंग्रेज़ समाज ने उनकी यादों को सहेज कर रखा है और किस तरह उसे एक बड़ा पर्यटन स्थल बना रखा है.

लेकिन उसी शेक्सपियर के दो समकालीन भारतीय साहित्यकारों, तुलसी दास और कबीर दास के साथ भारतीय समाज का बर्ताव कैसा रहा है?

दक्षिण भारत तो फिर भी अपने साहित्यकारों को एक हद तक सम्मान देता है लेकिन उत्तर भारत में स्थिति लगभग दयनीय सी है.

अपने कथाकारों, कवियों और रचनाकारों को लेकर भारतीय समाज की भूमिका एक कृतघ्न समाज की ही रही है.

राजनीतिक समाज की साहित्य चेतना भी दयनीय रही है. यही वजह है कि जिस समय हरिवंश राय बच्चन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के दोस्त बने हुए थे उसी समय मुक्तिबोध जैसे महत्वपूर्ण कवि को आजीविका के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था.

अब तो लोग एक पूर्व प्रधानमंत्री की ख़राब कविताओं पर वाह-वाह करते नहीं थकते और अपने पड़ोस के अच्छे कवि से कतराकर निकल जाते हैं.

इसलिए जब तक समाज की साहित्य चेतना दुरुस्त नहीं हो जाती और लोग रचनाकारों के अवदान का सम्मान करना नहीं सीख जाते, अच्छा है कि इसी बात से ख़ुश हो लिया जाए कि एक शताब्दी पहले रविंद्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबेल मिला था. चाहे जैसे भी मिला हो.

मेला, मोह और मंत्र

अपूर्व कृष्णअपूर्व कृष्ण|बुधवार, 05 अक्तूबर 2011, 20:21

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जो लोग बचपन में, अपने छात्र जीवन में, कभी किसी पूजा के आयोजन से जुड़े रहे होंगे, उन्हें, मोह क्या होता है, इसका पता नदी के घाट या समुद्र के तट पर चला होगा.

उस क्षण, जब मंत्रोच्चारों और जयघोषों के बीच, कई हाथ झुकते हैं, माँ दुर्गा या माँ सरस्वती या विनायक की प्रतिमा के चरणों को स्पर्श करते हैं और फिर उन्हीं हाथों से उन प्रतिमाओं को पुल से या नौका से जल में विसर्जित कर देते हैं, अक्सर आँखें भींज जाती हैं, हृदय हहरने लगता है, छोटे बच्चे-बच्चियाँ तो रोने ही लगते हैं.

बेशक विसर्जन के उस मेले में बैंड-बैंजो-ढोल-ताशा-डिस्को-डीजे का संगीत बरसता रहता है, उन्माद में भरे क़दम थिरकते रहते हैं, मगर उस एक क्षण, जब आँखें प्रतिमा को जल में विसर्जित होते देखती हैं, मोह घेर लेता है, मोह का मतलब समझ में आ जाता है.

ये मोह उस प्रतिमा को लेकर हुआ मोह होता है जो तीन-चार दिनों के उत्सव का केंद्र होती है, कुछ दिनों के लिए साथ रहती है.

अगर चरण स्पर्श करने और फिर विसर्जित करनेवाले हाथों को इतना मोह हो सकता है, तो फिर क्या बीतती होगी उन हाथों पर जिन्होंने इन प्रतिमाओं को तैयार किया होगा.

पता नहीं मिट्टी-बाँस-कूची-रंग-सजावट के सामानों के सहारे बड़े जतन से, दिन-हफ़्ते-महीने लगाकर देवी-देवताओं के स्वरूप को साकार करवानेवाले मूर्तिकारों को मोह होता होगा या नहीं?

कहा जा सकता है कि वो मूर्तिकार पैसे लेकर मूर्तियाँ बेचते हैं इसलिए उनका मन व्यवसायी हो जाता होगा.

मगर जिस किसी ने भी अपने जीवन में काग़ज़ के एक पन्ने पर भी कभी कोई चित्र उकेरने की कोशिश की होगी, चिड़िया-सूरज-पेड़-पहाड़ ही क्यों ना बनाया होगा, उन्हें पता होगा कि चाहे कोई रचना किसी भी उद्देश्य से क्यों ना की गई हो, भीतर यदि कल्पना ना हो, जज़्बात ना हो, तो उसमें कोई बात आ ही नहीं सकती.

देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ फ़ैक्ट्रियों में नहीं बनतीं, इंसान के हाथों से बनती हैं, कल्पना से बनती हैं, भावना से बनती हैं.

प्रख्यात बांग्ला साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय ने बताया है कि कैसे पहले के दिनों में मूर्तिकार को बुलाया जाता था, वो घरों में आकर प्रतिमाएँ बनाते थे, और कैसे माँ दुर्गा की प्रतिमा के अंतिम हिस्से - माँ के तृतीय नेत्र - को बनाने से पहले वो काफ़ी देर तक ध्यान लगाते थे, और फिर ब्रश की एक धार से माँ दुर्गा की प्रतिमा को अंतिम रूप दिया करते थे.

जो मूर्तिकार अपनी कल्पना को कूची तक पहुँचाने के लिए ध्यान लगा सकते होंगे, क्या उन्हें मोह नहीं होता होगा?

शायद होता होगा, मगर उन्होंने उस मोह पर विजय पाई होगी. और मोह से भी पहले अपने आत्ममोह पर विजय पाई होगी.

तभी तो मूर्तियाँ दिखती हैं, मूर्तिकार नहीं दिखते, ना ही कहीं उनका नाम तक दिखता है.

ऐसे व्यक्तिपूजन, आत्मप्रतिष्ठा वाले दौर में, जब काम से अधिक नाम की महिमा हो, हीरो-हीरोईन फ़िल्मों में कम टीवी पर अधिक दिखाई देते हों, खेल से अधिक चर्चा खिलाड़ियों की होती हो, रिपोर्टें कम और रिपोर्टर अधिक नज़र आते हों, लेखक-कवि पढ़े कम, दिखाई और सुनाई अधिक देते हों, बहस नेतृत्व और नीतियों को लेकर कम, नेताओं को लेकर अधिक होती हो - ऐसे इस समय में, माँ दुर्गा-माँ सरस्वती-श्रीगणेश की प्रतिमाओं के विसर्जन का वो क्षण, मोह और आत्ममोह को समझने का और उसपर विजय पाने का मंत्र दे जाता है.

वही मंत्र, जो कभी दास कबीर दे गए थे, ये कहकर - उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दरसन का मेला.

ईश्वर से सिफ़ारिश

विनोद वर्माविनोद वर्मा|शनिवार, 01 अक्तूबर 2011, 14:25

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मैं ऐसी किसी भी बात को नहीं मानता जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. इसलिए स्वाभाविक तौर पर ईश्वर को भी नहीं मानता.

लेकिन जब किसी पर बहुत रहम आता है तो बरबस ही मुंह से निकलता है, हे ईश्वर, इन्हें क्षमा करना. मेरा तो कोई ईश्वर है नहीं, सो ये सिफ़ारिश उनके ही ईश्वर से की गई होती होगी, जिसके लिए दुआ मांगी जा रही है. मैं नहीं जानता कि उनका ईश्वर, अल्लाह और गॉड उन्हें क्षमा करता है या नहीं.

ये चर्चा इसलिए कि इस समय दिल चाहता है कि बहुत से लोगों के लिए उनके ईश्वर से सिफ़ारिश की जाए कि वह उन्हें क्षमा कर दे.

सूची बहुत लंबी है लेकिन सबसे पहले नाम मोंटेक सिंह अहलूवालिया का आता है जिन्होंने कहा है कि जो शहरी व्यक्ति प्रतिदिन 32 रुपए और ग्रामीण 25 रुपए हर रोज़ खर्च करता है, वह ग़रीब नहीं है.

विश्वबैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के चहेते मोंटेक सिंह अहलूवालिया की इस रिपोर्ट से पहले योजना आयोग की ही एक और रिपोर्ट में आंकड़ा दिया गया था कि देश में 78 प्रतिशत लोग 20 रुपए प्रतिदिन से भी कम में गुज़ारा करते हैं.

योजना आयोग की इस सूझ के ख़िलाफ़ बहुत कुछ कहा जा चुका है और अब सिर्फ़ यही कहने को जी चाहता है, 'हे, ईश्वर उन्हें क्षमा करना.'

ऐसी ही सिफ़ारिश अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए भी करने को जी चाहता है. एक बार नहीं बार-बार. कभी इसलिए कि वे कहते हैं कि वे देश में महंगाई को कम नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास जादू की कोई छड़ी नहीं है, तो कभी इसलिए कि वे महंगाई और ग़रीबी के शोर के बीच अपने थैले से तरह-तरह की जादुई छड़ियाँ निकालते हैं कि देश में विकास की दर किसी तरह आठ प्रतिशत के आसपास बनी रहे.

और कभी इसलिए कि वे अपने मंत्रालयों के घोटालों के बारे में यह कहकर पल्ला झाड़ना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय को इसकी जानकारी नहीं थी.

भारत के प्रधानमंत्री के पद को इतना बेचारा बना देने के लिए पता नहीं उनका ईश्वर उन्हें माफ़ करेगा भी या नहीं.

यूपीए सरकार की माई बाप सोनिया गांधी के ईश्वर से उनके लिए क्षमा याचना करने को जी चाहता है जो अपने आपको आम जनता के पक्ष में खड़ा दिखाना चाहती हैं लेकिन अपनी सरकार के इन कारनामों पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करतीं.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के कथित युवराज के लिए भी ऐसी ही दुआ उठती है, जो चुनिंदा विषयों पर अपनी राय रखते हैं और शेष पर आंखे मूंद लेते हैं.

नरेंद्र मोदी के ईश्वर से उन्हें क्षमा कर देने की सिफ़ारिश करने को जी चाहता है, जो सद्भावना उपवास कर रहे हैं और साथ में वयोवृद्ध भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के लिए भी जो एक बार फिर रथयात्रा निकाल रहे हैं.

वैसे तो प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के समूचे नेतृत्व के लिए यही दुआ निकलती है जिसे महंगाई और ग़रीबी राजनीतिक का मुद्दा नहीं दिखता, सिर्फ़ घोटाला और भ्रष्टाचार दिखता है, जो उनके अपने मुख्यमंत्री भी अपने-अपने राज्यों में कर रहे हैं.

मीडिया के आकाओं के ईश्वर से प्रार्थना करने को दिल चाहता है, जिसके बारे में एक बार मूर्धन्य पत्रकार प्रभाष जोशी ने कहा था कि वे 'सब्ज़ी बेचकर क्रांति' करना चाहते हैं.

पता नहीं, इन सबका ईश्वर, अगर वो कहीं है, तो प्रार्थनाएँ सुनता है या नहीं.

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