एक कृतघ्न समाज
बहुत से भारतीय निराश हैं कि भारतीयों को साहित्य का नोबेल पुरस्कार नहीं मिला. इस बार नोबेल पुरस्कार पाने वालों की संभावित सूची में कथित तौर पर दो भारतीय साहित्यकार विजयदान देथा और के सच्चिदानंदन शामिल थे.
'कथित तौर पर' इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि नोबेल समिति कभी नहीं बताती कि पुरस्कारों की सूची में कौन-कौन थे.
वरिष्ठ पत्रकार और कवि विष्णु खरे ने भारतीय समाज की निराशा और साहित्यकारों की आतुरता की एक अख़बार में लिखे अपने लेख में ख़ूब मज़े लिए हैं.
हालांकि विजयदान देथा और सच्चिदानंदन के साहित्यिक योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. लेकिन निराशा और मज़े से परे सवाल ये है कि भारतीय समाज को क्यों एकाएक अपने साहित्य और साहित्यकारों से उम्मीद होने लगती है?
आमतौर पर तो साहित्य और साहित्यकारों को भारतीय समाज हाशिए पर ही रखता है. तब और अधिक अगर वह अंग्रेज़ी का साहित्यकार न हो.
याद आता है कि वर्ष 2007 में जादुई यथार्थ के सबसे बड़े लेखक गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ कोलंबिया में अपने गृहनगर एराकटाका लौटे थे तो लोगों ने किस उत्सुकता से उनका स्वागत किया था.
सैकड़ों लोग उनकी ट्रेन के साथ भागते हुए स्टेशन तक पहुँचे थे.
इसके बाद सरकार उनके घर का जीर्णोद्धार कर रही है और वहाँ एक संग्रहालय की स्थापना कर रही है.
लेकिन तभी बनारस के पास लमही में उजाड़ और जर्जर सा पड़ा वो मकान याद आता है जहाँ हिंदी के कालजीवी कथाकार प्रेमचंद रहा करते थे. सरकारों की घोषणाओं के बावजूद उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.
स्ट्रैटफ़र्ड अपॉन एवन याद आता है जहाँ शेक्सपियर का जन्म हुआ था. किस संजीदगी के साथ अंग्रेज़ समाज ने उनकी यादों को सहेज कर रखा है और किस तरह उसे एक बड़ा पर्यटन स्थल बना रखा है.
लेकिन उसी शेक्सपियर के दो समकालीन भारतीय साहित्यकारों, तुलसी दास और कबीर दास के साथ भारतीय समाज का बर्ताव कैसा रहा है?
दक्षिण भारत तो फिर भी अपने साहित्यकारों को एक हद तक सम्मान देता है लेकिन उत्तर भारत में स्थिति लगभग दयनीय सी है.
अपने कथाकारों, कवियों और रचनाकारों को लेकर भारतीय समाज की भूमिका एक कृतघ्न समाज की ही रही है.
राजनीतिक समाज की साहित्य चेतना भी दयनीय रही है. यही वजह है कि जिस समय हरिवंश राय बच्चन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के दोस्त बने हुए थे उसी समय मुक्तिबोध जैसे महत्वपूर्ण कवि को आजीविका के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था.
अब तो लोग एक पूर्व प्रधानमंत्री की ख़राब कविताओं पर वाह-वाह करते नहीं थकते और अपने पड़ोस के अच्छे कवि से कतराकर निकल जाते हैं.
इसलिए जब तक समाज की साहित्य चेतना दुरुस्त नहीं हो जाती और लोग रचनाकारों के अवदान का सम्मान करना नहीं सीख जाते, अच्छा है कि इसी बात से ख़ुश हो लिया जाए कि एक शताब्दी पहले रविंद्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबेल मिला था. चाहे जैसे भी मिला हो.

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आपके लेख, लेखन और व्यक्तिगत मानस से मैं पूरी तरह सहमत हूँ . हमारा समाज कृत्घन है , एहसान फ़रमोश , मौका परस्त ही है . एक कवि / लेख़क की समाज उपेक्षा करता (सताता ), और दाउद भाई तथा अमर सिंह जैसे लोगों का महिमा मंडन करता (पूजता ) है . समाज में प्राण की जगह मनी, हनी समां गया है .पतन की राह पर.
पुरस्कार तो तब मिलेगा न जब हमारे लेख़क दलित चिंतन और स्त्री विमर्श छोड़कर कुछ और करेंगे .
आख़िर प्रधानमंत्री कौन है ?
बहुत ज़रूरी प्रश्न आपने उठाया. इस ब्लॉग की रवायत के मुताबिक आम धारा से हटकर कुछ सोचा गया है .. हार्दिक धन्यवाद
आज के बदलते आधुनिक समाज में अपठित रह जाना ही हिंदी भाषा की अच्छी कृतियों की नीयति है. यथार्थ लिखा है आपने इसके लिए आपको साधुवाद.
बाक़ी सबकुछ ठीक है लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री के लिए ख़राब कविताओं का संबोधन नहीं करना चाहिए था. ग़ैर-स्तरीय शब्द तक ठीक था.
आपने भारतीय समाज की दुख्ती रग को दबाया लेकिन परेशानी ये है कि हम किस साहित्य की बात करें. अगर कोई हिंदी की बात करता है तो उसे ग़ैर-हिंदी भाषी को अपनी भाषा को हिंदी से ख़तरा दिखने लगता है. अगर संस्कृत की बात करें तो धर्मनिरपेक्षता पर ख़तरा दिखने लगता है. तुलसी दास की बात करें तो ब्रह्मणवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगता है, अगर ग़ालिब की बात करें तो तुष्टिकरण कहलाता है.
विनोद जी आपने हमारे समाज को इस बात के लिए निशाने पर लिया है क्योंकि वह अपने साहित्यकारों का सम्मान नहीं कर रहा है, हो सकता है कि मेरी धारणा गलत हो लेकिन मैं समझता हूं कि समाज और सत्ता के द्वन्द को समझे बिना आपका यह कथन अधूरा सत्य ही कह पाता है और यह बात भी सही है कि अधूरे सत्य अक्सर असत्यों से भी अधिक खतरनाक हो जाते हैं. आपने कबीर, तुलसी और प्रेमचन्द्र के नाम लिए हैं कि हमारा समाज इनका समुचित सम्मान नहीं कर रहा है, जबकि इन सभी लोगों की हमारे जनमानस में गहरी छाप है, लेकिन हमारी सत्तायें जो कि अमर्यादित ही नहीं बल्कि अराजक और भ्रष्ट भी है वो किस तरह नायक मर्यादापुरूषोत्तम राम के कवि तुलसीदास को स्वीकार कर सकेगी? कबीर जिन्होने पाखंड और साम्प्रदायिकता की धज्जियां उडा दी उन्हें किस तरह आजकल के राजनीतिज्ञ सहन कर सकेगें जो कि धर्म और सम्प्रदाय की मनमानी व्याख्यायें परोस कर गद्दियों में बैठे हैं. इन्हीं राजनीतिज्ञों ने तुलसीदास और कबीर जैसे लोगों का प्रभाव जनमानस में न पडने पाये इसके लिए भरपूर प्रयास किये हैं. विदेशी आक्रमणकारी ही नहीं आजादी के बाद भी सत्ता का यही चरित्र बरकरार है कि समाज के साहित्यकारों को विस्मृत करने के सचेत प्रयास किये जाएं लेकिन जिस समाज से आप नाराज हैं उसी समाज ने इन साहित्यकारों को धर्म की तरह धारण कर लिया और जिसे धर्म की तरह धारण कर लिया जाए उससे ऊंचा स्थान कुछ भी होना सम्भव नहीं है. सत्ता समझती है कि जनता के कोई साहित्यकार नहीं हैं तुलसी और कबीर तो धर्म से सम्बन्धित हैं यह सत्ता की नासमझी है. साहित्यकार तो ये ही है जब भी समय आयेगा तो इन्हीं का नाम लिया जाऐगा. प्रेमचन्द्र जिस आम आदमी की बात करते रहे इसके लिए हमारी सत्ता इन्हें किस तरह स्वीकार कर सकेगी, कुछ समय बीतने दीजिए सत्ताओं का यही जनविरोधि चरित्र बना रहा तो प्रेमचन्द्र को भी यही समाज धर्म का स्थान देकर भी जीवित रखेगा तब उन स्वनामधन्य साहित्यकारों का कोई नामलेवा भी न होगा जो कि आज गिरोह बनाकर एकदूसरे को सम्मानित कर रहे हैं और खुद ही प्रसन्न भी हो रहे हैं. समाज कृतघ्न नहीं हो सकता है क्योंकि साहित्यकार उसी की उपज है, यह सत्ताओं का खेल है कि वह उन लोगों को ही सम्मानित करेगी जो कि उसके हित रक्षक हों हताश भारतीय जनमानस में मर्यादापुरूषोत्तम राम का चरित्र गढने वाले तुलसीदास हों या समाज के मकडजाल पर प्रहार कर इसे गतिमान करने वाले कबीर हों या फिर राजनीति और समाज पर गहरी अर्न्तदृष्टि रखने वाले प्रेमचन्द्र हों ये सभी लोग सत्ताओं के लिए खतरनाक हैं यह बात ये लोग अच्छी तरह समझते हैं. इसीलिए इन्हें साहित्यकार के रूप में सम्मान नहीं दिया जाता है.
अतिसुंदर! परन्तु कड़वा सत्य लिखा आपने, साहित्यकारों की दुर्दशा जिस तरह से हमारे देश में हुई, इससे सचमुच बहुत दुःख होता है. हम अपने देश के महान साहित्यकारों की कृत्यों को महत्व नहीं देते परन्तु विदेशी भाषा की लिखी कोई कृति हम पढ़ते हैं. कम से कम पहले हमारी पाठ्य पुस्तकों में कवियों की कवितायेँ और कबीरदास, सूरदास के महान अर्थपूर्ण दोहे रहा करते थे परन्तु आजकल तो उसकी जगह भी समझ में न आनेवाली और अर्थहीन (जीवन के लिए) कविताओं ने ले ली है. पूर्व प्रधानमंत्री दिनकर जैसे कवियों की बराबरी के नहीं थे परन्तु उनकी कविताओं को ख़राब कहना उचित नहीं लगा.
हमारे देश में हिंदी में लिखने वालों को तो साहित्यकार माना ही नहीं जाता है. हां अंग्रेज़ी में एक किताब भी लिखकर सम्मान पाया जा सकता है. प्रेमचंद जैसे कथाकार केवल पुस्तकालय की अलमारियों की शोभा बढ़ा रहें हैं. हम तो इतने में ही ख़ुश हो जाते हैं जब किसी अप्रवासी भारतीय को कोई विदेशी सम्मान मिल जाता है. और उसके बाद हमारी सरकार भी उन पर इनामों की बौछार कर देती है.
जिस शहर में
नैतिकता के मुद्दे पर बुद्धिजीवी
उन वकीलों की तरह बहस करते हों-
जो केस जिताने का झूठा वादा कर
अपनी फीस के नाम पर
ऐंठ चुके हैं हत्यारों से मोटी रकम-
वहाँ, बुद्धिजीवियों की
उस कभी न खत्म होने वाली बहस में
हस्तक्षेप करने के लिए
मुझे कैसी कविता लिखनी चाहिए
मैं नहीं जानता!"""""
विनोद वर्मा जी...वैसे तो मेरा साहित्य से संबंध नहीं है, परन्तु आपका ब्लॉग पढकर मैंने प्रेमचंद की मानसरोवर माँगा ली...कुछ कहानियों पढ़कर ऐसा लगा की वो समाज की समस्याओं का हृदयस्पर्शी चित्रण है, और जो आज के सन्दर्भ में भी उतनी ही सटीक हैं..वहीं शेक्स्पियर के लेखनी में जीवन से संबंध कम दिखता है, वो भी महान लेखक थे पर प्रेमचंद की महानता भी कम नहीं...फिर प्रेमचंद को वो स्थान क्यों नहीं मिला.
अशोक वाजपई ने पुणे में पंडित भीम सेन जोशी जी के घर के बगल के सिनेमा हाल का पता बताकर वहां चलने को कहा,ऑटो वाले ने पूछा की आपको जाना कहाँ है?अशोक जी ने जैसे ही पंडित जी का नाम लिया,ऑटो वाले ने कहा अरे 'बादशाह' के यहाँ, ऑटो वाले ने उन्हें पंडित जी के यहाँ पंहुचा दिया..सम्मान इसे कहते हैं नागार्जुन का 'तरौनी' प्रेमचंद का .लमही हो या दिनकर का सिमरिया वहां के लोगों का सीना चौड़ा हो जाता है जब वे इन महान विभुतियों के गाँव का अपने को बताते हैं हमें उनकी यादों को सहेज कर रखना चाहिए.विनोद जी आपने अच्छी पहल की है.पत्रकार नागार्जुन,दिनकर के गाँव जाकर कुछ लिखें.
साहित्य की इस अवस्था के लिये सिर्फ़ समाज को उत्तरदायी ठहराना कहीं से भी उपयुक्त नहीं जान पड़ता . साहित्यकारों को भी विचार करना चाहिये कि क्या उनकी रचनाएं सही मायने में समाज की नब्ज को पह्चान पा रही है. अंग्रेजी सहित्य की बुराई कर देने भर से वर्तमान हिन्दी साहित्य महान नहीं हो जानेवाला. हमें विचार करना होगा कि हमारा साहित्य वर्तमान युवा समाज की सोच को समझ पा रहा है. कहीं ना कहीं हमारे हिन्दी के साहित्यकार आज भी उन्नीसवीं सदी से बाहर नहीं निकल पाएं हैं. कविता के नाम पर गद्य लिखा जा रहा है और प्रगतिशीलता का दम्भ भरा जा रहा है. कविता में सौन्दर्य का अभाव हो चला है और गद्य को क्लिष्ट भाषा एवं अबोधगम्यता से लाद दिया गया है. आम जनता एवं युवावर्ग इससे सम्बन्ध जोडे तो कैसे ? साहित्यकारों को आत्म-मंथन करना चाहिये कि वे किसके लिये लिख रहे हैं ? समाज के लिये या अपने लिये. अगर अपने लिये लिख रहे हैं तो छ्पवाने कि जरूरत ही क्या है ? और अगर जनता के लिये तो क्या वह सिर्फ़ तथाकथित साहित्यकारों को ही तो आम जनता समझने की भूल नहीं कर रहे. या फ़िर उन्हें यह भय तो नहीं सता रहा कि आम जनता के लिये लिखेंगे तो कहीं हिन्दी साहित्य के तथाकथित ठेकेदार स्तरहीन कहके उनकी रचनाओं को खारिज ना कर दें. विचार साहित्यकारों को करना होगा समाज को नहीं. समाज को बुरा - भला कहने से उनकी बुराई छुपनेवाली नहीं . " नाच ना जाने आंगन टेढा " सभी जानते है. आप भी !
मुझे ये सुन कर अच्छा लगा कि आप भारतीय साहित्य के प्रति अपनी विचारधारा इस तरीके से प्रकट कर रहे हैं.
रविंद्रनाथ टैगोर और बच्चन जी का उल्लेख जिन पंक्तियों में हुआ है, उनमें नकारात्मकता दिखी.
प्रिय विनोद जी, आज भारतीय समाज को हिंदी साहित्य के प्रति कोई संवेदना है तो केवल मनोरंजन के लिहाज से ,क्योंकि उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि पुराने साहित्य सेवकों कि पृष्ठभूमि क्या है, या क्या थी . अब तो उन्हें मसालेदार उपन्यास या मनगढ़ंत कथानक विषयों (टी.वी. सीरियल्स) के उन्माद में मदहोश रहना अच्छा लगता है. फिर भी कुछ लोग जिन्होंने हिंदी साहित्य को
आज के मुकाम तक पहुचाने के लिए जीवन पर्यंत साधना कीं, उनका मर्म समझ कभी ऐसे मुद्दे उठा देते हैं तो संतुष्टि के नाम पर "घोषणाओं का मुकुट " की ताजपोशी कर दी जाती है. परिणाम: आप - हम सब आज देख पा रहे हैं . रही बात भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार की, तो इसके लिए तो दशकों तक इंतज़ार करना पडेगा. आपके ध्यानाकर्षक विषय पर संजीदा ब्लाग के लिखने कोटिश: बधाई ...
ये ब्लॉग बहुत मालूमाती है और सरल भाषा में लिखा गया है, मेरे ख़्याल से गाँधीवादी बनने के लिए कपड़े से ज़्यादा अपने दिल में तब्दीली लाना ज़रूरी है.
स्त्री विमर्श और दलित चिंतन वाली बात शर्मनाक है.हमारे देश में साहित्यकारों को ये मुग़ालता है कि वो बहुत बड़े समाज सुधारक हैं और सिर्फ़ 1000 लोगों तक पहुँचने वाली अपनी पत्रिका निकलकर महान क्रांति कर डालेंगे. साहित्य समाज सुधार की कोई ब्रांच नहीं है.साहित्य अपने आप में पठनीय होता है.हिंदी में कुछ भी पढ़ने लायक लिखा ही नहीं जा रहा है. मैं प्रेमचंद,रेणु,परसाई,मुक्तिबोध,पन्त और नागार्जुन को जब पढता हूँ तो लगता है साहित्य पढ़ रहा हूँ,लेकिन दुर्भाग्य से आजकल के किसी लेखक की प्राथमिकता अच्छा साहित्य लिखना नहीं लगती. या यूँ कहें कि ये लोग साहित्य लिख ही नहीं सकते और अपनी इस कमजोरी को दलित और स्त्री विमर्श में छुपाते है.
आप बिल्कुल सही कह रहे हैं.भारतीय समाज में पहले आपको एक प्रसिद्ध व्यक्ति बनना होगा तभी आप एक कवि,अभिनेता या खिलाड़ी बन सकते हैं.