ईश्वर से सिफ़ारिश
मैं ऐसी किसी भी बात को नहीं मानता जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. इसलिए स्वाभाविक तौर पर ईश्वर को भी नहीं मानता.
लेकिन जब किसी पर बहुत रहम आता है तो बरबस ही मुंह से निकलता है, हे ईश्वर, इन्हें क्षमा करना. मेरा तो कोई ईश्वर है नहीं, सो ये सिफ़ारिश उनके ही ईश्वर से की गई होती होगी, जिसके लिए दुआ मांगी जा रही है. मैं नहीं जानता कि उनका ईश्वर, अल्लाह और गॉड उन्हें क्षमा करता है या नहीं.
ये चर्चा इसलिए कि इस समय दिल चाहता है कि बहुत से लोगों के लिए उनके ईश्वर से सिफ़ारिश की जाए कि वह उन्हें क्षमा कर दे.
सूची बहुत लंबी है लेकिन सबसे पहले नाम मोंटेक सिंह अहलूवालिया का आता है जिन्होंने कहा है कि जो शहरी व्यक्ति प्रतिदिन 32 रुपए और ग्रामीण 25 रुपए हर रोज़ खर्च करता है, वह ग़रीब नहीं है.
विश्वबैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के चहेते मोंटेक सिंह अहलूवालिया की इस रिपोर्ट से पहले योजना आयोग की ही एक और रिपोर्ट में आंकड़ा दिया गया था कि देश में 78 प्रतिशत लोग 20 रुपए प्रतिदिन से भी कम में गुज़ारा करते हैं.
योजना आयोग की इस सूझ के ख़िलाफ़ बहुत कुछ कहा जा चुका है और अब सिर्फ़ यही कहने को जी चाहता है, 'हे, ईश्वर उन्हें क्षमा करना.'
ऐसी ही सिफ़ारिश अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए भी करने को जी चाहता है. एक बार नहीं बार-बार. कभी इसलिए कि वे कहते हैं कि वे देश में महंगाई को कम नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास जादू की कोई छड़ी नहीं है, तो कभी इसलिए कि वे महंगाई और ग़रीबी के शोर के बीच अपने थैले से तरह-तरह की जादुई छड़ियाँ निकालते हैं कि देश में विकास की दर किसी तरह आठ प्रतिशत के आसपास बनी रहे.
और कभी इसलिए कि वे अपने मंत्रालयों के घोटालों के बारे में यह कहकर पल्ला झाड़ना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय को इसकी जानकारी नहीं थी.
भारत के प्रधानमंत्री के पद को इतना बेचारा बना देने के लिए पता नहीं उनका ईश्वर उन्हें माफ़ करेगा भी या नहीं.
यूपीए सरकार की माई बाप सोनिया गांधी के ईश्वर से उनके लिए क्षमा याचना करने को जी चाहता है जो अपने आपको आम जनता के पक्ष में खड़ा दिखाना चाहती हैं लेकिन अपनी सरकार के इन कारनामों पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करतीं.
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के कथित युवराज के लिए भी ऐसी ही दुआ उठती है, जो चुनिंदा विषयों पर अपनी राय रखते हैं और शेष पर आंखे मूंद लेते हैं.
नरेंद्र मोदी के ईश्वर से उन्हें क्षमा कर देने की सिफ़ारिश करने को जी चाहता है, जो सद्भावना उपवास कर रहे हैं और साथ में वयोवृद्ध भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के लिए भी जो एक बार फिर रथयात्रा निकाल रहे हैं.
वैसे तो प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के समूचे नेतृत्व के लिए यही दुआ निकलती है जिसे महंगाई और ग़रीबी राजनीतिक का मुद्दा नहीं दिखता, सिर्फ़ घोटाला और भ्रष्टाचार दिखता है, जो उनके अपने मुख्यमंत्री भी अपने-अपने राज्यों में कर रहे हैं.
मीडिया के आकाओं के ईश्वर से प्रार्थना करने को दिल चाहता है, जिसके बारे में एक बार मूर्धन्य पत्रकार प्रभाष जोशी ने कहा था कि वे 'सब्ज़ी बेचकर क्रांति' करना चाहते हैं.
पता नहीं, इन सबका ईश्वर, अगर वो कहीं है, तो प्रार्थनाएँ सुनता है या नहीं.

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बहुत अच्छा विनोद जी.
विनोद जी आप जिस भगवान से दुआ कर रहे हैं उन्होंने अपने भगवान को स्विस बैंक में क़ैद कर रखा है, इसलिए आपकी आवाज़ उन तक नहीं पहुँच सकती. ग़रीबों के भगवान हैं इसलिए वे उनकी रक्षा कर रहे हैं. वरना तो ये सरकार ग़रीबी को ख़त्म करने पर तुली है और उनको ख़त्म करने के लिए महंगाई को लगातार बढ़ा रही है. लेकिन ये सरकार ग़रीबों को मरने भी नहीं देना चाहती इसलिए योजना आयोग से आंकड़े बनाकर दिखा रही है कि भारत में ग़रीब कितने आराम से गुज़ारा कर रहे हैं और सरकारी आंकड़ों से ज़्यादा कमा रहे हैं. लगता है कि जब स्विस बैंक से भगवान निकलेगा तब वो भारत की जनता का हाल देखेगा और तब वह विचलित होगा. देर है अंधेर नहीं. पाप का घड़ा भर गया और वो फूटेगा ही.
विनोद जी आपने बहुत ख़ूब कहा है पर लगता है कि देश में सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की हालत शुतुरमुर्ग पक्षी की तरह हो गई है जो इस उम्मीद में रेत में अपना सिर छिपा लेता है कि शायद ऐसा करने से उसको कोई भी नहीं देख सकेगा. पर जनता इन तथाकथित विशेषज्ञों को ज़रुर जवाब देगी.
विनोद जी आप ब्लाग अच्छा लिखते हैँ परन्तु आपका यह ब्लाग दोयम दर्जे का है जो सभी मानदण्डो पर खरा नहीँ उतरता.
विनोद जी आप ब्लाग अच्छा लिखते हैँ परन्तु आपका यह ब्लाग दोयम दर्जे का है जो सभी मानदण्डो पर खरा नहीं उतरता.
विनोद जी, अति उत्तम. लेकिन, ये ब्लॉग सरकार और राजनितिक पार्टियों को भी पोस्ट करना चाहिए जिससे वे पढ़े व अपने भगवान को याद करें.
विनोद जी ,ईश्वर पर बहस करने की जगह हम ये बात करे की इश्वर अगर है तो भी इनको माफ़ी देने के लिए क्यों कहे,जब ये माफ़ी किसी से भी नहीं मांग रहे तो इनको माफ़ी कौन देगा? क्योकि ये सब खुद को जनता और राष्ट्र से ऊपर समझ रहे है ,इनको लगता है ये अवतार है या ईश्वर के बाद के ओहदे के लोग है ,इनको लगता है जो ये कर रहे है ,कह रहे है,बटोर रहे है वो सब सही है और वो इनका अधिकार है. पर यही सोच हिटलर,औरंगजेब,सद्दाम,लादेन,गद्दाफी,इदी अमिन,और कई लोगो की भी रही और इनकी जगह तय होगी इतिहास में की ये सब किस श्रेणी के थे.
विनोद जी, बहुत बढ़िया लिखा है. लेकिन भगवान भी किसे किसे माफ़ करेंगें. देश में जितने गुनाहगार हैं, उतनी तो माफ़ी भी भगवान के पास नहीं होगी. हमारे तथाकथित नेता तो इतने घाग है कि ईश्वर को कभी बहला कर अपने पाले में करने का मादा रखते हैं.
कहा जाता है कि ईश्वर के घर देर है पर अंधेर नहीं. देश के विशेषज्ञ जो अपने जादूई आकड़े से लोगों को दिग्भ्रमित कर रहे हैं, उनको करारा जवाब नहीं मिलेगा. कहते हैं न कि ये जनता सब कुछ जानती है और समय आने पर जवाब देगी. जरूरत है तो बस इंतजार करने की...
विनोद जी माना कि आप भगवान को नहीं मानते हैं, फिर भी आस्था में तो विश्वास करते हैं. इसलिए आप को रहम आ रहा है उन ग़रीबों के लिए जिन पर योजना आयोग मस्खरी कर रहा है. वह भी उन लोगों के लिए जिन्होंने ग़रीबों के लिए ग़रीबों से जुड़े आंकड़े बनाए हैं, उन पर भी आपको आस्था रखने के कारण रहम आ रहे है कि उनका भगवान उन पर रहम करे.
मेरा मानना ये है कि ये जो दिखाई दे रहे हैं वैसे हैं नहीं. मुझे तो यह राक्षस यौनी से ताल्लुक रखने वाले ज़्यादा दिखाई दे रहे हैं. इस लिए ये भगवान को नहीं मानते हैं तो उसमें आस की बात कहां ठीक बैठ रही है. हां आप की बात कुछ हद तक ठीक लगती है. वह भी आपकी आस्था के कारण कि किसी तरह उनको सदबुद्धी मिले.
और अब तो नरेँद्र मोदी के भगवान से संजीव भट्ट मामले के लिए भी दुआ माँगनी होगी. और इतना ही नहीं इस बात के लिए हर उस मूक व्यक्ति के भगवान से दुआ करनी होगी जो इसके विरोध की सामर्थ्य रखता है चाहे वो केंद्रीय मंत्रीगण होँ या देश के अन्य गणमान्य व्यक्ति या स्वयं माननीय श्री प्रधानमंत्री महोदय.
यूं तो प्रार्थना करना किसी के लिए भी नितांत निजी बात है लेकिन जिस प्रार्थना का जिक्र विनोद जी ने किया है वह अलग विषय है. दरअसल प्रार्थना तो वह होती है जो कांग्रेसी सोनिया जी के सामने करते हें। भाजपाई संघ के सामने करते हैं बसपाई मायावती जी के सामने करते हैं, सपाई मुलायम जी के सामने करते हैं आदि आदि। ये उन लोगों की नितांत ही निजी प्रार्थना है ।लेकिन विनोद जी ने ईश्वर से जो प्रार्थना की है उससे हम भी प्रभावित होगें ,इसलिए इस प्रार्थना से अपनी असहमति दर्ज कराना चाहता हूं। विनोद जी ने एक अबूझ पहेली का जिक्र किया है कि ईश्वर है या नहीं, वास्तव में तो यह निजी अनुभूति है जिनको लगता है कि ईश्वर है वे उसे मान लें जिन्हें ईश्वर के होने में सन्देह है, वे उसे ना मानें इसी सिद्धान्त पर दुनियां चल रही है। हम दुनियांदार लोग इस बहस को किसी मकाम तक पहुंचा सकने की हिम्मत नहीं रखते हैं ।काबिलियत की मैं बात नहीं कह रहा हूं क्योंकि मनुष्य की सम्भावना अनन्त है,वह कुछ भी कर सकता है। आपने ईश्वर से सार्वजनिक रूप से जो प्रार्थना की है,मैं आपकी प्रार्थना के विरोध में तो नहीं हूं लेकिन आपके मुद्दे के विरोध में हूं । ईश्वर यदि मनमोहन, मोंटेक सिंह ,युवराज और सोनियां जैसे लोगों को दण्ड नहीं देगें तो फिर किसको दण्डित करेंगें ? उन देशवासियों को जिन्हें मनमोहन और मोंटेक सिंह की नीतियों ने तबाह तो कर ही दिया है ,अब अपमानित भी करने लगे हैं । कल ही राशिद अल्बी बीबीसी इंडिया बोल के मंच से बात रहे थे कि हमारे पास आर्थिक संसाधन नहीं हैं उनका भाव यह था कि इसलिए जो लोग मरणासन्न हैं उनको ही गरीब माना गया है। इतने लोगों को मरणासन्न बनाया किसने? ये किसकी नीतियों का परिणाम है। कुछ समय पहले तक बच्चों को पढाया जाता था कि आधुनिक भारत के निर्माता जवाहर लाल नेहरू थे। जो फिर इस भारत के निर्माता मनमोहन और मोंटेक क्यों नहीं हैं?और फिर जैसा कि अल्बी याहब कह रहे थे कि ”हमारे पास संसाधन“ नहीं हैं इस बात का क्या मतलब है? ये तो राजे- रजवाडों की शब्दावली है आप केवल उसकी बात कर सकते हैं जो देश के संसाधन हैं। एक अरब डालर का रिहायसी मकान इस देश में लोग बना रहे हैं। इनके पास पैसा कहॉ से आ रहा है? खरबों रूपया विदेशो में गन्दे लोगों ने अवैध रूप से जमा कर रखा है। लगभग पॉच करोड रूपया प्रत्येक सांसद अपने चुनाव में फूंकता है इनके मकान ,महलों को भी मात देते हैं। रेड्डी बंघू बैठने के लिए सोने की कुर्सियों का इस्तेमाल कर रहे हैं । इस तरह के अनगिनत लोग इस देश में सक्रिय हैं।और सरकार के प्रतिनिधि कह रहे हैं। कि हमारे पास संसाधन नहीं हैं ये लोग रातों रात अमीर होते जा रहे हैं और देश कैसे गरीब हो रहा है। मनमोहन जी को इसका जवाब देना ही पडेगा। सरकार कहती है कि हमारे पास संसाधन नहीं हैं? आज ऐसी कोई विचारधारा दिखाई नहीं देती कि जो इनकी हकीकत उजागर कर दे। सभी विपक्षी दल और चिंतक ,विचारक सामाजिक कार्यकर्ता दिवालियापन के शिकार होते जा रहे हैं।ऐसा वैचारिक दिवालियापन मनुष्य के इतिहास में शायद ही कभी आया हो इसका उल्लेख दिखाई नहीं पडता है इन सबको भी दण्डित करने के लिए ईश्वर से मेरी भी प्रार्थना है। विनोद जी बुरा ना मानें।
वास्तव में अगर कहीं ईश्वर होता तो इनमें से एक को भी माफ़ न करता .......!
इस लेख के लिए धन्यवाद. भारत को आप ही जैसे लोगों की ज़रूरत है.
विनोद जी , आपने एक अच्छा प्रयास किया है व्यंग्य लेखन के सहारे. मेरा आवेदन है कि व्यंग्य बन नकारात्मक न हो जाए. रही बात भगवान की तो बुरा न मानिएगा, जिसके पास भी कुछ मोटा माल का स्वाद मुंह लग जाता है, वो खुद को भगवान मान लेता है. मैं आपको विश्वास दिला सकता हूं कि भगवान है.
विनोदजी आपको भी खबरें बेचनी है. क्या उस जनता के लिए ईश्वर से क्षमा की प्रार्थना नहीं की जो शराब, पैसों व खाने के लालच में इन नेताओं को अपना राजा बनाती है " जैसी प्रजा वैसा राजा"
विनोदजी, आखिर में उस भेड़ रूपी जनता के ईश्वर से भी उन्हें क्षमा कर देने की प्रार्थना करने को जी चाहता है, जो अपनी सारी बदनसीबी/दुर्व्यवस्था को ईश्वर की इच्छा मानकर, एक बेबस लाचारी भर प्रकट कर देने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाती.
वर्मा जी आप टिप्पणी करते समय सावधान रहा करें. किसी मान्यवर नेतागण का नाम न लिखा करें. नेता लोग क्रूर हो सकते हैं, आपको क्या बताऊं. एक श्लोक सुनाता हूं.
नेता सीमा से अधिक क्रूर होते हैं, दरिंदाजी
फिर जब वे गर्भ में थे, माता को क्यों नहीं खा गए.
उत्तर: जब गर्भ में थे, तो दांत नहीं थए न जी.
खुद की ईश्वर पर अनास्था को आधार बनाकर आपने एक ऐसे मुद्दे को कलमबद्ध किया है जिसकी सख्त जरूरत थी. ईश्वर पर आस्था और अनास्था को यदि एक किनारे कर दें तो यह भी कहने को दिल करता है कि आज ईश्वर भी वहीं है जो लोगों के लिए भले काम करें, फिर चाहे वह जिस रूप में भी हो...हमने ईश्वर को देखा नहीं है...शायद किसी ने भी नहीं देखा हो, कुछ ने महसूस किया होगा, पर आप जिनके ईश्वरों से सिफारिश कर रहे हैं, उनके तो अपने ईश्वर है भी नहीं, न तो वे धार्मिक है और न ही उनकी आस्था ईश्चर पर ही है. वे बेहद...क्या कहूं इनके लिए तो जैसे मुझे सही शब्द नहीं सूझ रहा है और यदि सूझ भी रहा है तो यहां लिखना अमर्यादित होगा. इस बीच एक बात और कि वह यह कि भारत पहले दिन से ही लीडरशिप की समस्या से जूझ रहा है.यदि इस समस्या का समाधान हो जाए तो फिर वर्तमान में व्याप्त ज्यादातर समस्या दूर हो सकती है. आप बहुत अच्छा लिखते है, सटीक लेखन और प्रासंगिक विषय के चयन पर आपको बधाई और मेरी ओर से अशेष शुभकामनाएं...आप इसी तरह लिखते रहे और अपने लेखन के आलोक से अज्ञानता और संदेहों को दूर करते रहे...
प्रिय विनोद जी इस देश में लोग तरह तरह के ऊट पटांग बोल बोलते रहते हैं और कर भी गुज़रते हैं. आये दिन इन्ही कार्य कलापों से देश रसातल में डूबता चला जा रहा है लेकिन फिर भी देश जिंदा है और अपनी मंथर गति से चलता जा रहा है. आप को तो अब तक इश्वर में विश्वास हो जाना चाहिए था क़ि इश्वर मौजूद है जो इन नेताओं की काली करतूतों के बावजूद देश को चला रहा है. और यहाँ की भोली भाली जनता जोश में इन नेताओं की हाँ में हाँ मिलाती रहती है क़ि यह देश विश्व का सुपर पॉवर बनने जा रहा है. कम से कम आप जैसे पत्रकार तो हकीकत के रूबरू होते हैं और ऐसी बातें लिख कर मेरे जैसे आदमी का मन झकझोर देते हैं.
क्या बात है आपकी. क्या वैज्ञानिक आधार दिया है कि ईश्वर नहीं है.
कोई सही और निष्पक्ष विश्लेषण करना सीखे तो आपसे सीखे.उमदा विचार है.
विनोद , भारत में राजनीति अब राजनीति नहीं रही है.यह एक व्यापारिक राजनीति बन गई है जो सत्ता में है उन्हें सब सुख सुविधाएं है या सभी लोग मालामाल है या ये कहें कि ये लोग मालामाल बनते जा रहे हैं.ऐसे में ईश्वर की याद किसे आएगी.ईश्वर तो गरीब के पाले आया हुआ है.उसके लिए ईश्वर उसका पालनहार है और वो बस जी रहा है.
बहुत ही अच्छा लिखा आपने.
विनोदजी मैं अपने भगवान से प्रार्थन करुँगा कि वो आपकी प्रार्थना को पूरा करें.
विनोद जी, आपके विचार अतिउत्तम हैं. मैं भी उन सारी चीज़ों में विश्वास नही करता जो वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित नही हैं . इन राजनीतिज्ञों के मामले में भी ऐसा ही है क्योंकि वो भी ऐसे ही विचार रखते हैं वो भी ईश्वर पर विश्वास नही रखते और उनसे डरते ही नही.
बहुत अच्छा , मैं आपसे सहमत हूँ.
जो भी ईश्वर को देखना चाहते हैं और सच जानना चाहते हैं मैं उनकी मदद करूँगा.
बेहतरीन, आपने प्रभाष जी को याद करके उन्हे सच्ची श्रृद्धांजलि दी है. उम्मीद करते हैं कि आपके ऐसे ही तेवर आगे भी बने रहेंगे.
विनोद जी, ईश्वर तो सभी के अन्दर है और सबका है , परन्तु उन माननीयों के ईश्वर तो देश सेवा करते - करते मर सा गया है. इसलिए उन्हे आप के द्वारा ईश्वर से माफ़ी दिलाने का प्रयास विफल होता दिख रहा है. फिर भी प्रयास किया जा सकता है. मैं भी आप के साथ ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वो उन्हें माफ़ करें.
विनोद जी आपने बिल्कुल सही कहा. मैं आप से पूरी तरह सहमत हूं.
प्रिय विनोद जी , भगवान के अस्तित्व के वैज्ञानिक आधार के विषय में मुझे जेनेवा की महामशीन (एल एच सी) की याद आती है, जिसमे ईश्वर कण को प्रमाणित किया गया है . यथा - आपको अपने इश्वर के अस्तित्व पर संशय की स्थिति नहीं होनी चाहिए. रही बात देश के रसूखदारों की ..तो सबसे पहले मुझे ध्यान आता है कि आखिर इनके अलावा हैं ही कौन?हम तो बस आलोचना और समालोचना तक ही सीमित हैं...संजीदा ब्लॉग लिखने के लिए बधाई ...
बहुत अच्छा विनोद जी