कोरोना वायरस : दुनिया भर में सेहत के लिहाज सबसे सुरक्षित ये पाँच देश

    • Author, लिंडसे गैलोवे
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

कोविड-19 से लड़ाई अस्पतालों में लड़ी जा रही है, लेकिन इसकी क़ामयाबी बहुत हद तक स्वास्थ्य प्रणालियों के कारगर होने पर निर्भर है.

ऐसा देखा गया है कि किसी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की रैंकिंग और वायरस को नियंत्रित करने की उसकी क्षमता के बीच सीधा संबंध है.

हमने लंदन के थिंक टैंक लेगाटम के समृद्धि सूचकांक 2019 को देखा. आर्थिक और सामाजिक नीतियों और स्थितियों के 12 पैमानों पर आधारित इस सूचकांक में 167 देश शामिल हैं.

इससे पता चलता है कि किसी देश के लोग कितने सेहतमंद हैं और ज़रूरी चिकित्सा सेवाओं तक उनकी कितनी पहुंच है.

हमने सूचकांक के शीर्ष के कुछ देशों के डॉक्टरों और वहां के निवासियों से बात की और यह समझने का प्रयास किया कि चिकित्सा व्यवस्था के किन पहलुओं ने वायरस को नियंत्रित करने में मदद की, आगे क्या चुनौतियां हैं और लोग वहां रहने में कैसा महसूस करते हैं.

जापान

स्वास्थ्य रैंकिंग में जापान दूसरे स्थान पर है. कोविड-19 पर क़ाबू पाने की शुरुआती सफलता के बाद इसकी तारीफ़ हुई लेकिन संक्रमण बढ़ा तो प्रधानमंत्री ने 7 अप्रैल को राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर दी.

इसके बावजूद जापान में लॉकडाउन नहीं हुआ. जापान ने गंभीर लक्षण होने पर ही कोविड-19 टेस्ट किए, मगर कोई भी व्यक्ति स्थानीय क्लीनिक में जाकर स्कैन करा सकता है.

टोक्यो की डॉक्टर मीका वाशियो कहती हैं, "सीटी स्कैन से निमोनिया के शुरुआती चरण का भी पता लगाया जा सकता है, फिर तुरंत ही उसका इलाज शुरू हो जाता है." इसी वजह से जापान में गंभीर मामले कम हुए.

सामुदायिक संक्रमण का पता लगाकर और उसे रोककर वायरस का प्रसार सीमित रखने पर काम चल रहा है.

सेहत के प्रति जागरुक जापानी संस्कृति के कारण भी कोविड-19 के प्रभाव को कम किया जा सका. वाशियो कहती हैं, "बहुत से लोग पहले से मास्क पहनते थे, ख़ास तौर पर सर्दियों में. इससे वायरस बहुत ज़्यादा नहीं फैला."

जापान के क़रीब 60 फ़ीसदी लोग सालाना हेल्थ चेक-अप कराते हैं और तंदुरुस्त रहने की कोशिश करते हैं.

इसका यह मतलब नहीं है कि आगे चुनौतियां नहीं हैं. कोविड-19 संक्रमण वाले कई मरीजों को अस्पताल में होना चाहिए, लेकिन जापान ज़्यादा गंभीर मामलों के लिए अस्पताल के बेड बचाकर रख रहा है.

दक्षिण कोरिया

लेगाटम हेल्थ पिलर इंडेक्स में चौथे नंबर का देश दक्षिण कोरिया कोविड-19 को संभालने के लिए ज़्यादा तैयार था.

उसे 2015 में MERS वायरस को नियंत्रित करने का तजुर्बा था. यहां के डॉक्टर और अस्पताल इस तरह के संकट से निपटने के लिए तैयार थे.

दक्षिण कोरिया ने तेज़ी से कोविड-19 टेस्ट किए. बीमारी के निदान और इलाज में इसके हेल्थकेयर सिस्टम का भी योगदान रहा. देश का हर नागरिक राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा सेवा (NHIS) के दायरे में है.

राजधानी सोल के डॉक्टर ब्रैंडन बी. सु का कहना है कि इलाज पर कम ख़र्च होने के कारण दक्षिण कोरिया में इमेजिंग और प्रयोगशाला परीक्षण बड़े पैमाने पर किए जाते हैं.

कोविड-19 प्रकोप होने पर कई लोगों का परीक्षण जल्दी हो गया जिससे समय रहते इसे रोकने के उपाय कर लिए गए.

सरकार ने मास्क ख़रीदने की नई प्रणाली बनाकर आपूर्ति को स्थिर कर दिया. जन्म के साल के आख़िरी अंक के आधार पर मास्क ख़रीदने की व्यवस्था बनाई गई.

सोल की ऑफ़िस वर्कर योंगबॉक ली कहती हैं, "कई जगहों पर इमारतों में घुसने से पहले शारीरिक तापमान लिया जाता है. बड़ी इमारतों में थर्मल कैमरे भी लगाए गए."

कोरिया सेंटर फ़ॉर डिज़ीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन और दूसरी सरकारी एजेंसियां कड़ी मेहनत कर रही हैं और लोग उनके प्रयासों की तारीफ़ भी कर रहे हैं."

दक्षिण कोरिया में निजी बीमा भी बहुत लोकप्रिय है. 77 फ़ीसदी नागरिकों ने इलाज के उन ख़र्चों को भी कवर कराया है जो NHIS के दायरे में नहीं हैं.

बीमा कवर देखभाल की गुणवत्ता बढ़ाने और नई तकनीक तक पहुंच बढ़ाने में बोनस हो सकता है लेकिन सु का कहना है कि "हमें अधिक मूल्य-आधारित स्वास्थ्य सेवा मॉडल की ज़रूरत है."

कुल मिलाकर, दक्षिण कोरिया की शुरुआती सफलता ने उम्मीद जगाई है. सु कहते हैं, "लोगों ने बाहर निकलना शुरू कर दिया है, हालांकि सभी लोग हर समय मास्क लगाते हैं."

दायगू दक्षिण कोरिया का सबसे अधिक प्रभावित इलाका है. यहां की वोन-जियोंग वांग को लगता है कि हालात सामान्य हो रहे हैं.

"हम पड़ोस के मोहल्ले तक टहल आते हैं लेकिन भीड़-भाड़ या बंद जगहों पर जाने से बचने की कोशिश करते हैं. मुझे लगता है कि सुरक्षा के लिए अभी घर पर रहना सही है."

वांग उस दिन का इंतज़ार कर रही हैं जब वह बच्चों को लेकर पार्क और मनोरंजन पार्कों में जा सकें.

इसरा

वुहान से फैलने वाले कोविड-19 वायरस पर नज़र रखने और उसके लिए तैयारी करने में शायद ही किसी दूसरे देश ने इसराइल जैसी तेज़ी दिखाई. हेल्थ इंडेक्स में वह 11वें नंबर पर है.

जनवरी के आख़िर में ही इसराइल के स्वास्थ्य मंत्री ने पीपुल्स हेल्थ ऑर्डिनेंस पर दस्तख़त करके वायरस के संभावित प्रसार की स्थिति में मंत्रालय का अधिकार बढ़ा लिए.

सरकारी उपायों में शामिल थे- गैर-ज़रूरी विदेश यात्राओं से परहेज़ कराना और "हॉटस्पॉट" से आने वाले लोगों को 14 दिन घर पर अलग रखना.

शुरुआत में ये उपाय बहुत सख़्त लगे थे लेकिन इनसे संक्रमण की दर कम रखने में मदद मिली.

इसराइल के बराबर आकार के दूसरे देशों के मुक़ाबले यहां कम लोग अस्पताल में भर्ती हुए. जांच भी सटीक होने लगी.

तेल अवीव यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉक्टर खितम मुहसेन कहते हैं, "केंद्रीय वायरोलॉजी प्रयोगशाला ने नाक और गले के नमूने में कोरोना वायरस का पता लगाने के लिए RT-PCR टेस्ट का तरीका बहुत ज़ल्दी विकसित कर लिया."

डॉ. मुहसेन कोविड-19 संकट के बारे में स्वास्थ्य मंत्रालय के सलाहकार हैं. वह कहते हैं, "प्रति 10 लाख आबादी पर टेस्ट की संख्या के मामले में इसराइल दुनिया के अग्रणी देशों में है."

तेल अवीव के कफ़ार सबा में रहने वाली तालिया क्लेन पेरेज़ को गर्व है कि उनके देश में परीक्षण की दर ज़्यादा है और मृत्यु दर बहुत कम है. वह क्वारंटीन के बारे में लिए गए शुरुआती फ़ैसलों को इसका श्रेय देती हैं.

सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली से भी मदद मिली. इसराइल में कोरोना का सबसे पहले इलाज शुरू करने वाले शेबा मेडिकल सेंटर के उप महानिदेशक प्रोफेसर आर्नोन आफ़ेक कहते हैं, "लोग इलाज के लिए मदद मांगने से नहीं घबराते क्योंकि उनको पता है कि इसके लिए उनको कुछ भी ख़र्च नहीं करना पड़ेगा."

"स्वास्थ्य प्रणाली में लागत बहुत अहम होती है क्योंकि इस जैसी परिस्थितियों में आप चाहेंगे कि अगर किसी को लक्षण हो तो वह मदद मांगें ताकि आप उनको खोजकर वायरस का प्रसार रोक सकें."

आफ़ेक के मुताबिक एक कमी यह है कि इसराइल अपनी जीडीपी का पर्याप्त हिस्सा स्वास्थ्य पर ख़र्च नहीं करता. "हालांकि इसका मतलब यह भी है कि हम बहुत दक्ष हैं, बहुत सक्रिय है और ज़ल्दी सीखते हैं."

"शेबा में हम हमेशा दो कदम आगे की सोचते हैं और संकट आने से पहले उसे हल करने की कोशिश करते हैं."

"हमने पहले अनुमान लगाया और कोरोना वायरस के रोगियों के लिए अलग आईसीयू बनाया. अतिरिक्त डॉक्टरों को वहां काम करने का प्रशिक्षण दिया. जब मरीज़ आए तो हम बिल्कुल तैयार थे."

इसराइल की आबादी विविध है. अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स समुदाय पारंपरिक मीडिया से दूर रहता है. उसमें दूसरे समुदायों के मुक़ाबले वायरस ज़्यादा फैला.

सरकार उन तक अलग तरीक़े से पहुंची और वे वायरस रोकने के उपायों में साथ देने के लिए तैयार हो गए.

जर्मनी

यूरोप के कई देशों के मुक़ाबले कम मृत्यु दर वाला जर्मनी सूचकांक में 12वें नंबर पर है.

कोविड-19 से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए उसकी दुनिया भर में तारीफ़ हुई, लेकिन विशेषज्ञों को लगता है कि जर्मनी अभी संकट से बाहर नहीं निकला है.

बर्लिन में यूरोपियन स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट के प्रोफ़ेसर फ्रांसिस डी वेरिकोर्ट को लगता है कि टेस्टिंग ज़्यादा करने से यह धारणा बनी कि जर्मनी की तैयारी बहुत अच्छी है और मृत्यु दर कम है.

हालांकि परीक्षण की व्यापक क्षमताओं की वजह से ही बीमार और बिना लक्षण वाले लोगों को स्वस्थ आबादी से अलग करने में क़ामयाबी मिली, जिससे वायरस का प्रसार रोकने में मदद मिली.

देश तैयार न हो तो संक्रमण की कम दर नुकसान पहुंचा सकती है. कम लोगों को कोविड-19 होने का मतलब है कि कम लोग इससे सुरक्षित हैं.

वेरिकोर्ट कहते हैं, "अपनी आदतों और सोशल डिस्टेंसिंग के उपायों में ढील तभी दी जा सकती है जब देश में कोविड-19 के मामले करीब-करीब ख़त्म हो जाएं वरना दूसरी बार प्रसार हो सकता है."

लोग इस बात के लिए तैयार हैं कि हालात ज़ल्दी सामान्य नहीं होने वाले फिर भी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी है.

मुर्नो एम. स्टैफेल्सी में रहने वाली इनग्रिड ग्रुह्स की सबसे बड़ी परेशानी अपनी मां को यह समझाने में होती है कि घर से बाहर नहीं जाना है.

उनकी मां को खरीदारी करना पसंद है इसीलिए ग्रुह्स ने उनके लिए मास्क बनाया और अपने साथ बाहर ले गईं.

"अब जबकि नये संक्रमण की तादाद घट रही है मुझे लगता है कि अब हमारे लिए ढील के बारे में सोचने का सही वक्त है. मुझे विश्वास है कि सरकार लोगों को बचाने और ज़िंदगी सामान्य बनाने के लिए सही फ़ैसले करेगी."

जर्मनी में संघीय ढांचा है जिसमें राज्यों के पास पर्याप्त अधिकार हैं. ब्रिटेन या फ्रांस के उलट यहां कोई एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं है.

वेरिकोर्ट कहते हैं, "बहुत अधिक बेड उपलब्ध हैं, आईसीयू और डॉक्टर उपलब्ध हैं." इन संसासधों का प्रबंधन विकेंद्रीकृत है, इस तरह स्थानीय सरकारों पर अधिक जिम्मेदारी आ गई है.

इसका मतलब है कि सभी पार्टियों की भी ज़िम्मेदारी है. इससे सहयोग को बढ़ावा मिलता है जो महामारी को रोकने और मरीजों की देखभाल में बहुत अहम है."

टेक्नीश यूनिवर्सिटी म्यूनिशन की छात्र लॉरा ग्रुह्स का कहना है कि उनको जर्मनी में रहने का गर्व है और सरकार ने लॉकडाउन करके बहुत बढ़िया काम किया है.

"मैंने ब्यूनस आयर्स में जुलाई से शुरू होने वाले सेमेस्टर में जाने की योजना बनाई थी जो अब शायद नहीं हो पाएगा. मैं निराश हूं लेकिन मैं बहुत भाग्यशाली हूं, इसलिए मुझे पाबंदियों को लेकर कोई शिकायत नहीं है."

असली परीक्षा मेडिकल सप्लाई चेन की है, जिसमें हॉस्पिटल स्टाफ, बेड, वेंटिलेटर और पीपीई किट के अलावा और भी बहुत कुछ हैं.

जैसे यूरोप के कई देशों में सैनेटाइजर का स्टॉक ख़त्म हो गया. जर्मन में हैंड जेल उपलब्ध थे लेकिन उनको रखने के लिए प्लास्टिक बोतल नहीं थे.

वेरिकोर्ट कहते हैं, "हेल्थकेयर सप्लाई चेन में आप इन सब चीज़ों के बारे में सोचते भी नहीं हैं."

ऑस्ट्रेलिया

हेल्थ पिलर इंडेक्स में ऑस्ट्रेलिया 18वें नंबर पर है. ऑस्ट्रेलिया कोविड-19 बढ़ने की दर 5% से नीचे रखने में क़ामयाब रहा.

यह की स्वास्थ्य व्यवस्था मिश्रित है. मेडिकेयर से सबको कवर किया गया है, साथ ही निजी अस्पताल भी हैं जिन्होंने देश को सबसे बुरी स्थिति के लिए तैयार रहने में मदद की.

मेलबर्न यूनिवर्सिटी में सीनियर लेक्चरार डॉ. एलेक्स पोलिकोव कहते हैं, "हमारी दो-स्तरीय व्यवस्था आपातकालीन सेवाओं और आईसीयू बेड की मांग में संभावित बढ़ोतरी को पूरा करने के लिए तैयार है."

"संघीय और राज्य सरकारों ने सभी गैर-ज़रूरी सर्जरी को स्थगित करने का निर्देश दिया है. इससे निजी अस्पतालों को कोविड-19 मरीजों के लिए तैयार होने का मौका मिल गया."

संघीय सरकार निजी अस्पतालों के बेड और स्टाफ के बदले पैसे चुकाने के लिए तैयार हो गई जिससे ऑस्ट्रेलिया की क्षमता दोगुनी हो गई.

यहां स्थानीय संक्रमण के कम मामले हुए. सरकार ने तेज़ी से कांटैक्ट ट्रेसिंग की और विदेश से लौटे लोगों या संक्रमण की चपेट में आए लोगों के संपर्क में आने वाले सभी लोगों के लिए अनिवार्य क्वॉरंटीन लागू किया.

पोलिकोव कहते हैं, "यदि स्थानीय संक्रमण रोका जा सकता है तो मैं लंबे दौर में रोज़ाना बहुत कम मामले बढ़ने की उम्मीद करता हूं."

'स्टोक्ड फॉर ट्रैवेल' पर ब्लॉग लिखने वाले क्रिस स्टीवेन्स कहते हैं, "जब कोविड-19 महामारी वास्तव में फैलनी शुरू हुई तो मैं श्रीलंका में था. वहां मामले तेज़ी से बढ़े जिससे 48 घंटे के नोटिस पर मुझे वहां से निकलना पड़ा."

"मेरे पास दो विकल्प थे- यूरोप में अपने माता-पिता के घर लौट जाऊं या ऑस्ट्रेलिया में अपने भाई के घर चला आऊं."

40 साल पैरामेडिक का काम कर रहे उनके पिता ने ऑस्ट्रेलिया को बेहतर विकल्प बताया. स्टीवेन्स यहां आए तो उनको 14 दिन क्वारंटीन में रहना पड़ा.

यदि मौजूदा रुझान जारी रहता है तो उम्मीद है कि ऑस्ट्रेलिया का हेल्थकेयर सिस्टम वेंटिलेटर और आईसीयू बेड की मांग में होने वाली बढ़ोतरी के लिए तैयार है. पोलिकोव निजी अस्पतालों के साथ की गई व्यवस्था से संतुष्ट हैं.

शटडाउन में ढील मिलने के बाद लोग सामान्य ज़िंदगी जीने का इंतज़ार कर रहे हैं.

सिडनी में रहने वाली जेनिफर डी लुका कहती हैं, "मैं अपने सबसे अच्छे दोस्त के साथ पसंदीदा कैफ़े में एक कप कॉफी पीना चाहती हूं. यह काम मैं पहले हर हफ़्ते करती थी और इस पर कभी ग़ौर भी नहीं करती थी."

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