समुद्र से निकले इन सिक्कों की अनसुलझी गुत्थी

    • Author, ब्रीना केर
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

समंदर अपनी गहराइयों में इंसानियत के हज़ारों राज़ छुपाए हुए है. गाहे-बगाहे गोताखोरी के शौक़ीन ऐसे राज़ समंदर की तलहटी से निकाल लाते हैं.

चलिए, आज आप को ले चलते हैं इसरायल के एक छोटे से शहर की सैर पर. ये वो शहर है, जो पिछले क़रीब दो हज़ार साल से आबाद है. जो यूनानी और रोमन साम्राज्य का भी हिस्सा रहा. मुस्लिम ख़लीफ़ाओं ने भी इस पर राज किया. एक दौर ऐसा भी था, जब यहां पर यहूदी सौदागरों का बसेरा हुआ करता था.

इस इसरायली शहर का नाम है-सीज़रिया. ये शहर इसरायल में भूमध्य सागर के किनारे पर है. सीज़रिया रोमन काल के अपने विशाल खंडहरों के लिए मशहूर है. यहां के समुद्र में अक्सर गोताखोर डुबकी लगाने के लिए जमा होते हैं.

सिक्कों से जुड़ीं इतिहास की कड़ियां

हाल ही में यहां पर क़रीब डेढ़ हज़ार साल पुराने ख़ज़ाने के कुछ सिक्के मिले हैं. असल में इसरायल के ज़्वीका फेयर को समुद्र में डुबकी लगाकर उसके अंदर के नज़ारे निहारना बहुत पसंद है.

हाल ही में जब वो समुद्र की तलहटी में उतरे, तो उन्हें कुछ चीज़ें चमकती सी दिखीं. ऊपर तूफ़ान आने का डर था. उन्हें जल्दी से जल्दी लौटना था. मगर ये चमक देखकर फेयर की आंखें भी चमक उठीं. वो उस चमकीली चीज़ के पास पहुंचे, तो देखा कि वो बहुत पुराने सोने के सिक्के थे. वो सारे के सारे सिक्के समेटकर बाहर आ गए.

तूफ़ान की वजह से वो अगले दिन ही दोबारा डुबकी लगा सके. फेयर और उनके साथियों को दोबारा और भी सिक्के मिले. ये सिक्के शायद किसी पुराने ख़ज़ाने का हिस्सा थे, जो किसी जहाज़ से समंदर में गिर गए थे. इन सिक्कों के मिलने की ख़बर उन्होंने फ़ौरन इसरायल के अधिकारियों को दी.

पहले तो अधिकारियों ने नाक-भौं सिकोड़ी. फिर जब वो फेयर और उनके साथियों के साथ समुद्र में उस जगह पहुंचे, तो वहां मिले ख़ज़ाने को देखकर उनकी आंखें फटी रह गईं. वहां पर बड़ी तादाद में शुद्ध सोने के सिक्के बिखरे हुए थे.

जांच में पता चला कि ये सिक्के क़रीब डेढ़ हज़ार साल पुराने थे. इन सिक्कों की वजह से सीज़रिया के इतिहास का एक बड़े ग़ायब हिस्से की कड़ियां जुड़ गई हैं.

सीज़रिया इसरायल की राजधानी तेल अवीव और हैफ़ा शहरों के बीच स्थित है. यहां के रोमन काल के खंडहरों को देखने बड़ी तादाद में सैलानी आते हैं. इस वजह से यहां एक अजायबघर और रेस्टोरेंट बनाया गया है. यहां एक गोल्फ़ कोर्स और रिहाइशी बस्ती भी बनाए गए हैं.

रोमन बादशाह के नाम पर शहर का नाम

लेकिन, जब आप इसके नुकीले बंदरगाह के तट पर खड़े होकर यूनान, साइप्रस और तुर्की की तरफ़ निहारते हैं, तो लगता है कि आप किसी और ही दौर में चले गए हैं. समंदर का नीला रंग और आस-पास बिखरे खंडहर आप को किसी और ही वक़्त में ले जाते हैं.

सीज़रिया में पहली इमारत यूनानियों ने बनाई थीं. ये इमारतें ईसा से चार सदी पहले बनाई गई थीं. बाद में इस शहर पर मिस्र की मशहूर महारानी क्लियोपेट्रा का राज हो गया. उस वक़्त सीज़रिया का नाम स्ट्रेटन पाइरोग्स हुआ करता था. बाद में रोमन राजाओं ने इस शहर पर क़ब्ज़ा जमा लिया. रोमन साम्राज्य ने स्थानीय सामंत हेरोड महान को शहर पर प्रशासन की ज़िम्मेदारी सौंपी. हेरोड ने रोम के आक़ाओं को ख़ुश करने के लिए शहर का नाम बदलकर रोमन बादशाह सीज़र के नाम पर सीज़रिया रख दिया.

हेरोड के राज में सीज़रिया ने ख़ूब तरक़्क़ी की. समुद्र की लहरों से बचाने के लिए किनारे पर दीवार बनवाई गई. कारोबार करने के लिए यहां से गुज़रने वालों के लिए सराय बनवाए गए. एक नहर भी यहां बनी, ताकि पानी की किल्लत न हो.

उस दौर में यहां रथों की दौड़ के मुक़ाबले होते थे. इसे देखने वालों के लिए सीज़रिया में बीस हज़ार लोगों के लिए एक खुला थिएटर भी बनवाया गया. ईस्वी 6 तक ये अहम रोमन गढ़ बन गया था. इसे रोमन सूबे जूडिया की राजधानी बना दिया गया. ईसा के दौर में यहां पर रोमन गवर्नर पोंटियोस पाइलेट का राज हुआ करता था.

मुस्लिम राज में शहर का गौरव ख़त्म

66 से 70 ईस्वी के बीच यहूदियों ने रोमन साम्राज्य के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी. येरूशलम को तबाहो-बर्बाद कर दिया गया. इसके बाद रोमन शासकों ने सीज़रिया को ही अपनी राजधानी बना लिया. अगले क़रीब छह सौ सालों का सीज़रिया का इतिहास बेहद शानदार रहा. ये रोमन साम्राज्य का एक अहम ठिकाना बना रहा.

640 ईस्वी में मुस्लिमों ने इस शहर पर धावा बोलकर अपना क़ब्ज़ा जमा लिया. इसके बाद से सन 1800 तक का सीज़रिया के इतिहास को लेकर ज़्यादा जानकारी मौजूद नहीं थी.

लेकिन, समंदर में मिले इन सिक्कों की वजह से सीज़रिया के इतिहास की एक बहुत बड़ी पहेली सुलझ गई है. इसरायल के इतिहासकार जैकब शर्विट कहते हैं कि पहले ये माना जाता था कि मुस्लिम राज में सीज़रिया का गौरव ख़त्म हो गया था.

ये मछुआरों का छोटा सा गांव भर बन कर रह गया था. लेकिन अब इन सिक्कों के मिलने से साफ़ है कि मुस्लिम राज में भी सीज़रिया ख़ूब फल-फूल रहा था. ये कारोबार और सियासत का बड़ा केंद्र था.

जैकब शर्विट कहते हैं कि फेयर और उनके साथियों को समंदर की गहराई में जो सिक्के मिले, वो हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराने हैं. इन सिक्कों में 95 फ़ीसद तक शुद्ध सोना इस्तेमाल हुआ है. इन्हें उस दौर में दीनार कहा जाता था. ये सिक्के मुस्लिम ख़लीफ़ाओं के दौर के हैं.

शर्विट की नज़र में ये छोटे-छोटे सिक्के अपने दौर की कहानी सुनाने वाले क़िस्सागो हैं. इन सिक्कों पर दर्ज़ तारीख़ के मुताबिक़, ये ख़लीफ़ा अल हकीम और उनके बेटे अल ज़हीर के दौर के हैं. अल हकीम ने सन 996 से 1021 तक राज किया. वहीं, अल ज़हीर का राज 1021 से 1036 के बीच रहा था.

सिक्कों के निशान बताते हैं कि इन्हें मिस्र की राजधानी काहिरा और सिसिली के शहर पालेर्मो में ढाला गया था. इन पर दांत के निशान भी मिले हैं. इससे पता चलता है कि उस दौर में लोग दांत से दबाकर सिक्कों की शुद्धता की पड़ताल किया करते थे.

शर्विट कहते हैं कि इन सिक्कों से साफ़ है कि मुस्लिम युग में भी सीज़रिया एक धनी-मानी शहर था. यहां सोने के सिक्कों की मदद से कारोबार होता था. एक सिक्का एक सैनिक की महीने भर की तनख़्वाह हुआ करता था. फेयर और उनके साथियों ने समंदर से जितने सिक्के निकाले, उनसे दो हज़ार सैनिकों को एक महीने की तनख़्वाह दी जा सकती है.

सिक्कों की गुत्थी अनसुलझी

शर्विट और दूसरे इतिहासकार ये नहीं समझ पा रहे हैं कि आख़िर ये सिक्के समंदर में कैसे पहुंचे. शायद, ये किसी जहाज़ से गिर गए, जब वो हादसे का शिकार हो गया होगा.

अटकलें लगाई जा रही हैं कि शायद इन सिक्कों को काहिरा भेजा जा रहा था, जो उस वक़्त ख़लीफ़ाओं की सल्तनत का अहम केंद्र था. ऐसा भी हो सकता है कि उस वक़्त यूरोप से आने वाले ईसाई हमलावरों से बचाने के लिए ये सिक्के काहिरा भेजे जा रहे हों.

असली कहानी क्या है, ये तो हमें शायद ही पता चले. लेकिन इन सिक्कों को छूने का एहसास ही अलग है. फेयर कहते हैं कि ये सिक्के हज़ार या दो हज़ार साल से समंदर में अनछुए पड़े हुए थे. वो मानते हैं कि उन्होंने समंदर से सिक्के नहीं, इसरायल के सीज़रिया का डूबा हुआ इतिहास निकाला है.

इन सिक्कों के मिलने से फेयर और उनके साथियों का हौसला बढ़ गया है. अब वो समंदर में और भी ख़ज़ाने तलाशने में जुट गए हैं.

सीज़रिया, इसरायल ही नहीं मध्य-पूर्व के इतिहास का प्रमुख ठिकाना है. सच तो ये है कि ये मानवता के इतिहास में मील का पत्थर है.

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