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कोरोना वायरस: आपदा के दौर में साज़िशों के क़िस्से मशहूर क्यों हो जाते हैं?
- Author, ज़ारिया गॉरवेट
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
कोविड-19 की महामारी फैलने के साथ साथ इससे जुड़ी साज़िशों के क़िस्से भी पूरी दुनिया में तेज़ी से फैले.
इसमें सोशल मीडिया से लेकर सियासी नेताओं तक का भरपूर योगदान रहा.
सोशल मीडिया पर साज़िश का ये क़िस्सा फैला कि कोरोना वायरस के प्रकोप के पीछे 5G तकनीक है.
तो, चीन और अमरीका ने एक दूसरे पर ये इल्ज़ाम लगाया कि ये वायरस लैब में जैविक हथियार के तौर पर बनाया गया है.
साज़िशों के ऐसे क़िस्से हर आपदा के साथ फैलते हैं. और ये सिलसिला बहुत पुराना है.
किसी बीमारी के फैलने से लेकर, दुश्मन के हमले तक, लोगों को साज़िशों के तार नज़र आने लगते हैं.
इतिहास क्या बताता है?
ईसा से 331 साल पहले रोम में अचानक बहुत से अमीर लोगों की रहस्यमय तरीक़े से मौत होने लगी.
ये सिलसिला बढ़ा तो एक दासी ने आकर जांच करने वालों से दावा किया कि कुछ बड़े घरों की महिलाएं इसके पीछे हैं, जो एक काढ़ा तैयार कर रही हैं.
इसे ही पीकर मर्दों की मौत हो रही है. जब इन महिलाओं से पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वो तो दवा तैयार कर रही थीं.
कुछ महिलाओं को ये दवा पिलाई गई, तो उनकी मौत हो गई. इससे उस दासी की साज़िश वाली कहानी को और बल मिला.
हालांकि, सदियों बाद आज जब इस क़िस्से का बारीक़ी से विश्लेषण किया जाता है, तो पता ये लगता है कि रोम के वो रईस शायद प्लेग से मर रहे थे.
हिंसक घटनाओं की ख़बरें
मगर, लोगों को उस बीमारी की ठीक समझ नहीं थी, तो ठीकरा उन महिलाओं पर फोड़ दिया गया, जिनसे उस दौर का रोमन समाज डरता था.
साज़िशों के साथ यही मसला है. लोग सहजता से बिना तर्क वितर्क किए उस पर भरोसा कर लेते हैं.
जैसे कि कोविड-19 की महामारी के पीछे 5G तकनीक का हाथ होने की साज़िश का दावा.
ब्रिटेन में इस अफ़वाह के फैलने के बाद कई टेलीफ़ोन लाइनों और संचार के इंजीनियरों पर हमले हुए. अमरीका से भी ऐसी ही हिंसक घटनाओं की ख़बरें आईं.
जबकि, इन बातों का हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं था. सवाल ये है कि आख़िर साज़िशों के ऐसे क़िस्से मशहूर क्यों हो जाते हैं?
जनता को इनमें क्या दिखता है कि वो ऐसे बेबुनियाद दावों पर भरोसा कर लेते हैं? और, क्या हम साज़िशों के इन क़िस्सों से कोई सबक़ सीख सकते हैं?
एक विलेन की तलाश
साज़िश के किसी भी क़िस्से के मशहूर होने की पहली शर्त यही है. खलनायक ऐसा होना चाहिए जिस पर सहजता से विश्वास हो जाए.
कोरोना वायरस को लेकर जो भी अफ़वाहें फैलीं, उनके पीछे जो विलेन बताए गए, उन्हें लेकर पहले से ही अविश्वास का माहौल था.
नतीजा ये कि साज़िशों के क़िस्से मशहूर होने में देर नहीं लगी.
साझा चिंताएं
केंट यूनिवर्सिटी की सामाजिक मनोविज्ञानिक कैरेन डगलस कहती हैं, "पूरी दुनिया में लोग ऐसी साज़िशों पर सहज ही भरोसा कर लेते हैं, जो सांस्कृतिक और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़े होते हैं. जो ख़ास जगहों पर हुई होती हैं. जिनमें धार्मिक अल्पसंख्यक, अमीर लोग, दुश्मन देश और रहस्यमयी तकनीकें शामिल होती हैं."
हर समाज में अपनी चिंताएं होती हैं. लोगों की सनक होती है.
साज़िशों के जो क़िस्से कामयाब होते हैं, वो इनका लाभ उठाते हैं. जैसे कि, भारत में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ माहौल, जो तमाम पूर्वाग्रहों के कारण पैदा हुआ है.
या फिर, अमरीका में नस्लवादी सोच के चलते अक्सर गोरे और अश्वेत लोगों के बीच साज़िशों के क़िस्से पनपते हैं.
क़बीलावाद
कैरेन डगलस कहती हैं, "अक्सर आप देखते हैं कि किसी देश के ख़ास समूह या लैंगिक समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर साज़िशों के क़िस्से मशहूर किए जाते हैं. इस बात के कई सबूत मिलते हैं कि लोग अक्सर अपने पूर्वाग्रहों के हिसाब से साज़िशों की बात को सही मानने लगते हैं."
अनिश्चितता का माहौल
कैरेन डगलस कहती हैं कि जब भी अनिश्चितता का माहौल होता है, या संकट आता है, तो लोग साज़िशों की कहानियों पर ज़्यादा यक़ीन करने लगते हैं.
जैसे कि कोविड-19 को लेकर फैली अफवाह कि इसके पीछे 5G तकनीक है. अभी ये संकट गहराया ही नहीं था कि 5G तकनीक को निशाना बनाकर क़िस्से गढ़ लिए गए.
इसकी दो वजहें थीं. पहली तो ये कि नई तकनीक को लेकर तरह तरह की आशंकाएं पहले से ही थीं.
और दूसरी बात इसके पीछे चीन की नीयत पर भी बहुत से लोगों को शक था. नतीजा ये कि वायरस से तेज़ी से साज़िश का ये क़िस्सा फैल गया.
किसी भी साज़िश के दावे के पीछे एक अच्छी कहानी के सारे किरदार होने ज़रूरी हैं. एक डराने वाला खलनायक, नैतिक सबक़ और तार्किक प्लॉट.
अक्सर, लोग अपनी धार्मिक आस्थाओं के कारण भी साज़िशों के ऐसे दावों पर सहजता से भरोसा कर लेते हैं.
जानकारी का अभाव
किसी आपदा के समय सरकार या भरोसेमंद संस्था की ओर से जानकारी की कमी भी साज़िश के दावों को बढ़ावा देती है.
आज, बहुत सी संस्थाओं पर जनता का भरोसा कम हो गया है.
ऐसे में सोशल मीडिया पर साज़िश का कोई भी दावा बड़ी तेज़ी से लोकप्रिय हो जाता है. फिर उसे झुठलाने में बरसों लग जाते हैं.
बदनीयती वाली साज़िश
कई बार सियासी लीडर, अपने हित साधने के लिए साज़िशों के क़िस्से को बढ़ावा देते हैं.
साल 2016 के अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में हिलेरी क्लिंटन के एक सहयोगी पर बच्चों का सेक्स रैकेट चलाने के आरोप लगे थे.
दावा किया गया था कि ये सेक्स रैकेट पिज़्ज़ा की एक दुकान के बेसमेंट में चल रहा था. सच ये था कि पिज़्ज़ा की इस दुकान के नीचे कोई बेसमेंट तक नहीं था.
फिर भी, हिलेरी क्लिंटन को बदनाम करने वाली ये साज़िश महीनों तक हवा में तैरती रही.
डार्टमाउथ कॉलेज, न्यू हैम्पशायर के राजनीति विज्ञानी रसेल म्योरहेड को एक अलग चिंता सता रही है.
वो कहते हैं कि पहले साज़िशों के ये क़िस्से कमज़ोर तबक़े का हथियार हुआ करते थे. जो अमीरों और ताक़तवर लोगों को निशाना बनाने के काम आते थे.
ट्रंप इसकी बड़ी मिसाल हैं...
मगर, अब षडयंत्रों की ऐसी कहानियों को बड़े बड़े नेता बढ़ावा देते हैं. ताकि अपने राजनीतिक हित साध सकें. अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप इसकी बड़ी मिसाल हैं.
जो अपने विरोधियों पर बेलगाम होकर इल्ज़ाम लगाते हैं.
रसेल म्योरहेड का कहना है कि आने वाले समय में अगर राजनेताओं का यही रवैया रहा, तो आम जनता को इसके बहुत बुरे नतीजे भुगतने होंगे.
साज़िशों के ऐसे क़िस्सों से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
रसेल म्योरहेड कहते हैं, "आज सरकारों से, संस्थाओं पर से और विशेषज्ञों पर से लोगों का भरोसा उठ चुका है. वो लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी यक़ीन नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे में ज़रूरत ऐसी संस्थाओं और व्यवस्थाओं में फिर से यज़ीन जगाने की है."
कैरेन डगलस कहती हैं, "तमाम रिसर्च से ये बात साबित होती है कि हम साज़िशों के युग में जी रहे हैं. मगर इसके कोई पक्के सबूत हमारे पास नहीं हैं."
ऐसे में कब, कहां और कैसे, किस नई साज़िश की कहानी का जन्म होगा, किसी को नहीं पता.
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