भारत में कोरोना वायरस का क़हर क्या गर्मी बढ़ने से ख़त्म हो जाएगा?

कोरोना का संकट

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भारत में कोरोनावायरस के मामले

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स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

कुछ लोगों का मानना है कि जैसे-जैसे तापमान में वृद्धि होगी कोरोना वायरस का प्रकोप ख़त्म होता जाएगा. लेकिन जानकार कहते हैं कि महामारियां, आमतौर पर मौसमी बीमारियों के वायरस जैसी नहीं होतीं.

ऐसी बहुत सी बीमारियां हैं जो मौसम बदलते समय सिर उठाती हैं. जैसे ही मौसम स्थिर होता है, वो ख़त्म हो जाती हैं. मौसमी बुख़ार इसकी सबसे आम मिसाल है.

इसी तरह टायफ़ाइड या ख़सरा अक्सर गर्मी के मौसम में सिर उठाती है. मैदानी इलाक़ों में ख़सरा अक्सर गर्मी के मौसम में पैर फैलाता है. जबकि, उष्णकटिबंधीय इलाक़ों में ये बीमारी सूखे मौसम में सबसे ज़्यादा फैलती है.

कोविड-19 वायरस सबसे पहले चीन में दिसंबर महीने में फैलना शुरू हुआ था. और तभी से ये वायरस लगातार फैल रहा है. अमरीका और यूरोप के देशों में भी इसने क़हर बरपाया हुआ है. अभी तक देखा गया है कि ठंडे इलाक़ों में ये काफ़ी तेज़ी से फैल रहा है.

वहीं जिन इलाक़ों में अभी थोड़ा सर्द और थोड़ा गर्म मौसम है वहां इसकी रफ़्तार धीमी है. लिहाज़ा माना जा रहा है कि गर्मी का मौसम शुरू होने के साथ ये वायरस ख़त्म हो जाएगा. हालांकि बहुत से जानकार, अभी भी इस बात से सहमत नहीं हैं.

कोविड-19 असल में सार्स (SARS) कोरोना वायरस के परिवार से है. इस नए कोरोना वायरस का आधिकारिक नाम कोविड-19 ही है.

सार्स वायरस 2003 में फैला था और इतने कम समय में ख़त्म हो गया कि रिसर्चरों को इसके मौसमी चक्र के बारे में पता लगाने का मौक़ा ही नहीं मिला. इसीलिए रिसर्च के लिहाज़ से ये वायरस बहुत ही नया है. लेकिन कोरोना वायरस परिवार के अन्य सदस्यों से हमें कोविड-19 के बारे में कई इशारे मिलते हैं.

10 साल पहले ब्रिटेन में एक स्टडी की गई थी. इसमें तीन तरह के कोरोना वायरस के सैम्पल ऐसे मरीज़ों से लिए गए थे जिन्हें सांस के ज़रिए संक्रमण हुआ था.

वहीं एक सैम्पल ऐसे मरीज़ से लिया गया था जिसे सर्जरी के दौरान संक्रमण हुआ था. इन सभी में वायरस का मौसमी चक्र नज़र आता है. इससे इशारा मिला कि तीन तरह के कोरोना वायरस दिसंबर से अप्रैल महीने के बीच सक्रिय होते हैं. जबकि सर्जरी वाले मरीज़ को संक्रमित करने वाला चौथा वायरस रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमज़ोर करने वाला था.

फ़िलहाल तो रिसर्चर यही मान रहे हैं कि कोविड-19 ठंडे और सूखे माहौल में ही पनपता है. लेकिन अभी जिन देशों में इस वायरस ने पनाह ली है, उनमें बहुत गर्म और उमस वाले देश भी शामिल हैं. हालांकि बहुत सी अप्रकाशित रिसर्च में यही दावा किया गया है कि बढ़ता तापमान इस वायरस की गति को धीमा कर देगा. लेकिन, बहुत से जानकार इससे सहमत नहीं हैं. फ़िलहाल रिसर्चर सिर्फ़ कंप्यूटर मॉडलिंग पर ही यक़ीन कर रहे हैं और उसी के आधार पर बात कर रहे हैं.

वायरस पर मौसम का असर नहीं?

जानकारों का कहना है कि महामारियां अक्सर आम बीमारियों के मौसम चक्र की पाबंद नहीं होतीं. मिसाल के लिए स्पेनिश फ़्लू भीषण गर्मी के मौसम में अपने चरम पर पहुंचा था. वहीं कई अन्य महामारियां सर्दी के मौसम में फैली थीं.

स्वीडन में संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ जैन एल्बर्ट को उम्मीद है कि आगे इस वायरस पर मौसम का असर नहीं पड़ेगा. अगर ऐसा होता है तो आगे चलकर कोविड-19 एक स्थानीय वायरस बनकर रह जाएगा. लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या उस वक़्त भी ये वायरस एक महामारी बनने की क्षमता रख पाएगा. फ़िलहाल तो रिसर्चर इसकी संभावना देख ही रहे हैं.

गर्मी का मौसम

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'कोरोना' वायरस के पूरे परिवार को- 'एनवेलप्ड वायरस' कहते हैं. इन वायरस पर प्रोटीन की एक परत होती है. इसे कोरोना इसलिए कहते हैं कि इसकी सतह पर क्राउन या ताज की तरह नोकें निकली दिखती हैं. वायरस के इस परिवार में नया सदस्य है कोविड-19. इस तरह के प्रोटीन की परत वाले वायरस में अक्सर मौसम चक्र की मार झेलने की क्षमता अधिक होती है.

रिसर्च पहले ही ये बात साबित कर चुकी हैं कि SARS-Cov-2 40 फ़ीसद उमस और 21 से 23 तापमान के बीच प्लास्टिक और स्टील की सतह पर 72 घंटे ज़िंदा रह सकता है. लेकिन कोविड-19 के बारे में कहा जा रहा है कि ये 4 डिग्री सेल्सियस तापमान में 28 दिन तक ज़िंदा रहने की क्षमता रखता है.

हालांकि, अभी ये साफ़तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इसे ज़िंदा रहने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा और कम से कम कितने तापमान की ज़रूरत है. इस वायरस का उमस से क्या रिश्ता है, ये भी अभी देखना बाक़ी है.

2003 में फैलने वाला सार्स (SARS) वायरस भी ठंडे और ख़ुश्क वातावरण में ही फलता फूलता था. मिसाल के लिए सूखा सार्स वायरस 22 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान और 40-50 फ़ीसद नमी के माहौल में पांच दिन से ज़्यादा संक्रमण फैलाने की क्षमता रखता है. नमी और तापमान जैसे-जैसे बढ़ता है वायरस कमज़ोर पड़ता जाता है.

स्पेन के रिसर्चर स्कॉलर मिगुएल अराजो का कहना है कि वायरस, वातावरण में जितनी देर ज़िंदा रह सकता है, उसका ख़तरा उतना ही गहराता जाता है. SARS-Cov-2 सारी दुनिया में तेज़ी से फैला था. लेकिन इसका सबसे ज़्यादा असर वहीं रहा जहां सूखा और ठंडा वातावरण था.

मरीज़ों की संख्या बढ़ेगी?

मिगुएल अराजो मानते हैं कि अगर कोविड-19 पर मौसम, नमी और तापमान का वही असर पड़ता है, जैसा कि अन्य वायरस पर तो इसका मतलब है कि अलग-अलग समय में कोरोना के मरीज़ों की संख्या तेज़ी से बढ़ेगी.

एक अन्य स्टडी के मुताबिक़ कोविड-19 ऐसे देश और इलाक़ों में तेज़ी से फैला है, जहां औसत तापमान 5 से 11 डिग्री सेल्सियस रहता है. और नमी आमतौर पर कम रहती है. लेकिन उष्णकटिबंधीय देशों में भी खासी संख्या में कोरोना मरीज़ देखने को मिले हैं.

एशिया में तापमान यूरोपीय और अमरीकी देशों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है. फिर भी नया कोरोना वायरस यहां तेज़ी से फैल रहा है. लिहाज़ा कहना मुश्किल है कि ज़्यादा तापमान होने पर कोविड-19 कमज़ोर पड़ जाएगा.

फ़िलहाल कोरोना वायरस इंसानों के संपर्क के कारण बढ़ रहा है. जैसे ही मौसम बदलेगा, इंसान का बर्ताव भी बदलेगा. तब हो सकता है कि कोरोना पर भी इसका असर पड़े.

मिसाल के लिए यूरोप में खसरा का वायरस स्कूल जाने वाले बच्चों में होता है. लेकिन जैसे ही बच्चों के स्कूल की छुट्टियां होती हैं, बच्चों का मिलना-जुलना कम होता है, वायरस भी कमज़ोर पड़ जाता है. चीन में 25 जनवरी को लूनर नए साल का जश्न मनाने के लिए बड़े पैमाने पर लोग वुहान में जमा हुए थे. और वहीं से ये वायरस तेज़ी से फैला.

कोरोना वायरस

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जैसे ही मौसम का चक्र घूमता है तो उसका असर हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी पड़ता है. और हम आसानी से किसी भी वायरस का शिकार हो जाते हैं.

विटामिन डी इसमें काफ़ी अहम भूमिका निभाता है. सर्दी के मौसम में हमें धूप कम मिलती है. हम ठंडी हवा से बचने के लिए शरीर को पूरी तरह ढके रहते हैं. लेकिन बहुत से जानकार इस थ्योरी से सहमत नहीं हैं.

कुछ जानकारों के मुताबिक़ सर्दी के मौसम में हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हो जाती है. जबकि कुछ जानकार कहते हैं कि सर्दी के मौसम में शरीर में ऐसी कोशिकाएं बनने लगती हैं जो शरीर को किसी भी तरह के संक्रमण से बचाने में सहायक होती हैं.

चीन में शोधकर्ताओं ने खोज की है कि उनके यहां उन दिनों में मौत सबसे कम हुईं, जिन दिनों में नमी और तापमान का स्तर ऊंचा था. इनकी रिसर्च से ये भी पता चलता है कि जिन इलाक़ों में न्यूनतम और अधिकतम तापमान और उमस में काफ़ी अंतर था, वहां मौत का आंकड़ा काफ़ी बड़ा था. हालांकि ये रिसर्च कंप्यूटर मॉडलिंग पर ही आधारित हैं. लिहाज़ा कहना मुश्किल है कि यही पैटर्न दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी देखने को मिलेगा.

कोविड-19 अभी एक बिल्कुल नया वायरस है. इसके बारे में सिर्फ़ क़यास ही लगाए जा सकते हैं. अगर आने वाले दिनों में इसके केस घटते हैं, तो उसमें बहुत बड़ा रोल सरकार के उठाए गए क़दम और लोगों के सहयोग का होगा. मौसम का इस वायरस पर कितना असर पड़ता है फ़िलहाल कहना मुश्किल है.

कोरोना वायरस
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