कोरोना वायरस से लड़ाई में सुपरपावर अमरीका क्यों पिछड़ता दिख रहा है?

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- Author, एंथनी ज़र्चर
- पदनाम, उत्तरी अमरीका, संवाददाता
अमरीका में कोरोना वायरस से संक्रमण का पहला मामला सामने आए हुए दो महीने से ज़्यादा वक़्त बीत चुका है. तब से इस वायरस का संक्रमण पूरे अमरीका में फैल चुका है. आज, क़रीब पौने तीन लाख अमरीकी नागरिकों में इस वायरस के संक्रमण का पता लगाया जा चुका है. नए कोरोना वायरस से सात हज़ार से ज़्यादा अमरीकी नागरिकों की मौत हो चुकी है.
अगर हम ये कहें कि आज अमरीका इस वैश्विक महामारी का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है, तो ग़लत नहीं होगा. संक्रमित लोगों की संख्या के मामले में ये चीन के आंकड़ों से लगभग चार गुना आगे निकल चुका है.
कोरोना वायरस का प्रकोप चीन से ही शुरू हुआ था. अब अमरीका कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले में सबसे बुरी तरह प्रभावित इटली और स्पेन से भी बहुत आगे निकल चुका है.
हालांकि, सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े अमरीकी अधिकारी ये कह रहे हैं कि अभी उनके देश में वायरस का प्रकोप अपने उच्चतम स्तर से कई हफ़्ते या यूं कहें कि कई महीने दूर है. लेकिन, इस महामारी ने अमरीकी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमज़ोरियों को उजागर कर दिया है.
इस संकट से निपटने में अमरीका ने जो तौर तरीक़े अपनाए हैं, उनसे अमरीकी सिस्टम की कई ख़ामियां उजागर हुई हैं. हालांकि, इस दौरान दुनिया की इकलौती सुपरपावर की कई अच्छाइयां भी सामने आई हैं.
आइए, अमरीका की इन्हीं ख़ामियों और उपलब्धियों पर एक नज़र डालते हैं.
मेडिकल उपकरणों की आपूर्ति में कमी
जैसे-जैसे कोरोना वायरस का प्रकोप अमरीका में बढ़ा, वैसे-वैसे देश के हर कोने से डॉक्टरों और अस्पतालों ने गुहार लगानी शुरू की कि उनके पास मास्क, दस्तानों, सुरक्षा करने वाले गाउन और वेंटिलेटर्स की कमी है.
ख़ास तौर से इस महामारी से सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाक़ों में तो इन ज़रूरी स्वास्थ्य उपकरणों की भारी कमी की शिकायतें आईं. इनसे जूझ रहे स्वास्थ्यकर्मी, ज़रूरी सामान के लिए परेशान हैं, ताकि वायरस से संक्रमित लोगों का इलाज भी करें और ख़ुद को इसके संक्रमण से बचाए भी रखें.
पर्याप्त मेडिकल संसाधन न होने की वजह से कई अस्पतालों में स्वास्थ्य कर्मियों को अपनी हिफ़ाज़त के इस्तेमाल हो चुके सामानों को फिर से प्रयोग करना पड़ा. या फिर उनके विकल्प के तौर पर कामचलाऊ चीज़ों से काम चलाना पड़ा.
वेंटिलेटर्स की कमी के कारण, कई राज्यों के अधिकारी बेहद चिंतित हैं. उन्हें इस बात की फ़िक्र है कि कहीं हालात इतने न बिगड़ जाएं कि उन्हें वेंटिलेटर लगाने के लिए मरीज़ों का चुनाव करना पड़ जाए. ये तय करने के लिए मजबूर न होना पड़ जाए कि किसे वेंटिलेटर लगाएं और किसे जाने दें.
मंगलवार को न्यूयॉर्क राज्य के गवर्नर एंड्रयू कुओमो ने शिकायत की कि कई अमरीकी राज्य, संघीय सरकार के साथ मिलकर, मेडिकल उपकरण ख़रीदने की होड़ लगाए हुए हैं. इससे ज़रूरी सामान के दाम आसमान छू रहे हैं.
कुओमो ने कहा कि, 'ऐसा लगता है कि हम सब ई-बे पर 50 राज्यों के साथ मिल कर बोलियां लगा कर वेंटिलेटर ख़रीद रहे हैं.'
अमरीका की जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में स्वास्थ्य नीति एवं प्रबंधन के प्रोफ़ेसर जेफरी लेवी कहते हैं कि ऐसे हालात नहीं बनने चाहिए थे. अमरीकी सरकार ज़रूरी सामान की आपूर्ति सुनिश्चित करने में बुरी तरह विफल रही.
उसके पास ऐसी महामारी से निपटने के न संसाधन थे और न ही कोई तैयारी थी. फिर जब हालात बिगड़ने लगे तो स्थिति की गंभीरता साफ़ तौर पर सामने होते हुए भी उसका रवैया बड़ा ढीला ढाला रहा.
प्रोफ़ेसर जेफरी कहे हैं, ''हमारे पास इस महामारी से निपटने के लिए ज़रूरी सामान बनाने के लिए पर्याप्त समय था. हमारे पास उत्पादन क्षमता भी है. हम लोगों की निजी सुरक्षा के लिए ज़रूरी उपकरण समय पर तैयार कर सकते थे. लेकिन, इस सरकार ने अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं किया. हमारी सरकार, ये सुनिश्चित करने में नाकाम रही कि इन उपकरणों का उत्पादन होने लगे.''
संदिग्ध लोगों के टेस्ट में देरी
प्रोफ़ेसर जेफरी लेवी कहते हैं, ''कोरोना वायरस के भयंकर प्रकोप को थामने के लिए शुरू में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का टेस्ट करना सबसे असरदार तरीक़ा है. यही काम दक्षिण कोरिया और सिंगापुर ने किया. लेकिन, अमरीकी सरकार ऐसा करने में नाकाम रही. ये अमरीका के प्रशासन की सबसे बड़ी ग़लती थी. क्योंकि इसी के कारण बाद में हालात बिगड़े और उसका दुष्प्रभाव अन्य रूपों में भी सामने आया.''
प्रोफ़ेसर जेफरी कहते हैं कि किसी भी महामारी से निपटने का एक ही तरीक़ा है. हालात के प्रति सजग होना. ये पता होना कि हो क्या रहा है और कहां हो रहा है.'

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इस जानकारी के बग़ैर, स्वास्थ्य अधिकारी बस हवा में तीर चलाते रहते हैं. उन्हें पता नहीं होता है कि वायरस का संक्रमण का अगला बड़ा ठिकाना क्या होगा. बड़े पैमाने पर लोगों का टेस्ट करने का मतलब होता है कि इससे संक्रमित मरीज़ों की पहचान हो जाती है. उन्हें बाक़ी लोगों से दूर किया जा सकता है.
इससे पूरे राज्य या देश में ऐसे मरीज़ों को रखने के लिए केंद्र बनाने की ज़रूरत नहीं होती. न ही बड़े पैमाने पर लॉकडाउन की ज़रूरत होती है. क्योंकि लॉकडाउन के कारण अमरीकी अर्थव्यवस्था की गाड़ी खड़ी हो गई है. और इससे लाखों लोग बेरोज़गार हो गए हैं.
प्रोफ़ेसर जेफरी लेवी कहते हैं कि इस नाकामी का लिए केवल और केवल ट्रंप प्रशासन ज़िम्मेदार है. जिसने, किसी महामारी से निपटने की एक दशक से भी ज़्यादा पुरानी योजना को ख़ारिज कर दिया. ये योजना राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के शासन काल में बनी थी. ट्रंप प्रशासन ने न केवल इसकी अनदेखी की बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग में अधिकारियों के पद ख़ाली रखे. क़ाबिल लोगों को भर्ती नहीं किया.
प्रोफ़ेसर जेफरी कहते हैं कि इस सरकार के राजनीतिक आकाओं को सरकारी व्यवस्था पर भरोसा ही नहीं है. इसी कारण से संघीय सरकार के महामारी से लड़ने के संसाधन जुटाने में इच्छा शक्ति की कमी साफ़ दिखती है. महामारी के प्रति ट्रंप प्रशासन की ढिलाई और लापरवाही एकदम साफ़ तौर पर दिखाई देती है.
अमरीका में जितने लोगों के अब तक परीक्षण किए गए हैं, उन्हीं से ये बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है. फ़रवरी महीने में जो शुरुआती टेस्ट किए गए थे, उन्हें अमरीका की गिने चुने लैब में भेजा गया था. अमरीकी प्रशासन की लापरवाही उसमें भी उजागर हो गई थी क्योंकि टेस्ट के उनके तरीक़े में ही ख़ामी पाई गई थी.
मार्च के मध्य तक अमरीकी सरकार ये वादा कर रही थी कि वो महीने के आख़िर तक पचास लाख कोरोना वायरस टेस्ट का लक्ष्य हासिल कर लेगी. लेकिन, इससे जुड़े आंकड़ों का स्वतंत्र रूप से विश्लेषण करें तो पता ये चलता है कि 30 मार्च तक अमरीका ने केवल दस लाख लोगों में ही कोरोना वायरस का पता लगाने वाला टेस्ट किया था.
हालांकि, ये किसी अन्य देश के मुक़ाबले काफ़ी अधिक है. लेकिन, याद रखने वाली बात ये है कि अमरीका की आबादी क़रीब 33 करोड़ है. उस अनुपात में ये टेस्ट बहुत कम हैं.
और परेशानी यहीं तक सीमित नहीं है. चूंकि, अमरीका में शुरुआत में टेस्ट कम तादाद में किए गए थे. इसलिए, जब बाद में कोरोना वायरस के टेस्ट की संख्या बढ़ी, तो इन्हें करने वाली लैब में सैंपल की बाढ़ सी आ गई है. इससे, जिन लोगों के नमूने लिए गए हैं, उनके नतीजे आने में हफ़्ते भर तक का समय लग रहा है. तब तक जिसका टेस्ट हुआ है, वो अंधेरे में ही रहता है कि वो वायरस से संक्रमित है या नहीं.
संदेश के नाम पर कोड़े लगाना और सियासी टकराव
मंगलवार को दोपहर बाद की अपनी प्रेस कांफ्रेंस में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने देश के सामने हालात की बेहद भयावाह तस्वीर इन शब्दों में पेश की-
'मैं हर अमरीकी नागरिक को आगाह करना चाहता हूं कि वो आने वाले मुश्किल दिनों के लिए तैयार रहे.'
ट्रंप के बाद उनके सार्वजनिक स्वास्थ्य सलाहकारों ने भी ऐसे ही बयान दिए. जबकि, बस एक हफ़्ते पहले तक ख़ुद राष्ट्रपति ट्रंप ये उम्मीद जता रहे थे कि अमरीका में अप्रैल के मध्य या ईस्टर की छुट्टियों के बाद हालात सामान्य होने लगेंगे और कारोबार दोबारा शुरू हो जाएगा.
जनवरी और फ़रवरी महीनों में, जब इस वायरस के प्रकोप से चीन के निर्माण क्षेत्र पर क़यामत टूट पड़ी थी. और इटली में भी बड़ी तादाद में मौत के कारण हालात भयावाह दिखने लगे थे. तब भी, राष्ट्रपति ट्रंप कोरोना वायरस से अमरीका को संभावित ख़तरे को मामूली बता कर ख़ारिज कर रहे थे. जब अमरीका में इस वायरस के संक्रमण के शुरुआती मामले सामने आए थे, तो ख़ुद डोनल्ड ट्रंप और उनकी सरकार के अन्य अधिकारियों ने कहा कि हालात क़ाबू में हैं और गर्मियों में ऐसा जादू होगा कि ये परेशानी छू मंतर हो जाएगी.
सरकार के शीर्ष नेतृत्व से लगातार ग़लत बयानी, अमरीका के लिए एक बड़ी समस्या साबित हुई है. प्रोफ़ेसर जेफरी लेवी कहते हैं कि, 'महामारी से निपटने की तैयारी लगातार बदलता माहौल होती है. और कई बार आपका संदेश भी बदलता है. लेकिन, अमरीकी सरकार की बात करें, तो आप देखेंगे कि सरकार की तरफ़ से इस बारे में आए हर पैग़ाम के साथ एक कोड़ा भी था, जिसके ज़रिए विरोधियों को निशाना बनाने की कोशिश होती थी. इससे बदलते हुए ज़मीनी हालात का तो वैज्ञानिक तरीक़े से अंदाज़ा नहीं ही होता था. बस दिखाई देती थी वो चिंता कि किस तरह इस मुश्किल वक़्त का भी सियासी फ़ायदा उठा लिया जाए.'
इसके अलावा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप, अपनी विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी के गवर्नरों से भी उलझते रहे. जैसे कि उन्होंने न्यूयॉर्क के डेमोक्रेट गवर्नर एंड्र्यू कुओमा की खुले तौर पर आलोचना की. और मिशिगन के ग्रेचेन व्हिटमर पर ट्विटर के ज़रिए हमला बोला. ट्रंप ने कहा कि राज्यों के नेताओं को इस महामारी से निपटने के संघीय सरकार के प्रयासों की 'तारीफ़' करनी चाहिए.

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सोशल डिस्टेंसिंग के उपाय नाकाम हुए
अमरीका के फ्लोरिडा राज्य के समुद्र तट, बसंत की छुट्टियां मनाने वाले कॉलेज के छात्रों से भरे हुए थे. न्यूयॉर्क के लोग मेट्रो के डिब्बों में ठसा-ठस भर कर सफ़र कर रहे थे. लूसियाना राज्य के एक चर्च में अब भी हज़ारों लोग इकट्ठा हो रहे हैं. जबकि इसके पादरी टोनी स्पेल पर लोगों की भीड़ जुटाने के आरोप में आपराधिक केस भी दर्ज हो चुका है.
इसके बावजूद पादरी टोनी स्पेल ने एक स्थानीय टीवी चैनल से कहा कि, 'कोरोना वायरस राजनीति से प्रेरित है. हमें अपने राजनीतिक अधिकार दिल ओ जान से अज़ीज़ हैं. और हम इकट्ठे होकर प्रार्थना करना जारी रखेंगे, भले ही कोई कुछ भी कहे.'
पूरे देश में आपको ऐसी कई मिसालें मिल जाएंगी, जब अमरीकी नागरिकों ने स्वास्थ्य अधिकारियों और इससे जुड़े पेशेवर लोगों की चेतावनी और अपील को दरकिनार करते हुए क़रीबी सामाजिक संपर्क बनाने का सिलसिला जारी रखा. कई बार तो इसे राज्य और स्थानीय अधिकारियों से भी शह मिली. क्योंकि इन राज्यों की सरकारें और सरकारी अधिकारी, कारोबार को बंद करने और नागरिकों को घर में रहने का आदेश जारी करने से कतराते रहे.
फ्लोरिडा के समुद्र तट पर टहल रहे एक शख़्स ने सीबीएस न्यूज़ चैनल से कहा कि, 'अगर मुझे कोरोना का संक्रमण होता है, तो हो जाए. मैं कोरोना वायरस के डर से पार्टी करना थोड़े बंद कर दूंगा.'
अच्छी नीयत से लिए गए हर क़दम के कुछ बुरे नतीजे भी होते हैं. सार्वजनिक परिवहन की सेवाओं जैसे कि न्यूयॉर्क सबवे को सीमित करने से हो सकता है कि ट्रेनों और बसों में और ज़्यादा भीड़ हो गई हो. जिन विश्वविद्यालयों ने अपने छात्रों को छुट्टियों पर घर भेजा, हो सकता है उन्होंने भी वायरस फैलाने में योगदान दिया हो. क्योंकि संक्रमित लोग दूर-दूर के शहरों, मुहल्लों और घरों तक पहुंच गए. क्योंकि देश में पूरी तरह से लॉकडाउन नहीं था.
राष्ट्रपति ट्रंप ने यूरोपीय देशों से अमरीका आने वालों पर रोक लगाने का जो आदेश जारी किया, वो पूरी तरह से स्पष्ट नहीं था. शुरुआत में ऐसा लगा कि वो केवल स्वदेश लौटने वाले अमरीकी नागरिकों और अमरीका आने वाले विदेशी नागरिकों, दोनों पर लागू होगा. इससे हवाई अड्डों पर भारी भीड़ जमा हो गई. जहां पर बहुत से ऐसे यात्री जिनकी पड़ताल नहीं हुई, उन्होंने वायरस का संक्रमण अन्य लोगों में फैला दिया.
हमें आने वाले समय में ऐसे फ़ैसलों के गंभीर नतीजे हमें देखने पड़ सकते हैं. इससे वायरस का संक्रमण रोकने के प्रयासों को धक्का लगा है. और बीमारी पूरे अमरीका में फैल गई है. इसे इस मिसाल से ही समझा जा सकता है कि पहले से भड़की हुई आग में मानो और पेट्रोल डाल दिया गया.
कोरोना वायरस से लड़ने में अमरीका की सफलताएं

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विशाल स्टिमुलस पैकेज
पिछले हफ़्ते अमरीकी संसद ने कोरोना वायरस से प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए 2 ख़रब डॉलर के राहत पैकेज को मंज़ूरी दे दी. इसमें बहुत से अमरीकी नागरिकों को सीधे नक़द मदद देना, बेरोज़गार लोगों को आर्थिक मदद बढ़ाना, राज्यों को हालात से निपटने में आर्थिक मदद देना, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य सार्वजनिक सेवाओं को आर्थिक मदद, सबसे बुरी तरह प्रभावित उद्योंगो को पैसे से मदद के साथ साथ छोटे और मंझोले कारोबारों के क़र्ज़ माफ़ कर देना ताकि उन्हें कर्मचारियों की छंटनी न करनी पड़े, जैसे उपाय शामिल हैं.
ये आर्थिक पैकेज बहुत विशाल और रिकॉर्ड तोड़ने वाला विधेयक था. जो अमरीकी कांग्रेस में डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं के बीच आपसी परिचर्चा का नतीजा था. इस क़ानून को संसद से मंज़ूरी दिलाने में केंद्रीय ख़ज़ाना मंत्री स्टीव म्नूचिन और उनके मातहत अधिकारियों की भी बड़ी सकारात्मक भूमिका रही थी.
आर्थिक विशेषज्ञ और कोलंबिया लॉ स्कूल के शिक्षक माइकल ग्रेत्ज़ ने कहा कि, 'ये स्टिमुलस पैकेज नहीं, ये अमरीका को बचाने का बिल है.' माइकल ग्रेत्ज़ अपनी किताब 'द वुल्फ़ ऐट द डोर:द मेनास ऑफ़ इकोनॉमिक इनसिक्योरिटी ऐंड हाऊ टू फ़ाइट इट' के लिए मशहूर हैं.
वो आगे कहते हैं कि, 'हर इंसान के पास ऐसी चीज़ होती है, जिसे वो पसंद नहीं करता, या उससे बेहतर कुछ और चाहता है. इस आर्थिक पैकेज से कोई संतुष्ट नहीं होगा. मगर मैं ये ज़रूर कहूंगा कि शुरुआत में इस पैकेज को अच्छे नंबर मिलेंगे.'
माइकल ग्रेत्ज़ कहते हैं कि, अमरीकी सांसदों की एक चुनौती ये भी है कि अमरीका के बेरोज़गारों के बीमा की मौजूदा व्यवस्था बेहद पुरानी पड़ चुकी है. ये राज्य सरकारों द्वारा अलग अलग चलाई जाने वाली योजनाओं का घालमेल है. इससे अलग अलग लोगों को अलग तरह के बेरोज़गारी भत्ते मिलते हैं. इसे पाने के लिए पैमाने भी अलग अलग हैं. जो आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से पुराने पड़ चुके हैं. अमरीकी कांग्रेस ने इस पैकेज के ज़रिए बेरोज़गारी से जुड़े इन पुराने नियमों में कुछ बदलाव करने की कोशिश की है. क्योंकि पैकेज के माध्यम से ये सुनिश्चित किया गया है कि फ्रीलांस और स्टार्ट अप कंपनियों में काम करने वाले भी इसके दायरे में आ जाएं. और उन्हें भी अस्थायी तौर पर मदद मिल सके.
माइकल ग्रेत्ज़ कहते हैं कि, 'बहुत से लोगों के लिए इस पैकेज से मिलने वाली मदद बेहद मामूली होगी. लेकिन, फिलहाल तो संसद के पास यही समाधान उपलब्ध था. कांग्रेस ने बहुत कमज़ोर स्थिति में इस क़ानून पर काम करना शुरू किया था. क्योंकि सामाजिक सुरक्षा का हमारा बुनियादी ढांचा ही बेहद कमज़ोर हो चुका है. वरना अगर सुरक्षा के अन्य पूर्ववर्ती उपायों की बुनियाद थोड़ी मज़बूत होती, तो अमरीकी संसद का काम थोड़ा आसान हो जाता.'
ख़ुद राष्ट्रपति ट्रंप, और अमरीका के निचले सदन हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी पहले ही मदद के एक और पैकेज के बारे में बयान दे चुके हैं. शायद उसके ज़रिए बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश और अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ के उपाय जनता को दिए जाएं. इससे संकेत यही मिलता है कि डेमोक्रेटिक और रिपब्लिक पार्टी के बीच इस संकट के समय आपसी सहयोग की ये बस शुरुआत है.

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अमरीका अभी भी रिसर्च की महाशक्ति है
अगर कोरोना वायरस से अमरीकी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कई ख़ामियों जैसे कि महंगी सेवाएं, सबको स्वास्थ्य योजना का लाभ न मिलना और ज़रूरी संसाधनों की कमी, को उजागर किया है. ये साफ़ हो गया है कि अमरीकी स्वास्थ्य सेवा इस सदमे के लिए तैयार नहीं थी. लेकिन, इस संकट से अमरीका के अनुसंदान और दवा के विकास के बुनियादी ढांचे की ताक़त भी सामने आई है.
दवा बनाने वाली कंपनियां और मेडिकल रिसर्च आज इस नए वायरस के बारे ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी जुटा रहे हैं. ताकि इस महामारी को मात देने की नई रणनीति ईजाद कर सकें.
एक कंपनी ने तेज़ी से टेस्ट का नतीजा बताने वाली किट ईजाद की है. इस किट से तुरंत ही ये पता लगाया जा सकता है कि किसी व्यक्ति को वायरस ने संक्रमित किया है या नहीं. इससे टेस्ट के लिए लगी लंबी क़तार को कम किा जा सकता है. और स्वास्थ्य अधिकारियों को संक्रमण के नए हॉट स्पॉट का फ़ौरन पता लगाने में मदद मिलेगी. जिससे वो लोगों को क्वारंटीन करने के फ़ैसले फ़ौरी तौर पर ले सकें.
प्रोफ़ेसर जेफरी लेवी कहते हैं कि, 'इस वायरस का टीका ईजाद करने और अन्य दवाओं के विकास के क्षेत्र में आए नतीजे और उत्साहवर्धक हैं. इस क्षेत्र में जो कुछ भी विज्ञान कर सकता है, वो हमारे रिसर्चर कर रहे हैं.'
प्रोफ़ेसर जेफरी कहते हैं कि जो फार्मास्यूटिकल कंपनियां इस वायरस के इलाज और मरीज़ों को ठीक करने के नए तरीक़ों तलाशने पर रिसर्च कर रही हैं, उन्हें सरकार से भरोसा मिल रहा है कि उनके उत्पादों के लिए एक बाज़ार होगा और उन्हें इस निवेश का वाजिब रिटर्न मिलेगा. हालांकि, प्रोफ़ेसर जेफरी का कहना है कि एक समस्या ये है कि जो कोशिशें आज की जा रही हैं उनके नतीजे आने में कई महीनों या उससे भी ज़्यादा समय लग सकता है.
अमरीका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एलर्जी एंड इन्फ़ेक्शस डिज़ीज़ेज के निदेशक डॉक्टर एंथनी फॉची ने भविष्यवाणी की थी कि नए कोरोना वायरस का टीका सबके लिए मुहैया कराने में एक साल तक का वक़्त लग सकता है. ऐसे में अभी तो सार्वजनिक स्वास्थ्य के नीति नियंताओं का लक्ष्य यही है कि वायरस के प्रकोप से मरने वालों की संख्या कम से कम रखी जा सके. ख़ास तौर से तब तक, जब तक इसका टीका बाज़ार में नहीं आ जाता.
राज्यों के नेताओं का शानदार प्रदर्शन
अमरीका की संघीय प्रशासनिक व्यवस्था में राज्यों के पास काफ़ी व्यापक अधिकार होते हैं. अमरीकी राजनीतिक व्यवस्था की ये ख़ूबी भी है और इसमें कई अभिशाप भी छुपे हुए हैं. अच्छे वक़्तों में इस व्यवस्था के तहत स्थानीय नेताओं को निजी तौर पर जनता की समस्याओं के अलग अलग समाधान तलाशने में मदद मिलती है. जिससे हम अपने अच्छी से अच्छी रीतियों नीतियों को आज़मा सकते हैं. और सफल रहने पर जिन्हें पूरे देश में लागू किया जा सकता है.
लेकिन, किसी जानलेवा महामारी के सामने आने की सूरत में छुटपुट रवैये से काम नहीं चलता. तब महामारी से लड़ने के प्रयास अधूरे लगते हैं. और इसका नतीजा ये होता है कि ज़्यादा लोगों की जान चली जाती है, जिन्हें संगठित रूप से काम करके बचाया जा सकता था. इससे आर्थिक गतिविधियों में भी बाधा पड़ती है.

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प्रोफ़ेसर जेफरी लेवी कहते हैं कि, 'हर राज्य का गवर्नर अपने स्तर पर फ़ैसले कर रहा है. कई लोग अच्छे क़दम उठा रहे हैं. तो, कई इस मोर्चे पर असफल भी साबित हो रहे हैं.'
प्रोफ़ेसर जेफरी, मिसाल के तौर पर अमरीका के कैलिफ़ोर्निया राज्य के गवर्नर गैविन न्यूसम और वॉशिंगटन राज्य के जे इनस्ली का नाम लेते हैं. इन दोनों ही राज्यों के गवर्नरों ने स्कूल बंद करने और क्वारंटीन के लिए ठिकाने बनाने के आदेश बहुत शुरुआत में ही दे दिए थे. इससे उनके राज्य की जनता के बीच ये महामारी फैलने की रफ़्तार धीमी हो गई.
ओहायो राज्य के गवर्नर माइक डेवाइन की भी कई हलकों में तारीफ़ हो रही है. क्योंकि उन्होंने शुरुआत में ही कई ठोस क़दम उठा लिए थे. जिन्हें उस वक़्त बेहद कठोर उपाय कह कर उनकी आलोचना की गई थी.
स्वास्थ्य अधिकारी कहते हैं कि कोरोना वायरस का जितना बुरा प्रकोप न्यूयॉर्क शहर में देखने को मिला है, वैसे ही हालात अमरीका के अन्य बड़े शहरों में भी देखने को मिल सकते हैं. हालांकि, वो ये भी उम्मीद जताते हैं कि शायद अन्य बड़े शहरों के हालात उतने बुरे न हों.
कई राज्य, न्यूयॉर्क जैसे बुरे हालात बनने से रोकने के लिए बहुत कोशिशें कर रहे हैं. लेकिन, प्रोफ़ेसर जेफरी लेवी चेतावनी देते हैं कि इन राज्यों की कोशिशें इसलिए नाकाम हो सकती हैं, क्योंकि अन्य क्षेत्र पर्याप्त मात्रा में एहतियाती उपाय नहीं अपना रहे हैं.
प्रोफ़ेसर जेफरी कहते हैं कि, 'हमारे अमरीका में दिक़्क़त ये है कि राज्यों के बीच किसी समस्या से निपटने की क्षमता में बहुत फ़र्क़ है. क्योंकि हर राज्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश की इच्छाशक्ति अलग अलग है.'
प्रोफ़ेसर जेफरी कहते हैं कि, 'ऐसे हालात में हम वायरस से उतने ही महफ़ूज़ हैं, जितने हमारे सबसे कमज़ोर राज्य.'


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