You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
इंसानों की तरह खास तरह का औज़ार बन सकता है ये कौवा
- Author, क्रिस बैरानियूक
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
बचपन में आपने चालाक कौवे की कहानी पढ़ी होगी, जिसमें एक प्यासा कौवा घड़े में कंकड़ डाल-डाल कर पानी को ऊपर लाता है. फिर अपनी प्यास बुझाता है.
इसी तरह, ब्रिटेन में बेट्टी नाम का एक कौवा बहुत मशहूर हुआ था. ये कौवा किसी तार को ले कर उसे मोड़ कर हुक बना लेता था. फिर वो उसकी मदद से अपने लिए खाना जुटाता था.
बेट्टी का क़िस्सा 2002 का है. तब उसने अपने करतब से बहुत से लोगों को चौंकाया था. वैज्ञानिकों के ज़हन में सवाल उठा था कि एक कौवा कैसे एक पेचीदा समस्या को ख़ुद ब ख़ुद हल कर रहा था. उस का दिमाग़ तो इंसानों की तरह पेचीदा सवालों के जवाब तलाश पा रहा था. ये भी उसी चालाक कौवे की तरह था, जिस का क़िस्सा हम ने बचपन में पढ़ा था.
लेकिन, आप ये जान कर हैरान होंगे कि बेट्टी या उस कहानी वाले कौवे से इतर भी ज़्यादातर कौवे चतुर होते हैं. बाद की रिसर्च में पता चला कि बेट्टी जिस नस्ल का कौवा था, उसे न्यू कैलेडोनियन क्रो कहा जाता है. उस प्रजाति के कौवों को छोटी चीज़ों को औज़ार बना कर इस्तेमाल करने में महारत हासिल है.
कौवों पर अपनी रिसर्च के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे कि ये चतुराई तो उनमें क़ुदरती तौर पर होती है.
ब्रिटेन की सेंट एंड्रयूज़ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक क्रिस्चियन रट्ज़ कहते हैं, ''बेट्टी का बर्ताव देख कर हम कौवों के बारे में अपनी राय बदलने पर मजबूर हुए.''
पिछले कुछ बरसों में वैज्ञानिकों ने कौवों की तमाम नस्लों के दिमाग़ पर काफ़ी रिसर्च की है. उनके अंदर ज्ञान संबंधी चौंकाने वाली क्षमताएं पाई गई हैं.
मगर, क्या कौवा वाक़ई बुद्धिमान होता है?
क्या है बुद्धिमत्ता
इस सवाल का जवाब जानने से पहले हमें ये पता लगाना होगा कि बुद्धिमत्ता होती क्या है? और, जीवों में ये किस तरह विकसित हुई है? इन सवालों के जवाब तलाशने में कौवे हमारी काफ़ी मदद कर रहे हैं.
बुद्धिमानी की जड़ दिमाग़ में है. इंसानों समेत तमाम प्राइमेट्स यानी वानर प्रजाति के जीवों के दिमाग़ के भीतर एक ख़ास संरचना होती है, जिसे नियोकॉर्टेक्स कहते हैं. माना जाता है कि हमारे ज़हन का ये हिस्सा, ज्ञान संबंधी नई संभावनाओं को जन्म देता है. मज़े की बात ये है कि कौवों के दिमाग़ के भीतर नियोकॉर्टेक्स नहीं पाया जाता है. इसकी जगह उन के ज़हन में तंत्रिकाओं का जाल होता है. जो उन्हें ज्ञान संबंधी क्षमता देता है.
भले ही कौवों और इंसान के दिमाग़ अलग-अलग होते हों. दोनों में किसी समस्या के समाधान की क्षमता एक जैसी होती है. वो नई जानकारियों और अनुभवों के आधार पर अपने इस हुनर को बेहतर बनाते हैं.
क्रिस्चियन रट्ज़ ने कौवों और दूसरे परिदों पर जो रिसर्च की है, उसके मुताबिक़, कौवे एक ख़ास नस्ल के पौधे की जड़ें तलाशते हैं. जिससे वो एक हुक जैसा औज़ार बना लेते हैं.
प्रयोगों के दौरान देखा गया कि अगर इस पौधे की जड़ को पत्तियों के बीच में छुपा भी दिया गया, तो भी कौवे उसे तलाश लेते थे. इस का मतलब ये हुआ कि ये परिंदे एक ख़ास तरह की चीज़ तलाश रहे थे, जिससे वो मन मुताबिक़ औज़ार बना सकते हैं. ठीक इंसानों की तरह. जैसे हम कोई नाख़ून उखाड़ने के लिए हथौड़ी का इस्तेमाल तो नहीं करेंगे. उसके लिए जो ख़ास औज़ार चाहिए, वो ही तलाशेंगे.
इस औज़ार की मदद से जंगली कौवे कीड़ों को उनके बिलों से निकाल कर अपना शिकार बनाते हैं.
किसमें ज़्यादा दिमाग
आप को लग सकता है कि कुछ जानवर, दूसरों से ज़्यादा चतुर होते हैं और इंसान सबसे चतुर जीव होता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि इंसान बुद्धिमत्ता के मामले में काफ़ी आगे निकल चुका है. पर, इसका ये मतलब नहीं है कि हम हर ज़हनी कसरत में अव्वल हैं. मसलन, चिंपैंजी में छोटे दौर की याददाश्त की ताक़त, इंसानों से ज़्यादा होती है. इसकी मदद से वो जंगल में पहले से छुपाया खाना तलाश लेते हैं.
ऐसे में जानवरों की बुद्धिमत्ता की रैंकिंग बनाना फ़िज़ूल है. क्योंकि हर जीव अपने काम के हिसाब से ही बुद्धिमानी की ज़रूरत महसूस करता है.
तो, हम ये कह सकते हैं कि बुद्धिमत्ता का मतलब है किसी ख़ास काम में विशेषज्ञ होना.
क्रिश्चियन रट्ज़ कहते हैं कि कौवों की बुद्धिमानी को इंसान के जैविक इतिहास से अलग करके नहीं देखा जा सकता. और सिर्फ़ कौवे ही अक़्लमंद होते हों, ऐसा भी नहीं. चिंपैंज़ी, तोते, घड़ियाल और यहां तक कि केकड़ों को भी कई चीज़ों को औज़ार की तरह इस्तेमाल करते देखा गया है.
और हर इंसान अपनी ज़रूरत के हिसाब से शरीर या अक़्ल का प्रयोग करता है. कौवे को अपने शिकार तक पहुंचने के लिए औज़ार चाहिए. तो किसी दूर के चारे तक पहुंचने के लिए जिराफ़ की लंबी गर्दन काम आती है.
वैसे कई चालाक जानवर अपनी ज़रूरत के अलावा भी कुछ मुश्किल काम कर लेते हैं.
बीबीसी की टीवी सिरीज़ 'इनसाइड द एनिमल माइंड' में क्रिस पैखम नाम के वैज्ञानिक ने दिखाया था कि एक कौवा किस तरह एक मुश्किल पहेली हल कर रहा था. जब कि इस पहेली से कौवे के खान पान या ज़िंदगी को ख़तरे का कोई ताल्लुक़ नहीं था. इन मिसालों के बाद कहानी वाले चतुर कौवे और बेट्टी के हुनर बड़े मामूली लगते हैं.
007 नाम वाले कौवे ने जो पहेली हल की, वो कई पायदानों की है और हर क़दम पर नई चाल की सोच तलब करती है. इसमें कामयाब होने वाला कौवा कहीं ज़्यादा बुद्धिमत्ता होने का परिचय देता है.
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डकोटा मैक्कॉय कहती हैं कि ज्ञान कभी-कभी बहुत मज़ेदार होता है. इससे ऐसे बर्ताव के दरवाज़े खुलते हैं, जिसकी हमें अपना अस्तित्व बचाने के लिए ज़रूरत नहीं होती.
जैसे हम अपने मज़े के लिए पहेलियां हल करते हैं, ताकि दिमाग़ी कसरत हो जाए. उसी तरह कौवे भी कई बार ऐसी पहेलियां हल कर के मस्ती और दिमाग़ी कसरत करते हैं.
डकोटा मैक्कॉय के मुताबिक़ कौवों में क़ुदरती तौर पर जिज्ञासा होती है. वो चुपके से कोई औज़ार उठा कर उड़ जाते हैं और फिर उससे अपने प्रयोग करते हैं. ख़ास तौर से नौजवान परिंदे ऐसे काम करते देखे गए हैं. ठीक इंसानों की तरह.
डकोटा कहती हैं कि, "हमारे पास इतना बड़ा दिमाग़ होता है. फिर भी हम क्रॉसवर्ड्स सुलझाते हैं. हमारे दिमाग़ का विकास इसके लिए तो नहीं हुआ था."
सिर्फ़ अपने उपयोग के लिए दिमाग़ का प्रयोग करना ही बुद्धिमत्ता नहीं है. मस्ती के लिए ज़हन को काम पर लगाने से दिमाग़ तेज़ होता है. ये बात इंसानों के साथ-साथ दूसरे जीवों पर भी लागू होती है.
तभी तो, कोई कौवा पहेलियां सुलझाता है, तो कोई तोता चुटकुले सुनाता है या आवाज़ों की नक़ल करता है. बात अक़्लमंदी की आती है, तो इसकी कोई सीमा नहीं है.
(बीबीसी फ़्यूचर पर इस स्टोरी को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी ट्रैवल को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)