मिरियम मेनकिनः महिला वैज्ञानिक जिनकी पहली कामयाबी थी IVF तकनीक

भारतीय समाज में बांझ औरतों की तुलना मुरझाए फूल से की जाती है.

लेकिन साइंस ने इस मुरझाए फूल को खिलने और मां की ममता की ख़ुशबू से गुलज़ार होने का मौक़ा दिया है.

मां नहीं बनने के दर्द को भी एक महिला वैज्ञानिक ने ही सबसे पहले समझा था और इसके ख़ात्मे के लिए दवा भी तलाशी थी.

इस महिला वैज्ञानिक का नाम है- मिरियम मेनकिन. उन्होंने अपनी रिसर्च से प्रजनन चिकित्सा में क्रांति ला दी.

लेकिन अफ़सोस कि इस महान महिला वैज्ञानिक का नाम आज शायद ही कुछ लोग जानते हों.

मिरियम, हॉरवर्ड में फ़र्टिलिटी एक्सपर्ट जॉन रॉक के साथ एक तकनीशियन के तौर पर काम करती थीं.

नाकामियों के बाद

उनका मक़सद इंसान के शरीर के बाहर प्रजनन करने वाले ऐसे अंडाणुओं को उपजाऊ बनाना था, जिनमें बच्चे पैदा करने की क्षमता नहीं होती.

ख़ुद डॉक्टर रॉक का मक़सद भी बांझपन का निदान ढूंढना था.

वो असल में अपनी रिसर्च से ऐसी औरतों की मदद करना चाहते थे जिनकी बच्चेदानी तो सेहतमंद थी लेकिन फ़ैलोपियन ट्यूब गड़बड़ थी.

अपनी क्लिनिक में वो ऐसे बहुत से केस देख चुके थे. इस काम में मिरियम ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

क़रीब 6 साल की मशक़्क़त और लगातार मिलने वाली नाकामियों के बाद फ़रवरी 1944 में उन्हें कामयाबी मिली.

जब उन्होंने अपनी लैब में देखा कि जिस स्पर्म को उन्होंने अंडे के साथ रखा था, वो एक हो गए हैं. और, कांच की डिश में इंसानी भ्रूण बनना शुरू हो गया है.

आईवीएफ़ तकनीक

मेनकिन की इस कामयाबी से बच्चे पैदा करने की तकनीक में एक नए युग का आग़ाज़ हुआ. बांझ औरतों का मां बनने का सपना साकार होने लगा.

1978 में दुनिया का पहला इन विट्रो फ़र्टिलाइज़र या आईवीएफ़ बच्चा पैदा हुआ, जिसका नाम है लुईस ब्राउन.

देखते ही देखते आईवीएफ़ तकनीक से मां बनना इतना लोकप्रिय हो गया कि मेडिकल दुनिया में ये एक बड़ा व्यापार बन गया.

2017 में अमरीका में सबसे ज़्यादा दो लाख, 84 हज़ार 385 लोगों ने गर्भ धारण किया. इन से 78 हज़ार 52 बच्चे इस दुनिया में आए.

मेडिकल साइंस के इतिहास में ये कोई रातों-रात होने वाला करिश्मा नहीं था. बल्कि ये वर्षों की मेहनत, तकनीकी महारत और सब्र का नतीजा था.

मेनकिन ने इस रिसर्च पर 18 पेपर लिखने में उन्हें लिखने वालों का साथ दिया. इनमें सबसे बड़ा नाम था डॉक्टर रॉक का.

बड़ा नाम नहीं बन पाई

लेकिन बहुत मेहनत के बावजूद, डॉक्टर रॉक की तरह मिरियम मेनकिन एक बड़ा नाम नहीं बन पाई. लोग उन्हें डॉक्टर रॉक की सहायक के तौर पर ही जानते रहे.

अमरीका की रटगर्स यूनिवर्सिटी की इतिहासकार मारग्रेट मार्श का कहना है कि डॉक्टर रॉक एक चिकित्सक थे. लेकिन मिरियम अपने मिज़ाज और ज़हन से एक वैज्ञानिक थीं.

मारग्रेट मार्श ने वेंडा रोनर के साथ मिलकर 2008 में डॉक्टर रॉक की जीवनी लिखी है.

लेकिन उन्हें अफ़सोस है कि इस किताब में उन्होंने मिरियम का ज़िक्र डॉक्टर रॉक की सहायिका के तौर पर ही किया है.

हालांकि अब वो एक और किताब लिख रही हैं, जिस में वो मिरियम के काम को भरपूर श्रेय दे रही हैं.

मिरियम फ़्राइडमेन का जन्म 8 अगस्त 1901 को यूरोप के बाल्टिक देश लैटविया में हुआ था. बचपन में ही उनका परिवार लैटविया से अमरीका आ गया.

बीमारी का इलाज

उनके पिता पेशे से डॉक्टर थे. बच्चपन में वो अपने पिता से कहानियां सुनती थीं कि कैसे साइंस जल्द ही डायबिटीज़ जैसी बीमारी का इलाज ढूंढ निकालेगी.

उन्होंने कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से ऊतक विज्ञान (सेल साइंस) और तुलनात्मक शारीरिक रचना विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की.

इसके बाद आनुवांशिकी विज्ञान में कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री ली. साथ ही न्यूयॉर्क में जीव विज्ञान और शरीर क्रिया विज्ञान की भी तालीम हासिल की.

मिरियम मेडिकल स्कूल में दाख़िला लेना चाहती थीं. लेकिन उन्हें देश के दो जाने माने मेडिकल कॉलिजों में दाख़िला नहीं मिल सका.

इसकी वजह शायद उनका महिला होना था क्योंकि उस दौर में गिने-चुने ही नामी मेडिकल कॉलेज थे जहां महिलाओं को दाख़िला मिलता था.

और वहां भी आरक्षण की शर्त लागू थी. यहां तक कि हॉरवर्ड जैसी यूनिवर्सिटी में भी 1945 में दूसरे युद्ध के दिनों में महिलाओं की पहली क्लास शुरू हुई थी.

गर्भनिरोधक गोलियों की खोज

दरअसल उस दौर में भी मर्दों की सोच यही थी कि साइंस जैसे विषय सिर्फ मर्दों के लिए हैं. जबकि महिलाओं का काम तो बच्चे पैदा करना और उनकी परवरिश करना है.

ख़ैर, मिरियम ने हॉरवर्ड यूनिवर्सिटी के ही मेडिकल के छात्र वेले मेनकिन से शादी कर ली और लैब में अपने पति की मदद करने लगीं.

इसके लिए उन्होंने बैक्टीरियोलॉजी और भ्रूण विज्ञान के कोर्स भी किए.

इस कोर्स के दौरान ही उनकी मुलाक़ात हॉरवर्ड के जीव वैज्ञानिक ग्रेगरी पिनकस से हुई जिन्होंने डॉक्टर रॉक के साथ मिलकर गर्भनिरोधक गोलियों की खोज की.

पिनकिन ने नर ख़रगोश के बग़ैर ही ख़रगोश का बच्चा पैदा कर दिया था, जिसके लिए उन्हें बदनामी भी सहनी पड़ी थी. इस काम में उन्होंने मिरियम की मदद ली थी.

उन्होंने ही मिरियम को नर ख़रगोश की प्रोस्टेट ग्रंथि से दो महत्वपूर्ण हार्मोन निकाल कर उन्हें मादा ख़रगोश में इंजेक्ट करने को कहा था.

क्लिनिकल रिसर्च

मिरियम ने ये काम बहुत ही महारत से किया. लेकिन इस लैब में मिरियम का समय बहुत जल्द ख़त्म हो गया.

प्रोफ़ेसर पिनकिन को इंग्लैंड वापिस बुला लिया गया और मिरियम की नौकरी ख़त्म हो गई.

बाद में डॉक्टर जॉन रॉक ने इस प्रोजेक्ट को फिर से शुरू किया और उसे क्लिनिकल रिसर्च तक लेकर गए.

इसके लिए उन्होंने न्यू इंग्लैंड जरनल ऑफ़ मेडिसिन में विज्ञापन दिया और मिरियम ने लैब में काम के लिए अर्ज़ी दे दी. इसे क़ुबूल कर लिया गया.

मार्श कहती हैं कि डॉक्टर रॉक बहुत प्रतिभाशाली और ज्ञानी थे. लेकिन, उनमें सब्र की कमी थी.

जबकि लैब में काम के लिए धैर्य रखना पहली शर्त है और मिरियम में धैर्य की कमी नहीं थी.

ऑपरेशन थिएटर

डॉक्टर रॉक ब्रूकलिन के एक ख़ैराती अस्पताल में भी अपनी सेवाएं देते थे, जहां मिरियम सुबह आठ बजे ही पहुंच जाती थीं. और ऑपरेशन थिएटर के बाहर टहलती रहती थीं.

डॉक्टर रॉक अंडाशय का एक छोटा सा टुकड़ा मिरियम को देते थे, जिसे वो दौड़कर चौथे माले पर बनी लैब में ले जाती थीं और फिर उसमें अंडा तलाशती थीं.

ये कोई आसान काम नहीं था. इस अंडे को तलाशने के लिए अक्सर रिसर्चरों को सूक्ष्मदर्शी कांच की ज़रूरत होती है लेकिन मिरियम इसे नंगी आंख से ही तलाश लेती थीं.

यही नहीं वो ये भी बता देती थीं कि अंडा सही आकार का है कि नहीं.

मिरियम के लिए ये हर हफ़्ते का काम हो गया कि वो मंगलवार को अंडा खोजतीं, बुधवार को उसे स्पर्म के साथ मिलाती और शुक्रवार के दिन उसे माइक्रोस्कोप से देखतीं.

ये काम वो 6 साल से भी ज़्यादा समय तक करती रहीं. फ़रवरी 1944 के दिन शुक्रवार को उन्हें कामयाबी मिली.

वर्षों की मेहनत

मिरियम, अपनी डिश में इंसान का भ्रूण देख कर ख़ुशी से पागल हो गईं. उनकी वर्षों की मेहनत आख़िरकार रंग ले आई थी. लेकिन मिरियम की इस कोशिश को यहीं पूर्ण विराम लग गया.

उन्हीं दिनों मिरियम के पति की नौकरी चली गई और उन्हें पति, बच्चों के साथ नॉर्थ कैरोलिना की ड्यूक यूनिवर्सिटी जाना पड़ा, जहां आईवीएफ़ को एक बड़ा घोटाला माना जा रहा था.

मिरियम की महारत के बग़ैर बॉस्टन में भी आईवीएफ़ पर हो रही रिसर्च पर ब्रेक लग गया. डॉक्टर रॉक का कोई भी मददगार विट्रो में फिर कभी अंडों को उर्वर नहीं बना सका.

नौकरी के सिलसिले में मिरियम के पति जहां कहीं भी गए मिरियम वहां अपने सपने के पीछे दौड़ती रहीं. लेकिन कोई ख़ास कामयाबी नहीं मिली.

इसी बीच वो डॉक्टर रॉक से संपर्क में भी रहीं और 1948 में दोनों ने मिलकर आईवीएफ़ पर व्यापक रिपोर्ट लिखी. इस बार रिपोर्ट में मिरियम का नाम पहले था.

कामयाबी की राह में रोड़े

मिरियम की शादीशुदा ज़िंदगी भी उनकी कामयाबी की राह में रोड़े अटकाती रही.

पति के साथ उनका रिश्ता बिगड़ने लगा तो उन्होंने तलाक़ ले लिया और बेटी लूसी को लेकर अलग हो गईं. लूसी को मिर्गी के दौरे पड़ते थे.

उसे हर समय किसी के साथ की ज़रूरत थी. ऐसे में मिरियम के लिए अपना सपना पूरा करना आसान नहीं था.

उन्हें वीकेंड और नाइट शिफ़्ट में लैब में काम करने की इजाज़त तो मिल गई लेकिन अकेले दम पर बच्चे को संभालने के साथ काम करना मुश्किल हो रहा था.

1950 में वो वापिस बोस्टन आ गईं, और लूसी को स्कूल में दाख़िल करके ख़ुद डॉक्टर रॉक के साथ लैब में काम करने लगीं. लेकिन इस बीच बहुत कुछ बदल गया था.

अब ज़्यादा बच्चे पैदा करना मक़सद नहीं था बल्कि बच्चे पैदा होने से रोकना मक़सद था.

पहली कामयाबी

डॉक्टर रॉक की अब अपनी लैब थी और वो अब गर्भनिरोधक के नए तरीक़ों पर काम कर रहे थे.

मिरियम भी उनके साथ इसी काम में लग गईं और दोनों ने इस विषय पर कई लेख लिखे. लेकिन मिरियम की पहली कामयाबी था आईवीएफ़.

उन्होंने बांझ औरतों को एक सपना दिया. लेकिन वो ख़ुद इस तरीक़े से बच्चा पैदा करने के हक़ में नहीं थीं. ये बात ख़ुद उन्होंने एक बार एक रिपोर्टर को बताई थी.

अगर मिरियम की ज़िंदगी इतनी मुश्किलों से ना घिरी होती और उन्हें अपने सपने साकार करने का भरपूर मौक़ा दिया होता तो वो और भी कई अहम खोज कर सकती थीं.

लेकिन उन्हें जितना भी मौक़ा मिला उसमें उन्होंने साबित कर दिया कि वो जन्म से ही एक वैज्ञानिक थीं.

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