सेक्स को लेकर ऐसे बदलने लगी है सोच

    • Author, ब्रैंडन एंब्रोसीनो
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

भारत में सेक्स ऐसा मसला है, जिसमें दिलचस्पी तो सबकी है, लेकिन बात करने से लोग हिचकते हैं.

पुरुष तो फिर भी सेक्स के बारे में अपना नज़रिया बयां कर देते हैं. लेकिन महिलाएं अगर खुलकर इस बारे में बात करना भी चाहें, तो उन्हें ग़लत नज़रों से देखा जाता है.

सेक्स के मामले में महिलाएं शर्म और सामाजिक बंदिशों के चलते अक्सर मौन रहती हैं. यूं तो प्राचीन भारतीय समाज शारीरिक संबंधों को लेकर काफ़ी खुले ज़हन का रहा था.

जिसकी मिसाल हमें खजुराहो के मंदिरों से लेकर वात्स्यायन के विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ कामसूत्र तक में देखने को मिलती है. लेकिन जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ा, हमारा देश जिस्मानी रिश्तों के प्रति संकुचित होता चला गया.

मर्द-औरत के यौन संबंध से जुड़ी बातों में पर्देदारी और पहरेदारी हो गई. हालांकि, अब यौन संबंधों को लेकर फिर से एक बड़ा बदलाव आ रहा है. ऐसा बदलाव जो क्रांतिकारी है.

बढ़ेगा लैब में बच्चे पैदा करने का ट्रेंड

क़ुदरती तौर पर सेक्स का मतलब सिर्फ़ बच्चे पैदा करने और परिवार बढ़ाने तक ही सीमित था. लेकिन साइंस की बदौलत अब सेक्स के बिना भी बच्चे पैदा किए जा सकते हैं. आईवीएफ़ और टेस्ट ट्यूब के ज़रिए ये पूरी तरह संभव है.

दुनिया का पहला टेस्ट ट्यूब बेबी 1978 में पैदा हुआ था. उसके बाद से अब तक क़रीब 80 लाख बच्चे इस तकनीक के ज़रिए दुनिया में आ चुके हैं.

रिसर्चरों का मानना है कि भविष्य में इस तरीक़े से पैदा हुए बच्चों की तादाद में भारी इज़ाफ़ा देखने को मिलेगा. लेखक हेनरी टी ग्रीली का कहना है कि आने वाले समय में 20 से 40 साल की उम्र वाले सेहतमंद जोड़े लैब में गर्भ धारण कराना पसंद करेंगे. वो सेक्स बच्चा पैदा करने के लिए नहीं बल्कि ज़िस्मानी ज़रूरत और ख़ुशी के लिए करेंगे.

अगर बच्चे बिना सेक्स के पैदा हो सकते हैं तो फिर सेक्स की क्या ज़रूरत है? सेक्स का काम मर्द, औरत की जिस्मानी ज़रूरत को पूरा करना और उन दोनों का रिश्ता मज़बूत करना है. लेकिन यहां भी धर्म बहुत बड़ा रोड़ा है.

हर धर्म, यौन संबंध को लेकर कई तरह की पाबंदियां और नियम-क़ायदे बताता है. ईसाई धर्म में कहा गया है कि मर्द-औरत को सेक्स सिर्फ़ बच्चे पैदा करने के लिए करना चाहिए.

अगर शारीरिक सुख और ख़ुशी के लिए सेक्स किया जाए तो वो अनैतिक है. हालांकि ईसाई धर्म की भी पुरानी किताब के सोलोमोन सॉन्ग में जोश के साथ सेक्स करने को बेहतरीन बताया गया है. साथ ही यौन संबंध को पति-पत्नी के बीच ही नहीं, बल्कि दो प्यार करने वालों के बीच की निजी चीज़ बताया गया है.

ग्रीस के बड़े दार्शनिक अरस्तू इस विषय पर रोशनी डालते हुए कहते हैं कि प्यार कामुक इच्छाओं का अंत है. यानी अगर दो लोगों के बीच मोहब्बत है तो उसका मुकाम शारीरिक संबंध बनाने पर पूरा होता है. इनके मुताबिक़ सेक्स कोई मामूली काम नहीं है. बल्कि, ये किसी को प्यार करने और किसी का प्यार पाने के लिए एक ज़रूरी और सम्मानजनक काम है.

जबकि अमरीकी समाजशास्त्री डेविड हालपेरिन का कहना है कि सेक्स सिर्फ़ सेक्स के लिए होता है. उसमें ज़रूरत पूरी करने या कोई रिश्ता मज़बूत करने जैसी कोई चीज़ शामिल नहीं होती.

हो सकता है कि जब इंसान ने सेक्स शुरू किया हो, तब वो सिर्फ़ शारीरिक ज़रूरत पूरी करने का माध्यम भर रहा हो. लेकिन जब परिवार बनने लगे, तो हो सकता है कि इसे रिश्ता मज़बूत करने का भी माध्यम समझा जाने लगा.

लेकिन आज समाज पूरी तरह बदल गया है. आज तो सेक्स पैसे देकर भी किया जा रहा है. बहुत से लोग पेशेवर ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए सेक्स को हथियार बनाते हैं. ऐसे हालात में यक़ीनन किसी एक की शारीरिक ज़रूरत तो पूरी हो जाती है. लेकिन, रिश्ता मज़बूत होने या जज़्बाती तौर पर एक दूसरे से जुड़ने जैसी कोई चीज़ नहीं होती.

ऐसे में फिर सेक्स का मतलब क्या है? इसका मतलब यही है कि सेक्स सिर्फ़ सेक्स के लिए किया जाए. इसमें बारीकियां ना तलाशी जाएं.

सेक्स है क्या?

बदलते समय के साथ आज ना सिर्फ़ इंसानी रिश्ते बदल रहे हैं. बल्कि यौन संबंध को लेकर लोगों का बर्ताव और रिश्तों के प्रति सोच भी बदल रही है. 2015 में अमरीका की सैन डियागो यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर जीन एम ट्वींग ने एक रिसर्च पेपर में कहा था कि 1970 से 2010 तक अमरीका में बहुत हद तक लोगों ने बिना शादी के सेक्शुअल रिलेशनशिप को स्वीकार करना शुरू कर दिया था.

नई पीढ़ी का मानना है कि सेक्शुएलिटी समाज की बंदिशों में नहीं बंधी होनी चाहिए. रिसर्चर ट्वींग के मुताबिक़ सेक्शुअल नैतिकता समय की पाबंद नहीं है. उसमें बदलाव होते रहे हैं, हो रहे हैं और आगे भी जारी रहेंगे. अब तो ये बदलाव इतनी तेज़ी से हो रहे हैं कि शायद हम ये बदलाव स्वीकार करने के लिए तैयार भी नहीं हैं.

जिस्मानी रिश्ते केवल मर्द और औरत के बीच नहीं बनते. बल्कि लेस्बियन और गे रिलेशनशिप को भी कई देशों ने मान्यता देनी शुरू कर दी है. ये कोई मानसिक या शारीरिक विकृति भी नहीं है. हालांकि धार्मिक और सामाजिक दोनों ही रूप से इसे अनैतिक व्यवहार माना जाता रहा है.

धर्म तो कहता है कि समान लिंग वाले जानवर तक आपस में संबंध नहीं बनाते. क्योंकि वो जानते हैं कि ये अनैतिक है. जबकि साइंस कहती है कि जापानी मकाक, फल मक्खियां, फ़्लोर फ़्लाइज़, अल्बाट्रॉस पक्षी और बोटल नोज़ डॉल्फ़िन समेत ऐसी क़रीब 500 प्रजातियां हैं, जिनके बीच होमोसेक्शुएलिटी होती है. लेकिन हम इन्हें, लेस्बियन, गे या हेट्रोसेक्सुअल जैसे नाम नहीं देते.

आख़िर इन सबके बीच लाइन खींची किसने? शायद उन लोगों ने जिन्होंने सेक्स को सिर्फ़ बच्चे पैदा करने की ज़रूरत समझा. अगर 'सेक्स क्यों'? के जुमले से सवालिया निशान हटा लिया जाए तो शायद लोग इसका बेहतर मतलब समझ पाएंगे. सेक्स की ख़्वाहिश क़ुदरती प्रक्रिया है.

जैसे-जैसे यौन सबंध के प्रति लोगों की सोच बदल रही है, वैसे-वैसे लोगों ने गे और लेस्बियन रिश्तों को भी स्वीकार करना शुरू कर दिया है.

हाल ही में 141 देशों में की गई रिसर्च ये बताती है कि 1981 से 2014 तक एलजीबीटी समुदाय को स्वीकार करने की दर में क़रीब 57 फ़ीसद इज़ाफ़ा हुआ है. इसमें मीडिया, मेडिकल सपोर्ट और मनोवैज्ञानिक संस्थाओं के सकारात्मक साथ ने बहुत अहम रोल निभाया है.

इसके अलावा आज पोर्न देखने का चलन जितना बढ़ चुका है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि लोगों में सेक्स की भूख कितनी ज़्यादा है. पोर्न देखने से कुछ मिले या ना मिले, लेकिन सेक्स की ख़्वाहिश बहुत हद तक शांत हो जाती है.

सेक्स भी बदल जाएगा

जानकारों का तो यहां तक कहना है कि भविष्य में सेक्स और भी ज़्यादा डिजिटल और सिंथेटिक हो जाएगा. यही नहीं भविष्य में सेक्स के और भी नए-नए तरीक़े सामने आ सकते हैं.

अभी तक टेस्ट ट्यूब और आईवीएफ़ को वही लोग अपना रहे हैं, जो प्राकृतिक तरीक़े से बच्चा पैदा करने में असफल हैं. हो सकता है आने वाले समय में सभी लोग इस तकनीक का इस्तेमाल शुरू कर दें.

बच्चा पैदा करने के लिए नर और मादा के अंडों का मिलन ज़रूरी है. लेकिन गे और लेस्बियन के संदर्भ में ये संभव नहीं है. लिहाज़ा ऐसे लोग बच्चे की चाहत पूरी करने के लिए इस तकनीक का ख़ूब इस्तेमाल कर रहे हैं. बॉलीवुड में इसकी कई मिसालें मौजूद हैं.

कमिटमेंट और शादी जैसे रिश्तों को लेकर भी बहुत से नए आइडिया अभी सामने आ सकते हैं. बीमारियों पर नियंत्रण के बाद इंसान की उम्र भी बढ़ गई है.

1960 से 2017 तक इंसान की औसत उम्र क़रीब 20 साल बढ़ चुकी है. एक अंदाज़े के मुताबिक़ 2040 तक इसमे 4 साल का और इज़ाफ़ा हो जाएगा. अमरीकी जीव वैज्ञानिक और भविष्यवादी स्टीवेन ऑस्टाड के मुताबिक़ आने वाले समय में हो सकता है कि इंसान 150 बरस तक जिए. इतनी लंबी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक ही सेक्स पार्टनर के साथ गुज़ारा मुश्किल होगा.

लिहाज़ा वो समय-समय पर अपना यौन संबंध का साथी बदलता रहेगा. और इसकी शुरुआत हो चुकी है. बड़े शहरों में इसकी मिसालें ख़ूब देखने को मिलती हैं. तलाक़ के मामले बढ़ रहे हैं.

2013 के सर्वे के मुताबिक़ अमरीका में हर दस में से चौथे जोड़े की दूसरी या तीसरी शादी होती है. आने वाले समय में कमिटमेंट और शादीशुदा ज़िंदगी को लेकर भी कई नए आइडिया सामने आ सकते हैं.

क़ुदरत अपने मुताबिक़ इंसान को बदलती रही है और बदलती रहेगी. अब बदलाव हमें अपनी सोच में करने की ज़रूरत है.

सेक्स और सेक्शुअल पसंद को लेकर हमें अपने विचार बदलने की ज़रूरत है. वो दिन दूर नहीं जब सारी दुनिया सेक्स को ख़ुशी और मनोरंजन का माध्यम यानी सिर्फ़ सेक्स ही मानेगी. न कि बच्चे पैदा करने का माध्यम.

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