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चाइल्ड पोर्न: क्या तकनीक ने बच्चों को आसान शिकार बना दिया है?
- Author, प्रज्ञा मानव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सीबीआई ने हाल ही में लखनऊ से एक शख़्स को गिरफ़्तार किया है जिस पर आरोप है कि वो व्हाट्सऐप पर चाइल्ड पोर्न का एक अंतरराष्ट्रीय रैकेट चला रहा था.
ये पहली बार नहीं है जब किसी मैसेजिंग ऐप को चाइल्ड पोर्न के लिए इस्तेमाल किया गया हो. यूरोप और अमरीका से ऐसी ख़बरें आती रहती हैं.
इनमें से बहुत सी ख़बरों में कनाडा की मैसेजिंग ऐप 'किक' का ज़िक्र आता है. फ़ोर्ब्स की मानें तो 2009 में शुरू हुई किक के ज़्यादातर यूज़र 13-24 साल के हैं, जिस वजह से ये बच्चों का यौन शोषण करने वालों (पीडोफ़ाइल) के बीच काफ़ी लोकप्रिय है.
मार्च 2016 में नॉर्थ कैरोलाइना से पकड़े गए थॉमस पॉल कीलर को तो किक इतना पसंद था कि उन्होंने उस पर चाइल्ड पोर्न से जुड़े 200 ग्रुप जॉइन कर रखे थे.
कीलर ने किक इस्तेमाल करके एक साल में 300 लोगों के साथ 3 से 12 साल के बच्चों के अश्लील फ़ोटो और वीडियो शेयर किए. फ़ोर्ब्स ने अगस्त 2017 में इस पर एक स्टोरी भी की थी.
कोई दूध का धुला नहीं
किक या व्हाट्सऐप ऐसे अकेले ऐप्स नहीं हैं. सोशल मीडिया पर फ़िल्टर्स के चलते फ़िलहाल चाइल्ड पोर्न का बाज़ार उतना बड़ा नहीं है लेकिन फिर भी फ़ेसबुक और ट्विटर के ग़लत इस्तेमाल से जुड़ी ख़बरें आती रहती हैं.
फ़रवरी 2016 में बीबीसी की एक जांच में सामने आया था कि फ़ेसबुक पर भी चाइल्ड पोर्न से जुड़े बहुत से सीक्रेट ग्रुप चल रहे हैं जिनमें से एक ग्रुप का मॉडरेटर दोषी साबित हो चुका एक पीडोफ़ाइल था.
बीबीसी ने फ़ेसबुक को कुछ ऐसे फ़ोटो भी भेजे थे जिन पर आपत्ति हो सकती थी लेकिन फ़ेसबुक ने उनमें से कुछ ही डिलीट किए. जुलाई 2017 में बीबीसी ने ट्विटर के 'पेरीस्कोप' पर चल रहे चाइल्ड पोर्न के कारोबार का पर्दाफ़ाश किया.
इसमें स्क्रीन के पीछे छिपे पीडोफ़ाइल छोटी-छोटी बच्चियों से वीडियो चैट में अलग-अलग तरह के सेक्शुअल काम करने के लिए कहते थे.
2015 में दक्षिण कोरिया की ऐप 'ककाओ टॉक' के प्रमुख को ऐसे ही एक मामले में इस्तीफ़ा देना पड़ा था.
इनके अलावा भी ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्हें लेकर सवाल उठता है कि क्या तकनीकी के इस दौर में बच्चों को शिकार बनाना ज़्यादा आसान हो गया है?
चाइल्ड पोर्न किसे कहते हैं?
चाइल्ड पोर्न ऐसी किसी भी यौन सामग्री को कहते हैं जिसमें बच्चे शामिल हों.
किसी बच्चे के साथ सीधे यौन संपर्क बनाया जाए, या अपनी यौन संतुष्टि के लिए उन्हें किसी तरह की यौन क्रिया या कुछ असामान्य करने के लिए कहा जाए तो ये बच्चे के साथ होने वाली यौन हिंसा है.
यौन हिंसा ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों तरह की होती है.
यौन हिंसा को वीडियो, फ़ोटो या तस्वीर में रिकॉर्ड करना चाइल्ड पोर्न है, फिर चाहे वो आपके निजी इस्तेमाल के लिए क्यों न हो.
चाइल्ड पोर्न बनाना, रखना, बेचना, ढूंढना, खरीदना, अपलोड-डाउनलोड करना, देखना और शेयर करना ग़ैर क़ानूनी है.
ज़रूरी नहीं कि पोर्न सामग्री में बच्चे के साथ किसी तरह की यौन क्रिया होती दिखाई जाए. यह भी ज़रूरी नहीं कि उन तस्वीरों या वीडियो में बच्चा ख़ुद कुछ कामुक या उत्तेजक करता नज़र आए.
किसी बच्चे की बग़ैर कपड़ों की तस्वीर या वीडियो भी चाइल्ड पोर्न में आते हैं. ख़ास तौर पर वे जिनमें उनके गुप्तांग नज़र आते हों.
इनमें से कुछ सामग्री तो ख़ुद परिवार वाले अनजाने में अपलोड कर देते हैं जिसे इंटरनेट पर घूम रहे शिकारी चुरा लेते हैं.
इंटरनेट यौन हिंसा की लाइव स्ट्रीमिंग का दौर भी है, जिसमें लोग पैसे देकर किसी बच्चे के साथ हो रही यौन हिंसा का लाइव वीडियो देखते हैं.
इसे ट्रेस करना बेहद मुश्किल है क्योंकि ऐसे रियल-टाइम इवेंट्स एक बार होकर ख़त्म हो जाते हैं और अपने पीछे डिजिटल फ़ुटप्रिंट यानी सबूत नहीं छोड़ते.
हालांकि चाइल्ड पोर्न में कुछ महीने के नवजात से लेकर 18 साल के किशोरों तक का इस्तेमाल होता है लेकिन दुनिया भर में ज़्यादातर फ़ोटो और वीडियो 12 साल से छोटे बच्चों के ही होते हैं.
इनमें से भी ज़्यादातर बच्चियों के होते हैं.
कहां जाते हैं ग़ायब हुए बच्चे?
यूनिसेफ़ की 6 फ़रवरी 2017 की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में ऑनलाइन चाइल्ड पोर्न की इंडस्ट्री कितनी बड़ी है, इस पर कोई जानकारी नहीं है क्योंकि सरकार ने कभी इस सिलसिले में कोई ढंग का सर्वे नहीं कराया.
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि सरकार के आपराधिक आंकड़ों में सारे साइबर अपराधों की एक कैटेगरी होती है जिसमें ज़्यादातर पैसे से जुड़े फ़्रॉड और राजनीतिक मामलों को ही शामिल किया जाता है.
बच्चों के साथ इंटरनेट की दुनिया में क्या हो रहा है, इसका कोई आंकड़ा सरकार के पास नहीं मिलता.
एनजीओ 'बचपन बचाओ आंदोलन' की वेबसाइट के मुताबिक़ भारत में हर छह मिनट में एक बच्चा खो जाता है और हर साल तक़रीबन एक लाख बच्चे ग़ायब हो जाते हैं.
सरकारी आंकड़े इससे अलग हैं लेकिन वे भी हर साल हज़ारों बच्चों के गुम होने से इंकार नहीं करते.
इन बच्चों के साथ क्या होता है, ये कोई दावे से नहीं कह सकता लेकिन चाइल्ड पोर्न के बढ़ते कारोबार को देखकर ये समझना मुश्किल नहीं कि इनमें से बहुत से बच्चे तस्करी और देह व्यापार की भेंट चढ़ जाते हैं.
हालांकि आजकल के समय में यह ज़रूरी नहीं कि किसी बच्चे के साथ ज़बरदस्ती ही की जाए.
इंटरनेट के चलते समय से पहले जवान हो रही ये पीढ़ी कई बार ख़ुद भी ऐसे अपराधियों के चंगुल में फंस जाती है.
इंटरनेट से कितना नुकसान?
यूनिसेफ़ की सितंबर 2016 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में 13 करोड़ से भी ज़्यादा बच्चों के पास फ़ोन है.
हर रोज़ एक जीबी डेटा मुफ़्त देने वाले ऑपरेटरों ने इंटरनेट को बहुत आसान और सस्ता बना दिया है. इंटरनेट और मोबाइल एसोसिएशन के मुताबिक़, जून 2018 तक भारत के 50 करोड़ लोगों के पास इंटरनेट होगा.
इसका फ़ायदा ये है कि बच्चे इंटरनेट पर मौजूद अथाह जानकारी से बहुत कुछ सीख सकते हैं लेकिन नुकसान ये है कि उन्हें उस जानकारी की एक्सेस भी मिल जाती है जो उनके लिए नहीं है.
दूसरा अहम पहलू ये है कि सरकार भले ही सेक्स के लिए सहमति की उम्र को 18 साल माने लेकिन रिसर्च साबित कर चुकी हैं कि अमूमन बच्चे उससे कहीं पहले ही सेक्स में दिलचस्पी लेने लगते हैं.
जब तकनीक नहीं थी तब दुनिया की लगभग सभी सभ्यताओं में किशोरावस्था (प्यूबर्टी) के बाद सेक्स को बुरा नहीं माना जाता था. सिर्फ़ एक शताब्दी पीछे जाएं तो पाएंगे कि सिर्फ़ विकासशील ही नहीं, विकसित देशों में भी छोटी उम्र के विवाह प्रचलित थे.
अब समय बदल गया है. लोग बाल विवाह के नुकसान से वाक़िफ़ हैं. लेकिन इसका मतलब उनकी सेक्स में दिलचस्पी घटना नहीं है.
अब बच्चे और किशोर अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए इंटरनेट का सहारा लेने लगे हैं क्योंकि ऐसे समाज में जहां वयस्क भी सेक्स पर बातचीत करने से कतराते हैं, इंटरनेट उनका निजी क्लासरूम बन जाता है.
ऐसे बच्चों को फुसलाना या ब्लैकमेल करना आसान है.
ख़ास तौर पर तब जब ख़ुद रिसर्च बताती है कि पीडोफ़ाइल आम तौर पर काफ़ी नम्र स्वभाव के होते हैं. वो इतनी लच्छेदार बातें करते हैं कि बच्चे उनके जाल में फंस जाते हैं.
मैथ्यू फ़ॉल्डर, जिन्हें 19 फ़रवरी को ब्रिटेन में 32 साल की सज़ा सुनाई गई है, अपने शिकार से टॉयलेट की सीट पर बैठने के लिए कहते थे. और बच्चे ऐसा करते थे.
पुलिस को चार साल तक चकमा देते रहे मैथ्यू ने ख़ुद पर लगे 137 गुनाह कुबूल किए जिनमें से 46 तो सिर्फ़ बलात्कार के हैं.
पीड़ित उनकी बातों में इतने उलझ जाते थे कि उनके कहने पर ख़ुद को नुकसान पहुंचाने से भी नहीं हिचकते थे.
क्या कहता है क़ानून?
बच्चों का लैंगिक अपराधों से संरक्षण क़ानून 2012 के तहत चाइल्ड पोर्न के लिए कड़ी सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है. लेकिन पुलिस और सीबीआई की समस्या ये है कि इन साइट्स को ट्रैक कैसे किया जाए.
इंटरनेट की दुनिया बहुत बड़ी है और चाइल्ड पोर्न का ज़्यादातर काम डार्क वेब पर होता है. डार्क वेब यानी इंटरनेट का वो छिपा हुआ कोना जहां आम सर्च इंजन नहीं पहुंच सकते.
फिर, इंटरनेट पर कुछ भी हमेशा के लिए डिलीट नहीं होता. एक साइट को बंद करें, तो उस पर मौजूद फ़ोटो और वीडियो दूसरी साइट्स पर सर्क्यूलेट होने लगते हैं.
तीसरी समस्या ये है कि इंटरनेट पर भारतीयों को कुछ उपलब्ध कराने के लिए किसी साइट का भारतीय होना ज़रूरी नहीं.
कोई भी, दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर, दिल्ली या लखनऊ में बैठे किसी व्यक्ति को कैसी भी जानकारी मुहैया करा सकता है.
ऐसे में पुलिस या सीबीआई अपने दायरे से बाहर की इन विदेशी वेबसाइटों की निगरानी नहीं कर सकती.
दूसरे देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों से मदद मांगी जा सकती है लेकिन उसके लिए भी साइट और उसकी लोकेशन की पहचान करना ज़रूरी है जो डार्क वेब पर बेहद मुश्किल है क्योंक वहां सब कुछ गुमनाम होता है.
क्या है रास्ता?
सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में सरकार से चाइल्ड पोर्न की वेबसाइट्स को ब्लॉक करने के लिए कहा था.
लेकिन उसमें एक बड़ी परेशानी ये है कि हमारे पास अब तक कोई ऐसी अचूक तकनीक नहीं है जो वयस्क पोर्न और चाइल्ड पोर्न की सामग्री में फ़र्क कर सके.
और देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियां गूगल की मशीन लर्निंग और माइक्रोसॉफ़्ट के फ़्री सॉफ़्टवेयर फ़ोटोडीएनए की मदद लेती हैं लेकिन भारत में इनके इस्तेमाल के आंकड़े पता लगाना मुश्किल है.
ऐसे में आम लोगों की हिस्सेदारी एक विकल्प हो सकता है. 2016 में मुंबई के एक एनजीओ ने ब्रिटेन के इंटरनेट वॉच फ़ाउंडेशन के साथ मिलकर ऐसी हॉटलाइन बनाई थी जिस पर कोई भी यूज़र किसी साइट को रिपोर्ट कर सके.
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