डेटिंग ऐप पर कैसे मिलेगा मनपंसद रिश्ता?

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    • Author, विलियम पार्क
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

स्मार्टफ़ोन के इस दौर में अब रिश्ते भी स्वाइप से तय होने लगे हैं. राइट स्वाइप यानी राइट च्वाइस और लेफ़्ट स्वाइप यानी वो पसंद नहीं.

टिंडर और बंबल जैसे डेटिंग ऐप ने रोमांस के बाज़ार को स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन में क़ैद कर लिया है. जहां आपकी पसंद के मुताबिक़ एल्गोरिदम संभावित रूमानी साथियों को आप की पेश-ए-नज़र करता है. पसंद आए तो राइट स्वाइप कीजिए, वरना आगे बढ़ चलिए.

बहुत से लोगों के ज़हन में सवाल होता है कि ये डेटिंग ऐप कैसे हमारी पसंद के साथी का चुनाव करते हैं? इस बारे में कंपनियां तो कुछ बताने को तैयार नहीं हैं. इसलिए कई लोगों ने रिसर्च किए हैं. हालांकि इनके नतीजे ठोस जवाब देने में नाकाम रहे हैं.

ब्रिटेन के रहने वाले मैट टेलर ने आज से कई बरस पहले टिंडर पर राइट स्वाइप के लिए एक ऑनलाइन ट्रिक इजाद की. इसकी वजह से उनके कंप्यूटर ने महज़ एक रात में 25 हज़ार संभावित साथियों को राइट स्वाइप किया.

इनमें से नौ लोग उनकी पसंद से मिलते थे और इन नौ लोगों में से एक महिला चेरी ने उनके साथ डेट पर जाने को रज़ामंदी दी. आज दोनों ही ख़ुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी जी रहे हैं.

ये बरसों पुरानी बात है. आज कोई और ऐसा नहीं कर सकता है क्योंकि डेटिंग ऐप में बहुत से ऐसे फ़ीचर आ गए हैं जो आपको हर विकल्प को राइट स्वाइप करने से रोकते हैं.

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आपकी पसंद कैसे पहचानते हैं डेटिंग ऐप्स?

इसका नतीजा ये हुआ है कि अपने संभावित पार्टनर की तलाश के लिए ज़्यादातर लोग अब एल्गोरिदम के ही भरोसे हैं और इस बात की कोई गारंटी तो है नहीं कि एल्गोरिदम आपको आप की पसंद के साथी का ही विकल्प देगा.

कनाडा की वेस्टर्न यूनिवर्सिटी की डॉक्टर सामंता जोएल कहती हैं कि अकेले रह रहे लोग चाहते तो यही हैं कि डेटिंग ऐप पर पलक झपकते ही उन्हें पसंदीदा साथी मिल जाए. तब वो उस के साथ डेट पर जाएं. वरना सभी संभावित साथियों से सीधे मिलना जज़्बाती तौर पर बहुत थकाऊ होता है और लोगों के ज़हन में संदेह भी पैदा करता है.

आख़िर एल्गोरिदम किस आधार पर आप के राइट या लेफ़्ट स्वाइप की ज़हमत को कम करते हैं?

इस सवाल का जवाब तो तभी मिल सकता है जब टिंडर या बंबल जैसे डेटिंग ऐप अपने एल्गोरिदम के डेटा प्रोसेसिंग को आप से साझा करें. मगर वो कंपनियों की बौद्धिक संपदा है. इसलिए कंपनियां इन्हें वैज्ञानिकों या पत्रकारों को देने को राज़ी नहीं हैं.

इसीलिए इन डेटिंग ऐप्स के एल्गोरिदम को समझने के लिए कई प्रयोग किए जा रहे हैं.

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डॉक्टर सामंता जोएल और उनके साथियों ने ऐसा ही एक प्रयोग किया था. उन्होंने अपनी ख़ुद की प्रश्नावली बनाई. जिसमें से ज़्यादातर सवाल तो वही थे जो डेटिंग ऐप आपसे पूछते हैं जैसे कि आपकी पसंद क्या है? आप कैसा साथी चाहते हैं? आप का मिज़ाज कैसा है? आप के डर क्या हैं? वगैरह-वगैरह.

डॉक्टर सामंता और उनके साथियों ने ऐसे 100 सवालों के जवाब से पसंद की एक फ़ेहरिस्त तैयार की. इसके बाद उन्होंने कई लोगों को चार-चार मिनट की स्पीड डेटिंग के प्रयोग में हिस्सा लेने को कहा. फिर उनसे पूछा गया कि क्या उनमें से किसी के साथ वो असल डेट पर जाना चाहेंगे?

सामंता जोएल और साथियों ने इस प्रयोग के आधार पर ये नतीजा निकाला कि कुछ लोगों के लिए कुछ संभावित साथी ज़्यादा आकर्षक होते हैं. ऐसे में ये अनुमान लगाया जा सकता है कि किसे कौन पसंद आएगा. हालांकि डेटिंग ऐप्स ऐसा नहीं करते हैं. लेकिन इस प्रयोग से डॉक्टर सामंता ने जो एल्गोरिदम तैयार किया, वो बहुत से लोगों के संभावित साथी की पसंद का अनुमान लगा सकता है. हालांकि इस बात की कोई गारंटी नहीं कि दोनों में पटेगी या नहीं.

सामंता कहती हैं, "जब दो लोग वाक़ई मिलते हैं तो रिश्ते में एक नया आयाम आता है. हर व्यक्ति की अलग पसंद होती है और किसे कौन आकर्षक लगेगा इसका अनुमान लगाना क़रीब-क़रीब नामुमकिन है.

हां, आपकी रेटिंग के हिसाब से आपका संभावित साथी कौन हो सकता है, उसके विकल्प ज़रूर सुझाए जा सकते हैं. आप मज़ाक़िया हैं तो आप के लिए मज़ाक़िया साथियों के विकल्प सुझाए जा सकते हैं. पर ज़ाहिर है कि आप केवल इसी आधार पर तो अपने साथी का चुनाव करेंगे नहीं."

यानी आप के संभावित जीवनसाथी का अंदाज़ा लगाना इतना सीधा काम नहीं है.

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ऐसे मिलेंगे पसंद के पार्टनर

हालांकि कुछ ऐसे वैज्ञानिक हैं जिन्होंने अपना एल्गोरिदम तैयार करके क़ामयाबी से लोगों के रोमांटिक साथी का अनुमान लगा लिया.

अमरीका की सैंटा बारबारा कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डैनियल कॉनरॉय-बीम और उनकी टीम का कहना है आदर्श पार्टनर और और संभावित पार्टनर के बीच का जो भेद होता है, वो सही विकल्प चुनने में मदद कर सकता है.

डॉक्टर डेनियल ने कई लोगों को फ़र्ज़ी प्रोफ़ाइल वाले लोगों के विकल्प दिए. क्योंकि लोग किसी से रूबरू मिलने से पहले ऑनलाइन काट-छांट करते हैं. ठीक इसी तरह डेनियल ने अपने प्रयोग में लोगों को मौक़ा दिया. सभी संभावित पार्टनर को बराबर मौक़े दिए गए.

वो कहते हैं कि आप अगर थोड़े समय के लिए साथी तलाशते हैं तो शारीरिक आकर्षण पर ज़ोर देते हैं. लेकिन जो लोग स्थायी साथी की तलाश में होते हैं, वो आपके अंदर करुणा और ख़ुशमिज़ाजी जैसे गुण तलाशते हैं.

इन पसंदों को ध्यान में रखते हुए संभावित साथी तलाशने का काम पेचीदा हो जाता है. आप किस गुण को ज़्यादा तरज़ीह देते हैं, किस ख़ूबी पर कम ध्यान देते हैं...इन्हें एक क्रम में रखने पर आपके पसंदीदा साथी की तस्वीर साफ़ होने लगती है.

इसके बाद प्रयोग में अगला सवाल यह था कि किस कारण से वो रिश्ता नहीं करना चाहेंगे? जैसे कि किसी को शराबनोशी से दिक़्क़त थी तो किसी को स्मोकिंग से. हालांकि रिसर्च से ये पता चला कि अगर किसी को अपने संभावित साथी में ज़्यादातर गुण मिल जाते हैं तो ना पसंद आने वाली आदतें दरकिनार कर दी जाती हैं.

मतलब साफ़ है कि अगर लोगों के पास इस बात का विकल्प होता है कि कोई उनसे मिलने के लिए राज़ी है तो वो उनकी कई न पसंद आने वाली आदतों की अनदेखी करने को राज़ी हो जाते हैं.

सामंता जोएल कहती हैं कि किसी व्यक्ति की बुरी आदतों का पता पहली ही मुलाक़ात में चल जाए, ऐसा नहीं होता. कई बार तो इसके लिए पांचवीं डेट तक का इंतज़ार करना पड़ सकता है और तब तक अगर आपको वो पार्टनर पसंद आने लगता है तो आप उसकी कुछ बुरी बातों की अनदेखी करने के लिए ज़हनी तौर पर तैयार होते हैं.

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ईमानदार रहिए, फ़ायदे में रहेंगे

अब अगर हम अपनी असल ज़िंदगी में कम कमियाँ निकालते हैं लेकिन डेटिंग ऐप पर कुछ ज़्यादा ही चुनाव करते हैं तो सही साथी तलाशना मुश्किल हो जाता है.

मैच डॉट कॉम या ईहार्मनी जैसी डेटिंग साइट तो पहले आप से बहुत से सवाल करती हैं ताकि रजिस्ट्रेशन से पहले ही आपकी पसंद-नापसंद का अंदाज़ा हो जाए. इन सवालों के जवाब देकर आपका साथी तलाशने का सिलसिला काफ़ी आसान हो जाता है.

ईहार्मनी की रैशेल लॉयड कहती हैं, "हम इन सवालों के जवाब में किसी व्यक्ति के बुनियादी मिज़ाज को समझते हैं फिर उन्हें संभावित साथियों के विकल्प सुझाते हैं. बरसों के रिसर्च से ये पता चलता है कि आप और आप के साथी में जितनी बातें समान होती हैं आपके मिलने की संभावना उतना ही बढ़ती जाती है. ईहार्मनी में हमने 150 सवाल पूछने से शुरू किया था. हालांकि अब इनकी तादाद कम हो गई है."

रैशेल कहती हैं कि उनकी साइट का मक़सद तसल्लीबख़्श रिश्ते बनाने में मदद करना है. वो बताती हैं, "आज से 20 बरस पहले जब वेबसाइट शुरू हुई थी, तब शादी अहम थी. आज शादी से पहले के रिश्ते अहम हो गए हैं. इसलिए हमारे एल्गोरिदम भी बदल गए हैं.'

ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी ने ईहार्मनी वेबसाइट के डेढ़ लाख सदस्यों के डेटा का आकलन किया तो उसमें सामंता जोएल की बात सही पाई गई. लोगों ने अपनी पसंद के गुण वाले साथी की कई बुरी आदतों की अनदेखी कर के उन्हें अपनाया था. फिर उन्हें शराबनोशी या फिर धूम्रपान जैसी बुरी आदतों से दिक़्क़त नहीं थी.

रैशेल ने बताया, "हमारी वेबसाइट के नतीजों के मुताबिक़ जो लोग दयालु होते हैं वो ज़्यादा कामयाब होते हैं. महिलाओं को वो पुरुष पसंद आते हैं, जो ख़ुद को 10 में से पांच नंबर देते हैं. वहीं, पुरुषों को वो महिलाएं पसंद आती हैं जो ख़ुद को अपने शारीरिक आकर्षण के लिए 10 में से आठ नंबर देती हैं.'

आंकड़े ये भी बताते हैं कि बहुत आकर्षक मर्दों को कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होता. कोई औसत मर्द भी साथी पाने में उनसे ज़्यादा कामयाब होते हैं.

हालांकि टिंडर और बंबल जैसे डेटिंग ऐप आप से ज़्यादा सवाल नहीं करते. बस आप को विकल्प दिखाते हैं. कुछ बुनियादी सवाल ज़रूर पूछे जाते हैं. जैसे कि आप पुरुष साथी चाहते हैं या महिला? उसकी उम्र क्या हो? वो आप से कितनी दूर या पास हो?

हालांकि जैसे-जैसे आप इन ऐप पर समय बिताते हैं, उन्हें आप की पसंद और बेहतर समझ में आने लगती है. फिर वो आप की पसंद के अच्छे विकल्प दिखाने लगते हैं.

सामंता जोएल कहती हैं का मानना है कि टिंडर काफ़ी बेहतर है क्योंकि वो आप को लोगों को दिखा कर पूछते हैं कि क्या ये आप को पसंद हैं. शुरुआती आंकड़े कारगर नहीं साबित होते. अगर ऑनलाइन साइट पर आप लंबे समय के लिए साथी तलाश रहे हैं तो आप को सही साथी पाने के लिए ज़्यादा समय बिताना होगा.

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क़ामयाबी में वक़्त तो लगेगा

डॉक्टर डेनियल का कहना है कि अस्थायी पार्टनर में लोग शारीरिक आकर्षण तलाशते हैं, जबकि स्थायी साथी में और गुण भी चाहते हैं. फिर भी लोगों की पसंद-नापसंद देखकर आप ये अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कोई किसी रिश्ते को लेकर कितना गंभीर है.

रैशेल कहती हैं कि उनकी साइट पर इकट्ठे आंकड़े कहते हैं कि आप अपने मिज़ाज को लेकर जितना खुलेंगे, आपके कामयाब होने की संभावना उतनी ही बढ़ जाएगी. जितनी ईमानदारी से साथी तलाशेंगे, उतने ही सफल होंगे.

हालांकि डेटिंग ऐप पर बनावटी लोगों की तादाद ज़्यादा है. ऐसे में पसंद का साथी मिलने में आप को काफ़ी समय लग सकता है.

कुल मिलाकर बात तो ये है कि आप की रूमानी ख़्वाहिशों का सटीक अंदाज़ा लगाना अगर नामुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर है. अभी भी हम किसी से आमने-सामने मिलकर जो संकेत एक-दूसरे के बारे में पा लेते हैं, उन्हें कोई एल्गोरिदम नहीं समझ सका है.

एक बात साफ़ है कि इंसान की पसंद बहुत पेचीदा है.

(बीबीसी फ़्यूचर पर प्रकाशित मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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