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दुनिया से अगर समंदर का नामोनिशान मिट जाए तो..
- Author, टीम बीबीसी फ़्यूचर
- पदनाम, लंदन
हमारी धरती के 71 फ़ीसद हिस्से पर समंदर फैले हुए हैं. इनमें दुनिया में मौजूद कुल पानी का 97 प्रतिशत हिस्सा है.
समंदर के जानकार कहते हैं कि इन में 1.35 अरब क्यूबिक किलोमीटर पानी मौजूद है. अब तक इंसान ने समुद्र के केवल पांच फ़ीसद हिस्से को ही खंगाला है.
समंदर, हमारी पृथ्वी पर जीवन का सबसे बड़ा स्रोत हैं. यहीं से धरती पर ज़िंदगी के विकास की बुनियाद पड़ी थी. अब तक समुद्रों में मौजूद जीवों की 2 लाख 30 हज़ार प्रजातियों का ही पता लगाया जा सका है.
लेकिन, जानकार कहते हैं कि चूंकि हम ने अब तक समुद्र का केवल पांच फ़ीसद हिस्सा ही खंगाला है, तो इस में मौजूद जीवों की प्रजातियों की संख्या 20 लाख से भी ज़्यादा हो सकती है.
समुद्रों से ही दुनिया का मौसम तय होता है. बारिश होती है. गर्मी पड़ती है. अंतरिक्ष में चारों तरफ़ सिर्फ़ काला रंग ही दिखता है. इस में सबसे अलग दिखती है हमारी धरती. नीली-हरी धरती का ये रंग समंदर की वजह से ही है.
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लेकिन, क्या हो अगर अचानक एक दिन दुनिया से समुद्रों का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाए?
एक मोटे अंदाज़े के मुताबिक़, क़रीब चार करोड़ लोगों की रोज़ी समंदर से चलती है. इन में से साढ़े तीन करोड़ के क़रीब लोग समुद्र में मछली मार कर अपनी जीविका कमाते हैं. तो बाक़ी के पचास लाख लोग जहाज़ों और क्रूज़ शिप के माध्यम से रोज़गार पाते हैं.
समुद्र का पानी अचानक से उड़ जाने से उस वक़्त समंदर में मौजूद जहाज़ क़रीब पौने चार किलोमीटर की गहराई में चले जाएंगे. क्योंकि समुद्रों की औसत गहराई इतनी ही है. ये भी हो सकता है कि कुछ ख़ास जगहों पर मौजूद जहाज़ इससे भी ज़्यादा गहराई में चले जाएं.
ऐसा होने की सूरत में जो जहाज़ किनारों के पास होंगे, उन्हें तो शायद मामूली नुक़सान उठाना पड़े. लेकिन, गहरे समंदर में तैर रहे जहाज़ अचानक से बहुत गहराई में गिरेंगे, तो उन्हें बहुत क्षति उठानी पड़ेगी.
समुद्र अचानक सूखे, तो उन में रहने वाले अरबों की तादाद में जीवों की दम घुटने से मौत हो जाएगी. इनमें व्हेल-डॉल्फ़िन और शार्क मछली से लेकर हज़ारों नस्लों के छोटे जीव शामिल होंगे. अंदाज़ा है कि इन जीवों की लाशों का वज़न 5 से 10 अरब टन हो सकता है. जब ये सड़ने लगेंगे, तो इनकी बदबू का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.
समुद्रों का पानी ख़त्म होने पर क़रीब 1.3 अरब वर्ग किलोमीटर जगह ख़ाली होगी, जिसे भरने के लिए वायुमंडल की हवा उस तरफ़ भागेगी. इससे वायुमंडल का घनत्व अचानक से बहुत कम हो जाएगा. इस वजह से ऊंचे ठिकानों में रहने वाले लोगों के लिए तो सांस लेना भी दूभर हो जाएगा. इन जगहों से हवा का दबाव कम होगा, तो तापमान भी बहुत तेज़ी से गिरेगा.
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संतुलन
समुद्रों में दुनिया का 97 प्रतिशत पानी मौजूद है. ये अचानक से ग़ायब हुआ तो प्रकृति का संतुलन ही बिगड़ जाएगा. वायुमंडल की बनावट बदलेगी. मौसमों का चक्र भी पटरी से उतर जाएगा.
आख़िर समुद्रों में मामूली नहीं बल्कि 13 अरब घन किलोमीटर से भी ज़्यादा पानी मौजूद है. जबकि, हमारी पृथ्वी पर मीठे पानी की तादाद केवल 10 करोड़ 64 लाख घन किलोमीटर के क़रीब है. मीठे पानी के इन स्रोतों को भी समुद्र से ही पानी मिलता है. समंदर नहीं रहे, तो बादल लापता हो जाएंगे. इन के न होने से पानी नहीं बरसेगा, तो मीठे पानी के स्रोतों को भी ताज़ा पानी नहीं मिलेगा.
समंदर और बादल न रहे, तो धरती को सूरज की भयंकर किरणों का सामना करना पड़ेगा. इससे भूमध्य रेखा के आस-पास तो मानो आग ही लग जाएगी. साथ ही ग्लेशियर और बर्फ़ीले पहाड़ भी पिघल जाएंगे. इन में जमा क़रीब ढाई करोड़ वर्ग किलोमीटर पानी भी पिघल जाएगा.
समुद्र में मौजूद काई और इस तरह के पौधे आज की तारीख़ में धरती की कुल दो तिहाई ऑक्सीजन पैदा करते हैं. ये वायुमंडल में मौजूद कार्बन को भी सोखते हैं. समंदर न रहे, तो ये पौधे भी ख़त्म हो जाएंगे. इससे धरती पर ऑक्सीजन की मात्रा अचानक से कम हो जाएगी और कार्बन डाई ऑक्साइड की तादाद बड़ी तेज़ी से बढ़ेगी.
बारिश नहीं होगी, तो हरियाली कम होगी. तापमान बढ़ेगा, तो प्रेयरी, टुंड्रा और दूसरे बड़े जंगलों में भयंकर आग लग जाएगी. इन से और कार्बन डाई ऑक्साइढ पैदा होगी और ऑक्सीजन कम होगी.
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धरती का स्वरूप
समंदर ख़त्म होने से खाने-पीने के संसाधनों की भारी कमी हो जाएगी. बचे हुए इंसानों में इसके लिए झगड़े होंगे. जो ताक़तवर होगा वो इन सीमित संसाधनों का उपभोग कर लेगा. कुल मिलाकर हालात ऐसे बनेंगे कि हमारी धरती भी बहुत से ग्रहों की तरह जीवन के लायक़ नहीं रह जाएगी. तब शायद कुछ छोटे-छोटे बैक्टीरिया और दूसरे ऐसे ही जीव धरती पर बचेंगे.
लंबे समय तक बिना समुद्र के रहने पर धरती के पहाड़ों का आकार बढ़ जाएगा. क्योंकि उनका आकार घटाने वाले ग्लेशियर, बारिश और हवा की तुर्शी मौजूद ही नहीं होगी. जो गर्म हवा होगी, उसकी वजह से धरती बेहद बदरंग हो जाएगी. कुरूप हो जाएगी. तब अजीब आकार की चट्टानें और पहाड़ ही दिखेंगे.
बर्फ़ और समंदर का पानी न होने से धरती की ऊपरी परत पतली हो जाएगी. इससे ज्वालामुखी विस्फोट ज़्यादा और बार-बार होने लगेंगे. इससे धरती का वज़न घट जाएगा. ऐसे ही हालात बने रहे, तो दसियों लाख बरस बाद सूरज का चक्कर लगाने वाली धरती की कक्षा भी बदल जाएगी. तब पृथ्वी सूरज से दूर चली जाएगी और यहां भयंकर ठंड पड़ने लगेगी.
हालांकि ये सिर्फ़ एक कल्पना भर है. लेकिन है बेहद डरावनी. हमें पता है कि धरती पर मौजूद समुद्र अभी तो कहीं नहीं जा रहे. लेकिन, जिस तरह मानवीय गतिविधियां धरती पर असर दिखा रही हैं, ऐसे में हमारी हरकतों के असर को समझना ज़रूरी है. बेहतर होगा कि हम धरती के संसाधनों का सावधानी से प्रयोग करें.
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