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अगर समय का पहिया दोबारा घूमा तो इंसान पैदा होगा
- Author, जेम्स हॉर्टन और टिफ्फनी टेलर
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
अमरीका के जीवाश्म वैज्ञानिक स्टीफ़न जे गोउल्ड ने एक बार एक काल्पनिक सवाल उठाया था. स्टीफ़न ने पूछा था कि क्या हो कि अगर समय का पहिया दोबारा घुमाया जा सके और समय चक्र को पीछे किसी भी एक जगह पर ले जा कर रोक दिया जाए?
उन्होंने इसके लिए एक प्रयोग भी किया था. आज भी विकास का जीवविज्ञान पढ़ने-पढ़ाने वाले, इस सवाल को लेकर तमाम कल्पनाओं में खो जाते हैं.
स्टीफ़ गोउल्ड का मानना था कि अगर विकास के पहिया को पीछे घुमाकर छोड़ दिया जाए, तो शायद प्रकृति दोबारा इंसान को जन्म न दे. स्टीफ़न का मानना था कि क़ुदरती विकास चक्र के दौरान इंसानों की उत्पत्ति बेहद दुर्लभ घटना थी. और ऐसा दोबारा होना क़रीब-क़रीब नामुमकिन है.
स्टीफ़न गोउल्ड का मानना था कि किसी नए जीव के विकास में अचानक होने वाली घटनाओं का बड़ा रोल रहता है. जैसे कि अचानक जीवों की एक प्रजाति का समूल नाश. या फिर, धरती से उल्कापिंड के टकराने से मची तबाही, या ज्वालामुखी में भयंकर विस्फ़ोट.
ये तो कुछ बड़ी घटनाएं हैं जो जीवों के विकास में अहम भूमिका अदा करती हैं. कई ऐसी छोटी घटनाएं भी होती रहती हैं, जिन पर हमारी नज़र नहीं पड़ती. लेकिन, जीवों के विकास की प्रक्रिया में इनका बड़ा रोल होता है. इन्हें वैज्ञानिक भाषा में जेनेटिक म्यूटेशन यानी जीन में उत्परिवर्तन कहते हैं.
जेनेटिक म्यूटेशन
जेनेटिक म्यूटेशन तब होता है, जब किसी जीव की कोई कोशिका या जीन, पहले से तय रास्ते के बजाय किसी और रास्ते पर चल पड़ते हैं. यानी उनका विकास अलग दिशा में होने लगता है. इससे ही जीवों की नई प्रजातियां पैदा होती हैं. जीवों में वातावरण के हिसाब से बदलाव आते हैं.
ये बदलाव ही असल में जीवों का क्रमिक विकास कहलाते हैं. कोई भी दुर्लभ और कदाचित होने वाला म्यूटेशन किसी जीव की नस्ल आगे बढ़ाने में मददगार होता है. तो कई म्यूटेशन प्रजातियों के ख़त्म होने की वजह भी बन जाते हैं. जीन में अचानक आए इन्हीं बदलावों का नतीजा है कि वानरों के परिवार से इंसानों की उत्पत्ति हुई. या हिरनों की इतनी जातियां दुनिया भर में पायी जाती हैं.
तो, स्टीफ़न का कहना था कि इंसान की उत्पत्ति एक ऐसे ही बेहद दुर्लभ जीन म्यूटेशन की वजह से हुई थी. अगर विकास चक्र को पलटकर पीछे ले जाया जाए, तो शायद ये दुर्लभ म्यूटेशन हो ही न और इंसान दोबारा धरती पर पैदा ही न हों. ये ख़याली पुलाव है.
हम समय के चक्र को पीछे नहीं ले जा सकते. लेकिन, कुछ वैज्ञानिकों ने ऐसे प्रयोग किए हैं जिनसे स्टीफ़न गोउल्ड के सिद्धांतों को हक़ीक़त की कसौटी पर कसा जा सके. उन्होंने ये प्रयोग कीटाणुओं पर किए थे.
छोटे जीव बड़ी तेज़ी से दो हिस्सों में बंटकर अपना विकास करते हैं. हम ऐसे अरबों कीटाणुओं को फ्रीज कर के अनंत काल तक रख सकते हैं. इन में से कुछ को हम बिल्कुल अलग माहौल में फिर से जीवित कर के विकसित होने का मौक़ा दे सकते हैं.
फिर हम इन पर नज़र रख कर ये पता लगा सकते हैं कि क़ुदरती तौर पर इनमें कोई म्यूटेशन होता है या नहीं. इन कीटाणुओं की मदद से हम भविष्य मे झांक सकते हैं और फिर पीछे भी आ सकते हैं.
बहुत से कीटाणुओं के विकास का अध्ययन कर के ये देखा गया है कि अक्सर विकास का पहिया पहले से तय रास्ते पर ही चलता है. बहुत से गुण और जीन बार-बार उसी रूप में सामने आते हैं.
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क्रमिक विकास
एक ऐसे ही प्रयोग के तहत 1988 से इशर्चिया कोलाई नाम के कीटाणु के क्लोन से तैयार इस बैक्टीरिया के 12 ख़ानदानों के विकास पर निगरानी रखी जा रही है. अब तक इस बैक्टीरिया की 65 हज़ार से ज़्यादा पीढ़ियां बीत चुकी हैं.
इसके मुक़ाबले धरती पर इंसान को आए हुए केवल 7500 से 10 हज़ार पीढ़ियां ही गुज़री हैं. इस बैक्टीरिया की हर नई पीढ़ी, ज़्यादा बेहतर और ताक़तवर होती है और तेज़ी से नई नस्ल को जन्म देती है. मतलब ये कि किसी भी जीव का विकास किस दिशा में होगा, उसकी भी कुछ सीमाएं क़ुदरत ने तय कर रखी हैं.
क्रमिक विकास के दौरान विकास कराने वाली प्राकृतिक ताक़तें म्यूटेशन को संतुलित रखती हैं, ताकि विकास का चक्र बेक़ाबू न हो जाए. इसका मतलब ये भी है कि बेवजह के जेनेटिक म्यूटेशन एक वक़्त के बाद ख़त्म हो जाते हैं. अलग-अलग जीवों में इन म्यूटेशन का अलग असर देखने को मिलता है.
एक ही परिवेश में रहने वाले जीवों की अलग प्रजातियों में हमने विकास के इस असर को देखा है. जैसे कि उड़ने वाले डायनासोर यानी टेरोसॉर्स और आज के पक्षियों में पंखों और चोंच का विकास हुआ था.
जबकि दोनों के पूर्वज एक नहीं थे. यानी, धरती पर इन दो अलग-अलग जीवों में पंखों और चोंच का विकास दो बार हुआ. इसकी वजह इन जीवों के आस-पास का परिवेश था जिसमें वो रह रहे थे.
सभी जीन बराबर नहीं होते. कुछ के पास बड़ी ज़िम्मेदारी होती है. तो कुछ हल्के-फुल्के बोझ सहते हैं. ये अक्सर आपस में मिलकर नेटवर्क बना लेते हैं. जीन के नेटवर्क को संचालित करने के लिए कई स्विच और मास्टर स्विच होते हैं. यानी कुछ जीनों का विकास कैसे होगा ये मास्टर स्विच से नियंत्रित होता है. और ये स्विच क़ुदरत नियंत्रित करती है.
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सौर ऊर्जा का इस्तेमाल
हमारे सौर मंडल की कुछ ख़ास बाते हैं. कुछ भौतिकीय नियम हैं, जिनका हमारी पृथ्वी पर गहरा असर पड़ता है. जैसे धरती पर पाया जाने वाला गुरुत्वाकर्षण या सूरज में हो रहा न्यूक्लियर फ्यूज़न, जिससे पैदा हुई ऊर्जा से हम सब जीवों को एनर्जी मिलती है. भौतिकी के ये नियम स्थायी होते हैं.
अगर ये स्थायी होते हैं, तो यक़ीनन, धरती के विकास की प्रक्रिया के दौरान इंसानों को पैदा होना ही था. लेकिन, बीसवीं सदी में भौतिकी विज्ञान की नई खोजों से पता चलता है कि परमाणु के स्तर पर भी प्रक्रिया अनियंत्रित और पहले से तय रास्ते पर चलने वाली नहीं होती. यानी हम इनकी भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि आगे क्या होगा.
कुल मिलाकर, विकास के बुनियादी उसूल वही रहेंगे, जो हमेशा से रहे हैं. जो भी जीव सौर ऊर्जा का सबसे अच्छा इस्तेमाल कर सकेगा, उसे विकास की प्रक्रिया में फ़ायदा होगा. वातावरण में मौजूद गैसों का बेहतर इस्तेमाल करने वाले जीव भी हर परिस्थिति में ख़ुद को बचा सकेंगे.
ऐसे बदलावों से एक ही तरह की विकास की प्रक्रिया देखने को मिल सकती है. लेकिन, अचानक कोई बदलाव आने की सूरत में हम भविष्य में झांक कर ये पता नहीं लगा सकते हैं कि विकास का पहिया किस रास्ते से गुज़रेगा.
इसकी मिसाल हमें खगोलशास्त्र से मिलती है. 17वीं सदी में एक गणितीय संस्थान ने लोगों से पूछा था कि वो सूरज, धरती और चांद की मौजूदा स्थिति के आधार पर क्या ये बता सकते हैं कि उनका भविष्य क्या है. इस पहेली के विजेता ने कहा था कि इसकी कल्पना कर पाना नामुमकिन है. हां, सूरज के पास सबसे ज़्यादा शक्ति है, तो इसका रोल सबसे अहम हो जाएगा.
प्राकृतिक विकास भी ऐसी ही शक्ति है, जो तमाम जीवों को एक रास्ते पर चलाती है. हमें ये नहीं मालूम कि हम समय के पहिए को पीछे ले जाएंगे, तो फिर क्या होगा. हो सकता है कि इंसान दोबारा न पैदा हों.
लेकिन, उसकी जगह जो भी नए जीव विकसित होंगे, वो आज जैसे ही होंगे. क्योंकि प्राकृतिक विकास के लिए जीवों के पास असीमित विकल्प नहीं हैं. हां, थोड़े-बहुत हेर-फेर हमें देखने को मिल सकते हैं.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
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