गणित की समस्याएं, जिससे दुनिया रुक सकती है

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इंसान की ख़्वाहिशों का अंत नहीं है. एक आरज़ू पूरी होती नहीं कि दूसरी सिर उठाने लगती है. ये सिलसिला चलता रहता है.

इंसान स्वभाव से ही उतावला है. उसे हर समय सब-कुछ, एक साथ, एक ही समय पर चाहिए. इस ख्याल के बग़ैर कि किसी दूसरे को भी उन्हीं सब चीज़ों की ज़रूरत होगी.

क़ुदरत ने इंसान को बेपनाह संसाधनों के साथ धरती पर उतारा था. और सभी को उन संसाधनों की ज़रूरत है. प्रकृति अपने हिसाब से उन्हें बांटती है.

इंसान ने ज़रूरत के हिसाब से तरक़्क़ी की. ज़िंदगी आसान बनाने के बहुत से अन्य संसाधन जुटाए और उनके बँटवारे के लिए बहुत से गणितीय तरीक़े भी अपनाए, जिन्हें मांग पूरी करने के लिए लगभग सभी कंपनियां अपनाती हैं.

इसे डाएनेमिक रिसोर्स अलोकेशन सिस्टम कहते हैं. लेकिन अचानक डिमांड बढ़ने पर ये सिस्टम भी धराशायी हो जाता है. किस डिमांड में कब, कहां, क्या बदलाव हो जाए नहीं कहा जा सकता.

डाएनेमिक रिसोर्स अलोकेशन सिस्टम जानने से पहले चलिए जान लेते हैं आख़िर ये समस्या है क्या.

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इस बात को इस मिसाल से समझिए. एक टैक्सी कंपनी के पास एक निश्चित संख्या में टैक्सी होती हैं.

कंपनी मोटे तौर पर जानती है कि किस रूट पर उसे कितनी टैक्सी तैयार रखनी है. लेकिन अचानक किसी रोज़ उसी रूट पर डिमांड बढ़ जाती है.

ज़ाहिर है कंपनी मांग पूरी करने के लिए दूसरे रूट की टैक्सी यहां लगाएगी. अब जहां से टैक्सी हटाई गई है वहां कि मांग भी प्रभावित होगी. ऐसे में डाएनेमिक रिसोर्स अलोकेशन सिस्टम की मदद से ही समस्या का हल तलाशा जाता है.

इस समस्या को समझने के लिए ज़रा इस मिसाल पर भी ग़ौर कीजिए. कल्पना कीजिए आपने अपने घर में चार सदस्यों के लिए उनका पसंदीदा खाना तैयार किया.

लेकिन जैसे ही आप खाना परोसने लगे, तो एक ने कहा उसे वो खाना पसंद नहीं है. दूसरा अचानक बताता है कि खाने पर दो अन्य लोग भी आने वाले हैं.

ऐसे में अचनाक डिमांड में बदलाव की चुनौती को पूरा करना मुश्किल हो जाता है. धीरे-धीरे हर रोज़ खाना खाने वालों की मांग में बदलाव होने लगते हैं.

आपको कोई अंदाज़ा नहीं होता कि किसे, कब और क्या खाना है. आप तजुर्बे की बुनियाद पर सिर्फ़ मोटा-मोटा अंदाज़ा लगाकर तैयारी कर सकते हैं. संसाधन वितरण की समस्या पर रिसर्च करने वालों को भी इसी समस्या से जूझना पड़ रहा है.

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बदलाव की ज़रूरत

समस्या ये भी है कि अभी तक जो कंप्यूटिंग सिस्टम इस्तेमाल में है वो फ़्यूचर प्लानिंग के लिए पुराने डेटा का इस्तेमाल करता है, जो कि छोटे से भी बदलाव के साथ तालमेल नहीं बैठा पाता. जिसकी वजह से समस्या गंभीर हो जाती है.

प्रोफ़ेसर योनेकी इसी समस्या के समाधान के लिए काम कर रही हैं. इनके मुताबिक़ कंप्यूटर की कॉन्फ़िगरेशन में ही बुनियादी बदलाव की ज़रूरत है.

आज की ज़रूरत के हिसाब से पूरा कंप्यूटिंग सिस्टम जटिल होता जा रहा है. लिहाज़ा आज के कंप्यूटर सिस्टम को डाएनामिक कंट्रोल मेथेडोलॉजी की ज़रूरत है.

आज हम जिस तरह के स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल कर रहे हैं वो भी पूरी तरह कंप्यूटर जैसे हैं. जो काम कंप्यूटर पर होते हैं वही काम स्मार्टफ़ोन से भी हो रहे हैं. देखा जाए तो आज हर कोई मोबाइल के ज़रिए ही अपना जीवन चला रहा है. लिहाज़ा रिसोर्स अलोकेशन का काम मोबाइल से भी हो रहा है.

जैसे, कैब की ज़रूरत होने पर आप कंपनी की ऐप पर जाकर बुक कर देते हैं फिर कंपनी आपकी ज़रूरत और अपनी सेवा की उपलब्धता के अनुसार सर्विस मुहैया कराती है.

सर्विस डिलिवरी कंपनियां भी अपना डिलिवरी सिस्टम फ़ास्ट करने के लिए काम कर रही हैं. उदाहरण के लिए अमरीका की यूपीएस कंपनी ने डिलिवरी रूट्स के लिए एड्वांस एलगोरिद्म का इस्तेमाल शुरू कर दिया है जिसे ऑन-रोड इंटेग्रेटिड ऑप्टिमाइज़ेशन एंड नेविगेशन यानि (ORION) का नाम दिया गया है.

कंपनी का दावा है कि इस नए सिस्टम से उन्हें हर साल 10 करोड़ मील का रास्ते कम तय करना पड़ा है. हालांकि कुछ रिपोर्ट का दावा है कि बड़े शहरों में इस सिस्टम से कई तरह की समस्याओं का सामना भी करना पड़ा है.

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सप्लाई चेन

सप्लाई चेन भी कभी न ख़त्म होने वाली समस्या है. आज किसी भी चीज़ के उत्पादन के लिए बहुत तरह की अन्य चीज़ो की ज़रूरत होती है, और सभी का एक ही समय में मौजूद होना भी ज़रूरी है.

प्रोफ़ेसर पॉवेल का कहना है कि समाज की लगातार बढ़ती मांग पूरा करने के लिए सप्लाई चेन का दुरूस्त होना बहुत ज़रूरी है.

प्रोफ़ेसर पॉवेल कहते हैं कि संसाधनों का वितरण तो एक समस्या है ही. उससे बड़ा मसला है उन समस्याओं से निपटने के लिए लोगों का बर्ताव.

लोगों को हर समस्या का समाधान चुटकी बजाते ही चाहिए. इस मुश्किल से उबरने के लिए बहुत सी रिसर्च टीमें काम कर रही हैं. पॉवेल का कहना है कि हर उद्योग को अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ अलग तरह का कंप्यूटिंग सिस्टम विकसित करना होगा.

और इसके लिए पुराने तरीक़ों से नहीं बल्कि नए डेटा के साथ काम करने की ज़रूरत है.

पिछले कई दशक में अच्छा ऑपरेशनल मैनेजमेंट सिस्टम लागू करने के बाद बहुत सी एयरलाइंस, लॉजिस्टिक्स फ़र्म और रोड नेटवर्क को अपना काम सुधारने में काफ़ी मदद मिली है.

हालांकि अचानक मांग में होने वाले परिवर्तन से अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. इसके लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल भी किया जा रहा है.

जिसके लिए ख़ास तरह का एलगोरिद्म तैयार किया गया है. जिसे वो इंसान की सहायता के बग़ैर इस्तेमाल कर सकता है.

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बहुत हद तक समस्याओं का निपटारा हो गया है. लेकिन, अभी भी बहुत काम बाक़ी है.

मशीनों के काम का तरीक़ा सीखने में भी समय लगेगा. लेकिन संसाधनों के वितरण की समस्या कभी ना ख़त्म होने वाली समस्या है.

हां, इतना ज़रूर है कि इसे रोका जा सकता है. लेकिन वो भी एक सूरत में, जब आबादी पर नियंत्रण किया जाए.

आबादी में अगर इसी तरह इज़ाफ़ा होता रहा तो ये समस्या और गहराती जाएगी. हमें ये समझना होगा कि संसाधन सीमित मात्रा में हैं और उन्हीं संसाधनों से सारी दुनिया को अपना काम चलाना है.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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