दुनिया की सबसे मजबूत इमारतों वाला मुल्क

टोक्यो
    • Author, मार्था हेनरिक्स
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

जापान के टोक्यो, ओसाका और योकोहामा जैसे बड़े शहरों में ऊंची-ऊंची, आसमान चूमती इमारतें ख़ूब दिखती हैं. इन बहुमंज़िला इमारतों को देखकर लगता है कि ये इंसान की बनाई हुई बेहतरीन बिल्डिंग हैं, जिन्हें कोई हिला भी नहीं सकता.

जापान की शहरी ज़िंदगी इन इमारतों के इर्द-गिर्द घूमती है. वैसे, ऐसा सिर्फ जापान के साथ हो, ये बात नहीं है. आज दुनिया के हर छोटे-बड़े शहर में बहुमंज़िला इमारतें आबाद हैं. इन चट्टान की तरह स्थिर खड़ी इमारतों के आस-पास से ज़िंदगी बहुत तेज़ रफ़्तार से गुज़रती रहती है. ऐसा लगता है कि ये वो लंगर हैं, जो जीवन के समंदर में लहराती कश्तियों को थामे हुए हैं.

लेकिन, जब ज़लज़ला आता है, तो हमें मालूम होता है कि हम किस मुग़ालते में थे. ऐसे में जापान में बहुमंज़िला इमारतें ऐसी बनायी जाती हैं, जो भूकंप के साथ ही हिल-डुल सकें.

हाल के दशकों की बात करें, तो, जापान में 2011 में आया टोकोहू भूकंप, सबसे ज़्यादा तबाही मचाने वाला माना जाता है.

भूकंपों वाला देश

लेकिन, ये ज़मीन के हिलने-डुलने कि यदा-कदा होने वाली घटना नहीं थी. जापान को उगते सूरज का देश कहने के साथ-साथ हम भूकंप वाला मुल्क कहें, तो ग़लत नहीं होगा. यहां दिन भर भूकंप के झटके महसूस किए जाते हैं. कई बार ये भूकंप 2011 जैसी तबाही ले आते हैं.

असल में जापान के चार द्वीप, धरती में उस जगह पर हैं, जिसे भूवैज्ञानिक, 'पैसिफिक रिंग ऑफ़ फ़ायर' कहते हैं. ये धरती का वो हिस्सा है, जहां पर यूरेशियाई, फिलीपीनी और प्रशांत महासागरीय टेक्टोनिक प्लेंटें मिलती हैं. धरती के भीतर स्थित ये प्लेटें खिसकती रहती हैं.

एक प्लेट, दूसरी के नीचे जाती है, तो बहुत दबाव बनता है. इससे चट्टानों से बड़ी भारी तादाद में धरती से ऊर्जा निकलती है. ये असल में उस दबाव का नतीजा होता है, जो एक प्लेट दूसरी प्लेट पर डालती है. भूकंप, इसी ऊर्जा के निकलने का स्वरूप होता है. इस में इतनी ताक़त होती है कि पल भर में चमकते हुए शहर को ज़मींदोज़ कर दे.

भूकंप

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लगातार आने वाले ज़लज़लों को देखते हुए, जापान में ऊंची इमारतें ऐसी बनायी जाती हैं, जो झटकों को झेल सकें.

टोक्यो यूनिवर्सिटी में इमारतों की इंजीनियरिंग पढ़ाने वाले जुन सैटो कहते हैं कि जापान में छोटी और अस्थायी इमारतों को भी इस तरह से बनाया जाता है कि वो भूकंप के झटके झेल सकें.

जापान के इंजीनियर इमारतें बनाते वक़्त दो बातों का ध्यान रखते हैं. वो ऐसे ढांचे बनाते हैं, जो छोटे भूकंप के झटके झेल सकें. ऐसे झटकों को कोई भी इमारत तीन या चार बार झेलती है. इमारतों को ऐसे बनाया जाता है कि भूकंप से उन्हें कोई नुक़सान न हो. ऐसे झटकों से नुक़सान होने पर मरम्मत की गुंजाइश रह जाए, तो वो इमारत ख़तरनाक मानी जाती है.

जापान

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इमारतों को यहां पर बड़े भूकंप झेलने के लिए भी तैयार रखा जाता है. भले ही ऐसे झटके कम आते हैं. लेकिन, जापान में कभी भी भयंकर ज़लज़ला आने का डर रहता है. इसके लिए 1923 में आए ग्रेट कांटो भूकंप का बेंचमार्क तय किया गया है. 1923 में जो भूकंप आया था उसकी तीव्रता 7.9 थी. इस ज़लज़ले से टोक्यो और योकोहामा शहर बर्बाद हो गए थे और क़रीब डेढ़ लाख लोग मारे गए थे.

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इमारत की मजबूती का आकलन

इससे ज़्यादा भयंकर भूकंप आने की सूरत में अगर किसी इंसान की जान नहीं जाती, तो उस इमारत को मंज़ूरी मिल जाती है.

लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के ज़िगी लुबकोवस्की कहते हैं कि, 'आप लोगों की जान बचाने के लिहाज़ से इमारतों के डिज़ाइन बनाते हैं. ये बुनियादी शर्त है.'

भूकंप के भयंकर झटकों को झेलने के लिए जापान में इमारतों के पिलर्स में शॉक एब्ज़ार्वर लगाए जाते हैं. ये वही हैं, जो गाड़ियों में झटकों से बचाने के लिए लगाए जाते हैं.

जापान

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जुन सैटो कहते हैं कि, 'जब कोई इमारत धरती के झटकों का दबाव झेल लेती है, तो उसके गिरने का डर नहीं होता.'

इमारतों में कई दफ़े रबर के शॉक एब्ज़ार्वर लगाए जाते हैं, जो करीब 12 से 20 इंच तक मोटे होते हैं. जहां भी इमारतों का ऊपरी ढांचा हिलता है, तो, रबर के ये सस्पेंशन, उस झटके को बर्दाश्त कर के इमारत को गिरने से रोकते हैं.

जापान में बहुमंज़िला इमारतों की बुनियाद में ऐसी इंजीनियरिंग की जाती है, जो बेहद ताक़तवर भूकंप में भी बची रहे.

इसके लिए हर दूसरी मंज़िल पर डैंपर लगाए जाते हैं. इससे भूकंप के झटकों से इमारतों का हिलना कम होता है.

ज़िगी लुबकोवस्की कहते हैं कि डैम्पर दिखने में साइकिल पम्प जैसे होते हैं. जैसे आप पम्प दबाते हैं तो हवा निकलती है, उसी तरह, इन डैम्पर्स का इस्तेमाल हवा का दबाव सहने के लिए होता है. इमारत को झटके कम लगते हैं.

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शानदार इंजीनियरिंग

इन नुस्खों के अलावा जापान में इमारतों के डिज़ाइन भी इस तरह बनाए जाते हैं, जो झटकों को झेल सकें.

ज़िगी लुबकोवस्की कहते हैं कि, 'हम कुछ इमारतों को साधारण बनाना चाहते हैं. अगर आपका हर फ्लोर एक ही आकार का होगा, तो इमारत झटकों को बेहतर ढंग से झेल सकेगी.'

लेकिन, ऊंची इमारतें बनाने वाले अक्सर ये समझौते नहीं कर पाते हैं. इसलिए जब कोई बिल्डिंग खड़ी होती है, तो उस दौरान इंजीनियरों और आर्किटेक्ट के बीच जंग छिड़ने का अंदेशा होता है. जापान के इंजीनियर एजरी स्ट्रक्चरल इजीनियर्स से जुड़े नोरीहिरो एजरी कहते हैं कि जापान में लोगों को आर्किटेक्ट के साथ इंजीनियरिंग की भी पढ़ाई कराई जाती है, ताकि आगे चलकर लोग एक दूसरे के ख़यालों और ख़तरों को समझ सकें.

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टोक्यो का स्काईट्री टॉवर दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची इमारत है. इसमें जापान के परंपरागत पगोडा बनाने की स्टाइल से लेकर आधुनिक इंजीनियरिंग तक का इस्तेमाल किया गया था. इसके अलावा भूकंप के झटके झेल सकने वाले डैम्पर भी इसमें लगाए गए हैं, ताकि ये इमारत भूकंप के झटकों को झेल सके.

जुन सैटो भूकंपीय इंजीनियरिंग पढ़ाते रहे हैं. सैटो कहते हैं कि वो आर्किटेक्ट के साथ मिलकर साझा तौर पर भूकंप के डर से निपटने की कोशिश करते हैं. जालीनुमा रचना हो तो उससे भूकंप के झटके कम लगते हैं. होता ये है कि किसी एक हिस्से के गिरने पर दूसरा उस पर पड़ने वाले दबाव को झेल लेता है. यानी जाल वाली इमारतें भी अब जापान में खूब बनायी जा रही हैं.

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हाकोदाते फ़्यूचर यूनिवर्सिटी की इमारत इसकी मिसाल है.

दिक़्क़त ये है कि इस इलाक़े में भूकंप दिनों-दिन और भयंकर होते जा रहे हैं. इसलिए इंजीनियरों की चुनौती भी बढ़ती जा रही है. किसी भी बिल्डिंग के मैटीरियल, बियरिंग, सस्पेंशन वग़ैरह के इस्तेमाल से उसे मज़बूत बनाया जाता है. नई-नई तकनीक के आ जाने से हम सब कुछ प्लान कर सकते हैं.

कई बार छोटी इमारतें भी भविष्य के लिए मिसाल बन जाती हैं. जैस कि नाओशिमा पैवेलियन.

हम अब तक भूकंप की सटीक भविष्यवाणी का नुस्खा नहीं तलाश पाए हैं. लेकिन, इमारतों में सुरक्षा के उपाय आज़मा कर हम ये देख सकते हैं कि भविष्य में कैसी इमारतों की ज़रुरत होगी,

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