सोलर प्लांट के कचरे की तरफ़ चीन का ध्यान क्यों नहीं

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- Author, क्रिस बर्नियक
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
अगर आप को कभी भी उत्तरी चीन के डटोंग गांव के ऊपर से उड़ने का मौक़ा लगे, तो ग़ौर कीजिएगा, वहां पर आप को दो विशाल पांडा दिखेंगे. इनमें से एक आप की तरफ़ हाथ हिलाता मालूम होगा. ये दोनों पांडा सोलर पैनल यानी सौर ऊर्जा के पैनल से बनाए गए हैं.
ये और आस-पास के बाक़ी सौर ऊर्जा पैनल मिलकर 100 मेगावाट बिजली पैदा करते हैं. ये सोलर फ़ार्म 248 एकड़ में फैला हुआ है. चीन के पैमाने से देखें, तो ये बहुत छोटा सा सोलर पार्क है. लेकिन ये देशभक्ति की भावना से भरा हुआ है.
इस सोलर फ़ार्म को बनाने वाली कंपनी पांडा ग्रीन एनर्जी की डॉक्यूमेंट्री बताती है कि, 'इस सोलर पार्क को चीन की राष्ट्रीय धरोहर की तरह डिज़ाइन कर के बनाया गया है.'
चीन, दुनिया भर में सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा उत्पादक है. यहां सूरज की रोशनी से 130 गीगावाट बिजली बनाई जाती है. अगर यहां के सभी सोलर फ़ार्म एक साथ बिजली बनाएं, तो इस बिजली से पूरे ब्रिटेन की ज़रूरत से भी कई गुना ज़्यादा बिजली बनती है.
चीन में बहुत से विशाल सोलर फ़ार्म हैं. इनमें से एक है तिब्बत में स्थित लॉन्गियांग्चिया बांध प्रोजेक्ट. इस सोलर फ़ार्म में 40 लाख सोलर पैनल लगे हैं, जिनसे 850 मेगावाट बिजली पैदा होती है.
वहीं दुनिया का सबसे बड़ा सोलर प्लांट भी चीन के टेंग्गर रेगिस्तान में है. इस सोलर प्लांट में 1500 मेगावाट से भी ज़्यादा बिजली बनाई जाती है.

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भरोसेमंद विकल्प
चीन ने इन विशाल सोलर प्लांट को बनाने में करोड़ों डॉलर की रक़म लगाई है. लेकिन क्या इनकी लागत वसूल हो पा रही है? और सवाल ये भी क्या चीन इतने सोलर प्लांट बना लेगा जिससे पर्यावरण को नुक़सान न पहुंचाने वाली बिजली का टारगेट पूरा हो सके.
चीन, सोलर पैनल का सबसे बड़ा उत्पादक देश है. ब्लूमबर्ग न्यू एनर्जी फ़ाइनेंस नाम की मार्केट रिसर्च कंपनी की येवोन ल्यू कहती हैं कि, 'सोलर पैनल का बाज़ार बहुत बड़ा है. चीन में सोलर पैनल बनाना देश की औद्योगिक नीति का अहम हिस्सा है.'
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी आईईए के मुताबिक़ दुनिया के 60 फ़ीसदी से ज़्यादा सोलर पैनल अकेले चीन में बनते हैं. ऐसे में चीन की सरकार की ये कोशिश होती है कि इन सोलर पैनल की बाज़ार में मांग बनी रहे.
फिर रिन्यूएबल एनर्जी के स्रोत बढ़ाकर चीन की सरकार अपनी पीठ भी थपथपा सकती है. आज की तारीख़ में चीन की बिजली की खपत में से प्रदूषण फ़ैलाने वाले ज़रिए को हटाना, वहां की सरकार की नीति का अहम हिस्सा है. आज भी चीन की कुल बिजली का दो-तिहाई हिस्सा कोयले से बनता है. इससे बड़े पैमाने पर पर्यावरण प्रदूषण फैलता है.
यही वजह है कि उत्तरी चीन के सूरज की रोशनी से चमकते इलाक़ों में बड़े-बड़े सोलर फ़ार्म लगाए जा रहे हैं. वहां सोलर प्लांट लगाने के लिए काफ़ी ज़मीन है. सूरज की रोशनी से बिजली बनाना एक भरोसेमंद विकल्प भी है. नतीजा ये कि आज चीन में बिजली की रफ़्तार से सोलर प्लांट लगाए जा रहे हैं. आईईए के मुताबिक़ चीन ने सौर ऊर्जा का 2020 का अपना लक्ष्य तीन साल पहले ही 2017 में हासिल कर लिया था.

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लेकिन केवल छठे हिस्से का ही हो रहा इस्तेमाल
सोलर प्लांट लगाने से चीन के सियासी हित भी सधते हैं. पिछले कुछ साल से चीन की कोशिश तिब्बत जैसे संवेदनशील इलाक़े में बुनियादी ढांचे के विकास पर ज़ोर देने की है. बहुत से तिब्बती नागरिक, चीन के क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ हैं. ऐसे में कुछ लोगों का मानना है कि बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश के ज़रिए चीन, यहां के लोगों के विद्रोह को दबाने की कोशिश कर रहा है. साथ ही सड़कों और बिजली की सप्लाई के विकास से यहां चीनी लोगों को लाकर बसाने में भी सहूलियत हो रही है.
तिब्बत में एक सोलर प्लांट ज़मीन के भीतर गर्मी पैदा करने का काम करता है. इसका मक़सद इलाक़े का तापमान बढ़ाकर पेड़-पौधों को उगाना है ताकि चीन के लोगों को तिब्बत आकर बसने के लिए राज़ी किया जा सके.
लेकिन, उजाड़ और बंज़र इलाक़ों में बड़े सोलर फ़ार्म लगाने की अपनी चुनौतियां भी हैं. इसकी वजह समझने के लिए हमें एक सदी पीछे जाना होगा.
1935 में मशहूर भूगोलविद् हू हुआनयोंग ने चीन की मशहूर 'हू लाइन' खींची थी. ये 'हू लक़ीर' उत्तर-पूर्व से दक्षिण-मध्य चीन तक जाती है. ये लक़ीर चीन को दो कमोबेश एक बराबर हिस्सों में बांटती है. इलाक़ा भले ही बराबर हो, मगर दोनों हिस्सों की आबादी में बहुत फ़ासला है.
चीन की 94 प्रतिशत आबादी पूर्वी हिस्से में रहती है. बचे हुए 6 फ़ीसदी लोग पश्चिमी हिस्से में आबाद हैं. हांगकांग की चीन यूनिवर्सिटी की युआन चू कहती हैं कि आबादी के मुक़ाबले चीन के सोलर फ़ार्म पश्चिमी हिस्से में ज़्यादा हैं.
चीन के ज़्यादातर बड़े सोलर प्लांट, बड़े शहरों से बहुत दूर हैं. नतीजा ये कि इनकी बिजली की जहां ज़रूरत है, वहां तक इनकी पहुंच नहीं है. युआन चू के मुताबिक़ चीन के ज़्यादातर सोलर फ़ार्म की कुल क्षमता का छठा हिस्सा ही इस्तेमाल हो पा रहा है.
कई बार इसकी वजह मौसम भी होती है. लेकिन, चीन के ज़्यादातर बड़े सोलर फ़ार्म क्षमता से कम काम कर रहे हैं. हुआन चू के मुताबिक़ बहुत-सी बिजली सप्लाई के दौरान बर्बाद होती है क्योंकि दूर-दराज़ के सोलर फ़ार्म से सैकड़ों किलोमीटर लंबी लाइनें खींचकर बिजली शहरों तक पहुंचानी पड़ती है.
अमरीका की स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के जेफ्री बाल कहते हैं कि चीन ने बिजली की सप्लाई की तकनीक को सुधारने में काफ़ी निवेश किया है. चीन में उच्च क्षमता वाली डीसी लाइनें बिछाई गई हैं. हालांकि इनका विस्तार उतनी तेज़ी से नहीं हो पा रहा है, जितनी ज़रूरत है.
चीन के सोलर एनर्जी सेक्टर को एक झटका तब और लगा, जब मई महीने में सरकार ने इस उद्योग को मिल रही सब्सिडी ख़त्म कर दी. यानी अब सोलर फ़ार्म बनाना महंगा पड़ेगा.

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लेकिन अब निवेश से क्यों कतरा रहे?
चीन की सरकार ने सोलर एनर्जी सेक्टर की सब्सिडी इसलिए ख़त्म की क्योंकि उस पर क़र्ज़ बढ़ रहा था. युआन ल्यू कहती हैं कि सरकार के सब्सिडी घटाने से चीन के सोलर एनर्जी सेक्टर को तगड़ा झटका लगा है. पिछले साल चीन में 53 गीगावाट क्षमता के सोलर प्लांट लगाए गए थे. इस साल इससे तीस फ़ीसद कम यानी 35 गीगावाट क्षमता के सोलर प्लांट ही लगाए जाने की उम्मीद है.
युआन ल्यू कहती हैं कि लागत बढ़ने से निवेशक, विशाल सोलर फ़ार्म में निवेश के बजाय दूसरे विकल्पों का रुख़ कर रहे हैं. बड़े शहरों में छतों पर सोलर पैनल लगाकर बिजली बनाने पर ज़ोर दिया जा रहा है. इससे बिजली सीधे ग्राहक तक पहुंचेगी.
हालांकि जेफ्री बाल, युआन ल्यू और चू, तीनों का मानना है कि चीन में बड़े सोलर प्लांट लगाने का सिलसिला ख़त्म होने वाला नहीं है. जेफ्री बाल कहते हैं कि चीन सिर्फ़ अपने यहां ही बड़े सोलर प्लांट नहीं लगा रहा. चीन दूसरे देशों में भी सौर ऊर्जा में भारी निवेश कर रहा है.
आज की तारीख़ में भारत समेत कई देशों में विशाल सोलर प्लांट लगाए जा रहे हैं. ये जल्द ही बन कर तैयार होंगे.
ऐसा ही एक सोलर फ़ार्म मिस्र के बेनबान कॉम्प्लेक्स में बनाया जा रहा है. ये 37 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है. इसकी क्षमता 1600 से 2000 मेगावाट बिजली बनाने की होगी. इसे बनाने वालों में एक चीन की कंपनी भी है.
वहीं पांडा सोलर प्लांट बनाने वाली पांडा ग्रीन एनर्जी, कई और बड़े सोलर प्लांट लगाने का इरादा रखती है. ये भी आसमान से देखने में काले-सफ़ेद पांडा जैसे दिखेंगे. इसके लिए ख़ास सोलर पैनल भी डिज़ाइन किए गए हैं. पांडा ग्रीन एनर्जी, कनाडा समेत कई और देशों में भी सोलर प्लांट लगाने पर काम कर रही है.
युआन ल्यू कहती हैं कि सोलर पैनल दिनों-दिन सस्ते हो रहे हैं. जल्द ही सौर ऊर्जा निवेशकों के लिए लॉलीपॉप जैसी हो जाएगी. वो मानती हैं कि अगले तीन से पांच साल में सोलर प्लांट को बिना सब्सिडी के आसानी से लगाया जा सकेगा.
लेकिन, बड़े सोलर प्लांट को लेकर सवाल कचरे का उठेगा. बड़े सोलर प्लांट में इस्तेमाल होने वाले पैनल आगे चल कर बड़े कचरे के ढेर में तब्दील होंगे क्योंकि इनकी उम्र अधिकतम तीस साल होती है. इसके बाद इन्हें तोड़ना पड़ता है. इन्हें रिसाइकिल करना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि इनमें सल्फ्यूरिक एसिड जैसे ख़तरनाक केमिकल होते हैं. यानी 2040 के बाद चीन के यही विशाल सोलर प्लांट बड़े और ख़तरनाक कचरे के ढेर में तब्दील होने वाले हैं. फिलहाल उनसे निपटने की कोई योजना नहीं दिखती.
हालांकि एटमी प्लांट के कचरे के मुक़ाबले सोलर पैनल का कचरा कम नुक़सानदेह है. लेकिन साफ़ बिजली हासिल करने के लिए हमें एक और चुनौती से दो-चार होना होगा.
जेफ्री बाल कहते हैं कि अभी सोलर प्लांट के कचरे की चुनौती की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं. अभी तो हर देश विशाल सोलर प्लांट लगाने में व्यस्त है.
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(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
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