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क्या भविष्य में कुछ इस तरह होगी खेती?
- Author, डालियाह सिंगर
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
अगस्त की बेहद गर्म दोपहर में पाउलिन बेनेटी और डायेन केलसी अंगूर और टमाटर की बेलों को ऊपर की ओर फैलना सिखा रही हैं.
टमाटरों के इस सीज़न में पाउलिन और डायेन की चुनौती केवल टमाटर नहीं हैं. हालांकि, फिलहाल उनका पूरा ज़ोर टमाटरों को ऊपर की तरफ़ फैलाते हुए पूरे साल फसल के उत्पादन से है.
डायेन और पाउलिन जियोथर्मल ग्रीनहाउस पार्टनरशिप यानी जीजीपी के पंचवर्षीय अभियान का हिस्सा हैं, जो अमरीका के कोलोराडो राज्य के पगोसा स्प्रिंग्स इलाक़े में चलाया जा रहा है.
ये गैर-लाभकारी संस्था, शहर के प्रशासन के साथ मिलकर बेहद गर्म पानी के सोतों की ऊर्जा की मदद से स्थानीय लोगों की साल भर की ज़रूरत का खाद्य सामग्री उगा रही है.
पश्चिमी अमरीका में पगोसा स्प्रिंग्स अपने गर्म सोतों के लिए चर्चित है. अमरीका जाने वाले सैलानी इन सोतों को देखने के लिए यहां पहुंचते हैं.
यहां पर धरती की गर्मी से बिजली बनाई जाती है और अब इसकी मदद से खेती करने का ये नया धंधा भी शुरू हुआ है.
गर्म पानी से कैसे होगी खेती?
पगोसा स्प्रिंग्स के पास ही तीन ग्रीनहाउस गुंबद बनाए गए हैं. हर एक गुंबद की चौड़ाई 42 फुट है. शहर की पुरानी इमारतों से देखें तो ये दूर से ही एकदम अलग नज़र आते हैं.
भले ही तीनों गुंबद देखने में एक जैसे लगते हों लेकिन इनमें तीनों का काम अलग-अलग होता है.
पहले गुंबद का नाम है एजुकेशन डोम. ये 2016 में बनाया गया था. तीनों गुंबदों में ये इकलौता है जिसमें काम हो रहा है.
यहां पर रोज़ाना स्वयंसेवक आकर पौधों की देख-भाल करते हैं. उनकी कटाई-छटाई करते हैं. यहां पर अब तक तीन सौ से ज़्यादा छात्र इंजीनियरिंग, गणित और पौधों के बारे में पढ़ाई करने के लिए आ चुके हैं.
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हर मंगलवार और शनिवार को दोपहर 11 बजे से 2 बजे तक आम लोग भी यहां आ सकते हैं.
जीजीपी की कोषाध्यक्ष सैली हाई कहती हैं, 'हम यहां पर अगली पीढ़ी को पूरे साल बिना क़ुदरत को नुक़सान पहुंचाए, खेती करना सिखाते हैं. सात हज़ार फुट से ज़्यादा की ऊंचाई पर ये करना बहुत बड़ी उपलब्धि है.'
कैसे काम करती है ये तकनीक?
इस परियोजना के तहत कस्बों के कुओं से निकला हुआ पानी ग्रीन हाउस तक आता है. इसके बाद एक हीट एक्सचेंजर की मदद से इस गर्म पानी से सामान्य पानी को गर्म किया जाता है जिसे सर्दियों के महीनों में ग्रीन हाउस में पहुंचाया जाता है. इसके बाद गर्म पानी आगे बह जाता है.
यानी गर्म सोतों से निकला पानी पाइप से इस जगह को गर्म करता है और बाहर निकल जाता है. इस पानी का और कोई इस्तेमाल ग्रीनहाउस के भीतर नहीं होता है.
गर्म पानी की मदद से ग्रीनहाउस का तापमान ठंड में 14 डिग्री सेल्सियस और गर्मियों में 32 डिग्री सेल्सियस बना रहता है. ग्रीनहाउस के भीतर एक तालाब, पंखे, खिड़कियां और धुंध के सिस्टम की मदद भी तापमान को स्थायी बनाया जाता है.
नतीजा ये कि ग्रीनहाउस के भीतर चुकंदर, टमाटर और दूसरी कई फ़सलें उगाई जाती हैं. ऊंचाई पर स्थित इस क़स्बे में फ़सलों के लिए महज़ 80 दिन होते हैं. लेकिन ग्रीनहाउस गुंबद के भीतर पूरे साल खेती होती रहती है.
तकनीक से बेहतर हुए खेती के अवसर
बाक़ी के गुंबदों में से एक और कम्युनिटी गार्डेन्स ग्रीनहाउस भी इस साल के आख़िर तक काम करने लगेगा. यहां पर फूड बैंक और दूसरे स्वयंसेवी संगठन भी अपने-अपने हिस्से में खेती कर सकेंगे, ताकि स्थानीय लोगों की मदद कर सकें.
यहां के तीसरे गुंबद का नाम है इनोवेशन ग्रीनहाउस. ये 2019 में काम करने लगेगा. इसका मक़द अक्वापोनिक माहौल में खेती की सुविधा देना है. जहां पर मछलियों को भी पाला जाएगा और साथ-साथ खेती भी की जाएगी. इस गुंबद को जनता के लिए बेहद कम वक़्त के लिए ही खोला जाएगा, ख़ास तौर से नुमाइशों वग़ैरह के वक़्त.
कोलोराडो में किसानों के बाज़ार सीज़न के हिसाब से लगते हैं. लेकिन ग्रीनहाउस गुंबदों की मदद से साल भर बाज़ार लगाने की कोशिश कोलोराडो की सरकार कर रही है.
सैली हाई कहती हैं कि 'हमारे जियोथर्मल ग्रीनहाउस गुंबदों को अभी कम करके आंका जा रहा है.'
कोलोराडो के इस इलाक़े में क़ुदरत के कमाल यानी गर्म सोतों की खोज उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में हुई थी. क़रीब एक सदी से भी ज़्यादा वक़्त के बाद 1982 में अमरीकी सरकार के ऊर्जा मंत्रालय की मदद से जियोथर्मल हीटिंग सिस्टम की शुरुआत हुई.
इसमें गर्म पानी की मदद से 60 स्थानीय कारोबारों और रिहाइशों को बिजली की सप्लाई की जाने लगी. सर्दियों में गर्म पानी की मदद से बर्फ़ पिघलाने का काम भी लिया जाने लगा.
बिजली की पूर्ती के लिए शानदार हैं हीट स्रिंग
पूरे अमरीका में क़ुदरती तौर पर गर्म पानी के ऐसे इस्तेमाल की बीस मिसालें मिलती हैं. ऐसे ठिकाने बोइस, इदाहो और सैन बर्नार्डिनो में देखे जा सकते हैं.
सैली हाई कहती हैं कि गर्म पानी के ये सोते पूरे साल चौबीसों घंटे बिजली सप्लाई के स्रोत हैं. इस पानी से ऊर्जा हासिल करने का काम एक मिसाल है, जो कहीं भी दोहराई जा सकती है.
अमरीका में जियोथर्मल एनर्जी यानी क़ुदरती गर्मी की मदद से खेती करने की ये इकलौती मिसाल नहीं. हालांकि तकनीकी रूप से तरक़्क़ी करने के बावजूद अमरीका इस मामले में पिछड़ा है. देश भर में ऐसे केवल 29 ग्रीनहाउस प्रोजेक्ट चल रहे हैं.
ऊर्जा के इस क़ुदरती स्रोत का इस्तेमाल स्थानीय समुदाय दूसरों पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए भी कर रहे हैं. उनकी बिजली की और दूसरी ज़रूरतें क़ुदरत ही पूरी कर रही है.
जियोथर्मल एनर्जी का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल आइसलैंड में होता है. यहां के कुल बिजली उत्पादन का 25 प्रतिशत क़ुदरती स्रोतों यानी जियोथर्मल स्रोतों से आता है. 13 यूरोपीय देश जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल करते हैं.
अमरीका में इस क़ुदरती स्रोत का अच्छे तरीक़े से इस्तेमाल नहीं हो रहा है. वहां के ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक़ इस तरीक़े से आज 3.7 गीगावाट बिजली पैदा हो रही है.
लेकिन एक मोटे अनुमान के मुताबिक़, अमरीका चाहे तो इस क़ुदरती गर्मी से 100 गीगावाट बिजली बना सकता है.
अगले पांच दशक में अमरीका अपनी कुल ऊर्जा ज़रूरतों का दस फ़ीसद बिजली ऐसे उत्पादन करना चाहता है.
पृथ्वी की कोख में छिपी है बिजली
जानकार कहते हैं कि अमरीकी धरती की कोख में भरपूर तादाद में बिजली छुपी हुई है. ज़रूरत इसे निकाल कर इस्तेमाल करने की है.
कोलोराडो में ग्रीनहाउस प्रोजेक्ट ख़ैरात की मदद से ही चल रहा है. हाल ही में इसे पौने दो लाख डॉलर की मदद मिली है. जैसे जैसे आख़िरी गुंबद बनकर तैयार होने की तरफ़ बढ़ रहा है, तो ये संस्था अपने पहले कर्मचारी यानी एक साइट मैनेजर को नियुक्त करने पर विचार कर रही है.
अब तक पूरा प्रोजेक्ट डायेन और पाउलिन जैसे स्वयंसेवकों की मदद से ही चल रहा है.
इस साल ग्रीनहाउस गुंबद में उगाई गई सब्ज़ियों को ग़रीब तबक़े के बच्चों के बीच बांटा गया था.
स्थानीय लोगों का मानना है कि ये ग्रीनहाउस गुंबद सिर्फ़ ग़रीबों को मुफ़्त खाना खिलाने के लिए नहीं हैं. नई पीढ़ी यहां पर क़ुदरती स्रोतों के बेहतर इस्तेमाल के तरीक़े सीख सकती है. बहुत से बच्चे अपने ख़ाली वक़्त में यहां सेवाएं देने और सीखने के लिए आते हैं. उन्हें बहुत मज़ा आता है.
क़ुदरत के खेल निराले हैं और अगर सलीक़े से इस्तेमाल हो, तो इससे इंसान की ज़रूरतों की झोली भर जाती है.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
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