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यूरोपीय अंतरिक्ष यात्री क्यों सीख रहे हैं चीनी भाषा
- Author, रिचर्ड हॉलिंगम
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
अंतरिक्ष की रेस में गर्माहट बढ़ रही है. अब तक इसमें पश्चिमी देशों का दबदबा रहता आया था, मगर अब भारत और चीन स्पेस रेस के नए बड़े खिलाड़ी बन कर उभर रहे हैं.
चीन ने तो स्पेस रेस में इतनी लंबी छलांगें लगाई है कि यूरोपियन स्पेस एजेंसी यानी (ई.एस.ए) के एस्ट्रोनॉट चीन में रहकर वहीं के अंतरिक्ष यात्रियों के साथ सी-सर्वाइवल ट्रेनिंग ले रहे हैं.
हाल ही में चीन के शहर यानताई के समुद्र तटीय इलाक़े में इस तरह का ट्रेनिंग सेंटर बनाया गया है.
जर्मनी के अंतरिक्ष यात्री मैथियास मॉरर और ई.एस.ए के दो अन्य एस्ट्रोनॉट ने यहां ट्रेनिंग ली थी और चीन के अंतरिक्ष यात्रियों के साथ कुछ समय तक काम भी किया था.
इन सभी का कहना है कि चीनी एस्ट्रोनॉट के साथ काम करने का तजुर्बा बेहद दिलचस्प था. उन्हें कभी लगा ही नहीं कि वो अपने देश से दूर अलग संस्कृति और भाषा के लोगों के साथ रह रहे हैं. वो सभी मिलकर खाते थे, एक दूसरे से बातें करते थे और परिवार की तरह रहते थे.
अंतरिक्ष यात्री मैथियास का कहना है कि दुनिया की अन्य स्पेस ट्रेनिंग एजेंसियां ट्रेनिंग लेने वाले सभी लोगों के बीच अच्छा संबंध स्थापित करने के लिए स्पेशल प्रोग्राम कराती हैं. लेकिन, चीन के लोग बुनियादी तौर पर मिलनसार हैं. उन्हें ऐसे किसी कोर्स या प्रोग्राम की ज़रूरत नहीं है.
चीन और रूस का एयरक्राफ्ट
साल 2003 में चीन का शिनझाऊ स्पेस एयरक्राफ्ट पहले अंतरिक्ष यात्री को लेकर कक्षा में गया था. इस स्पेसक्राफ्ट में तीन लोगों को ले जाने की क्षमता थी और ये रूस के सोयूज़ रॉकेट पर आधारित था.
इसका डिज़ाइन भी लगभग वैसा ही था. लेकिन, सोयूज़ पिछले 50 साल से अंतरिक्ष यात्रियों को लाने-ले जाने का काम कर रहा है. इसका डिज़ाइन स्पेस में जाने वाले पहले रॉकेट जैसा था जबकि शिनझाऊ रॉकेट एडवांस तकनीक वाला इक्कीसवीं सदी का स्पेसक्राफ़्ट है.
एस्ट्रोनॉट मैथियास कहते हैं कि वो शिनझाऊ स्पेस एयरक्राफ्ट की चौड़ाई देखकर ही हैरान थे. चीनियों ने भले ही रूस से तकनीक सीखी थी, लेकिन उन्होंने इसे सोयूज़ के मुक़ाबले बेहतर डिज़ाइन किया था.
अगर ये अंतरिक्ष यान किसी वजह से समुद्र के ऊपर हादसे का शिकार होता है तो पानी में गिरते ही एस्ट्रोनॉट स्पेस स्विमसूट में आ जाएंगे और आसानी से बाहर आ सकेंगे.
इसके अलावा शिनझाऊ स्पेसक्राफ्ट में हवा वाली रबर की नाव रखने के लिए काफ़ी जगह है. ये सुविधा रूस के रॉकेट सोयूज़ में नहीं है. इसके अलावा रूस में होने वाली सी-सर्वाइवल ट्रेनिंग के दौरान ठंडे समुद्र में छलांग लगाने को कहा जाता है, जो बहुत मुश्किल काम है. साथ ही हवा वाली नाव भी नहीं दी जाती.
मैथियास हाल ही में एस्ट्रोनॉट बने हैं. इससे पहले वो जर्मनी में यूरोपियन एस्ट्रोनॉट सेंटर में थे और 2012 में चाइनीज़ ह्यूमन स्पेस प्रोग्राम का जायज़ा लेने और उनके साथ ख़ुशगवार रिश्ता बनाने के लिए यहां आए थे.
मंदारिन सीखने की जरूरत
एक साल बाद वो बीजिंग ट्रेनिंग सेंटर में यहां की तकनीक और सहूलियतें समझने के लिए आए. जबकि 2016 में चीन के अंतरिक्ष यात्रियों ने ई.एस.ए के रेग्यूलर केविंग एक्सपिडीशन में हिस्सा लिया.
मोरिर कहते हैं कि उनके साथ कई देशों के अंतरिक्ष यात्री काम कर रहे थे. सभी के साथ अंग्रेज़ी में बात कर ली जाती थी, लेकिन चीनी एस्ट्रोनॉट अपनी मातृभाषा यानी मंदारिन ज़बान में ही ज़्यादा बात करते थे. इसलिए उन्होंने मंदारिन भाषा सीखनी शुरू कर दी.
अंतरिक्ष और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के मामले में अमरीका कभी भी चीन के साथ सहयोग नहीं करेगा. लेकिन यूरोपीय स्पेस एजेंसी ने चीन के साथ काम करने के सारे विकल्प खुले रखे हैं.
ई.एस.ए 2023 तक चीन के साथ मिलकर अपना पहला फुल साइज़ स्पेस स्टेशन लॉन्च करने जा रहा है. यही नहीं, यूरोप और चीन साथ मिलकर इसी साल चांद पर रोबोटिक मिशन भी शुरू करने जा रहे हैं.
ई.एस.ए ने अमरीका और रूस के साथ अपना क़रार जारी रखा है. पर साथ ही वो दुनिया के उभरते सुपरपावर चीन के साथ भी हाथ मिलाकर काम कर रहा है.
मैथियास कहते हैं कि यूरोपियन स्पेस एजेंसी में पहले ही 23 देश मिलकर काम कर रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि वो चीन की भाषा सीखने के साथ ही बहुत जल्द उन्हें अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष परिवार का हिस्सा बना लेंगे.
चीन का स्पेस स्टेशन
चीन ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिसर्च के लिए नया स्पेस स्टेशन खोलने के लिए यूनाइटेड नेशन्स ऑफ़िस फ़ॉर आउटर स्पेस अफ़ेयर्स के साथ क़रार किया है.
इस स्टेशन से 1970 और 80 के सोवियत इंटरकॉस्मॉस प्रोग्राम की तरह उन देशों के एस्ट्रोनॉट भी अंतरिक्ष में जाएंगे जो अभी तक हाशिए पर हैं, जैसे मंगोलिया, क्यूबा, अफ़ग़ानिस्तान और सीरिया.
मैथियास को उम्मीद है कि दुनिया का कोई भी देश जो अंतरिक्ष में अपने यात्री भेजना चाहता है, वो संयुक्त राष्ट्र संघ के ज़रिए चीनी स्पेस स्टेशन से संपर्क साध सकता है.
कोई दो राय नहीं की अंतरिक्ष में रिसर्च के मामले में यूरोप आगे है, लेकिन आने वाले कुछ ही महीनों में ई.एस.ए के एस्ट्रोनॉट चीनी स्पेस कैप्सूल में ट्रेनिंग लेते नज़र आएंगे. उम्मीद है कि भविष्य के प्रोजेक्ट में इन कैप्सूल में उन्हें सह-पायलट की जगह भी मिल जाए.
मैथियास स्पेस कैप्सूल में सीट के मामले से जुड़ा एक दिलचस्प वाक़या बताते हैं. वो कहते हैं कि सोयूज़ में बाएं हाथ की सीट को-पायलट की होती है. जब वो स्पेस कैप्सूल में को-पायलट की सीट के लिए बात करने पहुंचे तो उन्हें लगा कि अपनी शर्त मनवाने के लिए काफ़ी माथा पच्ची करनी पड़ेगी.
वहां जाकर उन्होंने बाएं हाथ वाली सीट देने का इसरार किया. चीन इसके लिए बहुत आसानी से मान गया, लेकिन बाद में पता चला कि शिनझाऊ में तो को-पायलट की सीट दाएं हाथ पर है.
मैथियास को उम्मीद है कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के लिए वो अपनी पहली उड़ान 2020 तक भर लेंगे और 2023 तक वो पहले विदेशी एस्ट्रोनॉट होंगे जो चीनी स्पेस स्टेशन में दाख़िल होंगे.
अंतरिक्ष में रिसर्च के लिए मोटी रक़म और मॉडर्न तकनीक की दरकार है. इसलिए ज़्यादा से ज़्यादा देशों का सहयोग भी ज़रूरी है.
मैथियास कहते हैं कि हो सकता है कि कूटनीतिक और सुरक्षा कारणों से अमरीकी स्पेस एजेंसी नासा और चीन एक साथ किसी प्रोजेक्ट के लिए सहयोग ना करें. लेकिन भविष्य में अमरीका और चीन दोनों मिलकर चांद और मंगल ग्रह पर ज़िंदगी की संभावनाएं तलाशते नज़र आएंगे.
(नोटः ये रिचर्ड हॉलिंगम की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं)
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