सोशल मीडिया आपके मूड को कैसे धोखा देता है?

सोशल मीडिया और असाद

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सोशल मीडिया को लोग अनजान लोगों से जुड़ने का ज़रिया मानते हैं. यहां पर कोई अपनी बात दुनिया के सामने रखता है, तो कोई अपनी ख़ुशी या ग़म में दूसरों को शरीक़ करता है. किसी की ज़िंदगी का ख़ूबसूरत लम्हा तस्वीर के रूप में इंस्टाग्राम पर दिखता है. तो, कोई अपना वीडियो या विचार फ़ेसबुक पर साझा करता है.

लेकिन, आपके सोशल मीडिया अकाउंट से आपकी दिमाग़ी हालत की भी झलक मिलती है. इसका इस्तेमाल करके हम बहुत सी ज़िंदगियां बचा सकते हैं. ख़ास तौर से लोगों के पागलपन को पहचानकर, उनके अंदर आत्महत्या की प्रवृत्ति को रोक सकते हैं.

यक़ीनन आप सोशल मीडिया के इस पहलू से वाक़िफ़ नहीं होंगे. न ही आपको ये पता होगा कि आपके सोशल मीडिया अकाउंट से आपकी, या आपके दोस्तों की मानसिक स्थिति का पता लगाया जा सकता है.

अब जब हम ज़िंदगी का एक बड़ा वक़्त सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं, तो ज़ाहिर है, ऐसे बहुत से संकेत हैं, जो जानकार आपके सोशल मीडिया अकाउंट से पढ़ सकते हैं. ख़ास तौर से उन लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट से, जिनके अंदर ख़ुदकुशी का ख़याल पनप रहा हो.

असल में दुनिया में ख़ुदकुशी के बढ़ते मामलों के बावजूद, इसके संकेत समझने के लिए ज़रूरी आंकड़े पिछले पचास साल से जस के तस हैं. अमरीका में हर 13 मिनट में एक शख़्स ख़ुदकुशी करता है. मगर वहां भी इस बारे में रिसर्च की भारी कमी है.

अब, सोशल मीडिया ने इस क्षेत्र में उम्मीद की नई रौशनी दिखाई है. डेटा माइनिंग यानी सोशल मीडिया से आंकड़े जमा करके इस तरह के विचारों को पहचाना जा सकता है. फिर ऐसे शख़्स की मदद की जा सकती है.

मशीनें आज ऐसे ही आंकड़े निकालकर बीमारियों की रोकथाम में मदद कर रही हैं. अब इसकी मदद से दिमाग़ी बीमारियों का इलाज तलाशने की कोशिशें शुरू हो गई हैं.

डोनल्ड ट्रंप

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कुछ तजुर्बों से मालूम हुआ है कि अगर आपको अवसाद है तो आपका इंस्टाग्राम अकाउंट या तो ज़्यादा नीला या भूरा होगा. यानी रंग चटख होगा. इस पर चेहरे कम दिखेंगे. आपकी तस्वीरों को बहुत ज़्यादा लोग 'लाइक' नहीं करते दिखेंगे. ऐसे लोग इंकवेल फिल्टर की मदद से तस्वीर को ब्लैक एंड व्हाइट बना देते हैं. इनके मुक़ाबले दिमाग़ी तौर पर सेहतमंद लोग वैलेंशिया नाम के फिल्टर का इस्तेमाल करके उसका रंग साफ़ करते हैं.

हालांकि सिर्फ़ इसी बुनियाद पर किसी को दिमाग़ी बीमार या परेशान नहीं कहा जा सकता.

हाल ही में अमरीका की हार्वर्ड और वरमोंट यूनिवर्सिटी ने इस बारे में रिसर्च की. एक टीम ने 44 हज़ार इंस्टाग्राम पोस्ट की बारीक़ी से पड़ताल की. इनके रिसर्च के ज़रिए जिन 70 प्रतिशत लोगों के बारे में अंदाज़ा लगाया गया कि वो डिप्रेशन के शिकार हैं, वो सही निकला. इनके मुक़ाबले आम डॉक्टरों का अंदाज़ा 42 फ़ीसद ही सही था. जो लोग डिप्रेशन के शिकार थे, उनके इंस्टाग्राम फीड से साफ़ संकेत मिल रहे थे कि वो डिप्रेशन में हैं. यानी इंस्टाग्राम एक वार्निंग सिस्टम की तरह काम कर रहा था.

मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि जो लोग अवसाद यानी डिप्रेशन के शिकार होते हैं, उनकी बातों से संकेत मिल जाते हैं कि वो बीमार हैं. उनकी ज़बान अलग हो जाती है. वो अक्सर फर्स्ट पर्सन या ख़ुद को केंद्र में रखकर बात करते हैं.

अगर आपको इस बारे में अपनी पड़ताल करनी है, तो आप http://analyzewords.com/ नाम की वेबसाइट पर जाएं. ये साइट आपके ट्वीट की बिनाह पर आपके बारे में बता देगी. ऐसे ही सोशल मीडिया अकाउंट के आधार पर जानकार, आपकी दिमाग़ी हालत का पता लगा सकते हैं. वो बता देंगे कि आप फ़िक्रमंद हैं, परेशान हैं, नाराज़ हैं या डिप्रेशन के शिकार हैं.

मोबाइल

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अगर कोई शख़्स सोशल मीडिया पर नहीं, कभी नहीं, जेल, क़ैद, क़त्ल जैसे शब्दों का ज़्यादा इस्तेमाल करता है. इसके बरक्स अगर वो ख़ुश, समंदर किनारे और तस्वीरों जैसे लफ़्ज़ों का इस्तेमाल कम करता है, तो ये उसके डिप्रेशन में होने के संकेत हैं.

अमरीका की हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड और वरमोंट यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने क़रीब 2 लाख 80 हज़ार ट्वीट की पड़ताल करके लोगों के मूड, उनकी भाषा और बात के संदर्भ को समझने की कोशिश की. इससे रिसर्चरों ने उन लोगों की पहचान की जो भयंकर डिप्रेशन के शिकार हैं. सोशल मीडिया के आधार पर उनका आकलन इतना सटीक था कि उन्होंने 90 फ़ीसद मामलों में बता दिया कि लोग दिमाग़ी परेशानी से जूझ रहे हैं.

वरमोंट यूनिवर्सिटी के क्रिस डैनफोर्थ इस रिसर्च में शामिल थे. उन्होंने बताया कि नकारात्मक शब्दों का ज़्यादा इस्तेमाल लोगों के परेशान होने का साफ़ संकेत देता है.

क्रिस डैनफोर्थ कहते हैं कि भले ही ये आंकड़े पुख़्ता न हों, मगर इनसे बीमारियों की पहचान में काफ़ी मदद मिल सकती है.

सोशल मीडिया

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ऐसे आंकड़े जमा करने में अगर शब्द मददगार हैं, तो वही चुनौती भी हैं. कई शब्द ऐसे भी होते हैं, जो सेहतमंद इंसान इस्तेमाल करते हैं. 2017 में अमरीकी रिसर्चरों ने ऐसे ही शब्दों से लैस 671 ट्विटर अकाउंट की पड़ताल करके, उन्हें अपने रिसर्च से अलग किया. इसके बाद उन्होंने जिन लोगों की पहचान की, उनमें से 88 फ़ीसद, शिजोफ्रेनिया के शिकार थे. ये एक दिमाग़ी बीमारी है.

बड़ा सवाल ये है कि सोशल मीडिया से जमा आंकड़ों का किया क्या जाए?

इसके जवाब में इस रिसर्च के पैरोकार कहते हैं कि इनसे बीमारी की पड़ताल और इलाज में लगे लोगों की मदद हो सकती है. मसलन, माइक्रोसॉफ्ट की एक रिसर्च टीम ने ऐसे आंकड़ों की मदद से उन महिलाओं की पहचान की, जो बच्चा पैदा होने के बाद डिप्रेशन की शिकार थीं. जबकि इस मामले में मेडिकल रिसर्च बहुत ही कम हुई है.

हम मां बनने वाली महिलाओं के सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल से आंकड़े जुटाकर ये अंदाज़ा लगा सकते हैं, कि उनमें से कौन आगे चलकर डिप्रेशन की शिकार हो सकती हैं. वक़्त रहते उनकी मदद करके उन्हें डिप्रेशन में जाने से बचाया जा सकता है.

शब्द

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इस तरह के रिसर्च के विरोधी सबसे बड़ा सवाल लोगों की प्राइवेसी का उठाते हैं. डर है कि लोगों की दिमाग़ी सेहत का पता अगर कंपनियों को चल गया, तो वो उनसे भेदभाव कर सकती हैं. दिमाग़ी बीमार लोगों को नौकरी या रोज़गार मिलने में दिक़्क़त हो सकती है. बीमा कंपनियां ऐसे आंकड़ों के आधार पर लोगों का बीमा करने से मना कर सकती हैं.

बहुत से लोगों को पता ही नहीं कि उनके सोशल मीडिया अकाउंट से भी आंकड़े जुटाए जा सकते हैं. उनके ही शब्द, पोस्ट और तस्वीरें उनकी दिमाग़ी सेहत की चुगली कर सकती हैं.

वैसे हर बार आंकड़ों की मदद से सही भविष्यवाणी हो, ये ज़रूरी नहीं. जैसे कि गूगल के फ्लू ट्रेंड्स ने ग़लत दावा किया था कि किस वक़्त फ्लू की बीमारी बहुत ज़्यादा फ़ैल जाएगी.

जानकार कहते हैं कि ये आंकड़े आपके मददगार हो सकते हैं. गड़बड़ तब होती है, जब आप सिर्फ़ इन्हीं आंकड़ों पर भरोसा करके किसी नतीजे पर पहुंचना चाहते हैं.

नींद

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सोशल मीडिया पर आपकी हरकतें, आपकी मानसिक सेहत की तरफ़ इशारा करती हैं. आपकी पोस्ट, तस्वीरें और ट्वीट बताते हैं कि आपकी दिमाग़ी हालत कैसी है.

दुनिया भर में क़रीब दो अरब लोग नियमित रूप से सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं. इनकी गतिविधियों से आंकड़े निकालकर हम, दिमाग़ी सेहत बेहतर करने में काम ला सकते हैं.

आज की तारीख़ में किसी के डिप्रेशन में जाने से उसके डॉक्टर के पास पहुंचने में 6 से 8 बरस लग जाते हैं. चिंता के शिकार लोगों के बीच तो ये फ़ासला 9 से 23 बरस तक का है.

सोशल मीडिया इस फ़ासले को पाटने में मदद कर सकता है. लोगों को जल्द डॉक्टरी मदद मुहैया कराई जा सकती है, अगर हम उनके सोशल मीडिया आंकड़ों से मदद लें.

हमें इसका इस्तेमाल करना चाहिए.

बीबीसी फ़्यूचर पर अंग्रेज़ी में प्रकाशित ये मूल लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.

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