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क्या खाएं, क्या ना खाएं, कुछ समझ ना आए...
- Author, बिनाका नोग्राडी
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
मोटापा, एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया है. हर कोई इसका हल तलाशने में लगा है. लोग पहले ढेर सारा खा कर मोटे हो जाते हैं, फिर उसे कम करने के लिए तरह-तरह के नुस्ख़ें अपनाते हैं.
दिलचस्प बात ये है कि वज़न कम करने के लिए जो तरीक़े अपनाए जाते हैं, उनसे में भी ज़्यादातर कुछ ना कुछ खाने से जुड़े होते हैं.
19वीं सदी मे ब्रिटेन में एक जुमला बड़ा चलन में था. लोग, पूछते थे कि तुम दुबले लग रहे हो! क्या 'बैंटिंग' कर रहे हो? असल में 1860 में ब्रिटेन के एक हट्टे-कट्टे शख़्स ने डाइटिंग का नुस्खा दिया था.
उसका नाम था विलियम बैंटिंग. बैंटिंग, ताबूत बनाने का काम करते थे. लोगों के लिए ताबूत बनाते-बनाते उनका ध्यान इस तरफ़ गया कि मोटापे कि वजह से कम उम्र में ही लोगों को दुनिया से जाना पड़ जाता है.
इसीलिए बैंटिंग ने खान-पान में बदलाव का सुझाव दिया. उन्होंने लोगों को सलाह दी कि खाना ऐसा खाएं, जिसमें कार्बोहाइड्रेट कम से कम हो. और एक दिन में महज़ छह आउंस मांस खाया जाए.
लेकिन उसमें रेड मीट शामिल ना हो. लोग अपना वज़न कम करने के लिए बुनियादी तौर पर आसान तरीक़े अपनाना चाहते हैं.
बैंटिंग के नुस्खे के बाद से अब तक दुनिया में मोटापा घटाने के लिए बहुत तरह के खान-पान के सुझाव सामने आ चुके हैं. लेकिन इन सभी तरीकों से वज़न पर कितना असर पड़ता है, मोटापा कम हो पाता है या नहीं, ये बड़ा सवाल है.
सांइस में कोई खोज आख़िरी नहीं होती. एक रिसर्च के जो नतीजे आते हैं, उसमें आगे खोज की जाती है. फिर नए नतीजे सामने आते हैं. यही हाल खाने को लेकर भी है.
अगर आज किसी खाने को सेहत के लिए घातक बताया जा रहा है, तो हो सकता है कि बाद में किसी रिसर्च के बाद पता चले कि वो आपकी सेहत के लिए अच्छा है.
मिसाल के लिए कुछ वक़्त पहले तक ये कहा जाता था कि अंडे खाना सेहत के लिए बुरा है, क्योंकि इससे कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है. लेकिन 1995 एक नई रिसर्च में पता चला कि अगर हर रोज़ दो अंडे खाए जाएं, तो उससे सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता.
बल्कि ये कहा गया कि अंडे में प्रोटीन, विटामिन होते हैं. इसलिए संडे हो या मंडे, रोज़ खाएं अंडे.
1980 के दशक में कुछ इसी तरह की राय मक्खन के बारे में भी थी. माना जाता था कि मक्खन खाने से कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है.
लिहाज़ा, वनस्पतियों और जानवरों की चर्बी से बने मक्खन का चलन शुरू हो गया. इसे मार्जरीन कहा जाता है. लेकिन बाद में लोगों ने इसे भी सेहत के लिए नुक़सानदेह मानना शुरू कर दिया.
कितना अच्छा होता ना कि हमें मोटापे का डर ही ना होता. हमारा जो दिल चाहता, खा लेते और बाद में अखरोट या ब्लूबेरी खाकर सारी कैलोरी खत्म कर देते.
लेकिन अफ़सोस ऐसा हो नहीं सकता. इसीलिए हमें अपने खाने पर कंट्रोल करना पड़ता है. और तरह-तरह के डाइट चार्ट पर चलना पड़ता है.
इस चार्ट पर अमल करते-करते हम अक्सर ऐसी चीज़ों से भी परहेज़ कर बैठते हैं, जो हमारी सेहत के लिए ज़रूरी हैं.
ब्रिटिश जानकार रोज़मेरी स्टैंटन कहती हैं कि आजकल लोग अपने खान-पान को लेकर बहुत जागरुक हो रहे हैं. खुद को दुबला-पतला और फिट रखने के लिए तरह-तरह के सुपर फूड लेते हैं.
लेकिन वो ये भूल जाते है कि ये सुपर फूड जादू की छड़ी नहीं हैं. अच्छी सेहत पाने के लिए आपको अच्छा खाना खाना होगा. साथ ही नियमित रूप से वर्जिश करनी होगी. तभी आप सेहतमंद रह सकते हैं.
जब से लोगों ने इस बात पर ध्यान देना शुरू किया है कि कौन सी चीज़ें उनके लिए फ़ायदेमंद हैं और कौन सी नुक़सानदेह, तभी से कंपनियों ने इसका फ़ायदा उठाना शुरू कर दिया.
इस दावे के साथ बाज़ार में खान-पान के तमाम प्रोडक्ट उतारने शुरू कर दिए, जो लोगों की ज़रूरत पूरी करने के दावे पेश करते हैं.
जैसे, अगर लोगों को लगा कि उन्हें ऐसा नमक खाना चाहिए जिसमें आयोडीन हो. तो, कंपनियों ने आयोडीन वाला नमक बाज़ार में उतार दिया. इस दावे के साथ कि अगर आप उनकी कंपनी का नमक खाएंगे तो आपके शरीर की आयोडीन और नमक की कमी पूरी हो जाएगी.
इसके लिए आपको अलग से किसी दवा की ज़रूरत नहीं रहेगी. प्रोफेसर स्टेंटन कहती हैं कि ऐसे दावे करके कंपनियां लोगों को अच्छे क़ुदरती खाने से दूर करती हैं और बेपनाह मुनाफ़ा बनाती हैं. लेकिन इससे लोगों की सेहत को कोई फ़ायदा नहीं होता.
19वीं सदी में फ्रांस के एक प्रोफेसर मार्सिलिन बर्थोल्ट ने कहा था कि आने वाला समय पूरी तरह से केमिकल फूड पर निर्भर होगा.
इसी राय को साल 1896 में एक और लेखक ने आगे बढ़ाते हुए कहा था कि एक वक़्त ऐसा आएगा, जब मांस-मछली से मिलने वाले सभी पोषक तत्व एक गोली की शक्ल में आएंगे.
साल 1973 में एक फ़िल्म में इस ख़्वाब को बड़े पर्दे पर उतारा गया था. 'सॉयलेंट ग्रीन' नाम की इस फ़िल्म में किरदारों को पोषक तत्वों की केमिकल डाइट पर पलते हुए दिखाया गया था.
दिलचस्प बात ये कि बाद में 'सॉयलेंट' के नाम से ही एक सप्लीमेंट भी बाज़ार में उतारा गया. अब ये आपको तय करना है कि सेब, मांस से बने व्यंजन या चीज़ खाने के बजाय क्या सिर्फ़ टैबलेट खाकर काम चलाना चाहेंगे?
एक और फ़िल्म में ये कल्पना की गई थी कि इंसान की ज़रूरत का सारा प्रोटीन समंदर से लिया जाए. फिलहाल हम सभी जितना प्रोटीन खाते हैं, उसका 16 फ़ीसद हिस्सा समुद्र से ही आता है.
शैवाल या एक ख़ास तरह की काई को भी खाने में शामिल किया जा सकता है. जैसे स्प्रिलिना नाम का शैवाल लोग खाते हैं.
लेकिन इस दिशा में रिसर्च की जा रही है कि समुद्र में मौजूद पेड़-पौधों में से किस में अच्छे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा मौजूद है? माना जा रहा है कि शैवाल इस तरह की एक फ़सल हो सकती है.
मार्गरेट एटवुड ने अपने साइंस फंतासी उपन्यास 'ओरिक्स ऐंड क्रेक' में लैब में मीट बनाने का ख़्वाब दिखाया था. इस दिशा में काम भी चल रहा है. हो सकता है कि आने वाले समय में लैब में ही मीट भी बनाया जाने लगे.
लेकिन सारी दुनिया में गोश्त खाने वालों की दीवानगी इस बात को शायद बर्दाशत नहीं करेगी. क्योंकि असली ज़ायक़े के लिए उन्हें ज़िंदा जानवर का मीट ही चाहिए. लैब में बना गोश्त उन्हें रास नहीं आएगा.
बहरहाल, सभी पोषक तत्व देने वाला खाना लैब में बनाकर या टैबलेट की शक़्ल में लोगों को परोस दिए जाए, ये मुमकिन नहीं.
अगर होगा भी, तो असली खाने की जगह वो नहीं ले सकते. साथ ही ये सवाल भी उठ सकता है कि अगर किसी इंसान की ज़िंदगी इस तरह लैब में बने खाने पर ही निर्भर होगी, तो क्या वो वाक़ई कोई ज़िंदगी होगी?
इन सभी सवालों और ख़्यालों पर चर्चा के लिए बीबीसी फ्यूचर, वर्ल्ड चेंजिंग आइडिया समिट आयोजित कर रहा है. ये ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में 15 नवंबर को होगा. इसमें दुनिया भर से खान-पान के दिग्गज जुटेंगे.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)
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