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इंसान आख़िर कपड़े क्यों पहनता है?
- Author, मेलिसा होजनबूम
- पदनाम, बीबीसी अर्थ
कभी आपके ज़ेहन में सवाल आया है कि इंसान कपड़े क्यों पहनता है? आख़िर इंसान भी दूसरे जानवरों की तरह एक प्राणी ही तो है. फिर जब बाक़ी जानवर कपड़े नहीं पहनते तो आख़िर इंसान ने ऐसा करना क्यों शुरू कर दिया?
आप कहेंगे कि समाज में नंगे रहना ख़राब माना जाता है, इसलिए कपड़े पहनते हैं. यह भी कह सकते हैं कि ठंड से बचने के लिए इंसान कपड़े पहनता है. कई बार तेज़ धूप से ख़ुद को बचाने के लिए भी इंसान कपड़ों को ढाल बनाता है.
मगर दुनिया में आज भी बहुत से ऐसे इंसान हैं जो कपड़े नहीं पहनते. बहुत से आदिवासी हैं जो बिना कपड़ों के ही रहते हैं. वे ठंड और गर्मी के मौसम का सामना बिना कपड़ों के ही करते हैं. क़ुदरती तौर पर भी इंसान, बिना कपड़ों के भी दुनिया में आता है.
फिर आख़िर ये कपड़े पहनने की शुरुआत हुई कहां से और कब से?
इंसानों के, दूसरे जानवरों की तरह मौत के बाद भी कंकाल रह जाते हैं. और काफ़ी बार बचे भी रह जाते हैं. इस वजह से हम इंसान के विकास का इतिहास जानते हैं. मगर कपड़ों के तो कंकाल बनते नहीं, इनके विकास की कहानी हमें पक्के तौर पर नहीं मालूम. हां, वैज्ञानिकों ने दूसरे तरीक़ों से इंसान के कपड़े पहनने का इतिहास जानने-समझने की कोशिश की है.
इंसानों के विज्ञान के जानकार यानी एंथ्रोपोलॉजिस्ट मानते हैं कि इंसान ने क़रीब एक लाख सत्तर हज़ार साल पहले, अपने तन को ढंकना शुरू किया था. इस बात की बुनियाद है जूं.
जूं की दो नस्लें ऐसी होती हैं जो इंसान के बदन पर पायी जाती हैं. एक सिर के बालों में. दूसरी बदन के बालों में छुपकर ज़िंदगी बसर करती है. वैज्ञानिक मानते हैं कि एक जूं की ये दो नस्लें तभी पैदा हुई होंगी, जब इंसान ने कपड़े पहनने शुरू किए होंगे. कुछ जुएं उन कपड़ों में भी रहने लगीं. वहीं जो पहले वाली नस्ल थी वो हमारे बालों में ही छुपकर बसर करती रही.
आज से एक लाख सत्तर हज़ार साल पहले आज का इंसान अफ्रीका में अच्छी ख़ासी ज़िंदगी बसर कर रहा था. उसके शरीर पर ज़्यादा बाल नहीं बचे थे.
शरीर के ये बाल ही गर्मी और ठंड से दूसरे वानरों को बचाते थे. मगर इंसान के बाल नहीं बचे थे. इसी वजह से वो जानवरों की खाल को ओढ़ने लगा, ताकि धूप और ठंड से ख़ुद को बचा सके.
लेकिन इस सिद्धांत के उलट बहुत से आदिवासी ऐसे हैं जो आज भी बिना कपड़ों के रहते हैं. तो सिर्फ़ बदन को ढंकना और ठंड-धूप से बचाना ही कपड़े पहनने की वजह नहीं रही होगी.
हालांकि जो आदि मानव अफ्रीका के बाहर, जैसे यूरोप में रहते थे, उन्हें ठंड से बचने के लिए बदन ढंकने की ज़रूरत पड़ी होगी. जैसे कि आज के इंसानों से पहले की प्रजाति निएंडरथल मानव, जो यूरोप में रहते थे, उन्हें ठंड से बचने के लिए किसी चीज़ की ज़रूरत महसूस हुई होगी.
आज के मानव और निएंडरथल मानव के पुरखे एक ही थे. इन्हीं से दो नस्लें पैदा हुईं. इससे साफ़ है कि कपड़ों का आविष्कार, हमसे पहले निएंडरथल मानवों ने किया होगा.
डेनमार्क के नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम के नैथन वेल्स कहते हैं कि कपड़ों को लेकर आज के इंसान और निएंडरथल की सोच में फ़र्क़ था.
वेल्स मानते हैं कि ठंड के दिनों में निएंडरथल अपने बदन का सत्तर से अस्सी फ़ीसद हिस्सा ढंककर रखते रहे होंगे. उनके मुक़ाबले आज के इंसानों के पुरखों को अपने बदन का 90 फ़ीसद हिस्सा ढंककर रखने की ज़रूरत महसूस हुई होगी.
आज उनके पहनावे के बारे में हमें थोड़ी-बहुत जानकारी है.
वैज्ञानिक मानते हैं कि निएंडरथल मानव, आम तौर पर जानवरों की खाल उधेड़कर उसे सुखाकर बदन पर लपेट लेते रहे होंगे. उनके मुक़ाबले हमारे पुरखे, जानवरों की खाल को काट-छांटकर और कई बार सी कर पहनते रहे होंगे.
इस बारे में कनाडा की साइमन फ्रेज़र बर्नबी यूनिवर्सिटी के मार्क कोलार्ड की अगुवाई में एक रिसर्च हुई. जिसके मुताबिक़ हमारे पुरखे ऐसे जानवरों का शिकार करते थे जिनकी खालें ज़्यादा घने बालों वाली और मोटी होती थीं. जैसे कि ठंडे इलाक़ों में पाए जाने वाले भेड़ियों की खाल. ये आदि मानवों के ज़्यादा काम की रही होंगी.
आज भी ठंडे इलाक़ों में रहने वाले एस्किमो, वोल्वेराइन का ही शिकार करते हैं. और उनकी खालों को बदन ढंकने के काम में लाते हैं.
नैथन वेल्स मानते हैं कि हमारे पुरखे, निएंडरथल मानवों से अलग बर्ताव करते थे. हालांकि उन्हें खाल काटने-छांटने के औज़ार शायद निएंडरथल मानवों से ही मिले. क्योंकि आज के इंसान के पुरखों से पहले ही निएंडरथल ने हड्डियों से औज़ार बनाना सीख लिया.
ये औज़ार आदि काल की इंसानी बस्तियों से पहले निएंडरथल मानवों के ठिकानों पर मिले. तो शायद निएंडरथल से हमारे पुरखों ने ये औज़ार बनाना सीखा और उनका बेहतर इस्तेमाल किया.
आज से तीस हज़ार साल पहले जब आइस एज या हिम युग शुरू हुआ तो निएंडरथल उस बेहद सर्द माहौल का सामना नहीं कर पाए और उनका ख़ात्मा हो गया. उनके मुक़ाबले हमारे पुरखों ने बदन ढंकने के लिए बेहतर कपड़े बनाना सीख लिया था,
आज के इंसान की नस्ल उस हिम युग में भी बच गई. उस दौर के कई सबूत वैज्ञानिकों ने इकट्ठे किए हैं. जैसे कि जॉर्जिया कि ज़ुज़ुआना गुफा में रंगे हुए रेशे मिले हैं. इनसे ऐसा लगता है कि उस दौर में इंसान ने कपड़े सीने की कला सीख ली थी.
इससे ये भी पता चलता है कि कपड़े सिर्फ़ बदन ढंकने के लिए नहीं इस्तेमाल होते थे. उनका इस्तेमाल सजावट के लिए भी होता था.
आज भी बहुत से आदिवासी जो कपड़े नहीं पहनते, वे अपने बदन को तरह-तरह से रंगते हैं. निएंडरथल मानवों के भी अपने बदन को गेरुए रंग से रंगने के सबूत मिले हैं.
इससे साफ़ है कि कपड़ों का इस्तेमाल बदन ढंकने के साथ ही सजावट के लिए भी होता था. जब सिर्फ़ बदन को रंगने से काम नहीं चला, तो इंसान ने बदन को ढंकने के लिए कपड़े पहनने की सोची. फिर उसमें भी रंग डाले गए.
आज की तारीख़ में कपड़े किसी की शख़्सियत की, उसके देश की, उसके समाज की नुमाइंदगी करते हैं. कपड़े और पहनावा हमारी पहचान बन चुके हैं. दक्षिण भारत और श्रीलंका में लुंगी पहनने का चलन है. वहीं राजस्थान में पगड़ी बांधने का चलन है. पहनावे से हम किसी इंसान के समाज और देश का अंदाज़ा लगा लेते हैं.
यानी कभी ठंड और गर्मी से बचने के लिए पहने जाने वाले कपड़े, आज इंसान की पहचान का अहम हिस्सा बन गए हैं.