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क्या किसी नस्ल या रंग में वाक़ई कुछ ख़ास होता है?
किसी ख़ास नस्ल के साथ मिथकों और किसी विशेष तरह की राय का जुड़ना आम बात है लेकिन यह आमतौर पर ग़लत होते हैं.
अक्सर इस तरह की राय वे लोग नहीं व्यक्त करते जो खुले तौर पर नस्लवादी होते हैं बल्कि ऐसे लोग रखते हैं जिनकी पहचान नस्लवादी के तौर पर नहीं होती है.
कई लोग अनुभवों और सांस्कृतिक इतिहास की वजहों से इस तरह से निष्कर्ष पर पहुंचते हैं लेकिन इन धारणाओं का कोई अनुवांशिक आधार नहीं होता. मसलन इस तरह की धारणाएं आमतौर पर व्याप्त हैं कि पूर्वी एशिया क्षेत्र के छात्र गणित में अच्छे होते हैं, काले लोग सुरीले होते हैं या फिर यहूदियों के पास ज़्यादा पैसा होता है. हम अपने आस-पास इस तरह के किसी न किसी को ज़रूर जानते हैं जो इस तरह की बातों पर यकीन रखते हैं.
आनुवंशिकी विशेषज्ञ और बीबीसी प्रस्तुतकर्ता डॉक्टर एडम रदरफोर्ड का कहना है, ''आज की तारीख़ में किसी भी वक़्त से ज़्यादा सार्वजनिक तौर पर नस्लवाद दिखता है. इसलिए हमारा कर्तव्य बनता है कि हम तथ्यों के साथ इसका मुक़ाबला करें.''
वो तथ्य और मिथक को समझने की एक वैज्ञानिक समझ हमारे सामने रखते हैं.
यहां हम ऐसे ही पांच नस्लीय मिथकों की असलियत वैज्ञानिक तथ्य के सहारे पेश कर रहे हैं:
मिथक 1: गोरे और काले लोगों के डीएनए पूरी तरह से अलग-अलग होते हैं.
इंसानी त्वचा में मेलानिन पाया जाता है जिससे इंसान के त्वचा का रंग निर्धारित होता है. यह बुनियादी तौर पर सूरज की रौशनी से हमें बचाता है.
यह सूरज की रौशनी में व्याप्त अल्ट्रा वायलेट किरणों को सोखता है जिससे कि वे शरीर में पाई जाने वाली फोलोट विटामिन को नुकसान नहीं पहुंचा पाती है.
मेलानिन के बनने की बायोकेमिकल प्रक्रिया में कई तरह के जीन की भूमिका होती है. इन जीन में प्राकृतिक रूप से मौजूद होने वाली विविधता अलग-अलग तरह की त्वचा के लिए ज़िम्मेवार होती है.
इसलिए गोरे और काले लोगों के बीच इंसानी नस्ल के सबसे बड़े आनुवंशिक अंतर की बात तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है.
इंसानों की सारी नस्लों में लगभग एक जैसी ही डीएनए पाई जाती है. यह एक ऐसा तथ्य है जो इस धारणा को तोड़ती है कि इंसानों की सारी नस्लों की उत्पत्ति अफ्रीका से हुई है.
दूसरी ओर अफ्रीकी महादेश में आनुवंशिक विविधता दुनिया के सभी दूसरे इलाकों को एक साथ रख दिया जाए तो उसकी तुलना में अधिक पाई जाती है.
दक्षिणी अफ्रीका के दो अलग-अलग आदिवासी समुदायों के सदस्य किसी श्रीलंकाई या रूसी या फिर किसी दूसरे जगह से लोगों से ज़्यादा आनुवंशिक रूप से एक-दूसरे से जुदा हो सकते हैं.
हम भले ही ऊपरी तौर पर देखकर लोगों को गोरे, काले या भूरे रंग में बांटें लेकिन वाकई में यह उनके आनुवंशिक रूप से अलग-अलग या फिर एक जैसे होने की पुष्टि नहीं करते.
मिथक 2:'नस्लीय शुद्धता' जैसी कोई चीज़ नहीं होती
हम किसी ख़ास क्षेत्र या लोगों को किसी विशेष पहचान के खांचे में बांटकर देखते हैं. ये बंटवारा हम भौगोलिक या सांस्कृतिक तौर पर करते हैं जो की लगता है कि शाश्वत सत्य है लेकिन ना ही ऐतिहासिक और ना ही अनुवांशिक तौर पर यह सच है. किसी भी राष्ट्र और नस्ल में बदलाव होते रहते हैं.
डॉक्टर रदरफोर्ड कहते हैं, "इतिहास में लोग एक जगह से दूसरी जगह पर दुनियाभर में जाते रहे हैं और वहां वे स्थानीय लोगों के संपर्क में आए और उनके संबंध बने."
ज़्यादातर ऐसा होता है कि कई पीढ़ियों में इस तरह के बदलाव धीरे-धीरे होते हैं और कभी-कभार कम समय में तेज़ी से ये बदलाव होते हैं.
जब धीमे-धीमे ये बदलाव की प्रक्रिया होती है तो लगता है कि भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से किसी ख़ास नस्ल के साथ कोई पहचान जुड़ गई है.
डॉक्टर रदरफोर्ड कहते हैं, "किसी भी नाज़ी का कोई भी यहूदी पूर्वज हो सकता है. किसी भी नस्लवादी गोरे का मध्य-पूर्व के पूर्वजों से राब्ता हो सकता है और नस्लीय श्रेष्ठता में यकीन रखने वाले का कोई अफ्रीकी, भारतीय और पूर्वी एशियाई पूर्वज हो सकता है."
उनका कहना है, "नस्लीय शुद्धता एक कोरी कल्पना छोड़ और कुछ नहीं. इंसानों में ख़ून की शुद्धता जैसा कुछ नहीं है."
मिथक 3: 'सिर्फ़ जर्मन लोगों के लिए है जर्मनी और तुर्कियों के लिए हैं तुर्की'
कुछ लोगों में बाहर से आने वाले लोगों के लिए बहुत ग़ुस्से की भावना होती है. इस तरह की भावना दुनिया के सभी देश के लोगों में होती है.
हाल ही में 19 फ़रवरी को जर्मनी के हनाऊ शहर के एक बार में गोलीबारी की घटना हुई थी. यह घटना उस अति दक्षिणपंथी भावना से प्रेरित थी जो प्रवासियों के प्रति नफ़रत की भावना रखती है और उन्हें देश से बाहर निकालने की बात करता है.
इस तरह की सोच रखने वाले ये मानते हैं कि जर्मनी सिर्फ़ जर्मन लोगों, तुर्की सिर्फ़ तुर्कियों, फ्रांस सिर्फ फ्रेंच और इटली सिर्फ इतालवी लोगों के लिए होना चाहिए.
"जहां से आए हो वहां वापस जाओ" जैसे नारे पूरी दुनिया में हर कहीं सुनाई पड़ते हैं.
सच तो यह है कि जर्मनी, फ्रांस, तुर्की और इटली जैसे देशों में हमेशा से लोग आते रहे हैं. ऐसा ही दुनिया के दूसरे हिस्सों के साथ भी है.
वो ब्रितानी द्वीप समूह जो क़रीब 7500 साल पहले महाद्वीप से अलग हो गए थे, वहां बड़ी मात्रा में अप्रवासी गए और बस गए.
1066 से पहले फ्रांस पर वाइकिंग्स, एंगल्स, सैक्सन और हूण जैसे दर्जनों आदिवासी समूहों ने कब्जा जमाया और वहां रहे.
क़रीब 4500 साल पहले ब्रिटेन में मुख्य तौर पर किसान रहते थे जो यूरोप के दूसरे-दूसरे हिस्सों से आए थे. ख़ास तौर पर नीदरलैंड्स और पूर्वी एंग्लिया में यह आवाजाही लगातार जारी रहती थी.
डीएनए के आधार पर हम उनके गोरे रंग, काले बाल और भूरी आंखों का अनुमान लगा सकते हैं. लेकिन पहले जब वो शिकारी हुआ करते थे तब उनका रंग गहरा होता था.
इसलिए जब कभी भी कोई नस्लीय राजनीतिक पार्टी जर्मनी सिर्फ़ जर्मन लोगों, तुर्की सिर्फ़ तुर्कियों, फ्रांस सिर्फ़ फ्रेंच और इटली सिर्फ़ इतालवी लोगों के लिए या फिर मूल निवासी का मुद्दा उठाता है तो वाकई में उनका मतलब क्या होता है?
मिथक 4: जीन टेस्ट से यह साबित हो सकता है कि कोई 100 फ़ीसदी गोरा है
वंशावली और अपने पूर्वजों के साथ हमारे संबंध हमें रोमांचित करते हैं. ख़ासतौर पर नस्ल में यकीन रखने वालों को.
स्टॉर्मफ्रंट जैसी वेबसाइट गोरे राष्ट्रवादी और वर्चस्वादी बहुत पसंद करते हैं.
ऐसे लोग जीन से जुड़ हुए टेस्ट करवाते हैं जो यह साबित करे कि वे ग़ैर-यहूदी 100 फ़ीसदी गोरे हैं. हालांकि यह तर्क बेमानी है.
डीएनए आपको अपने परिवार के बारे में कुछ दिलचस्प बातें बता सकता है और यह आपके अपने नज़दीकी संबंधियों और माता-पिता के बारे में बता सकता है. लेकिन जीव-विज्ञान में इसके प्रभाव की एक सीमा है.
समय के साथ अपने असल पूर्वजों के डीएनए का प्रभाव आपके अंदर कम होने लगता है और धीरे-धीरे यह अगली से अगली पीढ़ी में क्षीण होता चला जाता है.
मसलन ग्यारह पीढ़ी पहले के पूर्वजों के सिर्फ आधे ही डीएनए आप में बचे रहते हैं. इसलिए यह संभंव है कि अपने पूर्वजों के साथ आपकी जो आनुवंशिक संबंधता है वो अलग हो जाए.
डॉक्टर रदरफोर्ड कहते हैं, "आपके अंदर दुनियाभर के अलग-अलग लोगों के जीन मौजूद हो सकते हैं. उन लोगों के जिनके बारे में आपको पता है और उन लोगों के भी जिनके बारे में आपको जानकारी नहीं है. निश्चित तौर पर इनमें से कई के साथ आपके बहुत सार्थक आनुवांशिक संबंध नहीं होंगे."
5. गोरों की तुलना मेंकाले अच्छे धावक होते हैं
1980 में आख़िरी बार किसी गोरे ने ओलंपिक के 100 मीटर प्रतिस्पर्धा में जीत दर्ज की थी.
उसके बाद से अब तक काले लोगों का इस क्षेत्र में दबदबा बरकरार है. इसने इस धारणा को मज़बूती प्रदान की है कि अफ्रीकी नस्ल के लोगों को खेल-कूद में उनके आनुवंशिक गुण की वजह से फ़ायदा मिलता है.
डॉक्टर रदरफोर्ड का इस बारे में कहना है, "कोई जीन के आधार पर स्पोर्ट्स में मिलने वाली संभावित सफलता और नस्ल को जोड़ सकता है लेकिन यह एक कमज़ोर अनुमान होगा."
सच तो यह है कि खेल-कूद में मिलने वाली सफलता को आनुवंशिकता से जोड़ना एक ग़ैर-तार्किक कोशिश है.
रदरफोर्ड कहते हैं कि कई ऐसी शारीरिक विशेषताएं हैं जो इसके लिए ज़िम्मेवार हैं जैसे हृदय का आकार, ऑक्सीजन लेने की क्षमता और मांसपेशियों की मज़बूती.
इन सभी विशेषताओं का आनुवंशिक आधार तो है लेकिन इसके अलावा कई ऐसी विशेषताएं हैं, जिसके बारे में अभी ठीक से समझा नहीं जा सका है.
इसमें कई मनोवैज्ञानिक पहलू शामिल हैं जैसे लगन, दृढ़ निश्चय और जोखिम लेने जैसे गुण.
अध्यन से पता चला है कि जिन स्पोर्ट्स में ज़्यादा ताक़त और स्टेमिना की ज़रूरत पड़ती है उनके कामयाब एथलीट्स में आर-टाइप के एसीटीएन3 जीन की कॉपी पाई जाती हैं.
अफ्रीकी-अमरिकी एथलीट्स में यह जीन जहां 96 फ़ीसदी होता है तो वहीं गोरे अमरीकियों में 80 फ़ीसदी होता है. इससे अफ्रीकी-अमरीकी एथलीट्स को ज़रूर थोड़ा फ़ायदा मिलता है लेकिन यह गोरे और काले एथलीटों के बीच किसी बड़े फ़र्क को नहीं दिखाता है.
अगर इस जीन के आधार पर तुलना करें तो छह काले धावक पांच गोरे धावक के बराबर होंगे.
रदरफोर्ड कहते हैं कि यह एक सरलीकृत विश्लेषण है लेकिन यह ज़रूर दिखाता है कि स्पोर्ट्स में जीन की कोई भूमिका नहीं होती है.
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